ठाकुर साहब और माँ डॉक्टर के पास जा चुके थे। मैं भी कुछ ज़रूरी फाइलें उठाकर ड्राइवर के साथ ऑफिस आ गया।
लेकिन सच कहूँ तो मेरा दिमाग अब यहाँ के किसी भी काम में नहीं लग रहा था। मेरा पूरा ध्यान बस एक ही बात पर अटका हुआ था—मैं जल्द से जल्द अपनी माँ को यह हकीकत बताना चाहता था कि मैं उसका अपना बेटा हूँ।
माँ की तबीयत के बारे में सुनकर मैं काफी कुछ समझ चुका था। अब मुझे एहसास हो रहा था कि आखिर माँ ने कभी वापस मेरे पास आने के बारे में क्यों नहीं सोचा। आखिर क्यों उदय ठाकुर से शादी करने के बाद वह कभी अपनी माँ और अपने बच्चे से मिलने नहीं आई?
एक वजह तो मुझे कल रात ही समझ आ गई थी। ठाकुर साहब ने जिस तरह कहा था कि माँ के घर में अब कोई नहीं है, उससे मुझे अंदाज़ा हो गया था कि शायद वह नहीं चाहते थे कि माँ अपने पुराने रिश्तेदारों में से किसी के साथ भी अपना कोई रिश्ता बनाए रखे।
और दूसरी वजह थी माँ की खराब तबीयत।
उफ़्फ़!
इन सब बातों के बारे में सोचते-सोचते मेरा दिमाग पूरी तरह थक चुका था। समझ नहीं आ रहा था कि आखिर मैं क्या करूँ।
क्या मुझे सीधे माँ के सामने जाकर कह देना चाहिए कि—
'माँ, मैं क्षितिज हूँ... तुम्हारा अपना बेटा!'
क्या मैं उसे सब कुछ सच-सच बता दूँ?
लेकिन फिर उसके बाद क्या होगा? वह कैसे रिएक्ट करेगी? क्या वह मुझे पहचान पाएगी? क्या वह मुझे अपने सीने से लगा लेगी या फिर...
नहीं! मैं अब और इंतज़ार नहीं कर सकता था।
बेचैनी में मैंने अपने दोनों हाथों की मुट्ठियाँ भींच लीं और अपने बाल नोंचने लगा। मेरे भीतर चल रही उथल-पुथल अब बर्दाश्त से बाहर होती जा रही थी।
तभी अचानक मेरे केबिन का दरवाज़ा खुला।
मैंने चौंककर दरवाज़े की तरफ देखा।
कंपनी का अकाउंटेंट अंदर आया।
उसने मुझे इस तरह परेशान बैठे देखा तो कुछ पल के लिए रुक गया। फिर मेरी तरफ देखते हुए बोला—
"क्षितिज..."
Writing
"क्या बात है, क्षितिज? कुछ दिनों से परेशान लग रहे हो?"
उसकी बात सुनकर मैं तुरंत अपनी सोच से बाहर आया और खुद को संभालते हुए बोला,
"नहीं, कुछ नहीं। बस ऐसे ही थोड़ा उलझा हुआ हूँ। तुम बताओ, कैसे आना हुआ?"
मेरे पूछने पर उसने कुछ पेपर्स निकालकर मेरे सामने रख दिए।
"सर, कंपनी के कुछ एक्सपेंसेस हुए हैं। इन पर आपके साइन चाहिए।"
मैंने पेपर्स उठाकर देखने शुरू किए। उनमें कुछ इनवॉइस की समरी थी, जिन्हें सबमिट करने से पहले वेरिफिकेशन के लिए मेरे पास भेजा जाता था। यह ठाकुर साहब का ही आदेश था कि कंपनी का कोई भी खर्च मेरी नज़र से गुज़रे बिना अप्रूव नहीं होना चाहिए।
मैंने पेपर्स पर नज़र डालते हुए कहा,
"ठीक है, मैं देखता हूँ। तुम जाओ।"
मेरी बात सुनकर वह वहाँ से चला गया।
मैं उन शीट्स को ध्यान से चेक करने लगा। तभी अचानक एक शीट पर मेरी नज़र ठहर गई। उसमें दो लोगों की फ्लाइट टिकट्स की बुकिंग डिटेल्स थीं। दोनों टिकटें कल रात अमेरिका जाने के लिए बुक की गई थीं।
मैं यह देखकर बुरी तरह चौंक गया।
"क्या...?"
मेरी आँखें उन डिटेल्स पर जमकर रह गईं। मैंने एक बार फिर उन्हें ध्यान से देखा, लेकिन जो लिखा था, वह बिल्कुल साफ था।
तो क्या ठाकुर साहब माँ को इतनी जल्दी वापस अमेरिका भेज रहे थे?
यह ख्याल आते ही मेरे दिल की धड़कनें तेज़ हो गईं।
नहीं! ऐसा नहीं हो सकता।
अभी तो मैं माँ से ठीक से बात भी नहीं कर पाया था। अभी तो मैंने उसे बताया तक नहीं था कि मैं उसका अपना बेटा हूँ। अभी तो मुझे उसकी आँखों में देखकर यह पूछना था कि आखिर उसने मुझे इतने सालों तक अपने से दूर क्यों रखा।
और अगर वह वापस चली गई, तो?
क्या मैं फिर से अपनी माँ से मिलने के लिए तरसता रह जाऊँगा? क्या एक बार फिर किस्मत मुझे उससे दूर कर देगी?
मैं किसी भी कीमत पर ऐसा नहीं होने दे सकता था।
मेरे सामने अब सिर्फ एक ही सवाल था—क्या माँ सच में मुझे छोड़कर वापस अमेरिका जाने वाली थी, या इन टिकटों के पीछे कोई और वजह थी?
मैंने तुरंत फोन उठाया। अब मुझे इस बारे में सच्चाई जाननी ही थी। इससे पहले कि बहुत देर हो जाए, मुझे कुछ करना था।
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मैंने तुरंत अपना फोन उठाया और ठाकुर साहब का नंबर मिलाने लगा, लेकिन अगले ही पल रुक गया।
अगर उन्होंने सच में माँ को वापस अमेरिका भेजने का फैसला कर लिया था, तो क्या वह मुझे इतनी आसानी से यह बात बता देते?
नहीं... मुझे पहले खुद सच्चाई जाननी होगी।
मैंने तुरंत अपने असिस्टेंट को इंटरकॉम पर कॉल किया।
"सुनो, मुझे अभी पता करके बताओ कि ठाकुर साहब और मैम इस वक्त कहाँ हैं। और हाँ, कल रात अमेरिका जाने वाली फ्लाइट की बुकिंग किसने करवाई है, इसकी पूरी डिटेल्स भी मुझे चाहिए।"
"जी, सर!"
फोन रखते ही मैंने एक बार फिर उन टिकटों को देखा। मेरे मन में बेचैनी बढ़ती जा रही थी।
तभी मेरा फोन बज उठा।
स्क्रीन पर ठाकुर साहब का नाम चमक रहा था।
मैंने बिना देर किए कॉल रिसीव कर ली।
"जी, ठाकुर साहब!"
"क्षितिज, ऑफिस में हो?"
"जी, सर।"
"अच्छा, तो अपना काम खत्म करके सीधे घर आ जाना। हमें कुछ ज़रूरी बात करनी है।"
उनकी आवाज़ सामान्य थी, लेकिन मेरे दिमाग में तो बस उन फ्लाइट टिकटों का ख्याल घूम रहा था।
मैंने हिम्मत करके पूछ ही लिया, "सर, क्या आप और मैम कहीं बाहर जाने वाले हैं?"
कुछ पल के लिए दूसरी तरफ खामोशी छा गई।
फिर उन्होंने पूछा, "तुम ऐसा क्यों पूछ रहे हो?"
मैंने सामने रखे पेपर्स पर नज़र डालते हुए कहा, "सर, कंपनी के एक्सपेंसेस की फाइल में दो फ्लाइट टिकटों की बुकिंग डिटेल्स मिली हैं। कल रात अमेरिका के लिए टिकट बुक हुई हैं। इसलिए पूछा।"
इस बार उनकी आवाज़ थोड़ी गंभीर हो गई।
"क्षितिज, हर बात जानना तुम्हारे लिए ज़रूरी नहीं है। तुम बस अपना काम करो और शाम को घर आ जाना।"
इतना कहकर उन्होंने फोन काट दिया।
मैं फोन हाथ में लिए कुछ देर तक चुप बैठा रहा।
उनका जवाब मेरे मन में उठ रहे शक को और गहरा कर गया था।
आखिर ठाकुर साहब मुझसे क्या छिपा रहे थे?
तभी मेरे असिस्टेंट का फोन आ गया।
"सर, मैंने पता कर लिया है।"
मैं तुरंत सीधा होकर बैठ गया।
"हाँ, बताओ!"
"सर, दोनों टिकटें मैम और ठाकुर साहब के नाम पर बुक हुई हैं। लेकिन अभी तक बुकिंग कन्फर्म है या नहीं, इसकी जानकारी नहीं मिल पाई है।"
मेरे सीने में जैसे कुछ चुभ गया।
तो टिकटें माँ और ठाकुर साहब, दोनों के लिए थीं!
क्या माँ सच में वापस जाना चाहती थीं? या फिर ठाकुर साहब उन्हें यहाँ से दूर ले जाना चाहते थे?
मेरे पास इन सवालों का कोई जवाब नहीं था।
मैंने तुरंत अपनी फाइलें समेटीं और कुर्सी से उठ खड़ा हुआ।
अब मैं एक पल भी ऑफिस में नहीं रुक सकता था।
मुझे घर जाना था। माँ से मिलना था। और इस बार मैं अपने दिल की बात कहे बिना वापस नहीं लौटने वाला था।
चाहे माँ मुझे अपनाएँ या ठुकरा दें, लेकिन अब उन्हें यह सच जानना ही होगा कि उनका बेटा क्षितिज आज भी उनके सामने खड़ा है।