आखिर वह दिन आ गया जब इस कहानी का आखिरी पड़ाव हम सब का इंतज़ार कर रहा था । यह अमावस की घनी - काली रात थी, ऐसा माना जाता है कि अमावस की रात काली शक्तियां सबसे ज्यादा सक्रिय होतीं हैं ... शायद इसलिए प्रोफेसर शास्त्री ने इस रात को साधना के लिए चुना था। सर्द रात के बावजूद सिंहल पैलेस के खुले गार्डन में सब जमा थे, सच कहूँ तो मैं तो डर के मारे आना भी नहीं चाहती थी पर शर्लिन के वास्ते मुझे आना पड़ा। गार्डन में मेरे अलावा स्वप्निल, शर्लिन, डॉ. पार्थसारथी, गौतम देव रॉय थे .... सभी के बाजुओं में एक अभिमंत्रित रक्षा सूत्र बंधा हुआ था सिवाय शर्लिन के। तंत्र - मंत्र का जबरदस्त प्रभाव माहौल में था ... गार्डन के सारे लाइट्स ऑफ थे, सिर्फ दिये जल रहे थे चारों ओर ... जवा, कमल और नीले फूल से गार्डन पूरी तरह सजा हुआ था। एक बड़े से यज्ञ कुण्ड के आगे एक वृद्ध लाल रंग के वस्त्रों में बैठे थे, गले और बाजुओं में रूद्राक्ष ... ललाट और भुजाओं पर भभूति ... चेहरे पर अनुपमेय तेज़, यह प्रोफेसर अखिलेश शास्त्री थे। उनके अगल - बगल एक घेरे में उनके शिष्य खड़े थे। प्रज्ज्वलित यज्ञ कुण्ड के आगे बैठे प्रोफेसर शास्त्री लागातार मंत्रोच्चारण करते हुए आहुति दे रहे थे .... उनकी बायीं ओर एक लाल रंग का घेरा बनाया हुआ था। उल्लु और चमगादड़ जैसे कई अशुभ पक्षी बाहरी पेड़ों पर बैठे चित्कार कर रहे थे पर मंत्रोच्चारण के प्रभाव से गार्डन के अन्दर प्रवेश नहीं कर पा रहे थे । फिर अचानक से वहाँ के माहौल में अजीब सा कंपन महसूस होने लगा ... चीजें अपनेआप गिरने - टूटने लगीं ... काफ़ी सारे दिये एक साथ इस तरह बुझ गए जैसे किसी ने फूंक मार कर उन्हें बुझा दिया हो। सभी के चेहरे पर एक भय सा छा गया था पर प्रोफेसर शास्त्री अविचल बैठे मंत्रोच्चारण करते रहे ... आहुतियाँ देते रहे। तभी शर्लिन बड़े जोर से चीख़ उठी, मैं घबरा के उस की ओर लपकी उसे संभालने के लिए मगर बीच में ही मेरे पैर डर के मारे थम गए ... शर्लिन का पूरा देह कॉंप रहा था ... उसके बाल खुल के बिखर चुके थे ... आंखें ऐसी लग रहीं थीं कि जैसे किसी ने आंखों के अंदर लाल स्याही पोत दी हो ... शर्लिन का खुबसूरत चेहरा नीला पड़ चुका था ... इस वक़्त वह हसीन मुखड़ा ऐसे सूखे - बंजर जमीन जैसा लगने लगा था, जिस पर ढेर सारी दरारें पड़ गईं हों ... आवाज ऐसे घरघरा के निकल रही थी जैसे दो लोग एकसाथ बोल रहे हों, वो स्वप्निल की ओर देखते हुए बोली,
" अब तो ये काल के गाल में समा जायेगी ... क्या विचारा था, इस तंत्र - मंत्र - यंत्र के बल पर श्राप से मुक्ति मिल जायेगी ... मुझसे मुक्ति मिल जायेगी ... मुझ पर विजय पा लोगे ? "
हैरान करने वाली बात ये थी कि स्वप्निल इस भयंकर स्थिति में भी जरा सा भी विचलित नहीं लग रहा था बल्कि उसका चेहरा एक अद्भुत ओज से दमदमा रहा था। जब वह बोला तो उसकी आवाज में भी डर नहीं बल्कि गज़ब का माधुर्य था,
" मैं आप से मुक्ति नहीं चाहता देवी, आपकी मुक्ति चाहता हूँ । मैं चाहता हूँ कि सदियों की इन पीड़ाओं से ... इस प्रेत योनि से आप मुक्त हो जायें । "
शर्लिन के देह का कंपन बन्द हो गया, वो यानि घुँघरू बड़े ही गौर से स्वप्निल को देखने लगी पर तभी मंत्रोच्चारण बन्द हो गया, प्रोफेसर शास्त्री उसकी तरफ देख के दहाड़े,
" बच्चों को क्या धमकाती है, इधर आ मुझसे बात कर ! "
घुँघरू का ध्यान टूट गया, उसने बड़ी ही कहर भरी नज़रों से प्रोफेसर शास्त्री को घूरा और फिर जोर से अट्टहास किया। आवाज ऐसी जोर की थी कि सभी ने अपने कानों पर हाथ धर लिए ... हममें से कितने के कानों से तो खून बहने लगा। रक्षा सूत्र की वजह से हमारी रक्षा तो हो गई पर गार्डन में जैसे बवंडर आ गया पर स्वप्निल तब भी अविचल भाव से खड़ा रहा। शंखचूड़नी स्वप्निल की ओर धीमे कदमों से इस तरह बढ़ी मानों उसी क्षण उसे खा जायेगी पर तभी मंत्रोच्चारण फिर से शुरू कर दिया गया ... इस बार प्रोफेसर शास्त्री के साथ उनके शिष्य भी उच्च स्वर में मंत्रोच्चारण करने लगे और शंखचूड़नी अपनी जगह पर इस तरह थम गई मानों किसी ने उसे जकड़ लिया हो। इसके बाद प्रोफेसर शास्त्री तनिक देर के लिए चुप हुए मगर शिष्यों ने मंत्रोच्चारण जारी रखा। प्रोफेसर शास्त्री ने आसमान की ओर हाथ उठा के जोर से प्रार्थना करते हुए बोले,
" हे माँ तारा चण्डी ! इस शंखचूड़नी पर दया कर ... यह मार्ग भटक चुकी है, इसे सद्बुद्धि प्रदान कर ... इस का कल्याण कर माता ! "
शंखचूड़नी अपनी जगह से हिल भी नहीं पा रही थी पर वह वहीं से गरजी,
" तांत्रिक .... अरे दुष्ट तू मुझे अपने वश में करना चाहता है। सिंहल राजवंश के साथ तेरा भी विनाश होगा .... सब मृत्यु के ग्रास बनेंगे ... रूदन ... विलाप ... शोक ... मरण ... शव और रक्त .......... । "
प्रोफेसर शास्त्री निश्चल आंखों से उसकी ओर देखते रहे, फिर शांत - अम्लान स्वर में बोले,
" जिसे अपने अस्तित्व तक का बोध नहीं उस पर भला मैं क्रोध करूँ भी तो कैसे ? सदियों से रक्त का पान करते - करते तुझमें रक्त की प्यास इतनी बढ़ गई है कि तू घुँघरू नहीं मात्र शंखचूड़नी बनकर रह गई है, बेचारी घुँघरू की व्यथा को तो तूने भूला ही दिया है ... उसकी पीड़ाओं का क्या रे शंखचूड़नी ? वो बेचारी क्या और पांच सौ - हजार सालों तक यूँ ही प्रेत योनि में भटकती रहेगी ... कभी मुक्त न हो पायेगी ? "
वो अपनी जगह पर स्थिर खड़ी थी ... क्रोधित या शांत, ये पता नहीं। इसी बीच स्वप्निल उसकी ओर बढ़ा, उसने इशारे से हम सब को खामोश रहने को कहा। वो शर्लिन यानि घुँघरू के ठीक पीछे जाकर खड़ा हो गया और खूब सावधानी से उसका हाथ अपने हाथों में पिरो लिया। मैं कसम से कह रही हूँ, उस वक़्त मुझे पक्का लगा था कि अब ये स्वप्निल तो जिंदा नहीं बचेगा मगर न जाने क्या अलौकिक चमत्कार हुआ कि घुँघरू खड़ी रह गई और शर्लिन का बदन हवा में लहराया, इससे पहले की वो जमीन से टकराती स्वप्निल ने उसे अपनी बांहों में संभाल लिया। तब तक बड़ी हिम्मत जुटा कर मैं भी वहाँ पहुँच गई, स्वप्निल ने संभाल कर उसे मेरी गोद में सुला दिया। घुँघरू का साया स्थिर खड़ा था ... जगमगाते तारों से बना साया। वो बड़ी ही श्रद्धा से स्वप्निल की ओर देख रही थी, दोनों आंखों से खून जैसे लाल आंसू बह रहे थे। स्वप्निल को वापस उसकी ओर आता देख, उसने बड़ी श्रद्धा से हाथ जोड़ लिए और मुख से निकला,
" गुरू कुमार !!! "
तभी प्रोफेसर शास्त्री ने स्वप्निल को इशारा किया कि वो घुँघरू को लाकर उनकी बायीं तरफ बने लाल यंत्र में बिठा दे। स्वप्निल आगे बढ़ निर्भय घुँघरू का हाथ थाम यज्ञ स्थल की तरफ बढ़ चला, घुँघरू उसके पीछे - पीछे चलने लगी। हर कदम पर जादू की तरह घुँघरू का रूप बदलने लगा ... साया धीरे-धीरे आकार लेने लगा। हम सब चकित हो गए तेजस्वनी - मनमोहीनी घुँघरू का अद्भुत रूप देख कर। स्वप्निल के संग चलती हुई वो आकर यज्ञ कुण्ड की बायीं ओर बने लाल यंत्र में बैठ गई और इसके बाद जैसा कि योगी जी ने भविष्यवाणी की थी घुँघरू ने स्वयं अपने तर्पण यानि कि मुक्ति का मार्ग बता दिया। घुँघरू ने बताया कि यह श्राप उस के उस कंगन से आबद्ध है, जो मरते वक़्त उसके कलाई पर थे ... प्राण - लहू की बूदें डालकर उसने कंगन को श्राप से बांधा था। कंगन नष्ट होगा तो यह श्राप ख़ुद-ब-ख़ुद टूट जायेगा। घुँघरू ने बताया कि वह कंगन सिंहल राजवंश के उसी राजमहल में मिलेगा, जहाँ चार - पांच सौ साल पहले ये सारी अनहोनी हुई थी .... राजसिंहासन के निचले तले में वह कंगन जड़ा हुआ है। जाहिर सी बात है कि यह काम घुँघरू ने ही शंखचूड़नी बनने के बाद कंगन को सुरक्षित रखने के लिए किया था। कुछ विधियों के बाद प्रोफेसर शास्त्री ने घुँघरू को बंधनमुक्त कर दिया मगर हम सब को रक्षा सूत्र तब तक बांधे रखने को कहा जब तक की घुँघरू का तर्पण नहीं हो जाता। इस तरह ये डरावनी - निशाचरी रात खत्म हुई...................
अगले ही दिन गौतम देव रॉय और डॉ. पार्थसारथी कंगन को खोजकर लाने के लिए निकल पड़े। स्वप्निल को भी जाना था पर उसने जाना कैंसिल कर दिया क्योंकि शर्लिन हॉस्पिटल में थी और वो उसे यूँ छोड़ कर जाना नहीं चाहता था ... सो स्वीट ना ! वैसे आप फिक्रमंद हों, इससे पहले मैं बता दूँ कि शर्लिन की सेहत ठीक थी, बस उसे हल्की - फुल्की चोटें आईं थीं मगर वो अंदर से काफ़ी कमज़ोर महसूस कर रही थी। जाहिर सी बात है शंखचूड़नी की नेगेटिव एनर्जी को अपने देह में झेलना कोई खेल तो था नहीं। स्वप्निल ने प्रोफेसर शास्त्री से लेकर एक रक्षा सूत्र अपने हाथों से शर्लिन की बाजू पर बॉंध दिया। इस मुश्किल समय में स्वप्निल और शर्लिन की दिलों की नजदीकियां काफ़ी बढ़ गईं ... दोनों ने सदा संग रहने का इरादा कर लिया.........
उधर डॉ. पार्थसारथी और गौतम देव रॉय बगैर किसी बाधा के वो श्रापित कंगन लेकर आ गए, जिसका प्रोफेसर शास्त्री ने स्वप्निल के हाथों किसी इंसान के जैसे ही विधिवत् अंतिम संस्कार करवाया। फिर स्वप्निल ने ख़ुद जाकर कंगन के अवशेष यानि राख को वाराणसी के मणिकर्णिका घाट में विसर्जित किया। स्वप्निल ने बताया कि उसने जैसे ही राख जल में प्रवाहित किया, वैसे ही उसे एक जगमगाते तारों सी छाया आसमान की ओर जाती दिखाई पड़ी। सच तो ये है कि हम सब का घुँघरू से कोई नाता नहीं था पर सब को एक अद्भुत सुकून का अहसास हुआ, यह जानकर कि आखिरकार घुँघरू को अपनी सभी पीड़ाओं से मुक्ति मिल गई और वो परमधाम के सुख में विलीन हो गई.................।।।
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समाप्त
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