Dhadakne dil ki in Hindi Love Stories by Shravan Gore books and stories PDF | धड़कने दिल की - 2

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धड़कने दिल की - 2

दोपहर ढल चुकी थी, लेकिन सेंट जेवियर्स कॉलेज के गलियारों में तनाव की एक खामोश परत तैर रही थी। नोटिस बोर्ड के पास की भीड़ तो धीरे-धीरे छंट गई थी, पर सिया के चेहरे का रंग अब भी नहीं लौटा था। वह पत्थर की पुरानी सीढ़ियों पर अपने घुटनों में सिर छिपाए बैठी थी। उसकी दोस्त तन्वी उसके कंधे पर हाथ रखे बार-बार कुछ समझाने की कोशिश कर रही थी, लेकिन सिया के कानों तक आवाजें नहीं, सिर्फ अपने दिल की घबराई हुई धड़कनें पहुंच रही थीं।
थोड़ी ही दूरी पर, बरगद के पेड़ की आड़ में खड़ा आदित्य अपनी उंगलियों से बैग के कपड़े को महसूस कर रहा था। उस बैग की भीतरी जेब में रखी लेदर की डायरी अब उसे किसी कागज की किताब जैसी नहीं, बल्कि हाथ में रखे दहकते अंगारे जैसी लग रही थी।
"अगर मैंने अभी जाकर सबके सामने वो डायरी दी, तो जो सवाल मुझ पर नहीं उठने चाहिए, वो सिया पर उठेंगे," आदित्य ने मन ही मन सोचा। उसे समझ आ रहा था कि कॉलेज की दुनिया जितनी हसीन दिखती है, उतनी ही बेरहम होती है। यहां अफवाहें आग की तरह फैलती हैं और किसी की इज्जत को राख होने में एक दोपहर से ज्यादा का वक्त नहीं लगता।
उसने तय किया कि वह सिया से अकेले में मिलेगा।
आदित्य ने अपनी जेब से एक छोटा सा सादा कागज निकाला। अपने विंटेज पेन से उसने उस पर बहुत संक्षेप में दो लाइनें लिखीं:
*‘तुम्हारी अमानत सही सलामत है। अगर अपनी डायरी वापस चाहिए, तो ठीक शाम चार बजे कॉलेज लाइब्रेरी के सबसे पिछले रीडिंग सेक्शन (आर्काइव कॉर्नर) में आ जाओ। अकेले आना। किसी को बताने की जरूरत नहीं है।’*
उसने कागज को करीने से मोड़ा। अब चुनौती थी उस चिट को सिया तक इस तरह पहुंचाना कि किसी की नजर न पड़े। आदित्य ने देखा कि पास के कैंटीन काउंटर से चाय का एक लड़का कटिंग चाय के गिलास लेकर उसी रास्ते से गुजर रहा था। आदित्य ने तेजी से कदम बढ़ाए, लड़के को पचास रुपये का नोट थमाया और मुड़ी हुई चिट उसकी ट्रे के किनारे रखते हुए धीरे से कहा, "वो जो सीढ़ियों पर लड़की बैठी है, बादामी कुर्ती में... यह कागज सीधे उसके हाथ में देना। किसी और को नहीं।"
लड़के ने सिर हिलाया और सीढ़ियों की तरफ बढ़ गया।
आदित्य दूर से नजर रखे हुए था। लड़के ने चाय का ऑर्डर देने के बहाने वह कागज चुपके से सिया की गोदी में गिरा दिया और आगे निकल गया। सिया ने चौंककर सिर उठाया। उसने मुड़े हुए कागज को देखा, उसकी उंगलियां कांप रही थीं। जैसे ही उसने कागज खोलकर पढ़ा, उसकी आंखों में फैले आंसू अचानक ठहर गए। चेहरे पर डर की जगह एक गहरा अविश्वास और हैरानी उभर आई। उसने घबराकर चारों तरफ देखा, मानो वो उस अजनबी चेहरे को तलाश रही हो जिसने यह संदेश भेजा था।
लेकिन आदित्य पहले ही वहां से मुड़कर लाइब्रेरी की तरफ निकल चुका था।
शाम के पौने चार बज रहे थे। कॉलेज की पुरानी लाइब्रेरी में दिन के इस वक्त सन्नाटा पसरा रहता था। बाहर की दुनिया की धूप यहां की लंबी, गॉथिक खिड़कियों से छनकर जब फर्श पर गिरती थी, तो धूल के बारीक कण हवा में तैरते नजर आते थे। किताबों की वो जानी-पहचानी, पुरानी सी खुशबू पूरे कमरे में फैली थी।
आदित्य लाइब्रेरी के सबसे अंतिम हिस्से में पहुंचा। यह 'आर्काइव सेक्शन' था, जहां दशकों पुरानी किताबें और रिसर्च पेपर्स रखे थे। यहां आम तौर पर कोई छात्र नहीं आता था। आदित्य ने अपनी बैग से वह डायरी निकाली।
हाथ में लेते ही उसने उस पर फिर से नजर डाली। गहरा भूरा चमड़ा, जिसके किनारों पर वक्त की मार से हल्की सिलवटें पड़ चुकी थीं। और सबसे रहस्यमयी था वो छोटा सा पीतल का ताला। उस ताले पर कोई नंबर वाला कोड नहीं था, बल्कि वो एक बारीक सी चाबी से खुलने वाला पारंपरिक ताला था।
आदित्य ने डायरी को टेबल पर रख दिया। उसके मन में एक भयानक जंग छिड़ी हुई थी।
एक तरफ उसका जमीर था—एक शरीफ, सुलझे हुए लड़के का जमीर, जो किसी की निजी जिंदगी में तांक-झांक करने को सबसे बड़ा गुनाह मानता था। लेकिन दूसरी तरफ वो अजीब सी बेचैनी थी। सिया ने नोटिस बोर्ड के पास रोते हुए कहा था कि इस डायरी में उसकी जिंदगी और उसके पूरे परिवार का ऐसा सच है, जो उन्हें बर्बाद कर सकता है।
"आखिर ऐसा क्या हो सकता है?" आदित्य ने बुदबुदाते हुए डायरी की तरफ देखा।
तभी उसकी नजर डायरी के पिछले कवर की सिलाई पर पड़ी। सिलाई का एक हिस्सा थोड़ा उधड़ा हुआ था, और वहां से एक बेहद बारीक, काले धागे में बंधी हुई कोई धातु की चीज झांक रही थी। आदित्य की सांसें थम गईं। उसने उंगली से उस धागे को हल्के से खींचा।
वह उस ताले की नन्हीं सी चाबी थी!
सिया ने शायद किसी इमरजेंसी के लिए उस चाबी को डायरी के ही पिछले हिस्से की सिलाई में छिपाकर रखा था।
चाबी आदित्य की हथेली पर चमक रही थी। ताला उसके सामने था। सिर्फ एक घुमाव... और वो राज हमेशा के लिए उसके सामने खुल जाता जो सिया को अंदर से खोखला कर रहा था। आदित्य का हाथ अनजाने में ही ताले की तरफ बढ़ा। उसके माथे पर पसीने की एक बूंद उभरी। उसने चाबी को ताले के छेद में डाला।
'क्लिक!'
सन्नाटे में वह हल्की सी आवाज किसी धमाके जैसी लगी। ताला खुल चुका था।
आदित्य ने अपनी सांसें रोक लीं। उसने डायरी का पहला पन्ना पलटा। पहले पन्ने पर सिर्फ सिया का नाम था। उसने दूसरा पन्ना पलटा, जिस पर आंसुओं से धुंधली हो चुकी काली स्याही में कुछ तारीखें और एक अजीब सा पता लिखा था। और उसके ठीक नीचे जो पहली पंक्ति लिखी थी, उसे पढ़ते ही आदित्य के पैरों तले से जमीन खिसक गई।
उसमें लिखा था:
*‘अगर यह सच कभी बाहर आया, तो दुनिया कहेगी कि मेरे पिता एक मुजरिम हैं... और मैं एक झूठ के सहारे जी रही हूं।’*
आदित्य की आंखें फटी की फटी रह गईं। वह अगली लाइन पढ़ने ही वाला था कि तभी—
"तुम... तुम मेरी डायरी के साथ क्या कर रहे हो?!"
पीछे से एक तीखी, थरथराती और आंसुओं में डूबी आवाज गूंजी।
आदित्य ने झटके से सिर घुमाया। लकड़ी की बड़ी अलमारी के पीछे सिया खड़ी थी। उसकी मुट्ठियां कसी हुई थीं, चेहरा गुस्से और खौफ से तमतमा रहा था, और उसकी नजर सीधे उस खुले हुए ताले पर थी।
क्या सिया आदित्य को कोई ब्लैकमेलर समझेगी? और उस एक लाइन के पीछे सिया के परिवार का कौन सा खौफनाक अतीत छिपा था?