The Dark Station - Part 3 in Hindi Horror Stories by Shahroz Aslam books and stories PDF | अँधेरे वाला स्टेशन - भाग 3

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अँधेरे वाला स्टेशन - भाग 3

छत से लटकता साया और माधव का राज
कबीर के हाथ में पकड़े मोबाइल फोन की टॉर्च की रोशनी जैसे ही बर्थ नंबर 41 के ऊपर सीलिंग पर पड़ी, पूरे डिब्बे में सांसें अटक गईं।
वहाँ, छत से उल्टे लटके हुए उस साए के दोनों पैर सीलिंग के पंखे के खांचे में किसी चमगादड़ की तरह फंसे हुए थे। उसके लंबे, काले और उलझे हुए बाल नीचे की ओर झूल रहे थे। उसका सूखा, पीला चेहरा कबीर से महज तीन फीट की दूरी पर था। उसकी पुतली-विहीन सफेद आँखें कबीर की आँखों में गड़ी थीं, और उसके सड़े हुए नीले होंठों पर एक ऐसी विकृत मुस्कान थी, जिसने कबीर के पूरे शरीर में बर्फ जैसी ठंड उतार दी।
"रूपा! इधर मत देखना!" प्रिया ने फुसफुसाते हुए 8 साल की रूपा का चेहरा अपनी गोद में छिपा लिया। डॉक्टर होने के नाते प्रिया ने मुर्दाघरों में कई लाशें देखी थीं, लेकिन हवा में उल्टी लटकी यह चीज़ किसी भी मेडिकल विज्ञान की समझ से बाहर थी।
"हट पीछे!" बलवंत सिंह ने अपनी फौजी फुर्ती दिखाई। उन्होंने अपनी भारी स्टील की टॉर्च को डंडे की तरह पकड़ा और उस साए की तरफ झपट्टा मारा।
लेकिन जैसे ही टॉर्च की धातु उस साए के सीने से टकराने वाली थी, वह साया किसी तरल धुएं की तरह बिखर गया। कोई ठोस शरीर था ही नहीं! वह काला धुआं कबीर के चेहरे के पास से तेजी से घूमा। उस घूमते हुए धुएं के भीतर से एक भारी, कांपती हुई आवाज़ कबीर के कानों में सीधे फुसफुसाई—
"कबीर... तुम्हारे खून का हिसाब अभी बाकी है..."
कबीर पीछे की ओर गिरा। उसकी पीठ बर्थ की लोहे की सीढ़ी से टकराई। उसके माथे पर पसीने की ठंडी बूंदें छलक आईं।
'मेरे खून का हिसाब? यह मुझे कैसे जानता है?' कबीर के दिमाग में हथौड़े बजने लगे। वह तो यहाँ सिर्फ एक केस की पड़ताल करने जा रहा था। इस वीरान स्टेशन और इस शैतानी साए का उससे क्या ताल्लुक हो सकता था?
तभी कबीर की नज़र कोने में खड़े टीटीई माधव पर पड़ी।
माधव अपनी बुझी हुई लालटेन को दोनों हाथों से छाती से चिपकाए थर-थर कांप रहा था। उसके होंठ लगातार हिल रहे थे, जैसे वह कोई पुराना मंत्र या पश्चाताप के शब्द दोहरा रहा हो।
कबीर तुरंत अपनी जगह से उठा और उसने लपककर माधव का कॉलर पकड़ लिया। "माधव! सच बताओ! तुम क्या जानते हो? उस साए ने मेरा नाम कैसे लिया? और 1974 में यहाँ क्या हुआ था?"
बलवंत सिंह भी माधव के सामने आकर खड़े हो गए। उनकी भारी आवाज़ में चेतावनी थी, "टीटीई, अगर तूने अब भी कुछ छुपाया, तो बाहर का साया तुझे बाद में मारेगा, पहले मैं तेरी हड्डियाँ तोड़ दूंगा! सीधे-सीधे बता ये कालाघाट क्या बला है!"
माधव की आँखों से आंसू बह निकले। उसने कांपते हुए अपनी जेब से एक पुराना, पीला पड़ चुका कागज़ निकाला। उस पर लाल स्याही की एक सील लगी थी—गृह विभाग, उत्तर प्रदेश सरकार, 1974।
"बाबूजी... 14 अक्टूबर 1974 की रात..." माधव की आवाज़ रोने जैसी हो गई, "यहाँ कोई सिग्नल की खराबी नहीं हुई थी। उस वक्त के एक बहुत बड़े तांत्रिक और एक भ्रष्ट सियासतदान ने अपनी गद्दी बचाने के लिए यहाँ 108 निर्दोष मुसाफिरों की 'अकाल बलि' का षड्यंत्र रचा था। उन्होंने जानबूझकर डाउन पैसेंजर को लूप लाइन पर खड़ा किया और पीछे से आ रही तेज रफ्तार मालगाड़ी को हरा सिग्नल दे दिया।"
"और... और मेरे परिवार का इससे क्या वास्ता है?" कबीर ने उसका कॉलर झकझोरते हुए पूछा।
माधव ने कबीर की तरफ देखा, उसकी आँखों में गहरा खौफ था।
"उस भयानक रात जब पूरी ट्रेन आग का गोला बन गई थी और सैकड़ों लोग जिंदा जल रहे थे... तब इस पूरे इलाके के इंचार्ज पुलिस अफसर थे—डीएसपी दीनानाथ माथुर। आपके दादाजी, कबीर बाबू!"
कबीर का दिमाग सुन्न हो गया। उसके दादाजी! दादाजी, जो अपनी जिंदगी के आखिरी बीस साल एक अंधेरे कमरे में अकेले रहे, जो हमेशा आग और जलने की गंध से कांप उठते थे और जिन्हें डॉक्टरों ने मानसिक रूप से बीमार घोषित कर दिया था।
"दीनानाथ जी ने उस रात उस तांत्रिक की करतूत देख ली थी," माधव ने आगे बताया। "उन्होंने स्टेशन के रिकॉर्ड को बचाने की कोशिश की थी। लेकिन उन तांत्रिक शक्तियों ने पूरे स्टेशन को शापित कर दिया। मरने वालों की आत्माएं यहीं भटकती रह गईं। और उन रूहों को लगता है कि उस रात अगर पुलिस अफसर दीनानाथ ने स्टेशन मास्टर की लाल डायरी बाहर पहुँचा दी होती, तो उनका सच दुनिया के सामने आ जाता और उन्हें मुक्ति मिल जाती। पचास साल से... वो रूहें एक ऐसे इंसान का इंतज़ार कर रही हैं, जिसकी रगों में दीनानाथ का खून बहता हो!"
"यानी..." प्रिया ने कांपती आवाज़ में कहा, "यह ट्रेन यहाँ इत्तेफाक से नहीं रुकी? कबीर की वजह से रुकी है?"
कोच के बाकी मुसाफिर कबीर को नफरत और दहशत भरी नज़रों से देखने लगे।
"इसको बाहर फेंको!" एक अधेड़ मुसाफिर चिल्लाया। "इसकी वजह से वो शैतान हमारी जान ले लेंगे! इसको बाहर निकालो!"
"चुप रहो सब!" बलवंत सिंह गरज पड़े। "कबीर को भी इस बारे में कुछ नहीं पता था! और अगर कबीर के पास उस पुलिस वाले का खून है, तो शायद यही लड़का हमें इस नर्क से बाहर निकालने की चाबी भी है!"
तभी कबीर की कलाई घड़ी की अलार्म बीप बजी—बीप... बीप... बीप।
समय हो चुका था: रात के ठीक 11:59।

12:00 बजे का खौफनाक मंजर
माधव का चेहरा अचानक पीला पड़ गया। उसने अपनी लालटेन नीचे गिरा दी।
"वक्त खत्म हो गया..." माधव ने बदहवास होकर कहा। "बारह बज गए। दूसरी घंटी बजने वाली है!"
पूरे कोच में एक सन्नाटा छा गया। इतना गहरा सन्नाटा कि ट्रेन के बाहर तैरते कोहरे के सरसराने की आवाज़ भी सुनाई दे रही थी।
और फिर, प्लेटफॉर्म के खंभे पर टंगा वह भारी पीतल का घंटा हिला।
टॉन्ग...
पहली गूंज ने हवा को चीरा। और उसके ठीक दो सेकंड बाद, एक और भयानक प्रहार हुआ—
टॉन्ग...
दूसरी घंटी बज चुकी थी।
घंटे की आवाज़ खत्म होते ही, ट्रेन की पटरियों में एक तेज कंपन शुरू हुआ। लोहे की पटरियाँ थरथराने लगीं। डिब्बे की खिड़कियाँ खड़खड़ाने लगीं। ऐसा लगा जैसे ज़मीन के भीतर से कोई बहुत भारी, दैत्याकार चीज़ रेंगती हुई आ रही हो।
दूर से, बहुत दूर से... एक पुरानी भाप के इंजन की भारी छुक-छुक और एक दर्दनाक सीटी की आवाज़ आने लगी—कूऽऽऽ... कूऽऽऽ!
"ट्रेन? दूसरी पटरी पर कोई ट्रेन आ रही है!" एक मुसाफिर खिड़की से बाहर देखकर चिल्लाया।
कबीर, प्रिया और बलवंत सिंह तेजी से खिड़की के पास पहुंचे।
प्लेटफॉर्म नंबर 2 की जंग लगी, टूटी हुई पटरियों पर, जहाँ दूर-दूर तक कोई सिग्नल नहीं था, कोहरे को चीरती हुई एक पुरानी, कोयले वाली ट्रेन आगे बढ़ रही थी। उस ट्रेन का पूरा ढांचा जला हुआ, काला और कंकाल जैसा था। इंजन की चिमनी से काले धुएं के साथ-साथ लाल-लाल अंगारे हवा में उड़ रहे थे।
लेकिन सबसे भयानक बात यह थी कि उस ट्रेन के पहिए पटरियों पर चलने के बजाय, नीली आग की लपटों पर तैर रहे थे।
वह 1974 की वही मनहूस पैसेंजर ट्रेन थी।
जलती हुई वह ट्रेन धीरे-धीरे आगे बढ़ी और ठीक बी-3 कोच के समानांतर, प्लेटफॉर्म नंबर 2 पर आकर एक भीषण चीख के साथ रुक गई।
उस ट्रेन के रुकते ही बी-3 कोच की खिड़कियों के शीशे बाहर से आने वाली भयानक गर्मी से चटकने लगे—तड़... तड़... तड़क!
कोच के भीतर का बर्फीला तापमान अचानक भट्टी जैसी झुलसाने वाली गर्मी में बदलने लगा। हवा में जलते हुए मांस, पिघलते प्लास्टिक और कोयले की दमघोंटू गंध भर गई।
प्रिया ने खिड़की के पार देखा और खौफ के मारे उसके मुंह से चीख निकल गई।
उस जलती हुई ट्रेन की हर खिड़की पर मुसाफिर खड़े थे। उनके पूरे शरीर आग की लपटों से घिरे हुए थे। किसी के चेहरे की चमड़ी पिघल कर गिर रही थी, किसी के हाथ सिर्फ हड्डियों के ढांचे बचे थे। वे सब अपनी खिड़कियों से बाहर हाथ निकाल-निकाल कर बी-3 कोच के मुसाफिरों की तरफ इशारा कर रहे थे।
वे चिल्ला नहीं रहे थे, बल्कि एक सुर में, धीमी और भयानक लय में गा रहे थे:
"सफर अधूरा है... बोगी खाली है... हमारे साथ आओ... आग बहुत ठंडी है..."
तभी, बी-3 कोच के ठीक सामने वाली बर्थ की खिड़की का दोहरा शीशा उस भयानक गर्मी को नहीं झेल पाया। एक जोरदार धमाके के साथ शीशा चकनाचूर होकर अंदर बिखर गया।
बाहर से गर्म धुएं और राख का एक विशाल बवंडर सीधे डिब्बे के अंदर दाखिल हुआ।
उस बवंडर के बीच में से, जलती हुई हड्डियों वाला एक हाथ अंदर आया और उसने सबसे करीब खड़ी रूपा की माँ का हाथ कसकर पकड़ लिया। रूपा की माँ की चीख पूरे डिब्बे में गूंज उठी क्योंकि वह जलता हुआ हाथ उन्हें उस टूटी खिड़की के रास्ते बाहर, उस आग की ट्रेन की तरफ खींच रहा था!
"माँ!" रूपा रोते हुए अपनी माँ के पैरों से लिपट गई।
"कबीर! चादर लाओ! आग बुझाओ!" बलवंत सिंह अपनी पूरी ताकत से उस जलते हुए साए के हाथ पर टॉर्च से वार करने लगे।
कबीर ने देखा कि उसकी बर्थ पर रखी वह लाल डायरी अब हवा में उड़ रही थी। उसके पन्ने पागलों की तरह फड़फड़ा रहे थे। पन्ने पर एक नक्शा उभर आया था—प्लेटफार्म नंबर 1 के पुराने वेटिंग रूम के फर्श के नीचे बनी एक गुप्त सीढ़ी का नक्शा। और उसके नीचे लिखा था:
"तीसरी घंटी बजने में 40 मिनट बाकी हैं। अगर जीवित रहना है, तो आग से मत भागो... स्टेशन के नीचे उतरो!"
रूपा की माँ का आधा शरीर खिड़की से बाहर खिंच चुका था। बाहर खड़ी वह जली हुई ट्रेन की बोगियों के दरवाजे अपने आप खुलने लगे थे, मानो वे इन सभी मुसाफिरों को अपने अंदर समाने के लिए तैयार बैठी हों।
कबीर ने अपनी जान की परवाह किए बिना वह लाल डायरी अपने सीने से चिपकाई और चिल्लाया, "बलवंत अंकल! यह डिब्बा अब हमें नहीं बचा सकता! हमें इस खिड़की से नहीं... स्टेशन के नीचे जाना होगा!"
लेकिन सवाल यह था कि जब बाहर की ज़मीन इंसानों को जिंदा निगल रही थी, तो वे उस वेटिंग रूम तक पहुँचेंगे कैसे?
(कहानी जारी है एपिसोड 4 में...)