Chugli in Hindi Short Stories by Rajeev kumar books and stories PDF | चुगली

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चुगली

 

 

 

शनैः शनैः गतिरोध बढ़ता जा रहा था। गतिरोध तन का नहीं, बल्कि गतिरोध मन का बढ़ता जा रहा था। वो तो शिथील सी चाल से चल रहा था लेकिन उसकी इच्छाएं मानो विमान पर सवार हो। शारिरिक परेशानी की तो बात बिल्कूल भी नहीं है, लेकिन मानसिक परेशानी की बात जरूर है। अब गबरू की चहलकदमी में तेजी आयी और उसके कदम मुड़ चले रामखेलावन के घर की तरफ।

वही रामखेलावन जिसके साथ भरे बाजार में कहासुनी हो गयी थी। यह घटना बहूत से लोगों के सामन हुई थी। गजब का तमाशा हुआ था। तमाशा दखने वालों में एक नाम भीखना का भी था।

जब गबरू, भीखना के घर के पास से गुजरा तो भीखना ने आवाज लगा कर कहा ’’ गुस्सा में कुछ अनर्थ मत कर देना गबरू। बाजार में आधे लोग तुम्हारे पक्ष में थे तो आधे लोग उसके पक्ष में भी थे। ’’

गबरू के मन में आया कि वो रूके और पुछे कि ’’ तु किसके पक्ष में है, इधर आधे की या उधर के आधे की ? ’’ मगर उसने खुद पर नियंत्रण किया और रामखेलावन के घर की तरफ चल पड़ा।

उधर रामखेलावन का बेटा पप्पूने अपने बाप को जाकर खबर कर दी कि ‘‘गबरू काका गुस्से में लग रहे हैं और हो न हो, आपके पास ही आ रहे हैं। ’’

अगले ही क्षण गबरू और रामखेलावन दोनों आमने-सामने खड़े थे। एक के मन में सिर्फ सवाल था तो दुसरे के मन में जवाब ढुंढने की सनक। दोनों ही एक दुसरे की सनक से वाकिफ थे और हों भी क्यों न, दोनो जीगरी दोस्त रह चुके थे।

गबरू ने आवाज लगा कर कहा ’’ अरे रामखेलावन, घर से बाहर निकल, तुमने मेरी दोस्ती देखी है, अब दुश्मनी भी देखेगा। ’’

रामखेलावन के बेटे ने कुर्सी आगे बढ़ायी तो एक पैर पड़ते ही कुर्सी दुर जा गिरी। सकपकाए रामखेलवान ने तो पहले सोचा कि थोड़ी देर तक घर से नहीं निकलूंगा तो गबरू अपने घर चला जाएगा, मगर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। गबरू बेइज्जती का बदला लेना चाह रहा था और रामखेलावन का मन यह ढुंढने में लगा था कि आखिर मैंने ऐसा क्या कर दिया, क्या बोल दिया जो बेइज्जती हो गयी।

अब दोनों आमने-सामने खड़े थे।

गबरू ने गरज कर कहा ’’ तुमने भीखना से यह क्या सोचकर बोला कि ’’ गबरू एक नम्बर का झुठा और मक्कार है। ’’

रामखेलावन को अब समझ में आया कि माजरा क्या है। अपने उपर गबरू के पहूंच चुके हाथ को झटका देकर गबरू से कहा ’’ पहले भीखना को यहाँ बूलाओ, चलो हमलोग ही चलते हैं। ’’

दोनों को एक साथ आते देख कर भीखना की सिट्टी-पीट्टी गुम हो गयी। जिस मार के डर से भीखना ने अपनी गलती कबूल कर ली थी, उसी मार का समाना कर रहा था।

दोनों दोस्तों ने भरपूर गुस्सा भीखना पर निकालकर एक दुसरे के गले मिले।

बेइज्जती का बदला, कहासुनी और शक की वजह दोनों जाहिर थे और तो और सवाल का जवाब भी मिल गया था। दोनों अपनी दोस्ती पर गर्वित थे और खुश भी थे कि हम दोनों कि दोस्ती टुटते-टुटते बची, दोनों ने कसम खायी कि ’’ अब हम दोनों के बीच कोई शक-संदेह नहीं रहेगा। ’

’

 

समाप्त।