TERE ISHQ MEIN in Hindi Love Stories by Riya books and stories PDF | TERE ISHQ MEIN

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TERE ISHQ MEIN

बनारस – 

जिसे महादेव की नगरी भी कहा जाता है। जहां सुबह अलार्म से नही बल्कि 'हर हर महादेव' के जयकारों और बाबा विश्वनाथ के मंदिरों में गूंजते शंखो से होती है।

बनारस जहां से आज एक नई कहानी जन्म लेने वाली है और वो कहानी है प्रेम, तपस्या और समर्पण की। 

लेकिन आज बनारस की हवा में अजीब सी बेचैनी घुली हुई थी। आसमान में घने बादल छाए हुए थे। मानो बारिश कभी भी बरस सकती थी।

अस्सी घाट पर एक पूजा चल रही थी। ये पूजा शांति की थी, भक्ति की थी और सबसे बढ़कर किसी के बेकाबू गुस्से को शांत करने के लिए भी थी। 

हवन के धुंए की भीनी भीनी खुशबू हवा में फैल रही थी। पंडित जी मंत्र पढ़ रहे थे। और उनके सामने बेहद दुखी भाव से बैठे हुए थे —दादा साहिब! प्रतापगढ़ रियासत के सबसे बड़े ठाकुर, भानु प्रताप सिंह।

पंडित जी ने हवन में आहुति देते हुए भानु प्रताप जी से कहा,"हुकुम पूजा तो संपन्न होने को है, पर आपके चेहरे की ये शिकन बता रही है कि मन शांत नही हुआ?"

भानु जी ने गहरी सांस ली और उदासी से बोले,"पंडित जी रियासत से तो तलवारों से लिखी जीती जाती है, लेकिन घर की शांति किसी सादगी से आती है। मेरा पोता उसका गुस्सा और उसका घमंड बहती आग की तरह है। जो सब कुछ जला कर राख कर देना चाहता है।"

उनकी बात सुन कर पंडित जी मुस्कुराए," महादेव की नगरी में आए है हुक्म सा जब आग बेकाबू होती है तो उसे शांत करने कि लिए ठंडे पानी की एक बूंद ही काफी होती है। महादेव ने उनके लिए भी कोई चुना होगा।"

भानु जी इस पर कुछ नही कहा । उन्होंने बहती हुई गंगा की तरफ देखा। लेकिन तभी वहां पर किसी के पायलों की आवाज किसी मधुर संगीत की तरह गूंज उठी। 

छन! छन! छन!

हवा में घुली बेचैनी के बीच वो पायलों की खनक जिसे सीधे महादेव का कोई संदेश ले कर आई थी। 

भानु जी ने पीछे मुड़ कर देखा। काले किनारी वाली सफेद साड़ी पहने, हाथ में पूजा की थाली लिए एक लड़की गंगा की सीढ़ियों से नीचे उतर रही थी।उसके चेहरे पर वो नूर और सादगी थी जो बड़े–बड़े महलों की रानियों में भी नही होता। 

ये थी शुभागिनी त्रिपाठी! यानी सब की प्यारी शुभ– शुभी।

शुभागिनी ने झुक कर पंडित की के सामने प्रणाम किया। थाली में से गंगाजल और ताजा बेलपत्र पंडित जी को दे दिए। 

" पंडित जी, बाबा विश्वनाथ के श्रृंगार के लिए यह बेलपत्र अनाथ आश्रम के बच्चों ने खुद तोड़े हैं।" उसकी आवाज में बेहद मिठास थी," और यह गंगाजल आज की आरती के ठीक पहले का है,"

पंडित जी ने उसे आशीर्वाद दिया , " सदा सुखी रहो शुभी बेटा। आश्रम में सब ठीक है ना?" 

" सब महादेव की कृपा है पंडित जी।" उसने मुस्कुराते हुए कहा तभी उसकी नज़र भानु प्रताप जी पर पड़ी उनकी आंखों में छिपे दर्द और चेहरे की उदासी को शुभी की पारखी नजरो ने एक पल में भांप लिया

वह बिना किसी भी झिझक के भानु जी के सामने घुटनों के बल बैठी और धीमे से बोली," बाबा, महादेव के दरबार में कोई भी उदास चेहरे के साथ वापस नहीं जाता दुख कितना भी बड़ा हो जब गंगा मैया की छांव में आ गए हैं तो सब उन पर छोड़ दीजिए।"

भानु प्रताप जी ने जब ये सुना तो। उनके चेहरे के भाव-भाव बदल गए। उनके होठों पर मुस्कुराहट आ गई। 

उन्होंने शुभागिनी के सिर पर हाथ रखा और बड़े ही प्यार से बोले,"बेटा, अपने तो हमारे दिल का हाल बिना पूछे ही जान लिया लेकिन कुछ घाव ऐसे होते है कि उन्हें भरने के लिए मरहम की नही, बल्कि दुआओं की जरूरत होती है।"

शुभागिनी ने अपनी पूजा की थाली में से एक तुलसी का पत्ता उठाया और भानु जी की तरफ बढ़ा दिया और हल्की सी मुस्कान के साथ कहा," बाबा! दुआएं तो महादेव के चरणों में हर रोज चढ़ती है। बस आप इतना ध्यान रखिए कि दिया जब तक जलता हैं अंधेरा अपने आप छंट जाता है।"

उसकी बात सुन कर भानु जी के मन के सारे डाउट्स क्लियर हो गए। वो बस शुभी के चेहरे को देख रहे थे। उसकी खूबसूरत ग्रे आँखें में इतनी गहराई थी कि कोई भी अगर देखे तो बस डूब जाए। 

इस से पहले कोई कुछ बोलता पीछे से एक आवाज आई," शुभी! कितना टाइम लगेगा बच्चे इंतजार कर रहे होंगे।"

शुभी कि साथ पंडित जी और भानु जी ने भी पलट कर देखा। पीछे शुभी की ही उम्र की एक लड़की खड़ी थी। 

" आ रही ही हूं आर्या!" उसने मुस्कुरा कर अर्यांशी से कहा, और वापिस भानु जी की तरफ देखा और हाथ जोड़ कर बोली," हमे इजाज़त दीजिए! आश्रम के बच्चो को खाना खिलाने का वक्त हो रहा है। पर आप याद रखिएगा.... महादेव की नगरी आए है, उदास मन से जाएंगे तो उनका अपमान होगा... भरोसा रखिएगा।"

उसने अपनी आरती की थाली संभाली और पलट कर अर्यांशी के पास चली गई। भानु जी टकटकी लगाए उसे जाते हुए देखते रहे जब तक वो उनकी आंखों से ओझल नही हो गई। 

" हुकुम... आग को शांत करने वाली पानी की ठंडी बूंद मिल गई शायद?" पंडित जी मुस्कुरा कर बोले। 

" ये पानी की बूंद नही है... ये तो वो शीतल है जो प्रतापगढ़ के पूरे जलते हुए महल को शांत कर सकती है। " उन्होंने गंभीर आवाज में कहा।

इधर,

शुभी और अर्यांशी विनती अनाथालय पहुंची। ये अनाथायल शुभी की मां विनती त्रिपाठी के नाम पर था, जो अब इस दुनिया में नहीं थी। ये अनाथालय शुभी और अर्यांशी दोनो मिल कर चलाती है। 

अनाथालय के आंगन में दाखिल होते ही छोटे-छोटे बच्चों की खिलखिलाहट से पूरा माहौल चहक उठा। शुभी ने अपनी पूजा की थाली एक तरफ रखी और बच्चों के बीच जमीन पर बैठ गई।

"दीदी आप आ गई! हम कब से आपका इंतजार कर रहे थे?" छे साल के मासूम कान्हा ने शुभी के पल्लू को खींचते हुए मासूमियत से कहा।

शुभी ने प्यार से उसके गाल सहलाए," माफ करना कान्हा, आपको इंतजार करना पड़ा। लेकिन अब आप लोगो की शुभी आ गई है ना। चलो,फटाफट लाइन में बैठो मैं खाना परोसती हूँ।"

इतना कह कर शुभी आश्रम के अंदर चली गई। थोड़ी देर में वो और अर्यांशी थालियां सजाने लगी। 

अर्यांशी मुस्कुरा कर बोली," शुभी, तुम सच मे कमाल की हो। तुम्हे देखकर लगता ही नहीं कि तुम कभी थकती हो।"

" जब महादेव का हाथ सिर पर है आर्या, तो थकान कैसी?" शुभी ने हंस कर उसकी बात का जवाब दिया। वो दोनो बच्चो को खाना परोसने लगी। 

दूसरी ओर,

घाट पर पूजा समाप्त हो चुकी थी। भानु जी वहां खड़े हो कर गंगा की धार को देख रहे थे। उनके चेहरे पर शिकन गायब हो चुकी थी। 

" दादा जी ... प्रतापगढ़ की गाड़ियां आपका इंतजार कर रही है।" उनके खास बॉडीगार्ड शुभमन ने उनके पास आ कर बड़े ही अदब से कहा," प्रतापगढ़ से अभी बुलावा आया है,"

भानु जी ने उसे हाथ उठा कर इशारे से रोक दिया। उन्होंने आपने गले से रुद्राक्ष की माला निकाली और उसकी तरफ मुड़े। 

कुछ पल वो चुप रहे और फिर बोले," गाड़ियों को वापिस प्रतापगढ़ भेज दो,"

शुभमन ने चौंक कर कहा," पर दादा जी.... कुंवर सा का फोन आया था। वो महल में आपका इंतजार कर —"

" हमने कह दिया ना गाड़ियां वापिस जाएंगी।" उनकी आवाज सपाट थी,"उन्हे जा कर ये बोल दीजिए। उनके दादा को बनारस से मोह हो चुका है। जब तक हमारा मन नही भरेगा हम तब तक वापिस प्रतापगढ़ नही जाएंगे,"

"लेकिन दादा जी... ," शुभमन झिझकते हुए कहा," कुंवर सा का गुस्सा तो आप जानते है। वो पहले से गुस्सा था कि आप बनारस आ रहे, अगर उन्हें पता चला कि आप यही रुक गए तो पूरे महल को सिर पर उठा लेंगे," 

" उन्हे उठाने दो महल सिर पर...हम हर वार उनकी जिद्द के आगे झुके है लेकिन अब... उन्हे हमारी जिद्द के आगे झुकना होगा, और हां हमारा यहां रहने का इंतजाम कीजिए, कुंवर सा को आप बता दीजिए ... हम अगले दो तीन दिन के लिए यही रहेंगे।" 

शुभमन ने उनकी बात पर बिना कोई सवाल–जवाब किए अपना सिर हिलाया। 

बनारस से कई किलो मीटर दूर,

" WHAT DO YOU MEAN DADA JI BANARAS MEIN HAIN?????

प्रतापगढ़ के प्रताप पैलेस के शीशे का बढ़ा सा टेबल एक झटके से टूट गया। 

और ये गुस्सा था उस शख्स का, जिसके नाम से पूरे प्रतापगढ़ के लोग अपनी आवाज तक संभालकर रखते थे। 

— अभय प्रताप सिंह...