Avni ek Atut Vishwas in Hindi Love Stories by RAAHULL SHARMA books and stories PDF | अवनि एक अटूट विश्वास - 20

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अवनि एक अटूट विश्वास - 20

आर्यमन के पिता ने गहरी सांस ली। उन्हें भी लगने लगा था कि शायद शादी ही एक रास्ता है जिससे आर्यमन की ज़िंदगी पटरी पर लौट सकती है।


आर्यमन के पिता: "तुम ठीक कह रही हो बहू। श्रद्धा एक अच्छे खानदान की लड़की है और हमारे घर की इज़्ज़त बनेगी। अगर वह इतनी कोशिश कर रही है, तो आर्यमन को भी समझना चाहिए।"


हर्ष ने सुना तो उसे बहुत बुरा लगा। उसे पता था कि आर्यमन का दिल कहाँ अटका है, पर इस वक्त आर्यमन की जो हालत थी, उसमें वह किसी का पक्ष लेने की स्थिति में नहीं था।


हर्ष ने घड़ी की ओर देखा, रात काफी गहरा चुकी थी। कमरे का भारी माहौल और नीलम भाभी की शादी वाली बातें उसे और भी परेशान कर रही थीं। वह जानता था कि इस वक्त बहस करने का कोई फायदा नहीं है।


उसने अपने कोट के बटन ठीक किए और आर्यमन के पिता की ओर देख कर कहा:


हर्ष: "अंकल, अब मैं निकलता हूँ। रात काफी हो चुकी है और कल सुबह मेरी एक बहुत बड़ी बिजनेस डील है। मुझे थोड़ा जल्दी ऑफिस पहुँचना होगा।"


आर्यमन के पिता ने थके हुए लहजे में सिर हिलाया, "ठीक है बेटा, तू जा। तूने आज जो किया उसके लिए शुक्रिया। अगर तू नहीं होता तो पता नहीं ये लड़का कहाँ पड़ा होता।"


नीलम की तिरछी नज़र


हर्ष जब कमरे से बाहर निकलने लगा, तो उसने देखा कि नीलम भाभी के चेहरे पर एक अजीब सी जीत वाली मुस्कान थी। वह समझ गया कि हर्ष के जाते ही वह ससुर जी पर श्रद्धा के नाम का दबाव और बढ़ा देंगी।



हर्ष ने एक आखिरी बार बिस्तर पर पड़े बेसुध आर्यमन को देखा। उसके मन में आया कि चिल्लाकर सबको बता दे कि "आर्यमन श्रद्धा से नहीं, 


अवनि से प्यार करता है!" पर वह जानता था कि बिना सबूत और आर्यमन की मर्ज़ी के, यह बात आग में घी का काम करेगी।


हर्ष का प्रस्थान और मन की उलझन


जैसे ही हर्ष अपनी गाड़ी में बैठा, उसने एक गहरी सांस ली। वह मन ही मन सोचने लगा:


"बिजनेस डील तो सँभल जाएगी, पर आर्यमन की ज़िंदगी का क्या होगा? अगर इस हालत में इसकी शादी श्रद्धा से कर दी गई, तो तीन जिंदगियां तबाह होंगी—आर्यमन की, श्रद्धा की और उस मासूम अवनि की, जो न जाने किस हाल में होगी।"



उधर कमरे में अब सिर्फ आर्यमन के पिता और नीलम भाभी रह गए थे। नीलम ने मौका पाकर धीमे स्वर में कहना शुरू किया:



"देखा आपने पापा जी? हर्ष भी अब कतराने लगा है। आखिर वो भी कब तक इसकी बदतमीजियाँ झेलेगा? सुबह होते ही आप पंडित जी को बुलाइए। श्रद्धा के सब्र का बांध अब टूट रहा है।"



रात की उस भयानक गहमागहमी और नशे के धुंधलके के बाद, सुबह की पहली किरण आर्यमन के कमरे में दाखिल हुई। भारी सिर और आँखों में हल्की लाली लिए आर्यमन सोकर उठा।


ठंडे पानी से शावर लेने के बाद, वह पूरी तरह से फ्रेश होकर, एक कड़क फॉर्मल सूट पहनकर तैयार हुआ।



उसके चेहरे पर वही 'पत्थर' जैसा भाव वापस आ गया था—शांत, गंभीर और भावनाओं से कोसों दूर। वह सीढ़ियों से उतरकर सीधा नाश्ते की टेबल पर पहुँचा।



टेबल पर तनावपूर्ण शांति


टेबल पर उसके पिता पहले से मौजूद थे और नीलम भाभी बड़े चाव से नाश्ता परोस रही थीं। 


आर्यमन के आते ही वहाँ एक अजीब सी खामोशी छा गई। कल रात के हंगामे का कोई ज़िक्र नहीं था, लेकिन हवा में तनाव साफ महसूस किया जा सकता था।



आर्यमन ने चुपचाप अपनी कुर्सी खींची और जूस का गिलास हाथ में लिया।



नीलम भाभी (चेहरे पर बनावटी मुस्कान लाते हुए): "अरे आर्यमन, आ गए तुम? देखो, मैंने तुम्हारी पसंद के सैंडविच बनाए हैं।


आज तो बहुत बड़े-बड़े काम निपटाने होंगे तुम्हें, है ना?"
आर्यमन ने कोई जवाब नहीं दिया, वह बस अपने सैंडविच के टुकड़े करने लगा।



पिता का फैसला


आर्यमन के पिता ने अखबार नीचे रखा और चश्मा उतारकर सीधे आर्यमन की आँखों में देखा। उनकी आवाज़ आज पहले से कहीं ज़्यादा सख्त और दृढ़ थी।



पिता: "आर्यमन, ऑफिस जाने से पहले मेरी एक बात ध्यान से सुन लो। हम तुम्हारी हरकतों को बहुत बर्दाश्त कर चुके हैं। अब यह रोज़-रोज़ का तमाशा और क्लब जाना बंद होना चाहिए।"


आर्यमन ने जूस का घूँट भरा और बिना पलक झपकाए कहा, "मैं अपना काम बखूबी कर रहा हूँ पापा। ऑफिस के रिज़ल्ट्स आपको मिल रहे हैं।"



पिता: "काम ही सब कुछ नहीं होता! आज शाम को श्रद्धा और उसके माता-पिता घर आ रहे हैं। 


नीलम और मैंने फैसला किया है कि अब और देर करना ठीक नहीं। आज तुम्हारी और श्रद्धा की सगाई की तारीख पक्की हो जाएगी।"



आर्यमन की प्रतिक्रिया


आर्यमन के हाथ में पकड़ा हुआ काँटा (fork) एक पल के लिए रुक गया। उसके दिमाग में बिजली की तरह एक चेहरा कौंधा—अवनि का। वह बर्फीली रात, वह एक ही चादर की गर्माहट और वह मासूम हाथ जिसे उसने थामने का वादा किया था।



पर अगले ही पल, नीलम भाभी के कहे हुए 'पहले प्यार' और 'शिद्दत' वाले झूठ ने उसके अंदर की कड़वाहट को फिर से जगा दिया। उसे लगा कि अवनि ने उसे छोड़ दिया, वह उसे गलत समझकर चली गई।



आर्यमन (सपाट लहजे में): "जो आपको ठीक लगे पापा। मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। शाम को मैं समय पर आ जाऊँगा।"



नीलम भाभी की आँखों में चमक आ गई। उनकी चाल कामयाब हो रही थी। लेकिन आर्यमन के अंदर जैसे कुछ और ही टूट रहा था। उसने नाश्ता अधूरा छोड़ा और घड़ी देखते हुए उठा।



आर्यमन: "मैं ऑफिस के लिए निकल रहा हूँ। शाम को मिलते हैं।"



नाश्ते की मेज पर आर्यमन के जाते ही जो सन्नाटा छाया था, वह अब एक बहस में बदल गया। 


सोहन, जो अपने छोटे भाई की खामोशी के पीछे छिपे दर्द को समझ रहा था, उसने अपने पिता की ओर देख कर संजीदगी से कहा:



सोहन: "पापा, हमें एक बार आर्यमन से ठीक से पूछना चाहिए। उसका यूँ 'हाँ' कह देना मुझे कुछ ठीक नहीं लगा। 


वह बस आपका मन रखने के लिए कह गया है या फिर शायद टूट चुका है। इतनी जल्दबाजी करना सही नहीं है, हमें उसे थोड़ा और वक्त देना चाहिए।"



सोहन की बात सुनकर आर्यमन की माँ, जो अब तक चुपचाप सब देख रही थीं, उनके सब्र का बांध भी टूट गया। उन्होंने भारी मन से अपने पति की ओर देखा।