(सुबह की हल्की धूप परदे से झाँक रही है। कमरे में सन्नाटा है।
सिया अब भी नींद में है, चेहरा शांत लेकिन आँखों के नीचे हल्के डार्क सर्कल। कबीर उसके पास आता है, हाथ में फाइलें हैं।)
कबीर (धीरे से) बोला -
“सिया... उठो। आज ऑफिस जाना है।”
(सिया आधी नींद में कराहती है, कंबल ओढ़े हुए जवाब देती है।)
सिया (नींद में) बोली -
“क्या? मैं भी ऑफिस जाती हूँ क्या?”
(कबीर हँसता नहीं, बस हल्के से मुस्कुराता है।)
कबीर (थोड़ा सख्त लहजे में) बोला -
“और क्या... खुद को कोई राजकुमारी समझ रखा है क्या?
चलो, उठो — देर हो जाएगी।”
(सिया धीरे-धीरे उठती है, बाल बिखरे हुए हैं। फिर मुस्कराकर बाथरूम की तरफ बढ़ जाती है।)
(थोड़ी देर बाद दोनों तैयार होकर बाहर निकलते हैं। कबीर ब्लैक शर्ट में, सिया हल्की ब्लू साड़ी में — लेकिन उसके चेहरे पर अब भी थोड़ा असमंजस है।)
(लिफ्ट के सामने कर्मचारी खड़े हैं। सबके चेहरे पर हल्की हैरानी — क्योंकि महीनों बाद बॉस और उसकी पत्नी को साथ देखा जा रहा है।)
(कबीर सबके सामने रुकता है और बोलता है —)
कबीर (सख्त लहजे में) बोला -
“सब ध्यान से सुन लो। अबसे मिस सिमरन को सिया कहा जाएगा।
और मुझे कबीर, न कि करन। किसी को कोई पुरानी बात याद रखने की ज़रूरत नहीं। समझे सब?”
(सब सिर हिलाकर “यस सर” कहते हैं। सिया थोड़ी उलझी हुई खड़ी है।)
(लिफ्ट में — सिया चुपचाप खड़ी है, आईने में खुद को देखती है, और एक पल के लिए ठिठकती है। लिफ्ट के शीशे में उसे फिर वही ब्लैक सिया की झलक दिखती है — लेकिन इस बार बहुत क्षणिक। वो आँखें मलती है, कुछ नहीं दिखता।)
सिया (धीरे से) बोली -
“मुझे किसी की शक्ल याद नहीं आ रही...ये सब लोग कौन हैं...?”
(कबीर की निगाहें उस पर जाती हैं, पर वो कुछ नहीं कहता। बस मन ही मन बुदबुदाता है।)
कबीर (मन में) बोला -
“याद ना आए... तो ही अच्छा है, सिया।”
(लिफ्ट रुकती है — दोनों अपने केबिन की ओर बढ़ते हैं। सिया चारों ओर देखती है — दीवारों पर उसके और कबीर के फोटो लगे हैं, लेकिन वो खुद को उन पलों में पहचान नहीं पा रही।)
कबीर (हल्के स्वर में) बोला -
“यह हमारा... मेरा मतलब, तुम्हारा ऑफिस है।
तुम मेरी पर्सनल एम्प्लॉयी हो। मैं तुम्हारा बॉस हूँ।
तुम पहले भी यही काम करती थीं।”
(सिया हल्के से सिर हिलाती है, और अपनी डेस्क पर बैठ जाती है। सामने कंप्यूटर पर AI टूल्स खुले हैं।)
सिया (कन्फ्यूज़ होकर) बोली -
“मैंने... ये सब कहाँ से सीखा था?”
(वो झिझकते हुए कोड्स और डेटा पर काम करने लगती है — उसकी उँगलियाँ खुद-ब-खुद कीबोर्ड पर चलने लगती हैं, मानो शरीर को याद है पर दिमाग को नहीं।)
(कबीर उसे ध्यान से देखता है — उसकी आँखों में गर्व और डर दोनों हैं।)
कबीर (धीरे से, खुद से) बोला -
“यही तो है… जब यादें मिटा दी जाती हैं,पर आत्मा फिर भी सब याद रखती है…”
(सिया उसकी बात नहीं सुन पाती। वो काम में डूबी है, पर चेहरे पर सवालों की लकीरें अब भी हैं।)
“सिया फिर से उस जगह लौट आई थी, जहाँ कभी सिमरन ने अपने सपने और डर दोनों देखे थे।
पर अब सवाल था — क्या वो सच में सिया है,
या सिमरन के मिटे हुए अतीत की परछाई?”
(कैमरा सिया के मॉनिटर पर ज़ूम करता है —
AI स्क्रीन पर एक लाइन अपने आप टाइप होती है:)
💻 “Hello Simran.”
(सिया चौंककर स्क्रीन को देखती है — और अचानक बिजली चली जाती है।)
दोपहर का समय, कंप्यूटरों की आवाज़, कीबोर्ड की टक-टक, और एसी की हल्की गूँज।)
(सिया अपनी डेस्क पर बैठी है, स्क्रीन पर तेज़ी से काम कर रही है। उसके बाल बिखरे हुए हैं, चेहरा थका हुआ लेकिन ध्यान पूरी तरह काम पर है।)
कबीर (थोड़ा सख्त लेकिन चिंता भरे लहजे में) बोला -
“सिया, लंच टाइम हो गया है। चलो, उठो।”
(सिया बिना ऊपर देखे जवाब देती है —)
सिया (धीरे से) बोली -
“मुझे भूख नहीं है, बस ये रिपोर्ट पूरी करनी है।”
(कबीर उसके पास आता है, उसके सामने झुककर मॉनिटर का बटन बंद करता है।)
कबीर (नरम लेकिन आदेश के अंदाज़ में) बोला -
“रिपोर्ट बाद में भी बन जाएगी।
पर अगर तुम खुद को नहीं संभालोगी, तो ये काम कौन करेगा?”
(सिया हल्की सी झुँझलाती है, लेकिन उसकी आँखों में एक अपनापन है।)
सिया (थोड़ा मुस्कराकर) बोली -
“आप तो बिलकुल पापा जैसे बोलते हैं।”
कबीर मुस्कुराता है, फिर सिर झुकाकर कहता है —
“काश... बात इतनी ही आसान होती।”
(वो उसका हाथ पकड़कर कैफ़ेटेरिया की ओर ले जाता है। सिया कुछ नहीं कहती, बस उसके साथ चल देती है। दोनों चुपचाप लंच करते हैं — कैमरा सिया के चेहरे पर फोकस करता है जो थोड़ी देर के लिए शांति महसूस करती है।)
शाम 6:00 बजे, ऑफिस का वही केबिन।
(सिया फिर से अपने सिस्टम पर काम कर रही है। फाइलें खुली हैं, डेटा चल रहा है। लेकिन धीरे-धीरे उसकी आँखें झपकने लगती हैं।)
(कबीर उसकी ओर देखता है — वो झुकी जाती है, फिर आखिरकार कुर्सी पर ही सिर रखकर सो जाती है।)
(कबीर हल्की मुस्कान के साथ खड़ा होता है। वो उसके पास आता है, उसकी साड़ी के किनारे को ठीक करता है, बिखरे बालों को पीछे करता है। फिर उसके कंप्यूटर की ओर झुककर खुद टाइप करने लगता है।)
कबीर (धीरे से, खुद से) बोला -
“तुम्हें थकाना कभी मेरा मकसद नहीं था, सिया... बस दुनिया से छुपाना था।”
(वो कुछ देर तक टाइप करता रहता है, प्रॉम्प्ट पूरा करता है — “File Completed Successfully.”
फिर मॉनिटर ऑफ कर देता है।)
(धीरे से सिया को गोद में उठाता है। ऑफिस में अब बस सफाई करने वाले बचे हैं। वो किसी की परवाह किए बिना उसे अपनी कार तक लाता है।)
रात रास्ता सुनसान, हल्की स्ट्रीट लाइट्स।
(कबीर ड्राइव कर रहा है, सिया उसकी गोद में सिर रखकर सो रही है। हवा में शांति है, बस कार की आवाज़ है।)
(घर पहुँचकर वो उसे फिर से गोद में उठाता है, जैसे किसी अनमोल चीज़ को छू रहा हो।)
(धीरे-धीरे कमरे तक आता है। कमरे में हल्की नीली रोशनी है। वो सिया को बिस्तर पर लिटाता है, चादर ओढ़ाता है। खुद उसके बगल में बैठकर कुछ देर तक उसे देखता है।)
कबीर (धीरे से, टूटे स्वर में) बोला -
“काश तुम जानतीं... कि ये शांति कितनी झूठी है।”
(वो थका हुआ है, उसकी आँखों में नींद और डर दोनों हैं।
वो धीरे से उसके पास लेटता है, उसे सीने से लगाकर सो जाता है।)
रात के 2 बजे –
(घड़ी टिक-टिक कर रही है। सिया की आँखें खुलती हैं। कमरे में हल्की हवा चल रही है।)
सिया (धीरे से बुदबुदाती हुई) बोली -
“मैं... ऑफिस में थी ना? घर कब आई?”
(वो उठकर बैठती है, चारों ओर देखती है — दीवार पर वही फोटो, वही माहौल। उसकी नज़र कबीर पर जाती है जो अब भी उसके सीने के पास गहरी नींद में है।)
(सिया मुस्कराती है, उसके चेहरे को देखती है, धीरे से बालों को सहलाती है।)
सिया (धीरे से, मुस्कराते हुए) बोली -
“आप जैसे भी हो... पर जब पास होते हो, डर भी शांति बन जाता है।”
(खिड़की से चाँदनी कमरे में गिरती है, कबीर और सिया एक-दूसरे की बाँहों में सो रहे हैं।)
“कभी-कभी सबसे गहरी नींद तब आती है, जब हम हकीकत और झूठ के बीच सो रहे होते हैं…”
(ऑफिस में हलचल है। कंप्यूटरों की आवाज़, कीबोर्ड की टकटक।
सीया अपने डेस्क पर बैठी है, पर उसकी निगाहें बार-बार क़ाबिन के अंदर की अलमारी पर जा रही हैं।)
सीया (धीरे से खुद से) बोली -
"वो सर्टिफिकेट... उस पर मेरा ही चेहरा था... पर नाम 'सिमरन ठाकुर'?"
(वह धीरे-धीरे उठती है और क़ाबिन में जाती है। क़ाबिन में कोई नहीं है। वह फाइलें देखने लगती है। एक दराज़ खोलती है — अंदर एक ट्रॉफी और एक फ्रेम में सर्टिफिकेट रखा है।)
सीया (हैरान) बोली -
"बेस्ट एम्प्लॉयी ऑफ द ईयर... 2028... सिमरन ठाकुर? पर ये तो... मैं ही हूँ!"
(वह सर्टिफिकेट उठाती है और ध्यान से देखती है। तस्वीर में वही चेहरा है, बस बाल थोड़े छोटे हैं और मुस्कान ज़्यादा आत्मविश्वासी है।)
सीया (धीरे से) बोली -
"तो मैं... सिमरन हूँ? फिर सीया कौन?"
(उसी वक़्त दरवाज़ा जोर से खुलता है। कबीर अंदर आता है। उसकी आँखें लाल हैं, चेहरा गुस्से से भरा हुआ।)
कबीर (तेज़ आवाज़ में) बोला -
"सीया!! क्या कर रही हो तुम मेरे क़ाबिन में?"
(सीया घबरा जाती है, हाथ से सर्टिफिकेट गिर जाता है।)
सीया (घबराकर) बोली -
"वो... मैं बस साफ़ कर रही थी..."
कबीर (सर्टिफिकेट उठाते हुए) बोला -
"झूठ मत बोलो। तुम वही ढूंढ रही थी न, जो तुम्हें नहीं पता होना चाहिए!"
(वह सर्टिफिकेट को कसकर पकड़ता है और ऊपर की अलमारी में रख देता है, फिर उसकी तरफ मुड़ता है।)
कबीर (सख़्त लहजे में) बोला -
"ये ऑफिस है, तुम्हारा खेल का मैदान नहीं। जो काम कहूँ, बस वही करो। समझीं?"
(सीया की आँखों में आँसू आ जाते हैं। वह कुछ पल चुप रहती है, फिर गुस्से में बोलती है।)
सीया (भरे गले से) बोली -
"हर बार डांट क्यों लगाते हो मुझे? क्या मैंने कुछ ग़लत किया है? क्यों नहीं बताना चाहते सिमरन कौन थी? वो मेरे जैसी ही क्यों दिखती थी?"
कबीर (चेहरा दूसरी तरफ़ मोड़ते हुए) बोला -
"इस बारे में मुझसे दोबारा बात मत करना।"
(सीया ज़िद पर उतर आती है।)
सीया (तेज़ी से)। बोली -
"आप मुझे बताओगे ही! वरना मैं खुद पता लगाऊंगी!"
(कबीर मुड़कर उसकी आँखों में देखता है — उसकी आँखों में अब इंसानियत नहीं, एक सर्द चमक है।)
कबीर (धीरे, पर डरावनी आवाज़ में) बोला -
"मत खोजो वो बातें, सीया... वरना जो यादें दबी हैं, वो तुम्हें तोड़ देंगी।"
(सीया पीछे हटती है। दोनों के बीच चुप्पी छा जाती है। धीरे-धीरे दोनों अपने-अपने डेस्क पर जा बैठते हैं। एक ही क़ाबिन में — पर अब उनके बीच एक दीवार खड़ी हो चुकी है।)
( ऑफिस में सब कुछ सामान्य दिखता है, पर अंदर तूफ़ान है।)
(सीया घर में अकेली बैठी है, उसकी आंखें लाल हैं। वह आईने में खुद को देखती है। फिर धीरे से बुदबुदाती है।)
सीया बोली -
"सिमरन ठाकुर... क्या मैं ही वो हूँ? या कोई और मेरे अंदर है?"
(दूर कहीं से कबीर की परछाई दिखती है, जो उसे खामोशी से देख रहा है। उसकी आँखों में कुछ छिपाने का डर है… और कुछ पाने की तड़प भी।)
"कुछ राज़... बताने के लिए नहीं होते। क्योंकि सच... कभी-कभी इंसान से ज़्यादा ख़तरनाक होता है।"