रिटायरमेंट
प्रताप सिंह आज अपने आंगन में उदास लेटा था।
आज उसकी रिटायरमेंट की पहली सुबह थी। जिस सुबह का उसे पिछले तीस साल से इंतजार था, जब वो फाइलों के बोझ से मुक्त होगा, जब कोई बॉस का फोन नहीं होगा, जब वो देर तक सो सकेगा। पर आज जब वो सुबह आई, तो उसे कोई खुशी नहीं हो रही थी।
वो चारपाई पर लेटा-लेटा बस आसमान को निहार रहा था। आंगन वही था, घर भी वही, पर कुछ खाली-खाली लग रहा था।
तभी उसकी पत्नी सुशीला दो कप कॉफी का मग लेकर आई। उसने एक मग प्रताप की तरफ बढ़ाते हुए प्यार से कहा, "क्या हुआ? किस सोच में डूबे हो?"
प्रताप चौंक कर उठ बैठा। हल्की सी मुस्कान लाने की कोशिश की। सुशीला को अपने पास बिठाया, कॉफी का मग हाथ में लिया और बोला -
"सुशीला, सोच रहा हूँ, रोज-रोज की इस दौड़ती जिंदगी में वक्त रेत की तरह हाथ से फिसलता गया और पता ही नहीं चला कि जवानी कब चली गई।
पहले घर का किराया, फिर बच्चों की स्कूल की फीस, फिर अपना खुद का घर बनाने की जिद। इन सब में मैं खुद को ही भूल गया। बस एक अंधी दौड़ में भागता रहा पैसा कमाने के लिए। कभी समय ही नहीं मिला ये सोचने का कि हमने क्या-क्या खो दिया।
आज देखो, आज मेरे पास समय ही समय है, पर अब अपना कोई नहीं है। बच्चे अपनी-अपनी गृहस्थी में हमसे दूर जाकर बस गए हैं। जब तक कुर्सी थी, पॉवर थी, तब तक दोस्त-रिश्तेदार पूछते थे। कुर्सी गई तो कोई नहीं पहचानता।
जब बच्चे छोटे थे, हम उनके लिए जीते थे, उनके सपनों के लिए जीते थे। और अब... अब उन्हें हमारी जरूरत ही नहीं है।"
प्रताप की आँखें भर आईं। तीस साल की नौकरी, प्रमोशन, ट्रांसफर, टेंशन - सब कुछ बच्चों के लिए किया था, और आज घर खाली था।
सुशीला ने धीरे से अपने पति का हाथ अपने हाथ में ले लिया। उसके हाथ कांप रहे थे।
वो विनम्रता से बोली, "सही कहा तुमने। जब मुझे तुम्हारी जरूरत थी, तब तुम काम में व्यस्त थे। मैं दिनभर बच्चों को संभालती, तुम्हारा इंतजार करती। तुम मुझे अनदेखा कर देते थे। तब मैं बहुत रोती थी।
फिर मैंने अकेले खुश रहना सीख लिया। अपनी दुनिया खुद बना ली। और अब जब तुम्हें फुर्सत मिली है, तो तुम उदास हो।
लेकिन अब कर भी क्या सकते हैं प्रताप? जो चीजें हमारे हाथ में नहीं हैं, उनके लिए सोचकर क्या फायदा? जो भी समय बचा है, उसे हँसी-खुशी क्यों न बिता लें?"
सुशीला की इस बात ने प्रताप के दिल को छू लिया। सच ही तो था।
प्रताप ने एक गहरी साँस ली और बोला, "चलो सुशीला, कहीं घूमने चलते हैं। इस गृहस्थी की जिम्मेदारियों से बहुत दूर। हरिद्वार चलते हैं, पतंजलि आश्रम में। वहाँ रोज सुबह-शाम दोनों योग करेंगे, ध्यान करेंगे। थोड़ा मन को शांति मिलेगी।"
अगली सुबह दोनों हरिद्वार के लिए निकल गए।
पतंजलि आश्रम में उन्होंने एक महीना बिताया। सुबह चार बजे उठना, योग, प्राणायाम, ध्यान, और फिर आश्रम की सेवा - बागवानी करना, लंगर में मदद करना। कोई फाइल नहीं, कोई टेंशन नहीं। पहली बार तीस सालों में दोनों ने एक-दूसरे को ठीक से देखा था, बात की थी। मन को एक अजीब सा सुकून मिलने लगा था।
एक शाम दोनों गंगा किनारे बैठे थे। सूरज डूब रहा था, आरती की आवाज आ रही थी। पानी शांत बह रहा था।
सुशीला ने प्रताप का हाथ पकड़कर कहा, "प्रताप, मेरा अब घर लौटने का बिल्कुल मन नहीं है।"
प्रताप ने चौंक कर देखा।
सुशीला बोली, "हमारा शरीर दिन-प्रतिदिन ढल रहा है। घुटनों में दर्द शुरू हो गया है। क्यों न जब तक शरीर स्वस्थ है, हम तीर्थ यात्रा कर लें? पूरी जिंदगी यूं ही निकल गई घर संभालते-संभालते, पर खुद को संभालना ही भूल गए।
वैसे भी बच्चों को हमारी कहाँ याद आती है? महीने में एक बार फोन कर लेते हैं, बस औपचारिकता के लिए। उस घर में लौटकर वही खाली दीवारें और तुम्हारी उदासी देखनी पड़ेगी।"
प्रताप ने उस रात बहुत सोचा। सुशीला सही कह रही थी। उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी दूसरों के लिए जिया था, अब थोड़ा अपने लिए जीने में क्या बुराई है?
अगले दिन प्रताप ने एक बड़ा फैसला लिया। उसने बच्चों से बिना कोई राय लिए अपना शहर वाला घर किराए पर दे दिया। और रिटायरमेंट के बाद जो पीएफ और फंड का पैसा मिला था, उससे एक छोटा सा कारवां खरीद लिया - एक चलता-फिरता घर। जिसमें एक छोटा किचन था, एक बिस्तर था, और सामने बड़ी सी खिड़की।
और दोनों निकल पड़े देश भ्रमण पर।
न कोई बड़ा सामान, न कोई बड़ी इच्छा। बहुत ही सादा जीवन। सुबह जहाँ मन करता चाय बना लेते, दोपहर किसी मंदिर के बाहर बैठ जाते। अपनी आवश्यकताएं उन्होंने बहुत कम कर दी थीं।
कभी केरल के बैकवाटर में, कभी राजस्थान के रेगिस्तान में, कभी जगन्नाथ पुरी में, कभी रामेश्वरम में। लगभग दो साल तक दोनों ने पूरे भारत का भ्रमण किया। दो साल में उन्होंने वो सब देख लिया जो तीस साल की नौकरी में नहीं देख पाए थे।
दो साल बाद जब वो वापस लौटे तो उन्हें लगा कि अब फिर से उस गृहस्थी के जाल में फंसना ठीक नहीं है। वो चार दीवारी फिर उन्हें उदास कर देगी।
इसलिए दोनों ने फैसला किया - अब हरिद्वार ही अपना घर है।
उन्होंने गंगा किनारे ही एक छोटा सा आशियाना किराए पर ले लिया। छोटा सा एक कमरे का घर, सामने तुलसी का पौधा, और दूर गंगा बहती हुई।
आज भी प्रताप और सुशीला वहीं रहते हैं। सुबह योग करते हैं, शाम को गंगा आरती में दिया जलाते हैं। कभी-कभी उनके बच्चे मिलने आ जाते हैं, तो उन्हें भी बड़ा अच्छा लगता है। पर अब वो किसी का इंतजार नहीं करते।
प्रताप अब समझ गया है कि रिटायरमेंट अंत नहीं है, एक नई शुरुआत है। जब तक नौकरी थी, वो घड़ी के लिए जीता था। अब वो खुद के लिए जीता है।
डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली