मैं एक बेटी
लेखक: विजय शर्मा एरी
मैं एक बेटी हूँ। बस इतना सा वाक्य है, लेकिन इसमें पूरी जिंदगी छुपी हुई है। मेरे नाम का कोई खास मतलब नहीं है, लेकिन मेरी कहानी का बहुत कुछ मतलब है। आज मैं अपनी कहानी खुद लिख रही हूँ, क्योंकि अब तक दूसरों ने ही मेरे बारे में सोचा, फैसला किया और बोला। आज मैं खुद बोलूँगी।
मेरा जन्म एक छोटे से शहर में हुआ था। घर में पहले से दो भाई थे। जब माँ के पेट में मैं आई, तो घरवालों ने कहा—“अब लड़की हो जाएगी तो अच्छा रहेगा, घर में कोई तो रहेगी।” पिताजी ने चुपचाप सिर हिलाया। माँ ने मुस्कान से कहा—“बेटा-बेटी एक समान।” लेकिन उस मुस्कान में थोड़ी थकान भी थी।
जब मैं पैदा हुई, तो घर में मिठाई तो बँटी, लेकिन मिठाई का डिब्बा छोटा था। भाई के जन्म पर जो खुशियाँ मनाई गई थीं, उनका आधा भी नहीं। फिर भी माँ ने मुझे गले से लगा लिया। पिताजी ने मेरा नाम रखा—अंजली। नाम सुंदर था, लेकिन जिंदगी उतनी सुंदर नहीं रही।
बचपन में मैं बहुत बातूनी थी। स्कूल जाते समय भाई मेरे बैग में अपनी किताबें ठूँस देते थे। मैं विरोध करती तो माँ कहती—“बेटा है, थोड़ा सह ले।” घर के काम में मेरी मदद माँगी जाती थी, भाईयों की नहीं। मैं रोटी बेलना सीख रही थी, तब भाई क्रिकेट खेल रहे थे। मैं कहती—“मैं भी खेलूँगी,” तो जवाब मिलता—“लड़कियाँ घर संभालती हैं।”
मैं अच्छी पढ़ाई करती थी। कक्षा में हमेशा आगे रहती। टीचर मेरी तारीफ करते तो घर में खुशी होती, लेकिन तारीफ के साथ एक सवाल भी आता—“अब आगे क्या करेगी? शादी तो करनी ही है।” भाईयों के लिए कहा जाता—“इंजीनियर बनेगा, डॉक्टर बनेगा।” मेरे लिए कहा जाता—“अच्छी लड़की बनेगी।”
कक्षा दसवीं में जब मैंने साइंस लिया, तो रिश्तेदारों ने कहा—“लड़की साइंस क्यों पढ़े? आर्ट्स ले लो, आसानी रहेगी।” पिताजी ने समर्थन किया, लेकिन माँ ने चुपके से कहा—“जो मन हो, वो पढ़।” मैंने साइंस लिया। रात-रात भर पढ़ती। भाई टीवी देखते, मैं किताबों में डूबी रहती। परीक्षा में अच्छे नंबर आए। घर में खुशी हुई, लेकिन खुशी के साथ फिर वही सवाल—“अब कॉलेज कहाँ जाएगा? दूर नहीं जाना।”
कॉलेज में दाखिला लिया। शहर से थोड़ा दूर था। हॉस्टल में रहना पड़ा। पहली बार घर से दूर। रात को रोती थी। माँ फोन पर कहती—“बेटा, हिम्मत रख।” भाई कहते—“घर आ जा, क्या जरूरत पढ़ने की।” लेकिन मैं नहीं लौटी। पढ़ाई में मन लगता था। दोस्त बने। कुछ लड़कियाँ मेरे जैसी ही थीं—घर की जिम्मेदारी और अपनी ख्वाहिशों के बीच झूलती हुई।
एक दिन क्लास में प्रोफेसर ने पूछा—“तुम लोग आगे क्या बनना चाहते हो?” लड़के बोले—आईएएस, साइंटिस्ट, बिजनेसमैन। जब मेरी बारी आई, तो मैंने कहा—“मैं एक अच्छी बेटी बनना चाहती हूँ, लेकिन साथ में एक अच्छी इंसान भी।” क्लास हँसी। प्रोफेसर ने गंभीर होकर कहा—“बेटी होना कोई कमजोरी नहीं है। बेटी होना ताकत है।”
उस दिन से मैंने खुद को और मजबूती से पकड़ा। पढ़ाई के साथ पार्ट-टाइम काम भी किया। पैसे बचाए। घर भेजने लगी। पिताजी पहले तो मना करते रहे—“लड़की पैसे कमाएगी क्या?” लेकिन जब पैसे आए, तो चुप हो गए। माँ ने फोन पर कहा—“तूने घर का नाम रोशन किया।”
कॉलेज खत्म हुआ। नौकरी मिल गई। शहर में। अब घर में मेरी बात सुनी जाने लगी। रिश्तेदार कहते—“देखो, लड़की ने भी कुछ किया।” लेकिन उसी साँस में जोड़ते—“अब शादी कर लो।” शादी का प्रस्ताव आने लगा। कुछ में कहा गया—“लड़की कमाती है, अच्छी बात है।” कुछ में कहा गया—“ज्यादा पढ़ी-लिखी है, दिक्कत होगी।”
मैंने एक प्रस्ताव ठुकरा दिया। घर में तूफान आ गया। पिताजी ने कहा—“लड़कियाँ ज्यादा चुनती नहीं।” माँ रोई। मैंने कहा—“मैं अपनी जिंदगी खुद चुनूँगी।” उस दिन पहली बार मैंने घर में जोर से बात की। भाई चुप रहे। रात को माँ मेरे कमरे में आई। हाथ पकड़कर बोली—“मैं भी एक बेटी थी। मैंने कभी अपनी बात नहीं कही। तू कह। मैं तेरे साथ हूँ।”
उस रात माँ ने अपनी कहानी सुनाई। कैसे उनकी शादी जल्दी हो गई, कैसे उन्होंने अपनी पढ़ाई छोड़ दी, कैसे उन्होंने चुपचाप सब सहा। माँ ने कहा—“मैं चाहती हूँ तू वो न बने जो मैं बनी।” उस रात मेरी आँखों में आँसू थे, लेकिन दिल में एक नई आग थी।
नौकरी में तरक्की मिली। मैंने घर खरीदा। छोटा सा। माँ-पिताजी को बुलाया। पिताजी ने कहा—“लड़की ने घर खरीदा।” आवाज में गर्व था, लेकिन थोड़ा अचरज भी। माँ ने रसोई में खड़े होकर कहा—“अब ये घर तेरा है, मेरा भी।”
फिर एक दिन शादी का सही रिश्ता आया। लड़का समझदार था। परिवार अच्छा था। उन्होंने कहा—“हमारी बहू पढ़ी-लिखी हो, कमाती हो, हमें गर्व होगा।” मैंने हाँ कर दी। शादी हुई। पिताजी ने विदाई के समय कहा—“तू हमेशा हमारी बेटी रहेगी।” माँ ने गले लगाकर कहा—“अपनी खुशी खुद बनाना।”
ससुराल में नई जिंदगी शुरू हुई। ससुराल वाले अच्छे थे, लेकिन समाज वही था। जब मैं देर से ऑफिस से लौटती, तो पड़ोस की औरतें फुसफुसातीं। जब मैंने घर में अपनी राय दी, तो कभी-कभी कहा गया—“बहू ज्यादा बोल रही है।” लेकिन मेरे पति ने हमेशा साथ दिया। उन्होंने कहा—“तू जो है, वही सही है।”
एक दिन मुझे पता चला कि मैं माँ बनने वाली हूँ। घर में खुशी छा गई। सभी ने कहा—“बेटा हो तो अच्छा।” मैंने मुस्कुराकर कहा—“बेटी हो तो भी अच्छा।” जब बेटी पैदा हुई, तो घर में मिठाई बँटी। बड़ा डिब्बा था। पिताजी ने फोन पर कहा—“अब दो बेटियाँ हो गईं—तू और वो।” माँ ने रोते हुए कहा—“मेरी बेटी ने बेटी को जन्म दिया। ये चक्र पूरा हुआ।”
अब मेरी बेटी बड़ी हो रही है। मैं उसे वही सिखा रही हूँ जो मुझे सिखाने में देर हो गई थी। मैं उसे बताती हूँ—“तू एक बेटी है। ये कोई बोझ नहीं, कोई कमजोरी नहीं। तू आसमान छू सकती है।” जब वो पूछती है—“मम्मी, लड़के क्यों ज्यादा खेलते हैं?” तो मैं कहती हूँ—“क्योंकि अब तक उन्हें ज्यादा मौका मिला। अब तू भी लेगी।”
कभी-कभी रात को जब बेटी सो जाती है, तो मैं खिड़की के पास बैठकर सोचती हूँ। मैंने कितना कुछ सहा, कितना कुछ लड़ा, कितना कुछ जीता। समाज अभी भी वही सवाल पूछता है—“बेटी है तो शादी कब होगी? बेटी है तो घर कैसे संभालेगी?” लेकिन अब मैं जवाब देती हूँ—“बेटी है तो दुनिया बदल सकती है।”
मैंने देखा है कि बेटी होना कितना कठिन होता है। घर में काम का बोझ, बाहर की निगाहें, ससुराल की अपेक्षाएँ, खुद की ख्वाहिशें—सब एक साथ। लेकिन मैंने ये भी देखा है कि बेटी होना कितना खूबसूरत होता है। माँ की गोद, पिता का आशीर्वाद, भाई का प्यार (जो देर से आता है), अपनी बेटी की मुस्कान—ये सब बेटी होने का इनाम है।
आज जब कोई मुझसे पूछता है—“तुम कौन हो?” तो मैं गर्व से कहती हूँ—“मैं एक बेटी हूँ। एक माँ हूँ। एक पत्नी हूँ। एक कामकाजी औरत हूँ। लेकिन सबसे पहले मैं एक बेटी हूँ—जो लड़ी, जो जीती, जो आगे बढ़ी।”
मेरी कहानी कोई विशेष कहानी नहीं है। भारत के लाखों घरों में ऐसी ही बेटियाँ हैं। कुछ चुपचाप सहती हैं, कुछ आवाज उठाती हैं। कुछ टूट जाती हैं, कुछ और मजबूत हो जाती हैं। मैं उन सबकी कहानी हूँ।
मैं चाहती हूँ कि आने वाली पीढ़ी की बेटियाँ ये न कहें—“हमने सहा।” बल्कि कहें—“हमने बदला।” मैं चाहती हूँ कि जब कोई बेटी पैदा हो, तो मिठाई का डिब्बा उतना ही बड़ा हो जितना बेटे के जन्म पर होता है। मैं चाहती हूँ कि स्कूल में लड़कियों को भी उतनी ही आजादी मिले। मैं चाहती हूँ कि घर के काम सिर्फ बेटियों का न हो। मैं चाहती हूँ कि शादी कोई मजबूरी न हो, बल्कि खुशी का चुनाव हो।
आज मैं अपनी बेटी के सिर पर हाथ रखकर कहती हूँ—“तू एक बेटी है। दुनिया तुझे सिखाएगी कि तू कम है। लेकिन तू खुद को याद दिलाना कि तू काफी है। तू पर्याप्त है। तू शक्ति है।”
मेरी कहानी यहीं खत्म नहीं होती। ये कहानी हर उस बेटी की है जो सुबह उठकर घर संभालती है, ऑफिस जाती है, रात को बच्चों को सुलाती है, और फिर भी मुस्कुराती है। ये कहानी हर उस माँ की है जिसने अपनी बेटी को पंख दिए। ये कहानी हर उस पिता की है जिसने बेटी को बेटे से कम नहीं समझा।
मैं एक बेटी हूँ। और मैं गर्व से कहती हूँ—हाँ, मैं एक बेटी हूँ। मेरी कहानी जारी है। तुम्हारी भी।
(शब्द संख्या: लगभग 2000)
— विजय शर्मा एरी