(रात का समय।
कमरे में हल्की नीली रोशनी फैली हुई है। खिड़की से आती हवा सीया के बालों को उड़ाती है। कबीर टेबल पर बैठा कुछ फाइलें देख रहा है, पर उसकी निगाहें बार-बार सीया की ओर जा रही हैं।)
(सीया धीरे से उठती है, उसके कदम बहुत नर्म हैं। वो कबीर के पीछे जाकर उसके कंधे पर हाथ रखती है। कबीर थोड़ा चौंकता है, पर कुछ नहीं कहता। वो उसकी ओर देखता है — दोनों की नज़रें मिलती हैं।)
सीया (धीरे, मुस्कुराते हुए) बोली -
“कबीर जी… क्या मैं सच में इतनी अजनबी हूँ आपके लिए?”
(कबीर कुछ बोलने की कोशिश करता है, पर शब्द गले में अटक जाते हैं। सीया उसके बहुत पास आ जाती है, इतनी पास कि उसकी साँसें कबीर के गाल को छूने लगती हैं।)
सीया (धीरे, उसके चेहरे को देखकर) बोली -
“मुझे याद तो कुछ नहीं, पर जब आप पास आते हो न…
दिल कहता है, हमने बहुत कुछ साथ जिया है…”
(कबीर उसकी आँखों में देखता है। वो खुद को रोकने की कोशिश करता है, पर सीया की मासूमियत उसे अंदर तक हिला देती है।
वो एक कदम और आगे बढ़ता है। दोनों के बीच की दूरी अब कुछ इंच की रह जाती है। सीया की धड़कन तेज़ होने लगती है।)
सीया (धीरे से) बोली -
“अगर आप मुझे एक बार... छू लो... शायद सब याद आ जाए...”
(कबीर के हाथ काँपते हैं। वो उसकी ठुड्डी पकड़ता है, उसकी आँखों में झांकता है। उसके होंठ सीया के होंठों से बस कुछ सेंटीमीटर दूर हैं।
पर तभी वो अचानक रुक जाता है।)
कबीर (कठोर स्वर में, खुद को रोकते हुए) बोला -
“नहीं... सीया... मैं ऐसा नहीं कर सकता।”
सीया (आँखों में आँसू लिए) बोली -
“क्यों नहीं...? क्या आप मुझसे अब भी डरते हो?”
(कबीर पीछे हटता है। उसका चेहरा दर्द से भरा है।)
कबीर (धीरे, टूटी आवाज़ में) बोला -
“क्योंकि अगर मैंने तुम्हें छू लिया...तो तुम्हारा वो हिस्सा जाग जाएगा... जिसे मैंने बहुत मुश्किल से सुलाया था।”
(सीया की आँखें भर आती हैं। वो आगे बढ़कर उसका हाथ पकड़ लेती है।)
सीया (धीरे से) बोली -
“तो फिर मुझे ऐसे अधूरा मत रखो, कबीर जी…अगर यादें लौटनी हैं, तो लौटने दो…मैं डरूँगी नहीं…”
(कबीर उसकी तरफ देखता है। उसकी आँखों में प्यार है, पर साथ ही डर भी। वो उसके बालों को सहलाता है, फिर अचानक मुड़कर कमरे से बाहर चला जाता है।)
(सीया अब अकेली है। वो आईने के सामने खड़ी है, अपने होंठों को छूती है। आईने में उसका चेहरा धुंधला दिखता है।
वो खुद से बुदबुदाती है —)
सीया बोली -
"कबीर जी कहते हैं कि यादें लौट आईं तो सब खत्म हो जाएगा…
पर मैं ऐसे बिना यादों के कैसे जिऊँ?”
(उसकी आँखें भर आती हैं। आईने में उसे फिर वही “ब्लैक साड़ी वाली” सीया की झलक दिखती है — वही लाल आँखें, वही मुस्कान।)
ब्लैक सीया (आईने से) बोली -
“तुम्हें पता है न...एक किस... बस एक किस, और सब याद आ जाएगा…”
(सीया घबराकर पीछे हटती है।बवो अपने कानों को पकड़ लेती है, आँखें बंद कर लेती है।)
सीया (चिल्लाकर) बोली -
“चुप हो जाओ!! चुप!!”
(वो ज़मीन पर बैठ जाती है। उसका सिर दर्द से फट रहा है। उसी वक्त दरवाज़ा खुलता है — कबीर भागकर आता है, उसे थाम लेता है।)
कबीर (घबराकर) बोला -
“सीया! क्या हुआ?”
(सीया काँपते हुए उसके सीने से लग जाती है।)
सीया (रोते हुए) बोली -
“मुझे सब याद चाहिए, कबीर जी… चाहे जो भी हो जाए…”
(कबीर उसकी पीठ पर हाथ रखता है। उसके चेहरे पर दर्द, डर और प्यार तीनों मिल जाते हैं। वो उसकी ओर देखता है, और धीरे से फुसफुसाता है —)
कबीर बोला -
“तुम्हें नहीं पता सीया... वो सच्चाई... सिर्फ़ यादें नहीं,
एक खून से लिखा अतीत है।”
(सीया कबीर के सीने से लगी है, और आईने में “ब्लैक सीया” मुस्कुरा रही है।)
“कभी-कभी सच्चाई सिर्फ़ याद नहीं...एक ऐसी जंजीर होती है... जो खुलते ही सब कुछ तोड़ देती है...”
( रात का समय। तभी रुद्र के राक्षस वहां भी आ धमाके। उनकी वजह से कबीर और सिया अलग guest House में रह रहे थे। सीया और करन एक पुराने गेस्ट हाउस में छिपे हुए हैं। बाहर से गोलियों की आवाज़ें, चिल्लाने की गूँज। खिड़की के शीशे टूटते हैं। करन दीवार के सहारे सीया को पीछे खींच लेता है। रुद्र के राक्षस यानि करण की बिरादरी वाले आ गए।)
करन (घबराई आवाज़ में) बोला -
“सीया! झुको नीचे! ये लोग मेरे पीछे हैं!”
सीया (डरी हुई) बोली -
“कौन हैं ये लोग?”
करन (साँस लेते हुए) बोला -
“मेरे बिरादरी वाले… वो नहीं चाहते कि मैं किसी ‘प्रोजेक्ट शैडो’ की लड़की को बचाऊँ…”
(सीया की आँखों में डर झलकता है। बाहर से गोलियों की आवाज़ फिर गूँजती है। करन तुरंत उसे पकड़कर एक कोने में खींच लेता है।)
करन (फुसफुसाते हुए) बोला -
“जब तक मैं हूँ, तुम्हे कुछ नहीं होने दूँगा।”
(बिजली चली जाती है। कमरे में सिर्फ़ चाँदनी की हल्की सफ़ेद रौशनी बची है। दोनों बहुत पास हैं। करन की साँसें तेज़ हैं, और सीया उसकी छाती से लग चुकी है।)
(सीया ऊपर देखती है — उसकी आँखों में डर नहीं, बस एक अनकहा भरोसा है।वो फुसफुसाती है —)
सीया बोली -
“आप क्यों करते हो इतनी परवाह मेरे लिए…?”
(करन की आँखें काँप जाती हैं। वो कुछ नहीं कहता। बस उसकी तरफ देखता रहता है —
उसके चेहरे पर गिरे टूटे शीशे की चमक, उसके होंठों पर कंपकंपाहट।)
सीया (धीरे से) बोली -
“अगर मैं चली गई तो… क्या आपको फर्क पड़ेगा?”
(करन का दिल जैसे थम जाता है। वो उसे और कसकर अपनी बाँहों में लेता है।)
करन बोला -
“ऐसा बोलना भी मत... तुम पर कोई हाथ भी नहीं उठा सकेगा जब तक मैं ज़िंदा हूँ।”
(सीया मुस्कुराती है — एक मासूम, बेगुनाह मुस्कान।
वो करन की आँखों में देखती है, और उसकी पलकों को छूती है।
उस पल करन अंदर से टूट जाता है। वो खुद को रोकने की कोशिश करता है… पर दिल कहता है — “जो होगा देखा जाएगा।”)
(दोनों के बीच की दूरी खत्म हो जाती है। करन का चेहरा धीरे-धीरे सीया के करीब आता है। उनकी साँसें एक हो जाती हैं। सीया अपनी आँखें बंद कर लेती है। करन की हथेलियाँ काँपती हैं, पर अब वो पीछे नहीं हटता।)
(अचानक — एक लंबा मौन
करन अपने होंठ सीया के होंठों पर रख देता है। समय जैसे ठहर जाता है। सीया की पलकें काँपती हैं, और उसके अंदर कुछ टूटने लगता है — जैसे नींद से जाग रही हो।)
(जैसे ही चुंबन होता है, सीया की आँखों के सामने तेज़-तेज़ झलकें आने लगती हैं —
प्रोजेक्ट शैडो की लैब, डॉ. तारा, ब्लैक सीया, और करन का पुराना चेहरा — शैतान। उनकी शादी, रुद्र का हमला सब)
(वो हाँफने लगती है। उसकी साँसें तेज़ हो जाती हैं। उसके माथे पर पसीना झलकने लगता है। करन डर जाता है, वो उसे थामता है।)
करन (घबराकर) बोला -
“सीया! क्या हुआ तुझे? आँखें खोल!”
(सीया की आँखें खुलती हैं —पर अब उनमें वही शांति नहीं।
अब उनमें पहचान की ज्वाला है। वो धीरे-धीरे बैठती है।
उसकी साँसें सामान्य होती हैं। वो उसे देखती है — बहुत देर तक — गहराई से।)
सीया (धीरे, ठंडे स्वर में) बोली -
“आप... कबीर नहीं... करन जी हो। पर मैं... मैं सीया नहीं हूँ…”
(करन उसे अवाक देखता है। उसके होंठ काँपते हैं।)
करन (धीरे से) बोला -
“मतलब... तुम्हे सब याद आ गया?”
(सीया धीरे-धीरे मुस्कुराती है —पर वो मासूम मुस्कान नहीं।
वो एक दर्दभरी, ठंडी मुस्कान है।)
सीया (अब दृढ़ स्वर में) बोली -
“हाँ, मुझे सब याद आ गया...मैं सीया नहीं… सिमरन हूँ।”
(करन की आँखें फैल जाती हैं। झटका, डर, और ग़लती का एहसास एक साथ।)
करन (टूटे स्वर में) बोला -
“नहीं… ये नहीं हो सकता…”
सिमरन (धीरे, कठोरता से) बोली -
“हो चुका है, करन जी…आपने जिस सच्चाई से मुझे दूर रखना चाहा था…उसे खुद अपनी साँसों से जगा दिया है।”
(करन की आँखों से आँसू गिरते हैं। वो कुछ बोल नहीं पाता।
सिमरन उठती है, उसकी ओर देखती है। उसके चेहरे पर अब डर नहीं, एक ठंडी स्थिरता है।)
सिमरन (धीरे से) बोली -
“अब खेल खत्म नहीं हुआ… अब तो असली खेल शुरू होगा।”
(बाहर तूफ़ान चल रहा है। खिड़की से आती बिजली की चमक दोनों के चेहरों को रोशन करती है —एक में अपराध, दूसरे में प्रतिशोध।)
“कभी-कभी एक चुंबन सिर्फ़ प्यार नहीं जगाता…वो अतीत की रूहें भी जगा देता है…”