Kahaani ek ladki ki - 1 in Hindi Fiction Stories by Vishakha Pareek books and stories PDF | कहानी एक लड़की की - भाग 1

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कहानी एक लड़की की - भाग 1

"कहानी: एक लड़की की"
(भाग - 1: "विदाई की घड़ी ओर अतीत का पन्ना")
28 साल की मीशा अपने काम से जाने की घर वालों से विदा लेकर अपनी कार में बैठी। उसने अपने परिवार वालों की तरफ एक हल्की मुस्कुराहट के साथ देखा... जैसे मानो वह उनसे कुछ कहना चाहती हो, पर कह नहीं पा रही हो। फिर उसने अपनी माँ को देखा। उनकी आँखों में हल्के-हल्के आँसू थे और चेहरे पर एक अजीब सी चमक थी। मीशा और उसकी माँ की आँखों में देखकर ऐसा लगा जैसे वे आँखों ही आँखों में बात कर रही हों। मीशा अपनी माँ को आँसू पोंछने को कहती है और माँ मना करके कहती है, "ये तो खुशी के आँसू हैं... इन्हें बहने दे।"  
फिर तभी गाड़ी के आगे वाला दरवाजा खुलता है। मीशा और माँ की निगाहें आगे जाती हैं, तो गाड़ी में वहाँ उसके पापा बैठे हैं और मीशा से कहते हैं, "चले बेटा?" मीशा निगाहों के इशारे से कहती है, "हाँ।" उसके पापा ड्राइवर को चलने को कहते हैं, कि तभी पीछे से एक आवाज आती है, "रुको... अरे रुको!"  
सब देखते हैं तो असमंजस में पड़ जाते हैं। पिता जी कहते हैं, "अरे, अब क्या हुआ? माँ, बिटिया बाहर जा रही है काम से... क्यों देर करवा रही हो?"
दादी बोलीं, "अरे बेटा! मैं तो इसके लिए लड्डू लाई हूँ, अपने हाथों से बनाए हैं!"
पिता जी मुस्कुराकर बोले, "अच्छा-अच्छा, ठीक है, अब दे दो।"
मीशा प्यार से बोली, "हाँ दादी, लाओ मुझे दे दो... थैंक यू दादी, मेरी प्यारी दादी!"
दादी ने दुलारते हुए कहा, "अरे-अरे बस! ले, अपना ध्यान रखना बेटा।"
मीशा ने सिर हिलाकर कहा, "हाँ ठीक है दादी... आप चिंता मत करो।"  
और वे वहाँ से चल दिए। मीशा ने सब को 'बाय' कहा और अपनी माँ और दादी की तरफ मुस्कुराई।  
थोड़ी ही देर में वे रेलवे स्टेशन पहुँचे। उसके पिता जी वहाँ पहुँचकर उससे बोले, "चले बेटा?" मीशा ने कहा, "हाँ, चलिए।" पापा ने उसे उसकी सीट पर बैठा दिया और सामान को सही से रखवाकर कहा, "तुम्हें कुछ चाहिए क्या? मैं अभी लेकर आता हूँ।" मीशा ने मना करते हुए कहा, "नहीं पापा, सब ठीक है... अभी मैं यही हूँ।"  
दोनों कुछ देर शांत रहे... तभी उसके पापा ने उसकी तरफ निगाहें करके कहा, "अपना ध्यान रखना और अच्छे से जाना... आराम से पहुँचकर मुझे बता देना!"
मीशा की आँखें भर आईं और उसने अपनी भरी आँखों से कहा, "जी..."  
तभी ट्रेन के चलने का इशारा हुआ... कि अचानक उसके पापा बोले, "सॉरी बेटा..."
मीशा ने उनका हाथ पकड़कर रोते हुए कहा, "नहीं पापा! ऐसा मत कहो... मैं सब समझ सकती हूँ। मैं आपसे माफी माँगती हूँ, गलती मेरी भी थी... आई एम सॉरी!"
पापा ने उसके आँसू पोंछकर उसके सर पर हाथ फेरकर कहा, "नहीं... ऐसा मत बोलो। चलो अब सब बातें भूल जाओ... अच्छा चलो, मैं जाता हूँ, तुम आराम से जाना!"  
मीशा ने हाँ के इशारे में गर्दन हिलाई और उसके पापा ट्रेन से उतर गए। ट्रेन चलने लगी... और मीशा अपनी आँखों से एकटक अपने पापा को देखती रही। वे दोनों तब तक एक-दूसरे को देखते रहे जब तक वे एक-दूसरे की नजरों के सामने से ओझल नहीं हो गए।  
ट्रेन के थोड़ा आगे चलने पर मीशा खिड़की से बाहर देखती हुई अपने विचारों में खो गई। वह अपने पापा के 'सॉरी' कहने के बारे में सोचते-सोचते अपने अतीत (Past) को याद करने लगी...  
वह याद करने लगी कि कैसे एक छोटे से गाँव के ब्राह्मण परिवार में, एक विवाहित जोड़े की शादी के 3 से 4 साल बाद बहुत मन्नतों के बाद एक लड़की का जन्म हुआ था, जिसका नाम रखा गया—मीशा! उसके पैदा होने पर सबके चेहरे पर खुशी तो थी, लेकिन कुछ लोगों की प्रतिक्रिया बहुत अजीब थी... जिसमें चाची ने कहा था, "पहला ही बेटा होता तो अच्छा होता!" वहीं चाचा बोले थे, "अरे रहने दो, घर में लक्ष्मी आई है!"