बांसुरी की धुन
भाग : ०५
प्रश्न जटिल था, लेकिन रावण हेंब्रम के चेहरे पर अब भी वही शांति थी।
उन्होंने कुछ क्षण उस व्यक्ति की ओर देखा, फिर थोड़ा गंभीर होकर बोले—
“भाई, आपने जो प्रश्न किया है, वह केवल आपका प्रश्न नहीं है। ऐसे प्रश्न बहुत-से लोगों के मन में हैं। इसलिए इसका उत्तर भी स्पष्ट होना चाहिए।”
उन्होंने माइक को थोड़ा पास किया।
“युगपुरुष वही होते हैं, जिनके जीवन में सत्य और आदर्श का प्रकाश दिखाई देता है। मनुष्य जन्म से मनुष्य ही होता है। परमात्मा की दृष्टि में किसी मनुष्य का मूल्य केवल उसकी जन्मभूमि या कुल से निर्धारित नहीं होता।”
सभा शांत थी।
रावण हेंब्रम ने आगे कहा—
“लेकिन इसका यह अर्थ भी नहीं कि सामाजिक व्यवस्था की आवश्यकता ही समाप्त हो जाती है। समाज को सुव्यवस्थित रखने के लिए कुछ मर्यादाएँ आवश्यक हैं। वर्ण की मूल भावना भी मेरे समझने में कर्म, संस्कार, आचरण और योग्यता से जुड़ी हुई थी; बाद में उसे केवल जन्म से जोड़ देने पर अनेक विकृतियाँ पैदा हुईं।”
उन्होंने सामने बैठे लोगों की ओर देखा।
“श्रीश्री ठाकुर ने शिक्षा, दीक्षा और सुविवाह को अत्यंत महत्त्व दिया है। उनका संदेश है—”
उन्होंने धीमे स्वर में कहा—
“शिक्षा-दीक्षा और सुविवाह,
यही तो है मूल।
जैसे-तैसे शादी मत करो,
करना मत यह भूल।”
सभा में कुछ लोगों ने सिर हिलाया।
रावण हेंब्रम ने बात आगे बढ़ाई—
“मैं स्वयं ठाकुर जी से दीक्षित हूँ। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि मैं केवल दीक्षा लेने से स्वयं को विप्र घोषित कर दूँ। मैं तो उनका एक प्रतिनिधि हूँ। प्रतिनिधि होना और किसी पद या वर्ण का अधिकारी होना—दो अलग बातें हैं।”
अब सभा में पहले जैसी बेचैनी नहीं थी। लोग ध्यानपूर्वक सुन रहे थे।
“इसी तरह विवाह के विषय में भी ठाकुर जी ने मर्यादा और संस्कार को बहुत महत्त्व दिया। उनका जोर इस बात पर था कि विवाह केवल दो व्यक्तियों का संबंध नहीं, बल्कि दो परिवारों और आने वाली संतानों के संस्कारों का भी प्रश्न है।”
उन्होंने कुछ क्षण रुककर कहा—
“इसलिए केवल भावुक होकर, बिना विचार किए विवाह कर लेना उचित नहीं। विवाह में शिक्षा, संस्कार, चरित्र और जीवन-दृष्टि को भी देखना चाहिए।”
रावण हेंब्रम की आवाज अब और गंभीर हो गई।
“लेकिन एक बात बिल्कुल स्पष्ट है—किसी मनुष्य से द्वेष करना, उसे नीचा समझना या उसके साथ छुआछूत करना धर्म नहीं है।”
सभा में बैठे कई लोग एक-दूसरे की ओर देखने लगे।
“हमारे यहाँ भंडारा-गृहों में प्रतिदिन प्रसाद बनता है। जिन लोगों पर भोजन तैयार करने और भोग की सेवा की जिम्मेदारी होती है, वे अपने आहार और आचरण की विशेष मर्यादा रखते हैं। अनेक लोग मांस-मछली, प्याज और लहसुन से दूर रहते हैं और सात्त्विक जीवन जीने का प्रयास करते हैं।”
उन्होंने हाथ से सभा की ओर संकेत किया।
“लेकिन जब प्रसाद वितरण होता है, तब क्या किसी से पूछा जाता है कि तुम किस जाति के हो?”
सभा से कई आवाजें एक साथ आईं—
“नहीं...”
रावण हेंब्रम मुस्कुराए।
“यही तो बात है।”
“आचरण की मर्यादा अपनी जगह है और मनुष्य के प्रति सम्मान अपनी जगह। दोनों को मिला देना ही असली भ्रम है।”
उन्होंने धीरे से कहा—
“यदि कोई अपने जीवन को सात्त्विक बनाना चाहता है, तो उसका सम्मान होना चाहिए। लेकिन केवल जन्म के आधार पर किसी को ऊँचा या नीचा मान लेना—यह मनुष्य को मनुष्य से दूर करता है।”
अब तक जो बुजुर्ग सबसे अधिक गंभीर होकर बैठे थे, उनके चेहरे पर भी विचार की रेखाएँ दिखाई देने लगी थीं।
रावण हेंब्रम ने आगे कहा—
“हम सब एक ही पंक्ति में बैठकर प्रसाद ग्रहण कर सकते हैं। एक साथ सत्संग कर सकते हैं। एक-दूसरे के दुःख में खड़े हो सकते हैं। इससे किसी की साधना छोटी नहीं होती।”
उन्होंने रामलाल की ओर देखा।
“बल्कि असली परीक्षा तो तब है, जब हमारे सामने अपने से भिन्न विचार वाला मनुष्य बैठा हो और फिर भी हमारे मन में उसके प्रति सम्मान बना रहे।”
रामलाल जैसे भीतर तक सुन रहा था।
उसे लगा—आज तक उसने धर्म को केवल मंदिर, पूजा और कर्मकांड में खोजा था। लेकिन यहाँ धर्म उसके सामने मनुष्य के आचरण और संबंधों के प्रश्न के रूप में खड़ा था।
तभी सभा में बैठे एक वृद्ध विप्र ने धीरे से कहा—
“हेंब्रम जी... आपकी बात में एक बात समझ में आई। लेकिन एक प्रश्न अभी भी बाकी है।”
रावण हेंब्रम उनकी ओर मुड़े।
“पूछिए।”
वृद्ध ने कहा—
“अगर हम वर्ण को केवल जन्म से नहीं मानते, तो फिर यह कैसे तय होगा कि कौन विप्र है और कौन नहीं?”
सभा फिर शांत हो गई।
इस बार प्रश्न पहले से भी कठिन था।
तापस मंडल ने रामलाल की ओर देखा।
रामलाल के चेहरे पर उत्सुकता थी।
उसे लग रहा था कि आज की यह सभा केवल किसी एक व्यक्ति की बात नहीं सुन रही थी।
यहाँ वर्षों से चले आ रहे प्रश्नों की परतें खुल रही थीं।
रावण हेंब्रम ने कुछ क्षण आँखें बंद कीं।
फिर माइक उठाया और कहा—
“भाई... इसका उत्तर केवल नाम से नहीं दिया जा सकता। इसके लिए मनुष्य का जीवन देखना पड़ेगा।”
और उसी क्षण सभा के पीछे से किसी ने धीमे स्वर में कहा—
“तो क्या हम अपने जीवन से प्रमाण देंगे?”
रावण हेंब्रम ने उस आवाज की दिशा में देखा।
उनके चेहरे पर हल्की मुस्कान आई।
“हाँ...”
उन्होंने कहा—
“क्योंकि अंततः मनुष्य की पहचान उसकी वाणी से नहीं, उसके आचरण से होती है।”
प्रांगण में फिर एक गहरा मौन उतर आया।
और रामलाल को लगा—शायद आज की यह सभा अभी बहुत कुछ कहने वाली है।
क्रमशः...