पुल की टूटी लकड़ी के बीच पॉल का पैर फंसा हुआ था और वह नदी से करीब तीस फीट ऊपर हवा में उल्टा लटक रहा था। नीचे नदी के पानी में हलचल तेज़ हो चुकी थी; पिराना मछलियाँ और मगरमच्छ उस तैरते हुए शिकार को भांप चुके थे। ऐशली और रोज़ी पुल के दूसरे छोर पर खड़ी थीं। ऐशली का चेहरा डर और चालाकी के मिले-जुले भावों से भरा था, उसे अंदाज़ा नहीं था कि उसकी इस हरकत का नतीजा इतना भयानक होगा।
"लारा! मैट! मुझे बचाओ! मैं गिर रहा हूँ!
पॉल की चीखें पूरी घाटी में गूँज रही थीं। उसके हाथ रस्सी को पकड़ने की नाकाम कोशिश कर रहे थे, लेकिन उसका पूरा वज़न उसके फंसे हुए पैर पर था। पुल की मुख्य रस्सी 'चर्र-चर्र' करती हुई एक-एक धागा छोड़ रही थी। वह किसी भी पल टूट सकती थी।
इस पार खड़ी लारा ने एक सेकंड भी बर्बाद नहीं किया। उसने मैट की लकड़ी की मजबूत बैसाखी झटके से छीन ली। मैट ने कहा,
"लारा, तुम क्या कर रही हो? पुल कमज़ोर है, तुम दोबारा जाओगी तो वो तुरंत टूट जाएगा!
लारा ने मैट की तरफ देखा और कहा,
अगर पॉल नीचे गिरा, तो वो उन जानवरों का निवाला बन जाएगा। मुझे जाना होगा।
सोफिया ने लारा का हाथ पकड़ लिया, उसकी आँखों में डर था, पर लारा ने उसे भरोसा दिलाया।
लारा पेट के बल रेंगते हुए उस झूलते हुए, टूटे पुल पर आगे बढ़ी। नीचे बहती तेज़ नदी और हवा के थपेड़े पुल को बुरी तरह हिला रहे थे। लारा ने अपनी पूरी जान लगाकर मैट की बैसाखी को पॉल की तरफ बढ़ाया,
"पॉल! अपना हाथ ऊपर करो और इस लकड़ी को कसकर पकड़ो!
पॉल ने अपनी पूरी ताकत समेटी और हवा में हाथ लहराते हुए बैसाखी के सिरे को पकड़ लिया। लारा ने धीरे-धीरे बैसाखी को अपनी तरफ खींचना शुरू किया, जिससे पॉल का पैर उस टूटी हुई लकड़ी के शिकंजे से आज़ाद हो गया। लेकिन जैसे ही पॉल सीधा हुआ, पुल की वो कमज़ोर रस्सी पूरी तरह टूट गई—'स्नैप!'
पुल का एक हिस्सा नीचे नदी में जा गिरा। पॉल और लारा दोनों हवा में झूल गए, लेकिन खुशकिस्मती से लारा का आधा शरीर उस पार की पक्की ज़मीन पर था और उसका पैर एक मज़बूत पेड़ की जड़ में फंसा हुआ था। सोफिया और मैट ने तुरंत दौड़कर लारा के पैर और कमर को पकड़ा और पूरी ताकत लगाकर लारा और पॉल दोनों को खींचकर ज़मीन पर सुरक्षित ले आए।
पॉल ज़मीन पर गिरकर हांफ रहा था, उसकी आँखें फटी हुई थीं। वह मौत के मुंह से वापस आया था। उसने रोते हुए लारा के पैर छू लिए,
थैंक यू लारा... थैंक यू सो मच। अगर आज तुम नहीं होतीं, तो मैं..." लारा ने उसे उठाया और कहा, "शुक्रिया मुझे नहीं, सोफिया और मैट को कहो।
लेकिन कहानी का असली ड्रामा तो अब शुरू होना था। पुल का आधा हिस्सा टूटकर नदी में गिर चुका था, जिसका मतलब था कि नदी के इस पार अब सिर्फ लारा, सोफिया, मैट और पॉल थे... और नदी के उस पार, जहाँ खतरा सबसे ज़्यादा था, वहाँ ऐशली और रोज़ी अकेली रह गई थीं! दोनों पार जाने का रास्ता पूरी तरह बंद हो चुका था।
ऐशली और रोज़ी ने जब देखा कि पुल टूट चुका है और वे उस पार नहीं आ सकतीं, तो उनके चेहरे का रंग उड़ गया। ऐशली चिल्लाई,
"पॉल! मैट! हमें यहाँ से निकालो! हम इस तरफ अकेली हैं। यहाँ बहुत डर लग रहा है!
रोज़ी भी अपने जख्मी हाथ को पकड़े रोने लगी,
"पॉल, तुम मुझे छोड़कर नहीं जा सकते, प्लीज कुछ करो!
पॉल धीरे-धीरे खड़ा हुआ। उसकी आँखों में अब रोज़ी या ऐशली के लिए कोई प्यार नहीं था, सिर्फ एक गहरी नफ़रत और गुस्सा था। पॉल ने उस पार चिल्लाकर कहा, "ऐशली! तुम क्या सोचती हो कि मैं अंधा हूँ? मैंने देखा था कि जब मैं पुल पर था, तुम जानबूझकर कूद रही थी ताकि पुल हिले और लारा मुसीबत में आ जाए। तुमने लारा से नफ़रत के चक्कर में मेरी जान दांव पर लगा दी! तुम दोनों इतनी घटिया हो कि मुझे तुम्हारी शक्ल से भी नफ़रत हो गई है।
मैट ने भी कड़क आवाज़ में कहा,
"ऐशली, तुमने जो बोया है, वही पाओगी। इस जंगल में जो दूसरों के लिए गड्ढा खोदता है, वह खुद उसमें गिरता है। अब तुम दोनों अपनी अमीरी और अपने घमंड के साथ उसी पार रहो।
ऐशली पागलों की तरह चीखने लगी,
मैट! मैं तुम्हारी गर्लफ्रेंड हूँ, तुम मुझे इस नर्क में अकेले कैसे छोड़ सकते हो? लारा, प्लीज कुछ करो, हमारे पास कोई हथियार भी नहीं है!
लारा ने नदी के उस पार खड़ी उन दोनों अमीर लड़कियों को देखा। लारा के चेहरे पर एक सर्द मुस्कान थी। उसने कहा,
"ऐशली, तुमने रात को कहा था ना कि मैं सिर्फ हमदर्दी बटोरने के लिए नाटक कर रही हूँ? अब जाओ, अपने उस महंगे ब्रैंडेड बैग और पैसों से इस जंगल के जानवरों को खरीद लो। देखते हैं तुम्हारी अमीरी तुम्हें इस रात कैसे बचाती है।
लारा ने मुड़कर पॉल, मैट और सोफिया से कहा,
"चलो, आगे बढ़ते हैं। शाम होने से पहले हमें कोई ठिकाना ढूंढना है।
चारों आगे बढ़ गए। नदी के उस पार से ऐशली और रोज़ी के रोने और चिल्लाने की आवाज़ें आ रही थीं, जो धीरे-धीरे घने जंगल के सन्नाटे में खो गईं। दोनों लड़कियाँ अब अमेज़न के उस सबसे खतरनाक हिस्से में पूरी तरह अकेली और बेबस थीं, जहाँ रात होते ही दरिंदे बाहर आने वाले थे। उनकी खुद की नफ़रत और साज़िश ने उन्हें मौत के सबसे करीब लाकर खड़ा कर दिया था... (जारी है)