पिछले भाग का सार - आराधना अपने पिता के कर्ज़ की वजह से रेयांश की नफरत भरी दुनिया में आ गई थी। रेयांश ने सबके सामने कहा था - तुम सिर्फ मेरी हो। और उस रात उसने आराधना को अपनी पार्टी में अपनी पत्नी कह कर सबको चौंका दिया था।
अब आगे...
रात के बारह बज चुके थे। बगीचे वाला घर खाली हो चुका था। सारे मेहमान जा चुके थे।
आराधना अब भी उसी लाल साड़ी में बैठी थी। उसके हाथ काँप रहे थे। रेयांश उसके सामने खड़ा था, उसकी आँखों में गुस्सा और कुछ और भी था जो आराधना समझ नहीं पा रही थी।
"तुमने आज बहुत अच्छा अभिनय किया," रेयांश ने ठंडे स्वर में कहा।
"अभिनय? मैं कोई अभिनेत्री नहीं हूँ। तुमने मुझे सबके सामने झूठ बोलने पर मजबूर किया," आराधना चिल्लाई।
रेयांश उसके पास आया। उसने आराधना की कलाई पकड़ी, "मजबूर? तुम्हें याद है तुम्हारे पिता ने मेरे साथ क्या किया था? उन्होंने मेरे पिता की कंपनी को बर्बाद कर दिया था। मेरे पिता ने उसी अपमान में अपने प्राण दे दिए थे। उस कर्ज़ का ब्याज तो तुम्हें चुकाना ही पड़ेगा, आराधना।"
आराधना स्तब्ध रह गई, "क्या? मेरे पापा ने... नहीं, मेरे पापा ऐसा नहीं कर सकते। वो तो सबकी मदद करते हैं।"
"मदद? हाँ, लोगों से ब्याज पर पैसे लेकर मदद करते हैं तुम्हारे पापा। मेरे पिता उनके सबसे बड़े ग्राहक थे।"
आराधना की आँखों से आँसू बहने लगे, "तो इसमें मेरी क्या गलती है? तुम मुझसे बदला क्यों ले रहे हो?"
रेयांश ने उसकी कलाई छोड़ दी। वो खिड़की के पास चला गया, "क्योंकि तुम उसकी सबसे कीमती चीज़ हो। और कीमती चीज़ पर ही चोट करने से दर्द होता है।"
आराधना ने हिम्मत जुटाई, "तो तुम क्या चाहते हो? तुम मुझे मार दोगे?"
रेयांश पलटा। उसके चेहरे पर एक अजीब सी मुस्कुराहट थी, "मारूँगा नहीं। मैं तुम्हें अपना बनाऊँगा। इतना अपना कि तुम खुद भूल जाओगी कि तुम कौन थी। तुम सिर्फ मेरी आराधना बन कर रहोगी।"
इतना कह कर वो कमरे से बाहर चला गया। दरवाज़ा बंद हो गया।
आराधना ज़मीन पर बैठ गई। उसका दिल कह रहा था - भाग जा यहाँ से। पर उसका दिमाग कह रहा था - अगर भागी तो पापा जेल चले जाएँगे।
अगली सुबह।
आराधना की नींद एक नौकरानी ने खोली, "मेमसाहब, छोटे मालिक ने आपको नीचे भोजन के लिए बुलाया है।"
आराधना नीचे आई। मेज़ पर रेयांश बैठा था, समाचार पत्र पढ़ रहा था। उसने बिना देखे कहा, "बैठो।"
आराधना बैठी। नौकरानी ने उसके सामने भोजन रखा।
रेयांश ने समाचार पत्र बंद किया, "आज से तुम कोई काम नहीं करोगी। ना नौकरानी का, ना रसोई का। तुम इस घर की होने वाली मालकिन हो।"
"मैं तुम्हारे घर की मालकिन नहीं बनना चाहती। मुझे मेरे घर जाना है।"
"तुम्हारा घर अब यही है," रेयांश ने कहा और अपनी जेब से एक छोटी सी डिबिया निकाली।
उसने डिबिया खोली। अंदर एक अँगूठी थी। हीरे की अँगूठी।
"ये पहनो।"
"मैं ये नहीं पहनूँगी।"
रेयांश ने उसका हाथ पकड़ा और ज़बरदस्ती अँगूठी उसकी उँगली में डाल दी, "मैंने कहा ना, तुम सिर्फ मेरी हो। मेरी बात मानना सीख लो, आराधना। इसी में तुम्हारी भलाई है।"
आराधना ने अँगूठी निकालने की कोशिश की, पर वो निकल नहीं रही थी। जैसे उसकी किस्मत उसमें कैद हो गई हो।
तभी रेयांश का फ़ोन बजा। फ़ोन पर उसका सहायक था, "साहब, शर्मा जी आए हैं। कह रहे हैं अपनी बेटी से मिलना है।"
रेयांश की आँखें चमक उठीं, "उन्हें अंदर भेजो।"
कुछ देर में आराधना के पिता अंदर आए। उनकी आँखें झुकी हुई थीं। आराधना अपने पिता को देख कर दौड़ कर उनसे लिपट गई, "पापा!"
उसके पिता ने उसे गले लगाया, "बेटी, तू ठीक है? इस आदमी ने तेरे साथ कुछ गलत तो नहीं किया?"
रेयांश ने कहा, "शर्मा जी, आपकी बेटी बिल्कुल सुरक्षित है। बल्कि अब तो ये मेरी होने वाली पत्नी है। क्यों आराधना?"
आराधना कुछ बोल पाती उससे पहले ही उसके पिता ने रेयांश के सामने हाथ जोड़ दिए, "रेयांश बाबू, मुझे माफ़ कर दीजिए। मैं आपका सारा कर्ज़ चुका दूँगा। बस मेरी बेटी को छोड़ दीजिए।"
रेयांश हँस पड़ा, "कर्ज़? आपका कर्ज़ तो कब का खत्म हो गया। अब तो ब्याज चल रहा है। और ब्याज के रूप में मुझे आपकी बेटी चाहिए।"
आराधना के पिता गुस्से में बोले, "तुम क्या समझते हो अपने आप को? मैं पुलिस को बुलाऊँगा!"
"बुला लीजिए। पर पुलिस से पहले आपके सारे गैर कानूनी कागज़ समाचार पत्रों के पास पहुँच जाएँगे। फिर आपकी इज्ज़त का क्या होगा, सोच लीजिए।"
आराधना के पिता हार गए। वो ज़मीन पर बैठ गए।
आराधना ने अपने पिता को संभाला, "पापा आप जाइए यहाँ से। मैं ठीक हूँ। रेयांश मेरा ख़्याल रखेंगे।"
रेयांश को ये सुनकर आश्चर्य हुआ। आराधना उसकी तरफ देख कर बोली, "हाँ, मैं यहाँ रहूँगी। पर एक शर्त पर।"
"कैसी शर्त?"
"आप मेरे पापा को परेशान नहीं करेंगे। उनका सारा कागज़ वापस कर देंगे।"
रेयांश ने कुछ देर सोचा, फिर बोला, "ठीक है। मंज़ूर है। लेकिन बदले में तुम्हें भी मेरी एक शर्त माननी पड़ेगी।"
"क्या?"
"आज शाम को हम मंदिर जाएँगे। और तुम मेरे नाम का सिंदूर अपनी माँग में भरोगी। सबके सामने।"
आराधना के पैरों तले ज़मीन खिसक गई, "सिंदूर?"
"हाँ। ताकि दुनिया को पता चले कि तुम सिर्फ मेरी हो। किसी और की नज़र तुम पर ना पड़े।"
आराधना की साँसें तेज़ हो गईं। ये कैसा अनजाना सा इश्क़ था? जहाँ प्यार कम, अधिकार ज़्यादा था। जहाँ दर्द कम, जुनून ज़्यादा था।
शाम को मंदिर में क्या होगा? क्या आराधना सच में रेयांश के नाम का सिंदूर लगाएगी?
जानने के लिए इंतज़ार कीजिए भाग 4 का।
कैसा लगा ये अनजाना सा इश्क़ का मोड़?
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