Meri Kahani - 1 in Hindi Biography by Richa Sharman books and stories PDF | मेरी कहानी - 1

Featured Books
  • دوستی — ایک خوبصورت احساس

    دوستی — ایک خوبصورت احساسزندگی میں بہت سے رشتے ہمیں پیدائش ک...

  • شعور

    بھاری آسمان پر گھنے بادل جمع ہو رہے ہیں۔ وہ چلچلاتی دھوپ میں...

  • Safar e Raigah - 21

    منظر۔شاہ میر نے کیمرے کے لینس سے اپنی نظر ہٹائی اور مڑ کر آی...

  • بندھن — ایک پیار کا

    ایک چھوٹے سے خوبصورت شہر میں عائشہ اپنے والدین کے ساتھ رہتی...

  • دماغ

    آپ کی نظر آپ کی نگاہیں اشاروں سے کچھ کہہ رہی ہیں۔ ہماری زندگ...

Categories
Share

मेरी कहानी - 1

डर से शुरू हुई एक लंबी यात्रा
अगर मैं अपनी ज़िंदगी को पीछे मुड़कर देखती हूँ, तो मुझे लगता है कि मेरी कहानी कभी बहुत आसान नहीं रही। ऐसा नहीं है कि मेरी हर इच्छा अधूरी रही या मुझे कभी खुशियाँ नहीं मिलीं। मेरी बहुत-सी इच्छाएँ पूरी हुईं, मेरे कई सपने पूरे हुए, लेकिन अक्सर उन्हें पाने से पहले ज़िंदगी ने मेरी बहुत परीक्षाएँ लीं। जैसे हर खुशी तक पहुँचने से पहले मुझे किसी न किसी मुश्किल रास्ते से होकर गुजरना पड़ा हो।
और यह सिर्फ आज की बात नहीं है। यह सिलसिला मेरे बचपन से चला आ रहा है।
बचपन से ही मेरे मन में एक डर था। वह डर क्या था, शायद उसे शब्दों में पूरी तरह बता पाना मेरे लिए आज भी आसान नहीं है। लेकिन इतना जरूर है कि उस डर के साथ मेरा बचपन बीता। मैं बड़ी होती गई, उम्र बढ़ती गई, परिस्थितियाँ बदलती गईं, लेकिन वह डर कहीं न कहीं मेरे साथ चलता रहा।
बचपन से लेकर बड़े होने तक, और आज तक—कई बार मुझे ऐसा लगा जैसे मैं अपनी ज़िंदगी को डर के साथ जीती आई हूँ।
फिर बचपन पीछे छूट गया। मैं बड़ी हुई, शादी हुई और एक नई ज़िंदगी शुरू हुई। शादी के समय हर लड़की की तरह मेरे मन में भी बहुत-से सपने थे। मैं भी कुछ उम्मीदें लेकर अपने नए घर आई थी। मन में यह विश्वास था कि जिस तरह मुझे अपने मायके में संस्कार और प्यार मिला, उसी तरह मैं भी अपने नए परिवार को प्यार और अपनापन दे पाऊँगी।
मैं बचपन से ही दिल की बहुत साफ थी। मेरे साथ कोई कितना भी बुरा क्यों न करे, मेरे मन में उसके लिए बुरा सोच पाना मेरे लिए आसान नहीं था। मैं बहुत जल्दी पिघल जाती थी। कई बार मुझे गुस्सा आता, दुख होता, सामने वाले की बात चुभती भी थी, लेकिन फिर भी मन कहता—
“उसने मेरे साथ बुरा किया है, तो क्या मुझे भी उसके साथ बुरा करना चाहिए? नहीं… इतना बुरा तो मुझे भी नहीं बनना।”
शायद यही मेरी अच्छाई थी।
और शायद यही मेरी कमजोरी भी बन गई।
मैं लोगों से नाराज़ तो हो जाती थी, लेकिन उनके सामने अपने लिए खड़ी नहीं हो पाती थी। मुझे गुस्सा आता था, लेकिन मैं उस गुस्से को शब्द नहीं दे पाती थी। मैं लड़ नहीं पाती थी। मेरे अंदर वह शक्ति नहीं थी कि मैं हर गलत बात का उसी समय जवाब दे सकूँ।
और सच कहूँ तो, आज भी मैं पूरी तरह नहीं बदल पाई हूँ।
मेरी माँ ने मुझे बचपन से बहुत अच्छी बातें सिखाईं। खासकर शादी के समय उन्होंने मुझे ऐसी सीख दी, जिसे मैं आज तक अपने साथ लेकर चलती हूँ। उन्होंने मुझे कभी यह नहीं सिखाया कि ससुराल में जाकर किससे कैसे लड़ना है या किसको कैसे जवाब देना है। उन्होंने तो उल्टा मुझे समझाया
“उनकी बेटी नहीं है, तू उनकी बेटी बनकर रहना।”
मैं अपनी माँ की इस सीख को दिल से लेकर अपने नए घर आई थी। मेरे मन में यही था कि जिस परिवार, मैं जा रही हूँ, उसे अपना परिवार समझूँगी। जितना हो सकेगा, प्यार और सम्मान दूँगी।
To be continued......