*अध्याय 1: मेरा नाम - रुक्मिणी*
मेरा नाम रुक्मिणी है।
सिर्फ रुक्मिणी। इस नाम के आगे अभी कुछ नहीं लगा है। न किसी का गोत्र, न किसी का राज्य। बस रुक्मिणी।
लोग कहते हैं मैं विदर्भ की राजकुमारी हूँ। राजा भीष्मक की बेटी। महल में रहती हूँ, सोना पहनती हूँ, दासियाँ मेरे आस-पास रहती हैं। पर सच कहूँ, तो राजकुमारी होने का सुख मुझे कभी समझ नहीं आया।
राजकुमारी होने का मतलब क्या होता है? सुबह उठो, श्रृंगार करो, सभा में चुप रहो, और शाम को सुनो कि कौन सा राजकुमार तुम्हारे योग्य है। बस। इससे ज्यादा मेरी कोई कहानी नहीं थी।
मेरी पाँच सहेलियाँ थीं। हम आँगन में फूल तोड़ते थे। वो सब शादी के सपने देखती थीं। कहती थीं - मेरा पति ऐसा होगा, मेरा महल ऐसा होगा। मैं भी हाँ में हाँ मिलाती थी। पर सच में, मेरा मन कहीं और रहता था।
मुझे आसमान देखना पसंद था। खुला आसमान। विदर्भ का आसमान बहुत नीला होता है, जैसे अभी धुला हो। मैं घंटों उसको देखती रहती। सोचती थी - क्या उस आसमान में मेरे लिए भी कोई जगह है? जहाँ मुझे रुक्मिणी के नाम से जाना जाए, किसी की बेटी या किसी की होने वाली पत्नी के नाम से नहीं।
पिताजी मुझसे बहुत प्रेम करते थे। कभी-कभी अपने पास बिठाते, कहते - तू तो मेरी लक्ष्मी है। मैं खुश हो जाती। पर फिर सोचती - लक्ष्मी को भी तो अपना घर छोड़ कर जाना पड़ा था। क्या बेटी होना ही अपना घर छोड़ने का पाप है?
मेरा भाई रुक्मी मुझसे बड़ा था। बहुत घमंडी। वो हमेशा कहता था - रुक्मिणी, तू विदर्भ की इज्जत है। तेरी शादी ऐसे होगी कि पूरी दुनिया देखेगी। मुझे उसकी बातों में प्यार कम, सौदा ज्यादा लगता था। जैसे मैं एक हीरा हूँ, जिसे बेच कर उसे राज्य मिलेगा।
मैं चुप रहती। क्योंकि संत लड़कियाँ बोलती नहीं हैं, सुनती हैं। मैं संत थी। शुरू से।
शाम को जब महल में दिये जलते, तो मैं अपने कमरे में अकेले बैठती। दिये की लौ को देखती। लौ हमेशा हिलती रहती है, पर उसका काम बस जलना होता है। कोई उससे नहीं पूछता कि उसे हवा से डर लगता है या नहीं। बस जलना है। मैं भी उस दिये जैसी थी।
फिर एक दिन सब बदला।
नारद जी आए थे। पिताजी के मेहमान।
मैं पर्दे के पीछे खड़ी थी, जैसे राजकुमारियों को सिखाया जाता है। चुप, शांत। नारद जी हँस रहे थे, कहानियाँ सुना रहे थे। द्वारका की, एक लड़के की जो गोपियों के साथ खेलता है, जो बांसुरी बजाता है तो यमुना भी रुक जाती है।
उन्होंने नाम लिया - कृष्ण।
कृष्ण। कृष्-ण।
नाम छोटा था, पर पता नहीं क्यों, उस नाम को सुनते ही मेरे कान नहीं, मेरा दिल हिल गया। जैसे कोई बंद दरवाजा था अंदर, जो उस नाम ने खोल दिया।
मैंने उन्हें देखा नहीं था। न उनका रंग पता था, न रूप। बस एक नाम सुना था। पर उस एक नाम ने जो शांति मेरे अंदर थी, उसमें एक मीठा सा दर्द घोल दिया।
उस रात मैं छत पर गई। रोज जाती थी। पर उस रात आसमान अलग लगा। चाँद अलग लगा। मैंने चाँद से पहली बार कुछ माँगा।
मैंने कहा - अगर तू सच में सुनता है, तो मुझे उस नाम से मिला दे।
वो पहली बार था जब रुक्मिणी ने रुक्मिणी के लिए कुछ माँगा था। किसी राजकुमारी के लिए नहीं, किसी बेटी के लिए नहीं। बस अपने लिए।
और उसी रात से मेरी कहानी शुरू हुई। जो सिर्फ मेरी थी।
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*PATEL RJ*