उस समय की बात है, जब झारखंड बिहार से अलग नहीं हुआ था। गांवों में गरीबी और बेरोजगारी का ऐसा आलम था कि पेट की आग बुझाने के लिए लोग अपनी मिट्टी छोड़कर सैकड़ों मील दूर परदेस जाने को मजबूर थे।
बोकारो स्टील सिटी से सप्ताह में तीन दिन एलएपी एक्सप्रेस तमिलनाडु की ओर जाती थी। झारखंड के अलग-अलग जिलों से मजदूरों की टोलियां उसी ट्रेन में सवार होतीं। आठ-दस महीने परदेस में मजदूरी करते और आषाढ़ लगते ही गांव लौट आते—हल-बैल संभालने, खेतों में धान रोपने और अपनी मिट्टी की गंध में फिर से सांस लेने।
हरखू कोइरी पढ़ा-लिखा नहीं था। खोरठा ही उसकी दुनिया की भाषा थी। हिंदी के कुछ टूटे-फूटे शब्द समझ लेता, मगर बोलने में संकोच करता था।
गांव का सपन महतो मजदूरों को दक्षिण ले जाने का काम करता था। ठेकेदारों से उसकी अच्छी जान-पहचान थी। वह गांव-गांव घूमकर मजदूरों की टोली बनाता और उन्हें दक्षिण के कारखानों तथा निर्माण स्थलों तक पहुंचाता।
इस बार हरखू का नाम भी टोली में था।
लेकिन उसका मन जाने को तैयार नहीं था।
घर में बूढ़े पिता झुमरी कोइरी की तबीयत अक्सर खराब रहती थी। मां मंगली कोइरी भी उम्र के कारण ज्यादा काम नहीं कर पाती थीं। पत्नी बिमला देवी, तीन छोटे बच्चों और घर की जिम्मेदारियां भी हरखू के कंधों पर थीं।
बड़ी बेटी रूपाली कुमारी अब सयानी होने लगी थी। उसके बाद दो छोटे बच्चे थे। हरखू जानता था कि आने वाले दिनों में परिवार की जरूरतें और बढ़ेंगी।
एक शाम बिमला देवी ने आखिर कह ही दिया—
“पड़े रहो घर में! तुमसे छोटे रमेश, लखिया और चैतू बरसों से बाहर कमाने जाते हैं। एक तुम हो कि गांव से बाहर निकलने का नाम ही नहीं लेते।”
हरखू चुप रहा।
कुछ देर बाद बोला—
“लेकिन मुझे हिंदी नहीं आती। वहां लोगों से बात कैसे करूंगा?”
बिमला हंस पड़ी।
“भगवान ने अंगुली किसलिए दी है?”
हरखू ने उसकी ओर देखा।
बिमला बोली—
“भूख लगे तो इशारा करना, प्यास लगे तो इशारा करना। हाथ-पैर तो तुम्हारे पास हैं!”
फिर वह थोड़ी गंभीर हो गई।
“और चिंता मत करो। रमेश और लखिया तुम्हारे साथ रहेंगे। दोनों तुमसे ज्यादा पढ़े-लिखे हैं। कोई परेशानी होगी तो संभाल लेंगे।”
हरखू ने गहरी सांस ली।
“अच्छा..तो मैं भी जाऊंगा।”
उस रात वह देर तक अपने बच्चों को सोते हुए देखता रहा।
पांच साल का बेटा नींद में कुछ बड़बड़ा रहा था। बड़ी बेटी रूपाली अपनी मां से चिपकी सोई थी। हरखू ने धीरे से उसके सिर पर हाथ फेरा।
उसके मन में एक विचार आया—
“क्या पता लौटकर आऊं तो ये बच्चे कितने बड़े हो जाएंगे।”
उसने तुरंत उस विचार को झटक दिया।
“अरे, आठ-दस महीने की ही तो बात है।”
लेकिन कभी-कभी आदमी भविष्य को जितना छोटा समझता है, समय उसके सामने उतना ही बड़ा होकर खड़ा हो जाता है।
अगले दिन शाम करीब पांच बजे छब्बीस मजदूरों की टोली बोकारो से रवाना हुई।
किसी के कंधे पर गठरी थी, किसी के हाथ में बोरे का झोला। किसी की पत्नी ने रास्ते के लिए चूड़ा-गुड़ बांधा था, तो किसी की मां ने सत्तू की पोटली पकड़ा दी थी।
स्टेशन पर विदाई के समय किसी ने ज्यादा कुछ नहीं कहा।
गरीब आदमी की विदाई भी अजीब होती है—आंसू बहुत होते हैं, मगर शब्द कम।
ट्रेन चली।
पहले कुछ देर तक डिब्बे में सन्नाटा रहा। फिर फागू चाचा ने गला साफ किया और पूसा गीत छेड़ दिया।
धीरे-धीरे आवाजें जुड़ती गईं।
फिर डांडू गोप ने झूमर शुरू कर दिया।
कुछ ही देर में पूरा डिब्बा गांव के अखाड़े में बदल गया।
तालियां बजने लगीं। कोई सीट पर बैठकर पैर से ताल दे रहा था, कोई गलियारे में झूम रहा था।
हरखू खिड़की के पास बैठा बाहर देख रहा था।
गांव पीछे छूट रहे थे। खेत, पेड़, मिट्टी के घर और दूर टिमटिमाती लालटेनें अंधेरे में विलीन होती जा रही थीं।
हरखू की आंखों में कौतूहल था।
उसने मन ही मन कहा—
“दुनिया सचमुच बहुत बड़ी है...”
उसे क्या पता था कि कुछ ही घंटों बाद यही यात्रा उसके जीवन को दो हिस्सों में बांट देगी—
एक हरखू के साथ और दूसरा हरखू के बिना।
रात काफी हो चुकी थी।
ट्रेन अब दक्षिण के वन और पठारी इलाके से गुजर रही थी। खिड़की के बाहर घना अंधेरा था। कहीं-कहीं पहाड़ी की काली आकृति दिखाई देती और फिर अंधेरे में खो जाती।
डिब्बे में ज्यादातर लोग सो चुके थे।
किसी का सिर खिड़की से टिका था, कोई सीट के नीचे अपना सामान संभालकर सो रहा था।
हरखू भी ऊंघ रहा था।
तभी—
एक जोरदार झटका लगा।
पहले ऐसा लगा जैसे ट्रेन किसी गड्ढे से गुजरी हो।
फिर दूसरा झटका पहले से कहीं अधिक भयानक था।
लोहे के पहियों से ऐसी चीख निकली कि सोए हुए लोग चीखते हुए उठ बैठे।
“अरे...!”
“क्या हुआ?”
“बचाओ!”
अगले ही क्षण कई डिब्बे पटरी से उतर गए।
अंधेरी रात में लोहे के टूटने, शीशे चटकने और लोगों के चीखने की आवाजें एक साथ गूंज उठीं।
कहीं किसी बच्चे का रोना था, कहीं किसी स्त्री की चीख।
कुछ ही क्षणों में पूरा जंगल मानो मनुष्य के करुण क्रंदन से भर उठा।
रेल की पटरी से छेड़छाड़ की गई थी। बाद में पता चला कि सरकार के सामने अपनी मांगें रखने के लिए सक्रिय एक उग्रवादी समूह ने पटरी को क्षतिग्रस्त किया था।
लेकिन उस रात दुर्घटना के शिकार लोगों के लिए यह राजनीति नहीं थी।
उनके सामने केवल मौत का भय था।
हरखू को कुछ समझने का अवसर ही नहीं मिला।
एक जोरदार धक्के के साथ उसका शरीर खिड़की से बाहर जा गिरा।
वह दूर किसी झाड़ी में जा पड़ा।
उसका सिर पेड़ की एक मजबूत डाली से टकराया।
कुछ क्षण तक उसका शरीर वहीं पड़ा रहा।
फिर बेहोशी में उसके होंठ हिले—
“रमेश... लखिया...”
और फिर सब कुछ शांत हो गया।
उधर रेलवे के राहतकर्मी और स्थानीय लोग तेजी से घटनास्थल पर पहुंचने लगे।
घायलों को बाहर निकाला जाने लगा।
संयोग से दुर्घटना जिस घुमावदार हिस्से में हुई थी, वहां ट्रेन की गति कम थी। इसलिए एक बड़ी त्रासदी टल गई।
फिर भी दो यात्रियों की जान चली गई और अनेक लोग घायल हुए।
रेलवे कर्मचारी और स्थानीय लोग रातभर यात्रियों की तलाश करते रहे।
रमेश और लखिया भी घायल अवस्था में अपने साथियों के बीच मिल गए।
लेकिन हरखू कहीं दिखाई नहीं दिया।
काफी खोजबीन के बाद भी उसका कोई पता नहीं चला।
उस समय मोबाइल फोन नहीं थे। दूर गांव में खबर पहुंचाने का एकमात्र सहारा चिट्ठी या तार था।
कुछ दिनों बाद हरखू के साथियों की ओर से गांव में खबर पहुंची कि वे सभी सुरक्षित हैं।
लेकिन हरखू का कोई समाचार नहीं था।
बिमला देवी ने वह चिट्ठी कई बार पढ़वाई।
हर बार वही बात सामने आती—
“हम सब ठीक हैं... हरखू का पता नहीं चला।”
उसके हाथ से चिट्ठी गिर गई।
घर में तीन बच्चे थे।
सबसे छोटा केवल पांच साल का था।
वह बार-बार अपनी मां से पूछता—
“बाबा कब आएंगे?”
बिमला के पास कोई उत्तर नहीं था।
वह बच्चे को सीने से लगा लेती।
“जल्दी आएंगे बेटा... बहुत जल्दी।”
लेकिन बच्चे के जाते ही वह अकेले में फूट-फूटकर रोती।
कई बार उसे अपने ही शब्द याद आते—
“भगवान ने अंगुली किसलिए दी है?”
वह सिर पकड़कर बैठ जाती।
“नाहक मैंने उन्हें बाहर भेज दिया...”
उसे लगता, अगर उसने उस दिन जिद न की होती तो शायद हरखू आज उसके सामने होता।
मां मंगली कोइरी की हालत भी दिन-ब-दिन खराब होती जा रही थी।
वह अक्सर दरवाजे की ओर देखती रहतीं।
कभी किसी के कदमों की आहट सुनाई देती तो उनकी बूढ़ी आंखों में चमक आ जाती।
“हरखू आया क्या?”
लेकिन हर बार सामने कोई दूसरा होता।
पिता झुमरी कोइरी चुपचाप यह सब देखते रहते।
उनके पास बेटे को वापस लाने का कोई उपाय नहीं था।
समय बीतता गया।
महीने बीत गए।
बरसात आई और चली गई।
खेतों में धान लहलहाया और कट भी गया।
लेकिन हरखू नहीं लौटा।
एक दिन झुमरी खेत की मेड़ पर बैठे थे।
अगहनी धान कट चुका था।
आस-पास के अधिकांश खेत खाली पड़े थे।
मिट्टी में अभी पर्याप्त नमी थी।
झुमरी ने मिट्टी को हाथ में लेकर देखा।
उनके मन में अचानक एक विचार आया—
“जब जमीन में नमी है, तो इसे यूं ही खाली क्यों छोड़ दिया जाए?”
उन्होंने घर लौटकर अपनी पत्नी मंगली से बात की।
मंगली ने धीमे स्वर में कहा—
“बुढ़ापे में अब इतना सब कैसे होगा?”
झुमरी ने उत्तर दिया—
“हरखू नहीं है तो क्या हुआ? उसके बच्चे तो हैं।”
बस, यही बात उनके भीतर कहीं गहराई तक उतर गई।
अगले दिन उन्होंने अपने दोनों बैल बेच दिए।
लोगों ने पूछा—
“बुढ़ापे में बैल बेचकर क्या करोगे?”
झुमरी ने कोई उत्तर नहीं दिया।
वे चना और खेसारी का बीज खरीद लाए।
फिर खेत तैयार करवाए और एकड़-दर-एकड़ जमीन में बीज डाल दिया।
अब उनके पास केवल एक काम बचा था—रखवाली।
सुबह खेत।
दोपहर खेत।
शाम खेत।
धीरे-धीरे खाली पड़ी उस जमीन से झुमरी की तकदीर बदलने वाली थी ।
जहां लोग कुछ नहीं बोते थे, वहां चने के पौधे घने होकर खड़े हो गए।
फसल देखकर झुमरी की आंखों में पहली बार लंबे समय बाद चमक आई।
उस साल पैदावार उम्मीद से कहीं अधिक हुई।
झुमरी ने समझ लिया कि खेत केवल धान के लिए नहीं होते।
उन्होंने अगली बार सब्जियों की खेती शुरू की।
फिर शहर की मंडी में सब्जी बेचने लगे।
धीरे-धीरे उन्हें खरीद-बिक्री का हिसाब समझ आने लगा।
किस सब्जी की मांग कब बढ़ती है, किस मंडी में भाव अच्छा मिलता है और किस व्यापारी को माल देना चाहिए—वह सब सीखते गए।
जो बूढ़ा कुछ समय पहले बीमारी के कारण लाठी के सहारे चलता था, वही अब दूसरों से खेती करवाकर स्वयं शहर की मंडी में सब्जी बेचने लगा था।
समय ने उसके शरीर को नहीं, उसके भीतर की हिम्मत को बदल दिया था।
लेकिन इस बदलती जिंदगी के बीच एक खाली जगह हमेशा बनी रही।
हरखू की।
एक दिन बिमला देवी ने संदूक खोला।
उसमें हरखू की एक पुरानी ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीर रखी थी।
तस्वीर धुंधली थी।
चेहरा भी साफ दिखाई नहीं देता था।
लेकिन बिमला के लिए उसमें पूरा संसार था।
उसने तस्वीर को दोनों हाथों में लिया।
कुछ देर तक चुपचाप देखती रही।
फिर अचानक उसकी आंखों से आंसू बह निकले।
“तुम कहां चले गए हरखू...?”
वह तस्वीर को सीने से लगाकर फूट-फूटकर रोने लगी।
पास बैठी रूपाली ने मां को देखा।
वह धीरे से उठी और बिमला के पास आकर बैठ गई।
उसने तस्वीर की ओर देखा।
“मां... बाबा वापस आएंगे न?”
बिमला ने होंठ खोले, मगर आवाज नहीं निकली।
उसने रूपाली को अपने सीने से लगा लिया।
दूसरे कमरे में मंगली कोइरी चुपचाप बैठी थीं।
उन्होंने भी अपनी आंखें बंद कर लीं।
झुमरी बाहर आंगन में खड़े थे।
उनकी नजर दूर खेतों पर थी।
खेतों में सब्जियां लहलहा रही थीं।
घर में अब अनाज की कमी नहीं थी।
मंडी से पैसा आने लगा था।
बच्चों के चेहरे पर पहले जैसी भूख नहीं थी।
जीवन धीरे-धीरे संभल रहा था।
लेकिन जिस घर में कभी हरखू की हंसी गूंजती थी, वहां अब उसकी याद की खामोशी थी।
और किसी को यह मालूम नहीं था कि दक्षिण की उस अनजान धरती पर—
हरखू की कहानी वास्तव में खत्म हुई थी...
या अभी भी बाकी है
एक लंबी कहानी.....
क्रमशः......