दीवार पर लगी पुरानी घड़ी कई साल पहले ही बंद हो चुकी थी, लेकिन राघव ने उसे कभी दीवार से नहीं उतारा।
हर सुबह काम पर जाने से पहले वह कुछ पल उस घड़ी को जरूर देखता था।
उसे उस समय की याद आती थी, जब उसके बच्चे छोटे थे।
तब उसका घर बच्चों की आवाजों से भरा रहता था।
उसकी बेटी मीरा छोटे-छोटे कदमों से आँगन में दौड़ती रहती थी और उसका बेटा अर्जुन उसके पीछे भागता हुआ उसकी लकड़ी की खिलौना गाड़ी छीनने की कोशिश करता था। उनकी माँ सीता रसोई के दरवाजे के पास बैठकर दोनों की नोकझोंक देखकर मुस्कुराती रहती थी।
लेकिन वह समय ज्यादा दिनों तक नहीं रहा।
जब मीरा केवल आठ साल की थी और अर्जुन ग्यारह साल का, तभी उनकी माँ सीता इस दुनिया से चली गई।
उस दिन के बाद राघव ही अपने बच्चों के लिए माँ और पिता दोनों बन गया।
उसके पास न कोई बड़ा घर था, न बैंक में जमा पैसे और न ही कोई ऐसा रिश्तेदार जो हर महीने उसकी मदद कर सके। वह पास के शहर में मजदूरी करता था।
हर सुबह सूरज निकलने से पहले वह घर से निकल जाता।
और हर शाम थकी हुई आँखों और धूल से भरे कपड़ों के साथ घर लौटता।
लेकिन जैसे ही वह अपने बच्चों को दरवाजे पर उसका इंतजार करते देखता, उसके चेहरे पर मुस्कान आ जाती।
वह कभी नहीं चाहता था कि उसके बच्चे उसकी परेशानियों को समझें।
एक शाम अर्जुन दौड़ता हुआ उसके पास आया।
“पापा, मेरे शिक्षक ने कहा है कि अगर मैं मेहनत करूँ तो मैं कॉलेज जा सकता हूँ। मैं इंजीनियर बनना चाहता हूँ।”
राघव ने अपने बेटे की तरफ देखा।
कुछ पल तक वह चुप रहा।
इंजीनियरिंग की पढ़ाई उसके लिए बहुत बड़ा सपना था।
उसकी फीस इतनी थी जितने पैसे उसने एक साथ कभी नहीं देखे थे।
फिर भी उसने बेटे के सिर पर हाथ रखा और मुस्कुराते हुए कहा,
“तो मेहनत से पढ़ाई करो। पैसों का इंतजाम मैं करूँगा।”
अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।
“लेकिन पापा, अगर हमारे पास पैसे नहीं हुए तो?”
राघव मुस्कुराया।
“पिता का काम रास्ता ढूँढ़ना है, बहाना ढूँढ़ना नहीं।”
राघव की यह बात अर्जुन के दिल में हमेशा के लिए बस गई।
कुछ महीनों बाद मीरा भी अपनी स्कूल की अंकतालिका लेकर घर आई।
उसके बहुत अच्छे नंबर आए थे।
उसने अपने पिता से कहा,
“पापा, मैं बड़ी होकर अध्यापिका बनना चाहती हूँ।”
राघव ने अपने दोनों बच्चों को देखा।
एक बेटा इंजीनियर बनना चाहता था और बेटी अध्यापिका।
उसने कुछ पल दीवार पर लगी पुरानी घड़ी को देखा।
फिर बोला,
“तुम दोनों पढ़ोगे। चाहे कुछ भी हो जाए, मैं पैसों को तुम्हारे भविष्य का फैसला नहीं करने दूँगा।”
उस दिन के बाद राघव ने और ज्यादा मेहनत करना शुरू कर दिया।
जब भी अतिरिक्त काम मिलता, वह उसे कर लेता।
दिन में वह निर्माण स्थल पर ईंटें उठाता और रात में एक छोटे से गोदाम में बोरे उतारने का काम करता।
उसके हाथों में कठोरता आ गई।
उसकी कमर में अक्सर दर्द रहने लगा।
लेकिन हर महीने वह बच्चों की फीस जरूर जमा करता।
कई रातें ऐसी भी आतीं जब राघव खुद कम खाना खाता, ताकि उसके बच्चों के लिए पर्याप्त खाना बचा रहे।
जब बच्चे पूछते कि पापा खाना क्यों नहीं खा रहे हैं, तो वह हमेशा एक ही जवाब देता।
“मैंने बाहर खाना खा लिया था।”
बच्चे उसकी बात पर विश्वास कर लेते।
समय बीतता गया।
अर्जुन का दाखिला पास के शहर के एक इंजीनियरिंग कॉलेज में हो गया।
पहले साल की फीस इतनी थी कि राघव के लिए उसका इंतजाम करना बहुत मुश्किल था।
आखिरकार उसने अपने पिता से मिली जमीन का छोटा-सा टुकड़ा बेच दिया।
जब अर्जुन को यह बात पता चली तो वह बहुत दुखी हुआ।
“पापा, आपने मेरे लिए जमीन बेच दी?”
राघव ने शांत आवाज में कहा,
“जमीन दोबारा खरीदी जा सकती है, लेकिन तुम्हारे जीवन का यह समय दोबारा नहीं आएगा।”
अर्जुन ने अपने पिता से वादा किया,
“पापा, आपकी मेहनत बेकार नहीं जाने दूँगा।”
मीरा भी अपनी पढ़ाई जारी रखे हुए थी।
उसे दूसरे शहर में अध्यापिका बनने का प्रशिक्षण लेने का मौका मिला।
फिर राघव ने पैसों का इंतजाम किया।
लेकिन इस बार मीरा ने अपने पिता में एक बदलाव महसूस किया।
राघव अब पहले की तरह तेज कदमों से नहीं चलता था।
एक शाम मीरा ने पूछा,
“पापा, आप ठीक हैं?”
राघव हँसते हुए बोला,
“मैं बिल्कुल ठीक हूँ। तुम्हारा पिता पत्थर का बना है।”
मीरा मुस्कुरा तो दी, लेकिन उसे अपने पिता की बात पर भरोसा नहीं हुआ।
वह समझ चुकी थी कि उसके पिता उससे अपना दर्द छिपा रहे हैं।
एक सर्द सुबह राघव हमेशा की तरह जल्दी उठ गया।
उसने बिस्तर से उठने की कोशिश की, लेकिन उसके पैर कुछ कमजोर महसूस हुए।
वह कुछ देर बिस्तर के किनारे बैठा रहा।
पहली बार उसे लगा कि उसका शरीर अब उसके सपनों का साथ नहीं दे रहा था।
फिर भी वह काम पर चला गया।
उस शाम वह घर लौटा तो उसके हाथ में एक छोटा-सा लिफाफा था।
उसमें मीरा की अगली पढ़ाई की फीस के पैसे थे।
उसने वह लिफाफा चुपचाप मीरा की किताब के अंदर रख दिया।
कुछ देर बाद मीरा की नजर उस पर पड़ी।
उसने पैसे देखे और फिर अपने पिता की तरफ देखा।
“पापा, ये पैसे कहाँ से आए?”
राघव ने कहा,
“काम करके कमाए हैं।”
मीरा की आँखों में आँसू आ गए।
“आपको इतनी मेहनत नहीं करनी चाहिए।”
राघव मुस्कुराया।
“एक दिन जब तुम अध्यापिका बनोगी, तब अपने बच्चों को बताना कि शिक्षा महँगी हो सकती है, लेकिन अपने सपने को छोड़ देना उससे भी महँगा पड़ सकता है।”
मीरा अपने आँसू नहीं रोक सकी।
उसने अपने पिता को गले लगा लिया।
पहली बार राघव की आँखों से भी आँसू निकल आए।
कई साल बाद अर्जुन ने अपनी इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी कर ली।
उसे एक बड़ी कंपनी में नौकरी मिल गई।
जब वह नौकरी का पत्र लेकर घर आया तो उसने वह कागज अपने पिता के सामने रख दिया।
“पापा, मुझे नौकरी मिल गई।”
राघव ने उस पत्र को दो बार पढ़ा।
उसकी आँखें नम हो गईं।
वह कुछ बोल नहीं पाया।
उसने बस अपने बेटे को गले लगा लिया।
अर्जुन ने धीरे से कहा,
“यह सिर्फ मेरी सफलता नहीं है, पापा। यह आपकी सफलता भी है।”
कुछ समय बाद मीरा ने भी अपना प्रशिक्षण पूरा कर लिया और उसे एक स्कूल में अध्यापिका की नौकरी मिल गई।
कई वर्षों बाद पहली बार राघव ने मजदूरी करना बंद किया।
एक शाम पूरा परिवार साथ बैठा था।
टेबल पर खाना रखा था।
घर में हँसी थी।
और दीवार पर वही पुरानी घड़ी अब भी टंगी थी।
अर्जुन ने घड़ी की तरफ देखते हुए कहा,
“पापा, आप इस घड़ी को ठीक क्यों नहीं करवाते?”
राघव मुस्कुराया।
“तुम्हारी माँ के रहते यह घड़ी बंद हुई थी। मैंने इसे इसलिए संभालकर रखा, क्योंकि यह मुझे उस समय की याद दिलाती है जब हम चारों साथ थे।”
मीरा ने अपने पिता का हाथ पकड़ते हुए कहा,
“तो कल इसे ठीक करवाते हैं।”
राघव ने सिर हिला दिया।
अगली सुबह अर्जुन उस घड़ी को एक कारीगर के पास ले गया।
शाम को जब वह घड़ी ठीक करवाकर वापस आया तो उसे दीवार पर लगा दिया।
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घड़ी की आवाज पूरे घर में गूँजने लगी।
राघव काफी देर तक उसके नीचे खड़ा रहा।
फिर मुस्कुराकर बोला,
“इसकी आवाज आज कुछ अलग लग रही है।”
अर्जुन ने पूछा,
“कैसे?”
राघव ने अपने दोनों बच्चों की तरफ देखा।
“पहले मुझे लगता था कि समय मुझसे सब कुछ छीन रहा है।”
वह कुछ पल रुका।
“लेकिन अब समझ आया कि समय मेरे लिए कुछ वापस भी ला रहा था।”
बच्चे उसकी बात को समझने की कोशिश करने लगे।
राघव ने आगे कहा,
“मैंने तुम्हारी माँ को खो दिया। अपनी जवानी खो दी। अपनी ताकत खो दी। लेकिन मैंने तुम्हें आगे बढ़ाने की वजह कभी नहीं खोई।”
मीरा ने उसका हाथ कसकर पकड़ लिया।
“वह वजह क्या थी, पापा?”
राघव ने दोनों बच्चों की तरफ देखा और मुस्कुराया।
“तुम दोनों।”
कुछ साल बाद अर्जुन ने परिवार की वही छोटी-सी जमीन वापस खरीद ली।
मीरा ने उसकी मदद से वहाँ गरीब बच्चों के लिए एक छोटा-सा पुस्तकालय बनवाया।
उस जगह का नाम उन्होंने अपनी माँ की याद में रखा—
“सीता लर्निंग सेंटर।”
राघव अक्सर दोपहर के समय पुस्तकालय के बाहर बैठा रहता और बच्चों को किताबें लेकर अंदर जाते देखता।
एक दिन एक छोटा बच्चा उसके पास आया।
उसने पूछा,
“चाचा, आपने यह जगह क्यों बनवाई?”
राघव मुस्कुराया।
“मैंने नहीं बनवाई।”
बच्चे ने हैरानी से पूछा,
“फिर किसने बनवाई?”
राघव ने अर्जुन और मीरा की तरफ इशारा किया।
“उन्होंने।”
बच्चे ने फिर पूछा,
“क्यों?”
राघव ने पुस्तकालय की ओर देखते हुए कहा,
“क्योंकि कभी उनके पिता ने उनके लिए एक सपना देखा था।”
बच्चे ने पूछा,
“और अब?”
राघव मुस्कुराया।
“अब उनका सपना है कि किसी दूसरे बच्चे को भी वह मौका मिले, जो कभी उनके पिता ने उन्हें दिया था।”
बच्चा दौड़कर पुस्तकालय के अंदर चला गया।
राघव वहीं चुपचाप बैठा रहा।
उसके ऊपर वही पुरानी घड़ी अब भी चल रही थी।
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कई वर्षों तक राघव को लगता रहा कि एक पिता का सबसे बड़ा कर्तव्य अपने बच्चों को खाना, कपड़े और शिक्षा देना है।
लेकिन समय के साथ उसे एक और गहरी बात समझ आई।
माता-पिता हमेशा अपने बच्चों को एक आसान जिंदगी नहीं दे सकते।
कभी-कभी वे बस इतनी देर तक उनके साथ खड़े रहते हैं कि बच्चे अपनी मुश्किलों से लड़ना सीख जाएँ।
राघव ने अपने बच्चों को दौलत नहीं दी थी।
उसने उन्हें एक मौका दिया था।
और उसके बच्चों ने उस मौके को अपनी जिंदगी में बदल दिया।
राघव ने अपना पूरा जीवन उनके बेहतर कल के लिए लगा दिया था।
उसे कभी एहसास ही नहीं हुआ कि एक दिन उसके बच्चे ही उसका बेहतर कल बन जाएंगे।
उस शाम सूरज पेड़ों के पीछे ढल रहा था।
अर्जुन और मीरा अपने पिता के पास आकर बैठ गए।
कुछ देर तक तीनों चुप रहे।
किसी को कुछ कहने की जरूरत नहीं थी।
दीवार पर लगी पुरानी घड़ी चल रही थी।
टिक...
टिक...
टिक...
अब उस आवाज में राघव को अपनी खोई हुई चीजों की याद नहीं आती थी।
उसे उस आवाज में अपने परिवार की पूरी जिंदगी सुनाई देती थी।
एक ऐसा परिवार जिसने गरीबी देखी।
संघर्ष देखा।
अपने लोगों को खोया।
लेकिन कभी हार नहीं मानी।
घर आज भी छोटा था।
फर्नीचर आज भी पुराना था।
दीवारों पर आज भी संघर्ष के निशान दिखाई देते थे।
लेकिन उस घर में फिर से खुशियाँ थीं।
दौलत की वजह से नहीं।
शानदार जिंदगी की वजह से नहीं।
बल्कि प्यार, सम्मान और उस परिवार की वजह से, जिसने मुश्किलों के सामने झुकने से इनकार कर दिया था।
राघव ने अपने बच्चों की तरफ देखा और मुस्कुरा दिया।
उसने पूरी जिंदगी उन्हें बेहतर कल देने की कोशिश की थी।
लेकिन उसने कभी नहीं सोचा था कि एक दिन वही बच्चे उसके कल की सबसे बड़ी वजह बन जाएंगे।