Nazar in Hindi Thriller by Ritu kumari books and stories PDF | नज़र

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नज़र

अध्याय 1: धुंधलाता आसमान
शहर के पश्चिमी छोर पर बसी 'शांति कॉलोनी' की तंग गलियों में सुबह का सूरज अक्सर देर से पहुँचता था। इन संकरी गलियों में हवा कम और इंसानी सांसों की घुटन ज़्यादा तैरती थी। यहीं एक पुराने, जर्जर से मकान के एक छोटे से कमरे में रहती थी—नव्या।
नव्या की उम्र महज़ बाईस साल थी, लेकिन उसकी आँखें उम्र से बहुत पहले ही ज़िंदगी की गहराइयों और उसके अंतहीन संघर्षों को देख चुकी थीं। उसके चेहरे पर एक अजीब सा सूनापन रहता था, मानो कोई अनकहा डर हमेशा उसकी पलकों के पीछे छिपा बैठा हो। उसके लंबे, काले बाल हमेशा एक ढीली सी चोटी में बंधे रहते थे, और उसका पहनावा बेहद साधारण—एक पुरानी सूती सलवार-कमीज़, जो कई बार धुलने की वजह से अपने असली रंग को खो चुकी थी।
नव्या की दुनिया उसकी इसी चारदीवारी तक सीमित थी। इस दुनिया में उसकी पहचान सिर्फ एक चीज़ से जुड़ी थी—उसकी आँखें। या य कहें कि उसकी आँखों की बेबसी।
बचपन से ही नव्या की नज़र कमज़ोर थी। जब वह सात साल की थी, तब स्कूल में ब्लैकबोर्ड पर लिखा हुआ पढ़ना उसके लिए किसी जंग जीतने जैसा होता था। डॉक्टर को दिखाया गया, तो पता चला कि उसकी आँखों में एक दुर्लभ जेनेटिक बीमारी है, जो धीरे-धीरे उसकी रोशनी को पूरी तरह लील जाएगी। माँ-बाप ने अपनी हैसियत से बढ़कर इलाज कराने की कोशिश की, खेत बेचे, कर्ज लिया, लेकिन जब नव्या चौदह साल की हुई, तो उसके पिता इस दुनिया को अलविदा कह गए और माँ सदमे में बिस्तर पकड़कर हमेशा के लिए सो गईं।
तब से लेकर आज तक, आठ साल बीत चुके थे। नव्या की आँखों की रोशनी पूरी तरह जा चुकी थी। अब उसके सामने सिर्फ एक गाढ़ा, स्याह अंधेरा था, जिसमें न कोई रंग था, न कोई आकार, बस आवाज़ों की एक दुनिया थी।
"नव्या! ओ नव्या... बहरी हो गई है क्या?"
मकान मालकिन कमला बाई की कर्कश आवाज़ ने नव्या को उसके ख्यालों से बाहर खींच लिया। कमला बाई हर महीने की पहली तारीख को किराए के लिए यमराज की तरह दरवाजे पर आ खड़ी होती थीं।
नव्या हड़बड़ाकर उठी। उसने अपनी उँगलियों के सहारे दीवार टटोलते हुए पलंग से पैर नीचे रखे। उसकी हथेलियाँ उस पुरानी दीवार के हर एक खुरदरे कोने से वाकिफ थीं। उसे रास्ता देखने के लिए आँखों की ज़रूरत नहीं पड़ती थी, उसकी उँगलियाँ ही उसकी आँखें बन चुकी थीं।
दरवाजा खोलते ही कमला बाई का चेहरा गुस्से से तमतमाया हुआ दिखाई दिया। यद्यपि नव्या उन्हें देख नहीं सकती थी, लेकिन उनकी भारी साँसों और पैरों की आहट से वह सब भाप लेती थी।
"इस महीने के तीन दिन ऊपर हो चुके हैं नव्या! किराया चाहिए मुझे, पूरा एक हज़ार पाँच सौ रुपये। अगर आज शाम तक पैसे नहीं मिले, तो अपना बोरिया-बिस्तर समेटकर निकल जाना इस कमरे से। कोई धर्मार्थ शाला नहीं खोल रखी मैंने!" कमला बाई ने चिल्लाते हुए कहा।
नव्या ने अपने सूखे हुए होंठों को भीगाया। उसकी आवाज़ बहुत धीमी और काँपती हुई थी, "चाची जी, बस दो दिन और दे दीजिए। मैंने एक घर में सिलाई और कढ़ाई के कुछ कपड़े लिए हैं। आज शाम तक वे पूरे हो जाएंगे, तो पैसे मिल जाएंगे। मैं आपका किराया एक भी रुपया कम नहीं होने दूंगी।"
"मुझे बहाने नहीं चाहिए! कल-परसों... रोज यही रट लगाती है तू। अंधी है तो क्या सहानुभूति की भीख मांगकर पूरी ज़िंदगी काटेगी?" कमला बाई ताना मारते हुए सीढ़ियाँ उतरकर चली गईं।
दरवाजा बंद करके नव्या वापस अंदर आ गई। कमरे के एक कोने में उसकी सिलाई की पुरानी मशीन रखी थी—एक ऐसी मशीन, जिसे वह बिना देखे, सिर्फ सुई की टिक-टिक और कपड़े के टेक्सचर को महसूस करके चलाती थी। उसने कई महीनों की कड़ी मेहनत और खुद को अंधेरे में ढालने के बाद यह हुनर सीखा था। शहर के कुछ लोग उस पर तरस खाकर या उसकी मजबूरी समझकर उसे बच्चों के कपड़े सिलने के लिए दे देते थे।
नव्या ज़मीन पर बैठकर फफक-फफक कर रो पड़ी। उसके आँसू बिना किसी आवाज़ के उसकी गालों से होते हुए उसकी कमीज़ पर गिर रहे थे।
"क्या कसूर था मेरा, भगवान?" नव्या ने आसमान की तरफ खाली नजरों से देखते हुए फुसफुसाया, "क्यों छीनी मुझसे यह दुनिया? कम से कम एक बार सूरज को देखना चाहती थी, माँ का वो मुस्कुराता हुआ चेहरा देखना चाहती थी... पर मेरे हिस्से में सिर्फ यह स्याह सन्नाटा क्यों आया?"
कमरे में कोई जवाब नहीं था। बस सन्नाटा था—एक ऐसा सन्नाटा जो उसके सीने पर भारी पत्थर की तरह रखा हुआ था।
अध्याय 2: सिलाई की मशीन और उम्मीद की टिक-टिक
दोपहर की धूप उस छोटे से रोशनदान से तिरछी होकर कमरे के फर्श पर पड़ रही थी, जिसे नव्या महसूस तो नहीं कर सकती थी, लेकिन हवा में आई हल्की सी गर्माहट से उसे अंदाज़ हो जाता था कि दिन ढलने की ओर है।
नव्या अपनी सिलाई मशीन के पास बैठी थी। उसका दाहिना पैर पैडल पर थिरक रहा था और बायाँ हाथ कपड़े को सधे हुए तरीके से संभाल रहा था। उसकी उँगलियाँ सुई की नोक से महज़ एक सेंटीमीटर की दूरी पर थीं। कई बार सुई उसकी उंगली को चीर देती थी, खून की छोटी सी बूंद कपड़े पर टपक जाती थी, लेकिन नव्या रुकती नहीं थी। दर्द अब उसकी रोज़मर्रा की आदत बन चुका था।
आज उसे लाल रंग के एक छोटे से फ्रॉक में सुंदर सी कढ़ाई करनी थी। यह फ्रॉक पड़ोस में रहने वाली एक छोटी बच्ची 'चिंकी' के जन्मदिन के लिए था। चिंकी अक्सर नव्या के पास आकर बैठती थी और उसे अपनी कहानियाँ सुनाया करती थी। चिंकी ही वह इकलौता इंसान थी जिससे बात करते वक्त नव्या अपनी अंधी होने की लाचारी को भूल जाती थी।
दरवाजे पर हल्की सी खटखट हुई।
"आ जाओ चिंकी, दरवाजा खुला है," नव्या ने बिना रुके मुस्कुराते हुए कहा।
लेकिन इस बार दरवाजे से चिंकी की नहीं, बल्कि एक भारी और अनजाने मर्दानी कदमों की आहट आई। नव्या का दिल एक पल के लिए सहम गया। उसने तुरंत सिलाई रोक दी और मशीन के किनारे पर अपने हाथ कस लिए।
"कौन है?" नव्या की आवाज़ में एक अनजाना डर था।
"डरिए मत, नव्या जी," एक बेहद शांत, संजीदा और भारी आवाज़ गूँजी। आवाज़ में एक अजीब सा ठहराव और अपनापन था, जो नव्या को थोड़ा हैरान कर गया। "मैं... मैं नीचे वाले मकान में नया शिफ्ट हुआ हूँ। मेरा नाम कबीर है।"
नव्या ने अपनी खाली आँखों को उस आवाज़ की दिशा में मोड़ा। उसने कभी उस नाम का कोई इंसान इस मोहल्ले में नहीं सुना था।
"कबीर...?" नव्या ने असमंजस में पूछा, "लेकिन आप मेरे पास...?"
कबीर ने दरवाजे के पास ही रुकते हुए कहा, "जी, मैं नीचे सीढ़ियों के पास से गुजर रहा था, तो आपकी सिलाई मशीन की आवाज़ आ रही थी। दरअसल, मेरी एक पुरानी जैकेट की चेन खराब हो गई है और कमला जी ने बताया कि आप बहुत अच्छे कपड़े सील लेती हैं और ठीक भी करती हैं... क्या आप मेरी यह जैकेट ठीक कर देंगी?"
नव्या ने राहत की सांस ली। उसका दिल जो ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था, वह धीरे-धीरे अपनी सामान्य गति पर लौटने लगा। उसने कहा, "हाँ... लाइए, यहाँ रख दीजिए। कल सुबह तक मिल जाएगी।"
कबीर ने आगे बढ़कर वह जैकेट कमरे की एक छोटी सी मेज पर रख दी। रखते वक्त नव्या को ऐसा महसूस हुआ जैसे कमरे का तापमान थोड़ा बदल गया हो—कोई ऐसा इंसान वहाँ खड़ा था जिसके होने भर से वह कमरा अब उतना अकेला नहीं लग रहा था।
"वैसे," कबीर की आवाज़ फिर से आई, "आप यह सब बिना देखे... अकेले कैसे मैनेज करती हैं? मैंने सुना है कि आपकी..." कबीर की आवाज़ में थोड़ी हिचकिचाहट थी, मानो वह किसी की कमज़ोरी पर बात करके उसे आहत नहीं करना चाहता था।
नव्या के चेहरे पर एक कड़वी सी मुस्कान तैर गई। उसने सिर झुकाकर कहा, "रोशनी नहीं है तो क्या हुआ, आदत पड़ गई है अब। जब आँखें नहीं होतीं, तो बाकी के चारों हिस्से—कान, उँगलियाँ, और ये दिल—थोड़ा ज़्यादा काम करने लगते हैं।"
कबीर कुछ पल के लिए चुप रहा। उसकी खामोशी में कोई pity (दया) नहीं थी, बल्कि एक गहरा सम्मान था। उसने धीरे से कहा, "रोशनी सिर्फ आँखों से नहीं होती, नव्या जी। कई बार जो लोग देख सकते हैं, वे भी बहुत कुछ अंधों की तरह अनदेखा कर देते हैं।"
यह बात नव्या के दिल को सीधे छू गई। ज़िंदगी में पहली बार किसी ने उससे इस तरह बात की थी, बिना किसी तरस के, एक बराबरी वाले इंसान की तरह।
"कल सुबह मिल जाएगी आपकी जैकेट," नव्या ने धीरे से कहा।
"कोई जल्दी नहीं है। अपना आराम से कीजिए," कबीर ने कहा और फिर उसके जाने के कदमों की आवाज़ धीरे-धीरे सीढ़ियों से नीचे उतरते हुए विलीन हो गई।
नव्या ने अपनी उँगलियों से उस जैकेट की चेन को टटोला। उसकी उँगलियों ने महसूस किया कि वह कोई आम जैकेट नहीं थी, बल्कि किसी मोटे चमड़े (leather) की जैकेट थी, जिस पर कुछ खास किस्म की कारीगरी की गई थी। नव्या ने मन ही मन सोचा—यह आदमी कौन है? इसकी आवाज़ में इतनी गहराई क्यों है? और इसके आने से कमरे का यह भारीपन अचानक हल्का क्यों महसूस होने लगा?
अध्याय 3: अंधेरे की अपनी एक रोशनी होती है
अगले दिन सुबह, सूरज की हल्की किरणें जब खिड़की से झाँक रही थीं, तब तक नव्या उस जैकेट की चेन को पूरी मजबूती और खूबी के साथ ठीक कर चुकी थी। उसने टाकों को अपनी उँगलियों से जाँचकर देखा—एकदम परफेक्ट। सिलाई इतनी बारीक थी कि कोई देख भी नहीं सकता था कि यहाँ कभी कोई खराबी थी।
कबीर जब सुबह-सुबह अपनी जैकेट लेने आया, तो उसने नव्या के हाथ का काम देखकर हैरानी जताई।
"अरे वाह! यह तो बिल्कुल नई जैसी लग रही है। मुझे तो यह भी नहीं मिल रहा कि यहाँ चेन टूटी कहाँ थी," कबीर ने तारीफ करते हुए कहा।
नव्या अपने काम की तारीफ सुनकर अंदर ही अंदर खुश हुई, हालांकि उसने चेहरे पर अपनी वही गंभीर मुद्रा बनाए रखी। उसने जैकेट कबीर को थमाई और पूछा, "कितने हुए?"
कबीर ने अपनी जेब से पैसे निकालकर मेज पर रखे और कहा, "यह लीजिए। और नव्या जी... एक बात कहूँ बुरा न मानिएगा।"
नव्या ने अपनी पलकें उठाईं, "कहिए।"
"मैं पिछले तीन महीनों से इस शहर में नया आया हूँ। एक फोटोग्राफर हूँ, लेकिन आजकल अपनी ज़िंदगी के कुछ मुश्किल दौर से गुजर रहा हूँ... कैमरे का लेंस तो ठीक है, पर खुद मेरी ज़िंदगी का फोकस हिल गया है।" कबीर की आवाज़ में एक हल्का सा दर्द था, जिसे नव्या ने तुरंत पहचान लिया—दर्द को पहचानना अंधी लड़की से बेहतर कौन जानता था?
कबीर ने आगे कहा, "मैं सोच रहा था कि क्या मैं कभी-कभी आपके कमरे में आ सकता हूँ? यहाँ आकर मुझे एक अजीब सा सुकून मिलता है। मैं चुपचाप बैठा रहूँगा, आपको डिस्टर्ब नहीं करूंगा।"
नव्या कुछ पल के लिए असमंजस में पड़ गई। उसने कभी किसी गैर मर्द को अपने कमरे में आने की इजाजत नहीं दी थी। समाज क्या कहेगा? कमला बाई क्या सोचेंगी? लेकिन फिर उसके मन में ख्याल आया—समाज ने उसे कौन सा जीने का हक दे दिया था? वह तो वैसे ही दुनिया की नज़रों में एक कैदी की तरह जी रही थी।
"ठीक है," नव्या ने धीरे से कहा, "लेकिन मेरे पास आपको पिलाने के लिए चाय के अलावा और कुछ नहीं होगा।"
कबीर खुलकर हँस पड़ा। वह हँसी उस बेरंग कमरे में संगीत की तरह गूँज उठी। "चाय से बेहतर और क्या हो सकता है?"
उस दिन के बाद से, कबीर का आना-जाना नव्या के जीवन का एक खूबसूरत हिस्सा बन गया। शाम ढलते ही कबीर ऊपर आ जाता। वह कभी-कभी अपने साथ एक छोटी सी पोर्टेबल रेडियो या स्पीकर लाता, जिस पर पुराने ज़माने के मेलोडियस गाने बजते—लता मंगेशकर और मोहम्मद रफ़ी की सुरीली आवाज़ें।
वे दोनों घंटों बातें करते। कबीर नव्या को शहर की खूबसूरती के बारे में बताता—कैसे शाम को समंदर के किनारे आसमान लाल हो जाता है, कैसे बारिश की बूंदें पेड़ों के पत्तों पर चमकती हैं, और कैसे लोग भागदौड़ भरी ज़िंदगी जी रहे हैं।
और नव्या कबीर को अपनी दुनिया के बारे में बताती—कैसे वह आवाज़ों से इंसानों के चेาร पहचान लेती है, कैसे बारिश की आवाज़ उसके कमरे की टिन की छत पर अलग-अलग राग सुनाती है, और कैसे उसने अंधेरे को ही अपना दोस्त बना लिया है।
धीरे-धीरे, नव्या के दिल में कबीर के लिए एक खास जगह बनती जा रही थी। वह महसूस कर सकती थी कि जब कबीर कमरे में होता है, तो उसका अकेलापन कहीं गायब हो जाता है। लेकिन इसके साथ ही उसके मन में एक डर भी था—क्या एक अंधी, गरीब और बेसहारा लड़की के लिए कोई ऐसा सपना देखना भी जायज़ है, जो कभी सच न हो सके?
अध्याय 4: तूफ़ान से पहले की खामोशी
वक्त अपनी रफ्तार से बहता रहा। महीनों बीत गए। नव्या और कबीर की दोस्ती अब एक ऐसे रिश्ते में बदल चुकी थी जहाँ शब्दों की ज़रूरत कम और खामोशी की समझ ज़्यादा थी। कबीर ने नव्या को एक बहुत कीमती तोहफा दिया था—एक ब्रेल लिपि (Braille) की कुछ किताबें और पढ़ने का एक छोटा सा बोर्ड। नव्या ने बहुत कम समय में ब्रेल पढ़ना सीख लिया। अब वह सिर्फ आवाज़ों से नहीं, बल्कि अपनी उँगलियों के पोरों से शब्दों को छूकर पढ़ सकती थी।
लेकिन खुशियाँ नव्या की किस्मत में शायद बहुत ज़्यादा देर टिकने के लिए नहीं बनी थीं।
एक शाम, जब मानसून अपनी पूरी ताक़त के साथ बरस रहा था, बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी। टिन की छत पर पानी की बूंदों की गड़गड़ाहट इतनी तेज़ थी कि पास की आवाज़ भी मुश्किल से सुनाई दे रही थी।
कमरे में एक मिट्टी का दीया जल रहा था, जिसकी हल्की सी लौ हवा के झोंके से काँप रही थी। कबीर उस दिन थोड़ा शांत था। वह खिड़की के पास खड़ा होकर बाहर बहते पानी को देख रहा था।
"नव्या..." कबीर ने कुछ देर की खामोशी के बाद कहा।
"हाँ कबीर, कहिए। आज बहुत चुप-चुप से लग रहे हैं," नव्या ने मशीन पर काम रोकते हुए पूछा।
कबीर ने मुड़कर नव्या की तरफ देखा। उसकी आँखों में एक अजीब सी उलझन और बेचैनी थी, जिसे नव्या देख नहीं सकती थी, लेकिन उसकी साँसों की रफ्तार से महसूस कर रही थी।
"मुझे... मुझे कुछ दिनों के लिए शहर से बाहर जाना होगा," कबीर ने कहा।
नव्या का दिल एक पल के लिए जैसे थम गया। उसके हाथ से सिलाई का धागा छूट गया। उसने काँपती हुई आवाज़ में पूछा, "कहाँ? और... और कब तक लौटेंगे?"
कबीर ने थोड़ा झिझकते हुए कहा, "मेरा एक बहुत पुराना प्रोजेक्ट अधूरा था... दिल्ली में। वहाँ एक बड़ी गैलरी ने मेरी फोटोग्राफी की प्रदर्शनी बुलाई है। मुझे जाना ही होगा। और... नव्या, मुझे नहीं पता कि मुझे वहाँ कितना वक्त लगेगा। शायद कुछ महीने, या शायद..."
कबीर अपनी बात पूरी नहीं कर पाया। नव्या ने अपने दोनों हाथों से अपने चेहरे को ढक लिया। उसके गले में एक हूक सी उठ रही थी। वह रोना चाहती थी, चिल्लाना चाहती थी—मत जाओ कबीर! जब से तुम आए हो, इस अंधेरी दुनिया में थोड़ा उजाला हुआ है, मुझे फिर से उसी अंधेरे में मत छोड़ो!—लेकिन वह कुछ कह नहीं पाई। उसका आत्मसम्मान उसे ऐसा करने से रोक रहा था।
"जाना चाहिए आपको," नव्या ने अपनी आवाज़ को कड़ा करते हुए कहा, हालांकि उसकी आवाज़ का काँपना उसके झूठ की पोल खोल रहा था। "यह आपके करियर का सवाल है। मेरे लिए यहाँ रुकने की कोई ज़रूरत नहीं है।"
कबीर ने आगे बढ़कर नव्या के कंधे पर अपना हाथ रखा। उसका स्पर्श हमेशा की तरह गर्म और भरोसेमंद था। उसने कहा, "नव्या, मैं तुम्हें छोड़कर नहीं जा रहा हूँ। मैं वापस आऊँगा, वादा करता हूँ तुमसे। और जब आऊँगा, तो सब कुछ ठीक होगा।"
रात भारी कदमों से गुजरी। बारिश थम चुकी थी, लेकिन नव्या के दिल में जो सैलाब आया था, वह शांत होने का नाम नहीं ले रहा था।
अगली सुबह, जब नव्या उठी, तो कबीर का कमरा खाली हो चुका था। उसने नीचे जाकर कबीर के कमरे का दरवाजा खटखटाया, लेकिन अंदर से कोई आवाज़ नहीं आई। एक छोटा सा लिफाफा दरवाजे के नीचे से बाहर आ रहा था।
नव्या ने काँपते हाथों से वह लिफाफा उठाया। उसने उसे खोला और अंदर टटोला। उसमें कुछ पैसे थे—उसका किराया और सिलाई के एडवांस पैसे—और साथ में एक पर्ची थी जिस पर ब्रेल लिपि में कुछ पंक्तियाँ लिखी थीं।
नव्या ने अपनी उँगलियों से उन उभरे हुए बिंदुओं को छुआ। वहाँ लिखा था:
"नव्या, मैं जा रहा हूँ, लेकिन मेरा दिल यहीं इस कमरे में तुम्हारे पास छूटा है। अपनी इन आँखों को कमजोर मत समझना, दुनिया भले ही तुम्हें न देख सके, पर तुम इस दुनिया को अपनी रूह से देख सकती हो। अपना ख्याल रखना। मैं जल्द लौटूँगा।"
नव्या वह पर्ची अपने सीने से लगाकर फूट-फूट कर रो पड़ी। वह रोना ऐसा था जैसे आसमान फट गया हो और ज़मीन पर सिवाय मलबੇ के कुछ न बचा हो।
अध्याय 5: कमला बाई का क्रूर प्रहार
कबीर को गए हुए तीन महीने बीत चुके थे। इन तीन महीनों में नव्या की ज़िंदगी फिर से उसी पुराने, बेरंग और घुटन भरे दायरे में सिमट कर रह गई थी। न तो कबीर का कोई फोन आया (क्योंकि नव्या के पास फोन था ही नहीं, और कबीर को उसका नंबर या सही पता नहीं था कि वह खत लिख सके), और न ही उसकी कोई खबर आई।
कमला बाई का गुस्सा अब सातवें आसमान पर था। पिछले दो महीनों से नव्या ने किराया नहीं दिया था। शहर में महँगाई बढ़ चुकी थी और नव्या का सिलाई का काम भी कम हो गया था क्योंकि लोग अब रेडीमेड कपड़ों की तरफ ज़्यादा भाग रहे थे।
एक कड़कती हुई दोपहर को, कमला बाई सीधे नव्या के कमरे में धमक पड़ीं। उनके साथ दो अजनबी लोग और थे—स्थानीय बाज़ार का एक प्रॉपर्टी डीलर और उसका एक आदमी।
"बस! बहुत हो गया तुम्हारा नाटक, नव्या!" कमला बाई ने चिल्लाते हुए कहा, "तीन महीने से किराए का नाम नहीं है। मैंने तुम्हें बहुत छूट दे दी। अब यह कमरा खाली करो। आज ही इस मकान को किसी दूसरे को बेचना है।"
नव्या अपनी सिलाई मशीन से उठ खड़ी हुई। उसने हाथ जोड़कर विनती की, "चाची जी, बस पंद्रह दिन और दे दीजिए। मैंने कुछ लोगों से उधार मांगा है, पैसे मिलते ही मैं सारा किराया चुका दूँगी। इस वक्त मैं कहाँ जाऊँगी? मेरी कोई दुनिया नहीं है इस शहर में!"
"मुझे तुम्हारी किसी बात से मतलब नहीं है!" कमला बाई ने गुस्से में आकर नव्या की उस पुरानी सिलाई मशीन को ज़ोर से धक्का दिया।
धड़ाम!
वह सिलाई मशीन, जो नव्या की ज़िंदगी का एकमात्र सहारा थी, जो उसकी कमाई का ज़रिया थी, ज़मीन पर गिरकर टूट गई। उसके पुर्जे बिखर गए। वह मशीन, जिसके साथ नव्या ने अपनी अनगिनत रातें रोते-हँसते हुए काटी थीं, आज मलबे में तब्दील हो चुकी थी।
नव्या उस टूटी हुई मशीन पर गिर पड़ी। उसने उसके टूटे हुए हिस्सों को अपने हाथों से टटोला और चीख पड़ी, "मेरी मशीन...! क्यों तोड़ दिया इसे? यही तो मेरी ज़िंदगी थी! मैं कैसे कमाऊँगी? कैसे जूँगी?"
प्रॉपर्टी डीलर ने बेरुखी से कहा, "चलो भई, बूढ़ी औरत को परेशान मत करो, इसका सामान बाहर फेंको और ताला लगाओ इस कमरे पर।"
उन आदमियों ने नव्या के उस छोटे से बक्से, उसकी कुछ पुरानी किताबों और कपड़ों को घसीटकर बाहर गली में फेंक दिया। नव्या वहीं सीढ़ियों पर बेसुध होकर बैठ गई। उसके मुँह से कोई आवाज़ नहीं निकल रही थी। उसकी आँखें सूखी थीं, और दिल मानों धड़कना भूल गया था।
मोहल्ले के कुछ लोग तमाशा देखने के लिए बाहर निकल आए, लेकिन किसी की हिम्मत नहीं हुई कि उस अकेली, बेसहारा अंधी लड़की के लिए दो शब्द भी बोल सके। इस क्रूर दुनिया में कमज़ोर की मदद करने वाला कोई नहीं होता।
अध्याय 6: बारिश और एक नया मोड़
शाम ढलते-ढलते आसमान में काले बादल फिर से घिर आए। सितंबर की उमस भरी शाम अचानक एक तेज आंधी में बदल गई। नव्या अपने बिखरे हुए सामान के पास गली के एक कोने में दुबकी बैठी थी। उसके बदन पर भीगने से ठंडक उतर आई थी, लेकिन उसके दिल की आग उसे जला रही थी।
उसके पास न तो छत थी, न पैसे, और न ही जीने की कोई वजह। उसने मन ही मन सोचा—क्या यहीं तक थी मेरी कहानी? क्या इस दुनिया में मेरे जैसे इंसान का कोई वजूद ही नहीं है?
तभी गली के मुँह पर एक कार आकर रुकी। कार का दरवाज़ा खुलने की आवाज़ आई और उसके बाद किसी जानी-पहचानी जूतियों की आवाज़ तेज़ी से उसकी तरफ बढ़ने लगी।
"नव्या...!"
वह आवाज़... वह आवाज़ इस कदर बेचैन और भारी थी कि नव्या का दिल एक पल के लिए रुक गया। वह कोई और नहीं, कबीर था।
कबीर ने जब उस गली में नव्या को बिखरे हुए सामान के बीच बारिश में भीगते हुए और बेसुध बैठे देखा, तो उसका कलेजा काँप उठा। उसने दौड़कर अपनी जैकेट उतारी और नव्या के कंधों पर डाल दी। उसने नव्या को अपनी बाहों में समेट लिया।
"नव्या! यह क्या हो रहा है? तुम यहाँ... इस हालत में क्यों बैठी हो?" कबीर की आँखों में आंसू थे, जो बारिश के पानी में छिप नहीं पा रहे थे।
नव्या ने कबीर के सीने पर अपना सिर रख दिया और फूट-फूट कर रो पड़ी। उसने हिचकिचाते हुए कहा, "कबीर... वे मेरा सब कुछ छीनकर ले गए। मेरी मशीन तोड़ दी... मुझे घर से निकाल दिया। मेरे पास... मेरे पास अब कुछ नहीं बचा।"
कबीर ने नव्या को मजबूती से अपनी बाहों में भर लिया। उसने गुस्से और कसक से भरी हुई आँखों से कमला बाई के उस बंद दरवाजे को देखा। फिर उसने नव्या का चेहरा अपने दोनों हाथों में थामा और उसके माथे को चूमा।
"रो मत, नव्या," कबीर की आवाज़ में एक चट्टान जैसी दृढ़ता थी, "तुम अकेली नहीं हो। जब तक कबीर ज़िंदा है, तुम्हारी दुनिया का कोई भी हिस्सा वीरान नहीं होने देगा।"
कबीर ने तुरंत कुछ लोगों को बुलाकर नव्या का बचा हुआ सामान अपनी गाड़ी में रखवाया। उसने उसी रात शहर के एक अच्छे होटल में नव्या के रुकने का इंतज़ाम किया, जहाँ एक डॉक्टर को बुलाकर नव्या की सर्दी और कमज़ोरी का इलाज कराया गया।
अगले दिन सुबह, कबीर ने कमिश्नर ऑफिस और कुछ स्थानीय वकीलों की मदद से कमला बाई के खिलाफ उस अवैध बेदखली और तोड़फोड़ के खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू कर दी। कमला बाई को जब एक जाने-माने फोटोग्राफर और शहर के रसूखदार लोगों का साथ कबीर के साथ देखा, तो उनके होश उड़ गए। उन्होंने न सिर्फ नव्या से माफी माँगी, बल्कि उसका सारा सामान सम्मान के साथ वापस उसके कमरे में रखवाया और नव्या को ज़िंदगी भर किराया न देने का हलफनामा भी लिखवाया।
लेकिन नव्या जानती थी कि सिर्फ कमरा वापस मिलने से उसकी समस्या हल नहीं होने वाली थी। उसकी आँखें... उसकी वह आँखें जो दुनिया देखना चाहती थीं, उनका क्या?
अध्याय 7: वो आखिरी सच जो ज़िंदगी बदल देगा
एक शांत दोपहर को, जब कबीर नव्या के कमरे में बैठा था, उसने नव्या का हाथ अपने हाथ में लिया और बहुत ही गंभीर आवाज़ में कहा, "नव्या, मैं तुमसे कुछ कहना चाहता हूँ। बहुत दिनों से हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था।"
नव्या ने अपनी खाली नजरों को कबीर की तरफ घुमाया, "क्या बात है कबीर? इतने गंभीर क्यों लग रहे हो?"
कबीर ने लंबी सांस ली और कहा, "जब मैं दिल्ली गया था, तो वहाँ मेरा एक बहुत बड़ा डॉक्टर दोस्त है—डॉ. समीर मल्होत्रा। वह आँखों का एक बहुत नामी सर्जन (Cornea Transplant Specialist) है। मैंने... मैंने तुम्हारी मेडिकल रिपोर्ट्स और पिछली हिस्ट्री उसे दिखाई थी।"
नव्या का दिल अचानक ज़ोर से धड़कने लगा। उसके होंठ काँपने लगे। उसने डरे हुए स्वर में पूछा, "क्या... क्या मतलब? क्या मेरी आँखें ठीक हो सकती हैं?"
कबीर की आँखों में नमी तैर आई। उसने नव्या के हाथों को और कसकर पकड़ लिया और कहा, "हाँ, नव्या! डॉ. समीर ने कहा है कि तुम्हारी आँखों की कॉर्निया (Cornea) की जो झिल्ली खराब हुई है, उसे पूरी तरह बदला जा सकता है। आधुनिक तकनीक से यह सर्जरी संभव है। तुम... तुम फिर से देख सकती हो!"
यह बात सुनते ही नव्या जैसे सुन्न पड़ गई। उसके मुँह से कोई शब्द नहीं निकला। वह बरसों से जिस चीज़ के लिए तरस रही थी, जिस अंधकार को उसने अपनी किस्मत मान लिया था, क्या वह सचमुच मिटने वाला था? क्या वह सूरज को, आसमान को, और... और कबीर के चेहरे को देख पाएगी?
लेकिन अगले ही पल, नव्या का चेहरा पीला पड़ गया। उसकी खुशी का गुब्बारा पल भर में फूट गया। उसने कबीर के हाथ से अपने हाथ खींच लिए और घबराते हुए कहा, "नहीं... कबीर, यह मुमकिन नहीं है।"
"क्यों मुमकिन नहीं है?" कबीर ने हैरानी से पूछा।
"खर्च..." नव्या की आवाज़ में लाचारी थी, "लाखों रुपये लगते हैं इस सर्जरी में। मेरे पास एक फूटी कौड़ी नहीं है। मैं तो अपनी रोज़ की रोटी भी सिलाई करके कमाती थी, और वो मशीन भी टूट चुकी है। तुम... तुम मुझसे ऐसा मज़ाक क्यों कर रहे हो?"
कबीर ने मुस्कुराते हुए अपनी जेब से एक चेकबुक और कुछ कागजात निकाले। उसने नव्या के हाथों में एक कागज़ रखते हुए कहा, "मज़ाक नहीं कर रहा हूँ, नव्या। मैंने अपनी फोटोग्राफी की प्रदर्शनी से जो पैसे कमाए हैं, और जो मेरे पास जमापूँजी थी... मैंने वह सब इस सर्जरी के नाम कर दिया है। और बाकी का खर्च डॉ. समीर की चैरिटी फाउंडेशन ने उठा लिया है।"
नव्या सन्न रह गई। उसने उस कागज़ को अपनी उँगलियों से टटोला। उसकी आँखों से सैलाब की तरह आँसू बहने लगे। उसने कबीर के कॉलर को पकड़कर लगभग चीखते हुए कहा, "तुम... तुम ऐसा क्यों कर रहे हो मेरे लिए? मैं तुम्हारी लगती कौन हूँ? क्यों बर्बाद कर रहे हो अपनी कमाई मुझ पर?"
कबीर ने नव्या के दोनों कंधों को थामा और उसकी आँखों में झाँकने की कोशिश करते हुए (यह जानते हुए भी कि वह देख नहीं सकती) बहुत प्यार से कहा, "क्योंकि... क्योंकि जब से मैंने तुम्हारी इस अंधेरी दुनिया में तुम्हारी रूह की रोशनी को देखा है, मुझे अपनी यह देखने वाली आँखें भी अधूरी लगने लगी हैं। नव्या, मैं तुम्हारे बिना इस रंगीन दुनिया को भी बेरंग देखता हूँ। मैं तुम्हें देखना चाहता हूँ... हँसते हुए, इस नीले आसमान को देखते हुए।"
कमरे में उस वक्त ऐसा सन्नाटा था जिसमें दो धड़कनें एक साथ गूँज रही थीं। नव्या ने कबीर के सीने पर अपना सिर रख दिया और सिसक-सिसक कर रोने लगी। वह रोना दुख का नहीं, बल्कि ज़िंदगी की उस पहली उम्मीद का था जो अब हकीकत बनने जा रही थी।
अध्याय 8: रोशनी की पहली किरण
एक हफ्ते बाद, शहर के सबसे बड़े आई हॉस्पिटल के आईसीयू रूम में नव्या लेटी हुई थी। उसकी दोनों आँखों पर सफेद पट्टियाँ बँधी हुई थीं। कमरे के बाहर कबीर टहल रहा था, उसके माथे पर पसीना था और उसकी धड़कनें रुकी हुई थीं।
डॉक्टर समीर बाहर आए और मुस्कुराते हुए कबीर के कंधे पर हाथ रखा, "सर्जरी पूरी तरह सफल रही है, कबीर। भगवान का शुक्र है कि कॉर्निया ने बहुत अच्छी तरह से रिएक्ट किया है। कल सुबह हम पट्टियाँ हटाएंगे।"
वह रात नव्या और कबीर दोनों के लिए सदियों जितनी लंबी थी। नव्या ने अस्पताल के बिस्तर पर लेटे-लेटे रात भर भगवान से प्रार्थना की—हे ईश्वर! अगर तू है, तो कल जब ये पट्टियाँ खुलें, तो सबसे पहले मैं इस दुनिया के रंगों को देख सकूँ, और... और उस इंसान को देख सकूँ जिसने मुझे नया जीवन दिया है।
अगली सुबह, सूरज की पहली किरण खिड़की से छनकर कमरे में दाखिल हुई।
डॉक्टर समीर और कबीर धीरे-धीरे कमरे के अंदर आए। नर्स ने नव्या के सिर के पास आकर बहुत ही प्यार से कहा, "तैयार हो नव्या? अपनी नई दुनिया देखने के लिए?"
नव्या ने धीरे से सिर हिलाया। उसका पूरा शरीर काँप रहा था।
डॉक्टर ने धीरे-धीरे पट्टियाँ खोलनी शुरू कीं। जैसे-जैसे पट्टी का आखिरी सिरा अलग हुआ, नव्या ने अपनी पलकें बंद रखीं।
"अब धीरे-धीरे अपनी आँखें खोलो, नव्या। घबराना मत, रोशनी थोड़ी तेज़ लगेगी," डॉक्टर समीर ने कहा।
नव्या ने अपनी भारी पलकें बहुत धीरे से उठाईं।
शुरुआत में उसे सब कुछ सफेद और धुंधला दिखाई दिया। उसके सिर में हल्का सा चक्कर आया। उसने अपनी हथेलियों से अपनी आँखों को मसलना चाहा, तो नर्स ने उसका हाथ रोक दिया।
"नहीं, नव्या... धीरे-धीरे," नर्स ने कहा।
नव्या ने फिर से अपनी पलकें झपकाईं। इस बार कमरे की सफेद दीवारें साफ दिखने लगीं। खिड़की से आती हुई सुनहरी धूप ने उसे चकाचौंध कर दिया। उसने अपनी आँखों के सामने अपने हाथों को देखा—वही हाथ जिन पर सुइयों के निशान थे, आज साफ और सुंदर लग रहे थे।
उसने अपनी नज़रें कमरे में घुमाईं। डॉक्टर का सफेद एप्रन, नर्स की मुस्कान... और फिर, कोने में खड़े उस इंसान पर उसकी नज़रें टिक गईं।
कबीर वहाँ खड़ा था। उसकी आँखों में खुशी के आँसू छलक रहे थे और उसके चेहरे पर एक ऐसी मुस्कान थी जो दुनिया की सारी दौलत से कीमती थी।
नव्या ने अपनी उँगलियों से हवा में कबीर की तरफ छुआ, मानो वह यकीन करना चाहती थी कि वह सचमुच देख रही है या कोई सपना है।
"कबीर...?" नव्या की आवाज़ पहली बार इतनी साफ़ और गूँजती हुई निकली थी।
कबीर दौड़कर नव्या के बिस्तर के पास आया और उसने नव्या के दोनों हाथों को अपने होठों से लगा लिया। उसकी सिसकियाँ अब रोने में बदल चुकी थीं।
नव्या ने अपना एक हाथ उठाया और पहली बार अपनी इन नई आँखों से कबीर के चेहरे को छुआ—उसकी ठुड्डी, उसकी आँखें, उसके बाल, और उसकी वो मुस्कान जो उसने अब तक सिर्फ आवाज़ से महसूस की थी, आज उसने अपनी आँखों से देख ली थी।
"तुम... तुम बिल्कुल वैसे ही हो जैसा मैंने तुम्हें अपने दिल में सोचा था," नव्या की आँखों से बहते आँसू अब खुशी की चमक बन चुके थे।
खिड़की से बाहर देखा, तो आसमान नीला था, परिंदे उड़ रहे थे, और नीचे सड़क पर दुनिया अपने तमाम रंगों के साथ दौड़ रही थी। लेकिन नव्या के लिए इस पूरी कायनात में सबसे खूबसूरत रंग सिर्फ एक ही था—कबीर का प्यार और उसकी अपनी वह 'नज़र', जो अब हमेशा के लिए रोशन हो चुकी थी।
उपसंहार:
ज़िंदगी चाहे कितनी भी स्याह और बेरंग क्यों न लगे, अगर आपके पास कोई ऐसा इंसान है जो आपके अंधेरे में भी अपना दिया जलाने का हौसला रखता है, तो आँखें न होने पर भी दुनिया जन्नत बन जाती है। "नज़र" सिर्फ देखने की क्षमता का नाम नहीं है, बल्कि यह उस अटूट विश्वास का नाम है जो दो दिलों को हमेशा के लिए एक कर देता है।