Incompleteness - 30 in Hindi Motivational Stories by Falguni Dost books and stories PDF | अधूरापन - 30

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अधूरापन - 30

अध्याय-३०

अमृता सबके लिए मिल्कशेक्स बनाने गई। उसके पीछे-पीछे तुरंत हनी भी गई और बोली, "मम्मी! मुझे भी आपकी तरह ही सब कुछ सीख लेना है। आज मैं बनाऊँगी, आप जैसा-जैसा कहेंगी, मैं वैसा करती जाऊँगी।" अमृता तो दो पल हनी को देखती ही रह गई और सोच में पड़ गई—

कितना निष्कपट होता है जीवनसाथी के प्रति प्रेम,
सचमुच कुछ तो होता ही है उस जन्मों-जन्म के लेन-देन का प्रेम!

हनी फिर बोली, "मम्मी! कैसे बनाऊँ, बताइए न!" और जैसा अमृता ने बताया, हनी वैसे ही बनाती गई। अमृता उसे देखकर बेहद खुश हो रही थी।

रमेशभाई ने भव्या और हनी के साथ-साथ सोनाली की शादी की ज़िम्मेदारी भी खुद ही संभाली थी। अब शादी की तारीख तय हो जाने से शादी की तैयारियाँ शुरू हो चुकी थीं। निमंत्रण पत्र (कंकौत्री) चुनना, परिवार के सभी रिश्तेदारों और मित्र-मंडली को न्योता देने की लिस्ट, पहरावनी (उपहार) की सूची, हर रीति-रिवाज और भोजन के मेनू की छोटी से छोटी बात याद रखकर तैयारियाँ रमेशभाई ने की थीं। साथ ही, शादी की तारीख इस तरह तय की गई थी कि भारत में रहने वाले रिश्तेदार भी आ सकें। इन सभी तैयारियों के बीच-बीच में रमेशभाई शोभा को याद कर लिया करते थे।

रमेशभाई ने जैसा सोचा था, आयोजन उससे भी कहीं बेहतरीन तरीके से पूरा हो—ऐसी राजेश, अपूर्व, मानस और विनय की इच्छा थी।

उधर सभी जोड़ियाँ दिन गिन रही थीं कि वे कब अपने जीवनसाथी के साथ हमेशा-हमेशा के लिए जुड़ जाएँगी! देखा जाए तो सभी जोड़ियों का यह स्वर्णिम समय बीत रहा था। सब स्नेह के धागे में बँध चुके थे। कभी फोन पर तो कभी वीकेंड में आमने-सामने मिलते, घूमने जाते और इस रोमांचक पल का आनंद लेते थे।

आखिरकार वह दिन आ ही गया जिसका सभी को बेहद उत्सुकता से इंतज़ार था। दुल्हन के जोड़े में तीनों बहनें बेहद खूबसूरत लग रही थीं और तीनों दामाद राजकुमार जैसे मनमोहक दिख रहे थे। विदाई की भावुक घड़ी में हर किसी की आँख में हल्की-सी नमी छलक रही थी। बड़े ही आनंद और उत्साह के साथ विवाह संपन्न हुआ और भव्या, हनी तथा सोनाली के जीवन का नया सफर शुरू हो गया।

**६ महीने बाद...**

रोज़ की तरह आज भी अमृता माताजी की आरती कर रही थी। भार्गवी उसके पास प्रसाद की सामग्री लिए खड़ी थी। उनके ठीक पीछे राजेश और अपूर्व दोनों खड़े थे। सब कुछ पहले जैसा ही था, लेकिन बेटियों के बिना घर बिल्कुल सूना लग रहा था।

आज रमेशभाई ने बेटों के सामने अपनी एक इच्छा ज़ाहिर की और कहा, "अगर तुम दोनों को सही लगे, तो क्या हम गायत्री और मानसकुमार को तथा विनय और नीला को भी हमारे साथ ही रहने बुला लें? अगर तुम लोगों को ठीक लगे तो... इस घर का सन्नाटा थोड़ा कम हो जाएगा।"

अपूर्व और राजेश तुरंत पापा की बात से सहमत हो गए। गायत्री और मानसकुमार ने भी रमेशभाई की इच्छा का मान रखा, और विनय तथा नीला भी रमेशभाई की बात मानकर उनके साथ रहने आ गए। रमेशभाई का पूरा परिवार अब मानो पूरी तरह संपूर्ण लग रहा था। परिवार की इस खुशी को देखकर रमेशभाई मन ही मन बोल उठे, "लगता है कि अब इस धरती पर मेरा कार्य पूरा हो गया है। अब ईश्वर मुझे बुला भी लें, तो कोई हर्ज़ नहीं।" आज वे पूरे परिवार को खुश देखकर बेहद प्रसन्न थे। अगले दिन उनका जन्मदिन था, और भव्या ने तय किया था कि इस बार दादू का जन्मदिन बहुत यादगार और उनके लिए आनंददायक रहे, इसलिए एक सरप्राइज पार्टी रखी जाए। पार्टी की सारी तैयारियाँ हो चुकी थीं।

अगले दिन की सुबह हुई। आज रमेशभाई का जन्मदिन था। अमृता आरती के लिए पूजाघर में आई, लेकिन हमेशा की तरह रमेशभाई आज उससे पहले मंदिर में नहीं आए थे। उसे अचरज हुआ और वह रमेशभाई को बुलाने उनके कमरे में गई। वह बोली, "पापा! ओ पापा! आज तो आपका जन्मदिन है और आप अभी तक सो रहे हैं? चलिए, जल्दी से उठकर तैयार हो जाइए, अभी सब आते ही होंगे।"

लेकिन रमेशभाई कोई जवाब नहीं दे रहे थे। इसलिए अमृता ने रमेशभाई का हाथ पकड़कर उन्हें झकझोरा, और जैसे ही उनका हाथ अमृता के हाथ में आया, वह वहीं ढह गई। उनकी नाड़ी की धड़कनें बंद हो चुकी थीं। रमेशभाई चिरनिद्रा में सो चुके थे। रमेशभाई को अपने जन्मदिन के ही दिन मृत्यु का सौभाग्य प्राप्त हुआ था।

पार्टी के लिए सभी लोग पहुँच चुके थे। उन सभी के सामने अमृता ने हिम्मत जुटाकर कहा, "पापा अब इस दुनिया में नहीं रहे, लेकिन उनकी मृत्यु पर हम कोई आँसू नहीं बहाएँगे; बल्कि हम उनका जन्मदिन मनाकर उन्हें इस घर से विदा करेंगे। क्योंकि वे जब तक जिए, उन्होंने अपना जीवन हँसी-खुशी बिताया है; तो हमारा भी यह फर्ज़ बनता है कि ऐसे सदा मुस्कुराते चेहरे को हम हँसते-हँसते ही विदाई दें।"

रमेशभाई की विदाई एक अनोखी विदाई थी। पूरे परिवार ने उन्हें खुशी-खुशी विदा किया। उनका अंतिम संस्कार किया गया और रमेशभाई ने सभी के जीवन से विदा ली और शोभा के जीवन को सुशोभित करने चले गए।

रमेशभाई के परिवार में उनकी कमी तो हमेशा बनी रहेगी, लेकिन ज़िंदगी तो अनवरत चलती ही रहती है। 

देखो न, हर किसी के जीवन में अधूरापन है ही,
फिर भी उसे पूरा करने के लिए जीवन में पुरुषार्थ करना ही पड़ता है!

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रमेशभाई हमेशा बेटियों और बहुओं को लक्ष्मी के रूप में ही अपनाते थे और उन्हें पूरा मान-सम्मान देते थे। परिवार को दिए गए उनके इसी सहज योगदान के परिणामस्वरूप उन्हें एक सुंदर जीवन प्राप्त हुआ। कुदरत हमेशा अच्छे कर्मों का अच्छा फल देती ही है, और मनुष्य रूपी इस अवतार को वह फल भोगना ही पड़ता है। यह कहानी कर्मफल के अधीन, और बेटी या बहू को परिवार का अभिन्न सदस्य मानने पर वे 'लक्ष्मी' किस तरह घर को मंदिर बना देती हैं—इसी के उदाहरण स्वरूप लिखी गई है। 

आप सभी पाठकों के सहयोग और प्रोत्साहन से ही हम यह कहानी और बेहतर लिख पाई, इसके लिए हम आपके आभारी हैं।

**(समाप्त)**