वह तस्वीर
मीरा पूरी रात सो नहीं पाई।
उसके हाथ में वही पुरानी तस्वीर थी।
तस्वीर में दो छोटे बच्चे एक साथ खड़े थे।
लड़की के चेहरे पर वही मुस्कान थी जो आज मीरा के चेहरे पर थी।
और लड़का…
मीरा उस चेहरे को जितना देखती, उसका दिल उतनी तेजी से धड़कने लगता।
उसने तस्वीर पलटी।
पीछे सिर्फ एक तारीख लिखी थी—
15 जुलाई 2012
और नीचे एक नाम—
“आरव”
मीरा की आँखें फैल गईं।
“ये कैसे हो सकता है?”
उसे अपने बचपन की बहुत कम बातें याद थीं।
बस एक धुंधली-सी याद…
बारिश…
एक छोटा-सा घर…
और एक लड़का जो उससे कह रहा था—
“डरो मत, मैं तुम्हारे साथ हूँ।”
अचानक मीरा के कमरे की लाइट बंद हो गई।
वह डरकर खड़ी हो गई।
कुछ सेकंड बाद लाइट वापस आ गई।
लेकिन तस्वीर उसके हाथ से गायब थी।
“तस्वीर?”
मीरा ने पूरा कमरा खोज लिया।
तस्वीर कहीं नहीं थी।
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अगली सुबह।
आरव कॉलेज पहुँचा।
वह हमेशा की तरह मीरा का इंतजार कर रहा था।
काफी देर हो गई।
मीरा नहीं आई।
आरव ने फोन किया।
कोई जवाब नहीं।
उसने मैसेज किया—
“सब ठीक है?”
कुछ देर बाद जवाब आया।
“हाँ।”
बस इतना।
आरव को कुछ अजीब लगा।
क्लास शुरू हुई।
मीरा आखिरकार आई।
वह चुपचाप अपनी सीट पर बैठ गई।
आरव ने पूछा,
“क्या हुआ?”
“कुछ नहीं।”
“तुम ठीक नहीं लग रही।”
मीरा ने उसकी तरफ देखा।
कुछ पल के लिए उसकी आँखों में वही सवाल था—
क्या तुम मुझे बचपन से जानते हो?
लेकिन वह पूछ नहीं पाई।
उसने सिर्फ कहा,
“आरव… क्या तुम्हें अपना बचपन याद है?”
आरव हँस पड़ा।
“थोड़ा बहुत। क्यों?”
“तुम्हें कोई लड़की याद है?”
आरव कुछ सोचने लगा।
“लड़की?”
“हाँ।”
आरव ने सिर हिलाया।
“नहीं।”
मीरा ने नजरें झुका लीं।
उसका दिल भारी हो गया।
अगर तस्वीर सच थी…
तो आरव उसे भूल चुका था।
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दोपहर में आरव को कॉलेज की लाइब्रेरी में एक पुरानी किताब मिली।
किताब के अंदर एक छोटा-सा कागज था।
उस पर लिखा था—
“कुछ रिश्ते यादों से नहीं, किस्मत से वापस आते हैं।”
आरव ने कागज पढ़ा और उसे अजीब लगा।
उसी समय पीछे से मीरा की आवाज आई।
“तुम्हें ये कहाँ मिला?”
आरव ने कागज उसकी तरफ बढ़ाया।
मीरा ने कागज देखा।
उसका चेहरा सफेद पड़ गया।
“तुम इसे पहचानती हो?”
मीरा ने तुरंत कहा,
“नहीं।”
और वहाँ से चली गई।
आरव उसके पीछे गया।
“मीरा, रुको!”
मीरा रुक गई।
आरव ने पूछा,
“तुम मुझसे कुछ छिपा रही हो?”
मीरा चुप रही।
“अगर कोई परेशानी है तो मुझे बताओ।”
मीरा की आँखों में आँसू आ गए।
वह बोली,
“अगर मैं तुम्हें सच बता दूँ… तो शायद तुम मुझसे हमेशा के लिए दूर हो जाओगे।”
आरव ने कहा,
“ऐसा कुछ नहीं होगा।”
मीरा ने उसकी तरफ देखा।
“तुम ये बात अभी कह रहे हो।”
फिर वह चली गई।
आरव वहीं खड़ा रह गया।
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शाम को मीरा घर पहुँची।
उसकी माँ कमरे में बैठी थीं।
मीरा ने अचानक पूछा,
“माँ… क्या मैं बचपन में किसी दूसरे शहर में रहती थी?”
माँ कुछ पल के लिए चुप हो गईं।
“तुम ये क्यों पूछ रही हो?”
“बस ऐसे ही।”
माँ ने बात बदल दी।
“तुम खाना खा लो।”
मीरा ने फिर पूछा,
“माँ, आरव नाम का कोई लड़का…”
उसकी माँ के हाथ से गिलास छूट गया।
गिलास जमीन पर गिरकर टूट गया।
मीरा समझ गई।
माँ आरव का नाम जानती थीं।
“आप उसे जानती हैं?”
माँ ने कोई जवाब नहीं दिया।
मीरा उनके पास गई।
“माँ, सच बताइए।”
काफी देर की चुप्पी के बाद उसकी माँ ने कहा—
“मीरा… उस लड़के से दूर रहो।”
“क्यों?”
“क्योंकि उसके परिवार की वजह से हमारे परिवार ने बहुत कुछ खोया है।”
मीरा स्तब्ध रह गई।
“लेकिन आरव ने क्या किया?”
माँ ने धीरे से कहा,
“आरव ने नहीं…”
फिर वह रुक गईं।
“तो किसने?”
माँ ने उसकी तरफ देखा।
उनकी आँखों में डर था।
“ये सवाल तुम मत पूछना।”
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उसी रात आरव के घर पर भी एक अजनबी आया।
आरव के पिता ने दरवाजा खोला।
सामने एक बुजुर्ग आदमी खड़ा था।
उसने कहा,
“बारह साल बाद वही लड़की वापस आ गई है।”
आरव के पिता का चेहरा बदल गया।
“तुम यहाँ क्यों आए हो?”
बुजुर्ग ने कहा,
“क्योंकि अब सच छिपाया नहीं जा सकता।”
“मीरा को कुछ मत बताना।”
बुजुर्ग मुस्कुराया।
“अब फैसला तुम्हारे हाथ में नहीं है।”
आरव के पिता ने दरवाजा बंद कर दिया।
लेकिन दरवाजा बंद होने से पहले बुजुर्ग ने एक आखिरी बात कही—
“तुम्हारे बेटे को अगर मीरा से प्यार हो गया… तो वही पुरानी कहानी फिर शुरू होगी।”
अंदर खड़े आरव ने यह बात सुन ली।
उसके चेहरे पर हैरानी थी।
उसने पहली बार महसूस किया—
मीरा और उसके परिवार के बीच कोई ऐसा रिश्ता था, जिसके बारे में उसके अपने परिवार ने भी उससे सच छिपाया था।
और अब वह सच सामने आने वाला था।
जारी रहेगा…