mout ka dar part 4 ( college ) in Hindi Thriller by Irfan ayan Khan books and stories PDF | मौत का डर पार्ट 4 ( कॉलेज )

Featured Books
Categories
Share

मौत का डर पार्ट 4 ( कॉलेज )

[दृश्य 1]
स्थान: मुंबई के कॉलेज का मेन गेट
समय: सुबह के ठीक 8:00 बज रहे हैं।


सड़कों के ट्रैफिक और लंबी भागदौड़ के बाद रेहान ने अपनी बाइक लाकर कॉलेज के गेट के ठीक बाहर खड़ा कर दिया। पीछे बैठा राहुल तेजी से बाइक से नीचे उतरा और अपना बैग कंधे पर समेटा।


रेहान ने भी अपनी बाइक का स्टैंड लगाया और कंधे पर टंगा बैग संभालते हुए तेजी से बाइक से नीचे उतरा।


लेकिन जैसे ही उन दोनों की नजर कॉलेज के मेन लोहे के गेट पर पड़ी, उनके पाँव जैसे जमीन पर ही जम गए—कॉलेज का भारी गेट धीरे-धीरे बंद होने लगा था, और गार्ड ताला लगाने के लिए आगे बढ़ रहा था!


राहुल की साँसें उखड़ने लगीं, उसके माथे पर चिंता की लकीरें उभर आईं। उसने हड़बड़ाहट में रेहान की तरफ देखते हुए कहा—


[राहुल]
"गेट बंद होने लगा है! शुक्र है कि किसी तरह टाइम पर पहुँच गए, वरना अगर आज अंदर नहीं घुस पाएंगे, तो सुबह से की गई हमारी सारी की सारी मेहनत और भागदौड़ बेकार हो जाएगी!"


रेहान ने राहुल की घबराहट को शांत करने के लिए एक गहरी साँस खींचते हुए कहा—


[रेहान]
"चुप कर यार! पहले अंदर चलने की कोशिश तो कर... और वैसे भी, आज रिजल्ट नहीं देख पाते तो कौन सा आसमान टूट पड़ता, रिजल्ट तो कल भी मिल ही जाता! पर चल, अब पहुँच ही गए हैं, तो अंदर चलकर आज ही देख लेते हैं।"


तभी पीछे से एक ऑटो आकर रुकता है। उस ऑटो से थकान और अनगिनत चिंताओं को समेटे मीसा आंटी तेजी से नीचे उतरती हैं। ऑटो का किराया चुकाकर वे दौड़ती हुई रेहान और राहुल के पास पहुँचती हैं। लंबी भागदौड़ और घबराहट के कारण उनका बुरा हाल था—वे लगातार हाँफ रही थीं, उनके सीने से साँस लेने की भारी आवाजें आ रही थीं, और वे अपने दोनों हाथों से घुटनों को थामकर अपनी उखड़ी हुई साँसों को काबू करने की कोशिश कर रही थीं।


[मीसा आंटी]
अरे... अरे रेहान!... तुम लोग... तुम लोग अभी तक अंदर नहीं गए?... रास्ते में... रास्ते में इतना भयानक ट्रैफिक मिला कि पूछो मत... मैं तो... मैं तो रास्ते में ही डर गई थी कि पता नहीं टाइम पर पहुँच पाऊँगी भी या नहीं!


रेहान अपनी शर्ट की आस्तीन को कायदे से ठीक करते हुए बहुत ही शालीन और आत्मविश्वास भरे लहजे में जवाब देता है—


[रेहान]
"फिक्र मत कीजिए आंटी, हम भी बस अभी ही पहुँचे हैं... रास्ते में थोड़ा ट्रैफिक हमें भी मिला था, पर टाइम पर आ ही गए। चलिए, जल्दी चलिए, उधर गेट बंद हो रहा है!"


वे तीनों तेजी से गेट की तरफ बढ़ते हैं। मीसा आंटी सीधे गार्ड के पास पहुँचती हैं और बहुत ही नम्र और शालीन लहजे में अनुरोध करती हैं—


[मीसा आंटी]
"भैया! सुनना... जरा गेट रोकिए! प्लीज गेट खोल दीजिए... हम इतनी दूर से और ट्रैफिक पार करके आए हैं। बच्चे साथ हैं, मुझे इन्हें अंदर लेकर जाना है और रिजल्ट दिखवाना है। गेट खोलिए, प्लीज!"


गार्ड अपने हाथ में पकड़ा लोहे का ताला दिखाते हुए सख्त चेहरे के साथ साफ मना कर देता है—


[गार्ड]
"नहीं, अंदर जाने की अनुमति नहीं मिलेगी! नियम नियम होता है, ऊपर से स्ट्रिक्ट ऑर्डर है कि आठ बजे के बाद गेट बंद मतलब बंद। रिजल्ट कल मिल जाएगा, आज कोई एंट्री नहीं मिलेगी। अब आप लोग कल आइएगा।"


मीसा आंटी अपनी मजबूरी और थोड़ी जिद भरे लहजे में गार्ड को समझाते हुए कहती हैं—


[मीसा आंटी]
"अरे भैया, कल मिलने को तो कल मिल जाएगा, पर कल मैं शहर में नहीं रहूंगी! मुझे एक जरूरी काम से बाहर जाना है, इसलिए मैं आज ही बच्चों के साथ आई हूँ ताकि इनके साथ रहकर रिजल्ट देख सकूँ। अब जब हम सुबह-सुबह इतनी मशक्कत करके पहुँच ही गए हैं, तो आज ही अंदर जाने दीजिए ना!"


मीसा आंटी की बात सुनकर रेहान के मन में अचानक एक अजीब सा सवाल कौंध जाता है—'अभी कुछ ही मिनट पहले तो वह बाहर से लौटी है। फिर अचानक ऐसा कौन सा जरूरी काम है जिसकी वजह से उन्हें बार-बार शहर से बाहर जाना पड़ता है?' उसके मन में यह उलझन तो जरूर उठती है, लेकिन इस वक्त उस पर बहस करने का समय नहीं था।


इस बार गार्ड का दिल पसीजने के बजाय वो अपनी बात पर और सख्त हो जाता है। वो गुस्से में सिर हिलाते हुए मेन गेट पर बड़ा ताला अड़ा देता है और दो टूक शब्दों में कह देता है—


[गार्ड]
"मैंने एक बार कह दिया ना कि नियम तो नियम होता है, और ताला भी लग चुका है! आप कल रहें या बाहर जाएँ, आज कोई अंदर नहीं जा सकता, चाहे आप कितनी भी जिद कर लीजिए।"


माहौल में पूरी तरह निराशा छा जाती है। मीसा आंटी के चेहरे पर गहरी झुंझलाहट साफ उभर आती है कि इतनी पास आकर भी गार्ड की वजह से बात अटक गई है।


बात को संभालते हुए रेहान तुरंत आगे बढ़ता है, गार्ड के थोड़ा करीब आता है और बहुत ही सधे हुए और अदब भरे लहजे में उसे समझाते हुए कहता है—


[रेहान]
"देखिए अंकल, गलती हमारी ही है कि हम थोड़ा लेट हो गए, हम मानते हैं। लेकिन ज़रा सोचिए, जब आंटी को कल किसी जरूरी काम से बाहर जाना है और हम इतनी दूर से फँसते-बचते आ ही गए हैं, तो आज ही अंदर जाने दीजिए... वरना कल दोबारा फालतू में चक्कर लगाना पड़ेगा। बस पाँच मिनट के लिए ताला खोल दीजिए... प्लीज थोड़ा समझाइए ना!"


रेहान के साथ-साथ राहुल भी तुरंत आगे बढ़ता है और हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाते हुए कहता है—


[राहुल]
"हाँ अंकल, प्लीज समझाइए ना! सुबह-सुबह इतनी भागदौड़ करके आए हैं, बस एक बार अंदर झाँकने तो दीजिए... हमारा पूरा साल और मेहनत बर्बाद हो जाएगी, प्लीज गेट खोल दीजिए!"


गार्ड से बहस करते-करते 15 मिनट बीत चुके थे और घड़ी की सुइयां सुबह के 8:15 पर पहुँच चुकी थीं। गार्ड ने कुछ सेकंड तक उन दोनों और फिर मीसा आंटी के अड़े हुए चेहरों को देखा।


 उसके तेवर थोड़े ढीले पड़े, उसने गुस्से में एक गहरी साँस छोड़ी और ताला थोड़ा हटाकर मेन गेट का एक पल्ला खिसका कर खोल दिया—


[गार्ड]
"चलो, ठीक है... अब इतनी ज़िद कर रहे हो तो जाओ अंदर! लेकिन याद रखना, अगली बार से इतनी छूट नहीं मिलेगी, लेट हुए तो अंदर घुसने नहीं दूँगा।"


गार्ड के इतना कहते ही तीनों के चेहरों की शिकन गायब हो जाती है और राहत की सांस मिलती है। अंदर कदम रखने से पहले रेहान मुड़कर उस गार्ड की तरफ देखता है और पूरे आदर के साथ आभार जताते हुए कहता है—


[रेहान]
"थैंक यू सो मच, अंकल!"
गार्ड बिना कुछ बोले बस अपनी गर्दन हिला देता है। रेहान, राहुल और मीसा आंटी राहत की एक लंबी साँस छोड़ते हैं और दौड़कर कॉलेज के अंदर दाखिल हो जाते हैं।


[दृश्य 2]
स्थान: कॉलेज का मुख्य प्रांगण और नोटिस बोर्ड का इलाका
समय: सुबह के 8:20 बजे


जैसे ही वे कॉलेज परिसर के अंदर दाखिल हुए, वहाँ का माहौल बाहर के शोर-शराबे से बिल्कुल अलग और अजीब सा शांत नजर आया। सुबह की पीली धूप में चारों तरफ खामोशी पसरी हुई थी, लेकिन ठीक सामने लगे नोटिस बोर्ड के पास कुछ स्टूडेंट्स की भीड़ जुटी हुई थी जो अपने रिजल्ट को लेकर आपस में कानाफूसी और चर्चा कर रहे थे।


रेहान, राहुल और मीसा आंटी जैसे ही नोटिस बोर्ड की तरफ आगे बढ़ने लगे, भीड़ में खड़े कॉलेज के दो बिगड़ैल और रईसजादे लड़के—अमन (उम्र 26 साल) और रॉकी (उम्र 25 साल) की नजर अचानक उन पर पड़ गई। ये दोनों पहले से ही मौका तलाशते रहते थे कि कैसे रेहान और राहुल को नीचा दिखाया जाए और इन्हें परेशान किया जाए। ये अक्सर कॉलेज में इन्हें देखकर फब्तियां कसते थे, लेकिन रेहान और राहुल इन छिछोरे लोगों की हरकतों पर कभी ज्यादा ध्यान नहीं देते थे और इन्हें पूरी तरह नजरअंदाज कर देते थे।



आज भी अमन ने उन्हें देखते ही एक तंज कसने वाली कड़वी हँसी हँसते हुए अपने साथी रॉकी की तरफ देखा और तेज आवाज में बोला—


[अमन]
"अरे जरा इनकी चाल तो देखो भाई! ऐसे शान से कदम बढ़ा रहे हैं जैसे कोई कॉलेज नहीं, बल्कि अपनी जागीर फतह करने आए हों... बस फर्क इतना है कि सपनों की उस दुनिया से बाहर आने में इन्हें हर बार सूरज सिर पर चढ़ाना पड़ता है!"


रॉकी मुस्कुराते हुए और व्यंग्य भरे लहजे में आगे बढ़ा और बोला—
[रॉकी]


"सही कह रहा है अमन! रेहान ने तो कम से कम अपनी आंटी को साथ घसीट लिया... पर तेरा क्या राहुल? तेरे अमीर बाप के पास पैसों के सिवा देने को कुछ नहीं है, और तलाक के बाद दोनों अपनी अलग दुनिया बसा चुके हैं... तो क्या, अपने उस अमीर बाप या तलाकशुदा माँ में से किसी को लेकर आने वाला था? पर शक्ल तो किसी की नहीं दिख रही मुझे!"


चारों तरफ के कुछ चापलूस स्टूडेंट्स के बीच हल्की और चुभने वाली हँसी गूँज उठी।


[लेखक की कलम से]

क्या नोटिस बोर्ड पर रिजल्ट उम्मीद के मुताबिक आया?

मीसा आंटी के अचानक शहर से बाहर जाने का क्या राज है?

क्या अमन और रॉकी से आगे चलकर कोई बड़ी भिड़ंत होने वाली है?