Paths - 29 in Hindi Motivational Stories by shiromani mathur books and stories PDF | राहें - 29

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राहें - 29

पिता

दीपा अपने किसी पारिवारिक काम से भैया से मिलने उनके घर
गई थी। उसने ड्राइंग रूम में झांक कर देखा भैया के पास बहुत से
अपरिचित लोग बैठै हुए थे। इसलिये वह भैया से न मिलकर घर में
जाकर भाभी के पास बैठ गई। भैया नगर के ही नहीं इस क्षेत्र के
प्रतिष्ठित, सम्पन्न व व्यवहार कुशल ऊँची पहुँच रखने वाले राजनेता
भी है। हैं तो वे मुँहबोले भैया परन्तु दीपा का उस घर से पुराना रिश्ता
है तो वह बिना सूचना या अनुमति के कभी भी किसी भी काम के
लिये उनसे मिलने चल देती थी और भाभी से भी घंटो इधर-उधर की
बातें करती रहती थी।
साधारण औपचारिकता के बाद भाभी बेहद दुखी व भावुक शब्दों
में बोली-"दीदी, तुम्हारा भाई मेरे बेटे को मार डालेगा। बारबार उसे
मारने की धमकी देते हैं और कहते है-- सतीश मुझे दिख भर जाये मैं
उसे जिंदा नही छोड़गां । मुझे भी बहुत डॉटते रहते है कि मैने बच्चों
को बिगाड़ दिया है'।
दीपा ने पूछा--- "सतीश हैं कहाँ?"
भाभी बोली-- "छिपा-छिपा फिर रहा है। कभी कहीं, कभी कहीं
छिपता रहता है, इन्हें खबर मिलेगी तो उसे मार ही डालेंगें" ।
दीपा ने पूछा --सतीश कब से घर से गया है"?
"20 दिन से घर से गायब है" भाभी ने बताया।
दीपा ने पूछा-- "बात क्या है? जो भैया इतना नाराज हैं"
भाभी बोली--- "कभी समय था तो वो भी मेरे पीछे घूमतें थे ,आज
बच्चे की गलती पर उसको मारने की ठान कर बैठे गये हैं। बच्चे हैं,

गलती हो जाती है ,अगर इन्हें कुछ भी समझाओ तो मुझे भी डॉटने-डपटने
लगते हैं।
भाभी ने बताया कि किसी लड़की से उसकी मित्रता थी। अब
उन दोनो ने शादी कर ली है। वे दोनों कहीं बाहर हैं, खाने-पीने को
भी परेशान है। उनके पास पैसा नहीं है । नगर में उसको सब जानते
हैं कि वह बड़े आदमी का बेटा है, कौन उसको अपने यहाँ काम पर
रखेगा? जो भी उसकी मदद करेगा उसे भी यह छोड़ेंगे नही, तो कोई
भी सामने नही आता। लड़की वाले इनके पास आये थे, तो इन्होने
कहा --- "कहीं भी सतीश मिले तो पकड़कर, सतीश को मारो। उनको भी
मारने की सलाह देने से ऐसा लगता है, तुम्हारे भैया बेटा को मारने
पर बेहद उतारू हैं। अच्छा हुआ आप आ गई। आप अपने भैया को
समझा कर उनका क्रोध शान्त करिये ,मेरी मदद करो, दीदी- कहकर
भाभी रो पड़ी।"
दीपा अपने काम से भैया से मिलने गई थी परन्तु भाभी को रोता
देखकर व घर की स्थिति देखकर सब कुछ भूल गई कि वह वहाँ गई
क्यों है? भाभी के पास बैठकर वह भाभी को समझाती रही व धीरज
बंधाती रहीं।
थोडी देर बाद मेहमानों के जाने के बाद दीपा भैया के पास
ड्रांइग रूम में गई ,भैया अकेले बैठे थे। सामान्य शिष्टाचार के बाद वह
भैया के पास बैठ गई। उसकी समझ में नही आ रहा था कि वह
बात कहाँ से और कैसे प्रारम्भ करें? भैया के मन में क्या है? बिना
समझे इस नाजुक विषय पर कुछ बोल दिया तो मामला कहीं उलझ
ना जाये ,वह शॉत बैठी रही फिर धीमे से बोली- "भाभी कह रहीं थी
कि आप सतीश से बहुत नाराज है'। इतना सुनते ही भैया जोर से
बोले "तेरी भाभी ने बच्चों को बहुत बिगाड़ दिया है, मैं व्यस्त रहता हूँ, 
 मुझे समय नहीं मिलता, वह भी बच्चों का ध्यान नही रखती,सब
मनमानी करते हैं।'
"मै बच्चों को कुछ कहता हूँ तो वह बच्चों का पक्ष लेती है। मुझे
तो सतीश कहीं मिल जायेगा तो मै उसे मारे बिना छोड़ ही नही
सकता।"
दीपा बोली- "भैया वह भूखों मर रहा है, उसके पास पैसा नहीं
है। आपके डर के कारण कोई उसको काम नही दे रहा है। अब वह
अकेला नही है लड़की भी उसके साथ है।"
वे बोले "मुझे मालूम है, मै घर में नही रहता तो सतीश यहाँ आता है और
तेरी भाभी उसको पैसे देती है। उसी ने उसे सिर चढ़ाया है। बच्चों के
बिगाड़ने में उसका ही हाथ है ,उसने मुझे समाज में मुँह दिखाने के
लायक नहीं रखा| घर में किसी को मेरी इज्जत की परवाह नहीं है।
दीपा धीरे से बोली--- "भैया आप इतना नाराज ना हो, यदि आप
नही चाहोगे तो सतीश उस लड़की को छोड़ भी देगा, घर का माहौल
शॉत होना चाहिए।"
दीपा के इतना कहते ही भैया जोर से बोले -"अब उस लड़की
की जिन्दगी खराब करूंगा,--- क्या?"
भैया के इतना कहते ही दीपा को बात करने का रास्ता मिल
गया। उसने बात को आगे बढ़ाते हुये कहा --- "इस समस्या का हल
तो निकालना ही पड़ेगा। कब तक बच्चे बाहर पड़े रहेंगे? ---सतीश
कहीं भी रह ले, वह बच्ची अब अपने घर की है, उसे बाहर रखना---
शोभा नही देता।"
 कह कर दीपा भैया का मूँह देखने लगी, भैया बोले-- "मेरी इज्जत
इन माँ बेटे ने मिटटी में मिला दी।"
दीपा फिर बोली "भैया आप 
गुस्से में ही भरकर भाभी को इतना
तो बोल दो-"तू जान और तेरा काम जाने"। यदि आप इतना कह
दोगे तो वह लड़की कम से कम घर आ जायेगी। वे सास बहु लड़ेगी
या प्रेम से रहेंगी , यह उन पर निर्भर करता है, आप इस लफड़े से
मुक्त रहोगे। भाभी भी आपका इशारा पाकर ही कोई कदम उठा
पायेंगीं---। सभी बातें सोचनी पड़ती है। सतीश भी भूखों मर रहा है. ---
थोड़ा बहुत पैसा भाभी दे देती होगी, तो भी उसमें गुजारा वह कैसे
कर रहा होगा ?---आप भी समझ सकते हो।"
भैया दीपा की ओर देखकर धीरे से बोले-- मुझे मालूम है उसके
पास पैसे नही है, मैने नवीन (बड़े बेटे) को बोल दिया है, बाहर की
गाड़ियों का काम उसको दे दे।
दीपा ने संतोष की सांस ली। भैया के गुस्से मे भी बच्चे के
कल्याण का भाव छिपा है, कहाँ भैया सतीश को मार डालने की बात
कर रहे थे, कहाँ उसको काम देने की बात कर रहें हैं, कितना प्रेम
व सुरक्षा भावना से भरपूर होता है एक पिता का दिल---दीपा सोचती रही, फिर 
धीरे से दीपा उठी,भाभी के पास गई। भाभी से बोली- "आप
समय देखकर लड़की को घर बुला लो, भैया लड़की को थोड़े ही
कुछ कहेंगें, धीरे-धीरे सब शॉत हो जायेगा".
कुछ दिनों बाद दीपा भैया के घर फिर गई । उसी लड़की ने
भाभी व दीपा को चाय पिलाई, घर का माहौल शांत था, दीपा मन ही मन बच्चों को
देखकर खुश होती रही।

छत्तीसगढ़ रत्न
डॉ. शिरोमणि माथुर ,( विद्या वाचस्पति )
दल्ली राजहरा
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