Avni ek Atut Vishwas in Hindi Love Stories by RAAHULL SHARMA books and stories PDF | अवनि एक अटूट विश्वास - 18

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अवनि एक अटूट विश्वास - 18

वह काबिल-ए-तारीफ है। लेकिन सबसे अच्छी बात जानते हो क्या है? इतनी शोहरत के बाद भी वह बहुत ही धार्मिक और नेक दिल इंसान है।


बड़ों का आदर कैसे करना है, यह कोई उससे सीखे। वह उन लड़कों में से नहीं है जो अपनी जड़ों को भूल जाएं।"
दादाजी ने एक लंबी सांस ली और अवनि की ओर देखते हुए कहा:



"मैंने राजेश जी से खुलकर बात की है। वह और उनका परिवार अवनि को अपनी बहू बनाने के लिए बेहद खुश हैं। मेरा मानना है कि इस बार हमसे कोई चूक नहीं होगी।


जो धोखा हम पहले खा चुके हैं, वैसा कड़वा अनुभव अब दोबारा नहीं मिलेगा। राजेश जी का परिवार दूध का धुला है और बहुत ही संस्कारी है।


मयंक जैसा जीवनसाथी अवनि की खुशियों का ख्याल भी रखेगा और हमारे गोयनका साम्राज्य का मान भी बढ़ाएगा।"



चाचा जी ने उत्साहित होकर कहा, "बाबूजी, अग्रवाल एंड कंपनी तो वाकई बहुत बड़ा नाम है। अगर अवनि का रिश्ता वहां होता है, तो यह हमारे लिए भी बड़े गर्व की बात होगी।"



दादाजी ने सिर हिलाया और बोले, "यही मैं भी सोच रहा हूँ। इस बार रिश्ता सिर्फ बराबरी का नहीं, बल्कि भरोसे का भी होगा।


अगर आप सबकी रज़ामंदी हो, तो मैं उन्हें अगले हफ्ते ही यहाँ आमंत्रित करूँ?"


अवनि ने नीची नज़रों से भगवान कृष्ण की प्रतिमा को देखा। उसके मन में हलचल थी, लेकिन उसने खुद को मज़बूत किया। वह जानती थी कि उसे अपने अतीत की राख से बाहर निकलना ही होगा।



दादाजी की बातों में एक अलग ही सुकून और भविष्य की योजना साफ झलक रही थी। उन्होंने अपनी लाठी जमीन पर टिकाते हुए आगे कहा:



दादाजी: "और सबसे बड़ी बात जानते हो क्या है? मेरी राजेश जी से बात हुई तो उन्होंने खुद कहा कि वे अब कोलकाता का काम अपने मैनेजरों के भरोसे छोड़कर कानपुर में ही बसना चाहते हैं।



उनका मानना है कि कानपुर में टेक्सटाइल के जो कारीगर हैं और यहाँ की जो मज़बूत पकड़ है, वो पूरे देश में कहीं नहीं है। उनके आने से हमारा और उनका साथ और भी गहरा हो जाएगा।"



दादाजी की आँखों में एक चमक आ गई, उन्होंने मुस्कुराकर अवनि की ओर देखा और बोले, "इससे बड़ा सुख मेरे लिए क्या होगा कि मेरी बिटिया, कानपुर की लड़की, शादी के बाद भी कानपुर में ही रह जाएगी। मेरी आँखों के सामने।"



हॉल में बैठे सब लोग इस बात से बेहद खुश थे, पर अवनि के अंदर जैसे भावनाओं का ज्वार उमड़ रहा था। उसे खुशी होनी चाहिए थी, पर अतीत के ज़ख्म अभी भी कचोट रहे थे।



इतनी बड़ी चर्चा के बीच अवनि अचानक अपनी जगह से उठ खड़ी हुई और बिना कुछ कहे मंदिर की ओर जाने लगी।



उसका इस तरह अचानक उठना देख दादाजी थोड़े हैरान हुए।



दादाजी (चिंता भरे स्वर में): "अवनि बिटिया! कहाँ जा रही हो? अभी तो हम बहुत ज़रूरी बात कर रहे हैं।"
अवनि के कदम एक पल के लिए रुके।


उसने खुद को संभाला, अपनी आँखों की नमी को छुपाया और बिना पीछे मुड़े बहुत ही शांत स्वर में कहा:



अवनि: "दादाजी... मैं बस अभी आई। वो... मैं भगवान को प्रसाद चढ़ाना भूल गई थी। कान्हा जी इंतज़ार कर रहे होंगे।"



अवनि तेज़ी से मंदिर की सीढ़ियाँ चढ़ गई। हॉल में बैठे लोगों को लगा कि शायद अवनि अपनी शादी की बात सुनकर शरमा गई है या भावुक हो गई है, 



लेकिन अवनि जानती थी कि वह वहां से इसलिए भागी क्योंकि वह अपनी आँखों से बहने वाले आँसुओं को सबके सामने नहीं आने देना चाहती थी।



जैसे ही वह मंदिर में पहुँची, उसने भगवान कृष्ण की प्रतिमा के सामने माथा टेका।



अवनि (फुसफुसाते हुए): "कान्हा जी, ये कैसा इम्तिहान है? एक तरफ वो यादें हैं जो पीछा नहीं छोड़तीं, और दूसरी तरफ दादाजी का यह विश्वास। 



मुझे शक्ति दीजिए

अवनि मंदिर की चौखट पर सर झुकाए बैठी थी। मंदिर का दीया मद्धम जल रहा था, जिसकी रोशनी कृष्ण की मूरत पर पड़कर उसे और भी दिव्य बना रही थी। 


अवनि की सिसकियां अब गहरी हो गई थीं। उसने कान्हा की आँखों में आँखें डालकर बड़े ही अधिकार और पीड़ा के साथ अपना सवाल पूछा।



अवनि (रुँधे हुए गले से): "कान्हा जी... यह आपकी कैसी लीला है? आज सब खुश हैं, दादाजी मेरे लिए एक नया संसार सजाने की बात कर रहे हैं।


मयंक अग्रवाल के रूप में मेरे जीवन में एक नया इंसान आने वाला है। पर मेरा मन तो आज भी उसी मोड़ पर खड़ा है।"



उसने अपनी हथेलियां मंदिर के ठंडे फर्श पर टिका दीं और आगे कहा:



"जब आपको मेरे जीवन में किसी दूसरे व्यक्ति को लाना ही था, तो आपने उस इंसान (आर्यमन) के लिए मेरे मन में प्रेम क्यों जगाया?


क्यों आपने मुझे उसकी जान बचाने का ज़रिया बनाया? क्यों मेरी रातों की नींद और मेरे दिन का चैन उसके नाम कर दिया? और अगर वह मेरे लिए था ही नहीं, तो वह प्रेम जगाकर मेरी उम्मीदें क्यों तोड़ीं कान्हा जी?"



अवनि ने प्रतिमा की ओर उंगली उठाते हुए उलाहना दी:
"क्या मेरा कसूर सिर्फ इतना था कि मैंने निस्वार्थ भाव से किसी की जान बचाई?


क्या प्रेम करना इतना बड़ा गुनाह है कि उसकी सज़ा मुझे इस कदर दी जा रही है कि आज मैं किसी और के नाम की मेहंदी लगाने की बात सुन रही हूँ, जबकि मेरा मन उस पुराने ज़ख्म को सहलाने में लगा है?



अवनि का सर कान्हा के चरणों में झुक गया। तभी पीछे से अवनि की माँ की आहट सुनाई दी। उन्होंने अवनि की बातें सुन ली थीं, और उनकी अपनी आँखों में भी आंसू थे। उन्होंने अवनि के कंधे पर हाथ रखा।



माँ (सहानुभूति से): "अवनि बेटा... भगवान कभी-कभी हमें टूटने के लिए नहीं, बल्कि हमें यह बताने के लिए मोड़ पर छोड़ देते हैं कि हम अकेले ही काफी हैं।



दिल्ली: आर्यमन का पत्थर दिल अवतार


कानपुर की उन बर्फीली वादियों से लौटकर आर्यमन कभी 'इंसान' नहीं बन सका। उसने अवनि को खोने के गम को नफरत की ढाल से ढंक लिया था। दिल्ली के आलीशान ऑफिस में बैठा आर्यमन अब सिर्फ एक मशीन की तरह काम करता।



दोपहर 2:00 बजे: बड़े-बड़े बिज़नेस डील्स को बेरहमी से फाइनल करना।



रात 10:00 बजे: दिल्ली के सबसे महंगे नाइट क्लबों में तेज़ संगीत के बीच शराब के जाम से खुद को सुन्न करना।
उसके चेहरे पर अब वो पुरानी नरमी नहीं थी।


वह पहले से कहीं ज़्यादा कठोर और रूखा हो गया था। उसके पिता भी उसे देख कर डरते थे।