मैं बनारस की हल चल से दूर उसकी खामोशी में जीने लगीं।
कुछ भी पहले जैसा नहीं था। रोज़ चलने वाली हवाओं ने भी, अपना रास्ता बदल दिया था।
अस्सी घाट पर अभी भी बहुत भीड़ रहतीं थी लेकिन उस भीड़ में भी ख़ामोशी थी।
अनकहे शब्द थे।
चायवाले की दुकान पर नया बोर्ड लग चुका था।
वही गंगा है, पर किनारे पर चेहरों की भीड़ बदल चुकी थी।
अब लगता था जैसे गंगा ने भी मुंह फेर लिया हो। दीपक के साथ जिस बनारस में मैंने प्रेम को महसूस किया था, जीना सीखा था।
वो बनारस काट खाने को दौड़ता है।
और समय ने ऐसी करवट ली कि, पलक झपकते ही सब कुछ बदल गया।
उससे जुड़ी सारी यादें में बनारस छोड़ आई
और फिर एक दिन बनारस छोड़ दिया और कानपुर रहने आ गई उन सब यादों से दूर जो मुझे परेशान करती हैं।
कुछ महीनों तक बहुत बैचेनी हुई, लेकिन वक्त के साथ मैंने ख़ुद को थामना सीख लिया।
यहां आकर बच्चों को ट्यूशन देने लगी।
पर उस बंधन में नहीं जुड़ पाई जिसके सपने मैंने दीपक के साथ सजाए थे।
ये कहते हुए सुनीता की आंखें भर आई और वो चुप हो गई।
उधर नैना की आंखें भी नम थी, उसने बुआ को गले से लगा लिया।
उसने दिलासा देते हुए कहा… हो सकता है दीपक किसी काम में इतना उलझ गए हो, कि लौट न सकें।
ऐसा भी क्या काम हो सकता है, जो बरसो बाद भी मेरी याद नहीं आई।
सुनीता ने थोड़े बदले अंदाज में कहा।
ठीक है, वो नहीं आ सकता था तो एक खत भेज देता। मुझे दिलासा मिलता मेरे सवालों के जवाब मिल जाते।
अगर वो मुझे अपनी परेशानी बताता, मैं खुद उसे जाने देती।
उसका साथ देती।
उसके न आने को मैं क्या नाम दूं?? प्यार, धोखा, या भ्रम।
बताओ नैना!! क्या कहूँ मैं??
नैना के पास कोई जवाब नहीं था। आख़िर क्या बोले??
जैसे ही सुनीता ने अपनी बात ख़त्म की— पूरे कमरे में सन्नाटा छा गया।
एक पल को लगा, जो यादें वो छोड़ आई थी। आज फिर से दस्तक दे रही हैं।
नैना भी किसी ख़्याल में डूबी बैठी थी।
बाहर से झींगुर के बोलने की आवाज़ आ रही थी।
थोड़ी चुप्पी के बाद सुनीता बोली… चलो जाने दो।
बड़े बुजुर्ग कहते हैं… पुरानी यादें हो या पुराने ज़ख्म उन्हें खोला नहीं करते।
नहीं तो वे बड़े घाव बन कर बहुत पीड़ा देते हैं।
इसलिए उन्हें दिल के किसी कोने में संभाल कर रखो मगर याद मत करो।
हां, नैना ने सिर हिलाया।
उसने एक सवाल और पूछा,
क्या आप आज भी उनका इंतजार करती हो?
बुआ बस ये लास्ट सवाल है।
वो जानती थी नैना बिना जाने चुप नहीं रहेगी
उसने धीरे से कहा… कभी कभी’
याद तो करती हूँ लेकिन अब इंतजार नहीं क्योंकि मेरा मन कहता है वो अब नहीं लौटेगा।
वो मेरा अतीत है,, भविष्य नहीं।
मैंने अकेले जीना सिख लिया है। अब किसी की जरूरत नहीं है।
और वैसे भी तुम तो हो मेरे साथ, तो किसी और के लिए जगह है भी नहीं।
नैना बुआ की बात पर मुस्कुराई।
आप बहुत स्ट्रांग हो बुआ इतना सब होने के बाद भी मुस्कुरा देती हो।
और कहीं न कहीं नैना हैरान भी थी, ये देखकर कि जो औरत उसके समाने हमेशा मुस्कुराती है।
अस्ल में अंदर से टूटी हुई है। उसकी आत्मा न जाने कितनी बार मरी होगी!!
बस कभी बताती नहीं, दिखाती नहीं।
रात भी बहुत हो चुकी थी। बातों बातों में समय का पता ही नहीं चला ।
सुनीता कुर्सी से उठी, अब सो जाओ बेटा।
कल कॉलेज भी जाना है।
नैना उठी और चुप चाप अपने कमरे में चली गई।
सुनीता बिस्तर पर लेटी हुई छत को निहारती रही। आज फिर किसी ने उसके जख्मो को खुरदर दिया था।
रात फिर से लंबी हो गयी थी।
कुछ दिनों बाद…
नैना तैयार हुई और कॉलेज पहुँची।
कॉलेज में वो अपने दोस्तों से बातें कर रही थी, कि समीर वहां आया उसने नैना से कुछ नोर्स लिये।
थोड़ी सी इधर उधर की बातें भी हुई।
वो कहते है जब दो लोगों की सोच बहुत ज्यादा मिलती है। तो शायद ये यूनिवर की बनाई जोड़ी में से एक होती है।
एक शहर, एक कॉलेज, और क्लासमेट, तो बेस्ट फ्रेंड तो बनना ही था।
कुछ दिनों में वे बहुत अच्छे दोस्त बन गए।
उन दोनों की आपस में खूब जमती थी।
कॉलेज का माहौल भी बहुत अच्छा था,, एक दूसरे की मदद करना, बिना शो ऑफ के।
सभी छात्रों को दूसरों से बेहतर बनाता था।
लेक्चर का समय हो रहा था। सभी से अंदर जाने को कहा गया।
इसलिए सब अपने अपने लेक्चर रूम में पहुँचे।
जल्द ही समेस्टर एग्जाम शुरू होने वाले थे।
प्रोफेसर ने सब को एक एक प्रोजेक्ट बनाने का कार्य दिया और वो प्रोजेक्ट एग्जाम से पहले पूरा करना था।
प्रोजेक्ट एक सफ़ाई अभियान से जुड़ा हुआ था
जिसके लिए उन्हें आपस में टीम बनाकर काम करना था।
और शायद आस पास के गांव में भी जाना पड़ सकता था।
सभी ने अपनी अपनी टीम बनाई, प्रत्येक टीम में छ छात्र थे।
कुल मिला कर उनके क्लास की दस टीम बनाई गई।
प्रत्येक टीम को शहर के पास के अलग अलग गांव में जाकर, वहां के लोगों को स्वच्छता से जुड़े लाभ बताने थे
सफाई से जुड़े सवाल और उन्हें सफाई का महत्त्व, कैसे बीमारियों से बच सकते है? ये सब समझाना उनका काम था।
उस काम का रिकार्ड नोट करना था।
समीर और नैना दोनों एक ही टीम में थे। उसके साथ उसके कुछ दोस्त भी उसी टीम में थे। चित्रा, अयान, मीरा।
सभी टिम का एक लीडर था। जो उन्हें बताता उन्हें क्या करना है? और कैसे करना है?
सबको अपने अपने विचारो को रखने के लिए अगला दिन चुना गया।
सोचेंगे क्या करना है? और कैसे अपने प्रोजेक्ट को सबसे अच्छा दिखाना है?
कॉलेज के बाद सब लोग अपने अपने घर चले गए। नैना भी समीर के साथ चौराहे तक आई। फिर वे दोनों भी अपने अपने घर चले गए।
नैना जब घर आई तो उसने अपना बैग बाहर ही रख दिया, और पास पड़े सोफे पर पांव पसार कर बैठ गई।
उसकी बुआ ने जब ये देखा तो वो मुस्कुराई। बोली लगता है... बहुत थक गई हो।
नैना हंसने लगी बोली… ह्म्म थोड़ा सा।
आज का दिन कैसा था सुनीता ने पूछा? सब अच्छा था ना??
कॉलेज से एक प्रोजेक्ट मिला है बस उसी को पूरा करना है, और अभी तो कुछ तैयारी भी नहीं की हमने, नैना ने मुंह बनाते हुए बताया।
अरे कोई बात नहीं सब हो जाएगा ।। मुझे विश्ववास है तुम पर।
चलो अब हाथ मुंह धुलकर खाना खा लो,, मैंने तुम्हारे पसंद के राजमा चावल बनाए हैं।
ये सुनकर नैना के चेहरे पर चमक आ गई क्योंकि राजमा चावल उसकी मनपसंद था।
खाना खाने के बाद वह अपने काम में लग गई।
उधर समीर भी सोच रहा था कि प्रोजेक्ट को कैसे पूरा करें और सबसे बेहतर बनाएं।
सबके मन में कुछ न कुछ तरकीब आ रही थी।
अगले दिन कॉलेज में…
सभी टीम एक जगह इकठ्ठा हुई।
सभी टिम लीडर अपनी अपनी टीम को समझा रहे थे।
समीर और उसकी टीम ने हाथ मिलकर शुरुआत की।
उन्होंने प्रोजेक्ट का काम अपने कॉलेज से ही शुरू किया।
अपने कॉलेज के मैदान, बगीचे, परिसर आदि को साफ किया और सब ने पहले दिन के मुकाबले बहुत अच्छा किया ।
अगले दिन… नजदीक के गांव से शुरू करना था। शायद एक दो दिन गाँव में रुकना पड़ सकता था। इसलिए सबको पहले ही बता दिया गया था। कि पूरी तैयारी के साथ ही घर से आए।
और इस सब के लिए अच्छी खासी तैयारी करनी थी।
सबको बोल दिया गया था अपना अपना सामान पैक करने के लिए।
आज उनके प्रोजेक्ट का पहला दिन था हल्की सी थकान के साथ वे सब अपने घर पहुंचे।
नैना भी जब घर आई तो उसने सुनीता से कहा... बुआ मेरे लिए कुछ खाने को बना देना।
कुछ क्रंची कुरकुरा होना चाहिए।
मैं अपने साथ कैम्पिंग में ले जाऊँगी। सब कुछ न कुछ लेकर ही आएंगे।
थोड़ी चिंता के साथ सुनीता ने पूछा कहां जा रही हो?
बुआ कॉलेज प्रोजेक्ट के लिए पास के गांव में कैंप लगाना है।
उस दिन बताया था ना बस वहीं।
मेरी सभी दोस्त भी जा रहे हैं। शायद एक दो दिन लग जायेगा।
बहुत मज़ा आएगा।
कुछ दिनों की बात है
अच्छा, सुनीता ने कहा।
तो कब जाना है? कल सुबह।
ये कह कर नैना अपना सामान पैक करने लगी।
शाम का समय…
नैना बुआ के साथ मंदिर गई हुई थी।
हालांकि बनारस की तरह कानपुर में समय धीमें चलने वाला कहां था।
कानपुर की दौड़ती हुई सड़कों के साथ लोग भी दौड़ रहे थे।
वक्त की चाल तो पूछो ही मत। यहां सबको आगे निकलना है, अपनी मंजिल, पहचान चाहिए।
कोई किसी के लिए नहीं रुकता।
सड़कों पर लगी गाड़ियों की भीड़ देखते देखते।
वे मंदिर पहुँची।
पूजा करने के बाद जब वे दोनों मंदिर की सीढ़ियों से उतर रही थी।
कि नैना की नजर समीर पर पड़ी जो मंदिर की सीढ़ियां पर खड़ा था। हाथ में फ़ोन लिये।
वह उसके पास जाकर बोली ,, क्या तुम हो? ये कह कर वो हँसने लगी।
समीर ने जब पलट कर देखा, तो नैना उसके पीछे खड़ी थी, उसके साथ एक औरत भी थी।
नहीं में समीर नहीं हूं, नैना को चिढ़ाते हुए उसने जवाब दिया।
ओह अब बता भी तो यंहा क्या कर रहे हो??
मैं यहां मां की साथ आया हूं। समीर ने अंदर की ओर इशारा करते हुए कहा।
अच्छा "
नैना ने फ़िर पूछा तुम अंदर क्यों नहीं गए? समीर बोला ऐसे ही मन नहीं था।
नैना ने उसे डाट लगते हुए बोला — तुम्हारा मन ऐसा है, कि तुम दो कदम चल कर ईश्वर के दर्शन भी नहीं कर सकते।
मंदिर तक आए हो तनिक अच्छे भविष्य की कामना ही कर लो।
क्या तुमने प्रार्थना की अपने लिए, समीर ने नैना से पूछा?
हां मैं तो की है।
असल मसला तो ये था कि समीर को ईश्वर में उतना विश्वास नहीं था। लेकिन अपनी मां के लिए रोज मंदिर आता।
उन दोनों की नोंक झोंक देख सुनीता ने पूछा ये कौन है?
नैना बोली… ये मेरे कॉलेज का दोस्त है, मेरे साथ ही पढ़ता है।
उसने बुआ से समीर का परिचय कराया।
नैना तुम्हें भी डाट देती है, सुनीता ने थोड़ी मस्करी करते हुए कहा।
समीर हंसने लगा।
है ये छोटा डॉन है न"
तभी सामीर की मां भी वहां आ गई ।
उन्होंने समीर को जब कुछ नए चेहरों से बातें करते देखा तो उन्होंने भी पूछा।
समीर ने बताया मां ये वही लड़की है, नैना, जिसके बारे में मैंने उस दिन बताया था ना।
मां बोली अच्छा वो जो कॉलेज में गिर गई थी।
नैना उनकी फुसफुसाहट ध्यान से सुन रही थी।
जब उसने दोनों को बातें करते देखा, तो पूछ लिया क्या बातें हो रही है?
अरे कुछ नहीं बस माँ को बता रहा था।