चलो, अब दोस्ती की ओर बढ़ते हैं। ये लिखते हुए मुझे और भी अफ़सोस है, लेकिन इस दोस्ती के सफ़र में भी कुछ चीज़ें मज़ेदार हैं, तो चलो, चलते हैं क्रश के सफ़र के अगले भाग में। OK?
मेरे तब बहुत फ्रेंड्स थे। मुझे याद है, मैं 9th क्लास में एक लड़की की दोस्त बनी थी, जिसका नाम पिया था। मैं उसके लिए कोचिंग में बैठने की जगह भी रिजेक्ट करती थी, देखो।
हम स्कूल में एक बेंच पर बैठते थे। हमारे गाँव की चार लड़कियाँ थीं। हम बचपन की दोस्त थीं। ये अलग वाली दोस्ती है। हम तब बहुत क्लोज़ थे। इतना कि झगड़ा, प्यार, चिढ़ना आम बात थी हमारे बीच। और साइड टेबल के बीच में मेरी क्रश उर्फ़ गाल लाल हो गया है। बोलो! 😒 खैर, आगे बढ़ते हैं।
तब मैं बहुत ज़्यादा बोलती थी। इतनी कि सुनने वाला इरिटेटिंग और समझने वाला प्यार में ही पड़ जाए। हाँ, माफ़ करना, कुछ ज़्यादा ही तारीफ़ कर दी मैंने अपनी।
मैं तब सबको हँसाती थी, जोक मार-मारकर। कोचिंग में भी पिया नाम की दोस्त से हमेशा बोलती थी कि वो मेरी दोस्त, वो मेरी दोस्त है। लेकिन दोस्ती तब नज़र आई, यानी असली मसाले तब आए, जब हम सब 10th क्लास में पहुँचे।
पिया नाम की लड़की ने कोचिंग में आई नई लड़की से दोस्ती कर ली। मुझे इग्नोर तो नहीं करती थी, लेकिन कम ध्यान देने लगी, या यूँ कहें कि नहीं दिया। मेरी वो बचपन की दोस्त सिया ने एक बेस्टie बना ली, मिया नाम की लड़की के साथ। और एक दोस्त था, उसने भी वैसा किया बीच में।
तब जब हम स्कूल जाते थे, सिया तो अपनी बेस्टie के साथ जाती थी। सबके अपने एक पर्सनल फोन जैसे बेस्टie थे, पर मेरा नहीं। मुझे याद है।
मैं उस दिन पहली बार अकेले स्कूल में जाने लगी। मेरी आँखों में आँसू आने लगे कि ऐसा क्यों है मेरे साथ। फिर भी मैंने हर बात को नज़रअंदाज़ किया और स्कूल में वापस उन दोस्तों के साथ हँसने-बातें करने चली गई।
और आप सबको तो पता ही है, मैं तो उस जूलियन मोटे को देखकर ही पिघल जाती हूँ। हाँ! 😂🤣🤣
खैर, आगे बढ़ते हैं।
10th क्लास भी बहुत ज़्यादा अजीब था। तब मुझे उस अकेलेपन की जगह दिखी ही नहीं, शायद इसलिए कि मैं और कोशिश करना चाहती थी। मेरे दोस्तों ने अपनी दोस्तों के साथ बिज़ी हो गए। हालाँकि, मैं ये नहीं कहूँगी कि उन्होंने गलत किया, लेकिन तब मुझे ऐसा लगा था जैसे मैं हूँ या नहीं।
सब बाहर खेलते रहते थे और मैं अकेले क्लास में एक बेंच पर बैठकर बस ये सोच-सोचकर उदास होती थी कि कब मैं स्कूल में किसी के साथ जाऊँगी, यानी अकेले नहीं, कोई और हो मेरे साथ। लेकिन अफ़सोस, ऐसा कुछ नहीं हुआ।
एक दिन मेरी दोस्त सिया मुझे बैठकर स्कूल ले गई और वापस आते वक्त सब मुझे छोड़कर चले आए। तो मैं अकेले उस एक किलोमीटर रास्ते से एक बैग लिए आ रही थी। सच कहूँ तो मुझे तब रोना नहीं आ रहा था, बल्कि ऐसा था ना कि मेरे दोस्त भले ही ऐसे हों, लेकिन टॉयलेट-सुसु जाते वक्त या ऐसे वक्त में साथ होते थे। इसलिए मुझे ज़्यादा सैड तो नहीं लगा, या यूँ कहें कि उनकी अच्छाई के आगे ये नहीं दिखा।
और ऊपर से क्रश की गली के आगे से जा रही थी। मुझे तो बड़ा शर्म आ रहा था, just because मैंने किसी भी क्लास में एक यार बैग तक नहीं खरीदा है। पैसे नहीं हैं ना, तो मैं तब एक पॉलिथीन बैग लिए जाती थी। इसीलिए ज़्यादा शर्म लग रही थी। Sad और शर्म मिक्स, बोलो! 😒
रास्ते में दूर जाने के बाद मुझे मेरी जूनियर लड़कियाँ दिखीं। उन्हें देखकर खुश हुई। उनके साथ घर गई। सारी प्रॉब्लम्स भूलकर फिर शुरू हुई दोस्ती, वही दोस्ती।
Countie.....
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