संस्मरण
मामाजी के आँगन में
लगभग 40-42 साल पहले जब मैं प्रायमरी स्कूल में पढ़ता था, तब गर्मियों की छुट्टियाँ दो महीने की होती थीं। उस समय हर साल 30 अप्रैल को परीक्षा परिणाम निकलता था। तब आजकल की तरह सभी बच्चे पास नहीं होते, बल्कि कई बच्चे फेल भी हो जाते, तो कुछ को सप्लीमेंट्री मिलती थी, जिन्हें एक बार फिर से परीक्षा देने का मौका मिल जाता था।
मैं पढ़ाई-लिखाई में अपने भाई-बहनों से अपेक्षाकृत कमजोर परंतु ओवरआल ठीक-ठाक ही था। पासिंग मार्क्स तो ले ही आता था।
अप्रैल के दूसरे-तीसरे सप्ताह में परीक्षा खत्म होने के बाद से ही हम सभी बहुत एक्साइटेड रहते, क्योंकि 30 अप्रैल को हमें पूरे दो महीने के लिए नानी के घर जाना होता था। पूरे दो महीने तक दर्जनभर हमउम्र भाई-बहनों के साथ मौज-मस्ती, हँसी-ठिठौली, थोड़ी-सी पढ़ाई-लिखाई में कैसे बीतता, पता नहीं चलता। प्रति दिन किश्तों में दो ढाई घंटा हमें गौतम मामा और विमल भैया पढ़ाते भी थे। दोनों शिक्षक थे, पर कभी लगता नहीं कि हमें कोई शिक्षक पढ़ा रहे हैं। वह बस यूँ ही हँसते-हँसाते, मस्ती की पाठशाला होती थी।
सबके लिए उनकी हाइट के हिसाब से खाट होती थी। सब बच्चे दोपहर को बरामदे में और रात को आंगन में खुले आसमान के नीचे सोते थे।
एकदम समय पर हमारे नास्ते और खाने-पीने की जिम्मेदारी पहले लता मामी और पद्मिनी भाभी की होती थी। लगभग 20-22 लोगों के लिए रोटी या चीला बनाना आसान काम नहीं होता। इसलिए अक्सर नास्ते में पनपुरुवा रोटी या पोहा बनता। काम में मदद के लिए लता मामी अपनी छोटी बहन कला मौसी को भी बुला लेती थीं। वह हम सबकी बहुत केयर करतीं। मुझे तो बहुत बाद में पता चला कि वह हमारी सगी मौसी नहीं बल्कि विमल भैया की सगी मौसी हैं।
हमारे गौतम मामा हर साल 30 अप्रैल को अपने नियमित सेवक नारदमुनि को बैलगाड़ी के साथ सुबह ही भेज देते। नारदमुनि, जिसे हम सभी नारद भैया कहते थे, बहुत ही अच्छे और मजाकिया स्वभाव के थे। वे बुनगा (जिला-रायगढ़, मध्यप्रदेश अब छत्तीसगढ़) से निकलकर सबसे पहले हमारी मौसी के घर कनकतोरा (जिला-झारसुगड़ा, उड़ीसा) जाते। वहाँ से वे हमारे चार मौसेरे भाई-बहनों लेकर दोपहर हमारे घर नेतनांगर पहुंचते थे। लंच के बाद उन चारों भाई-बहनों के साथ हम तीन भाई-बहन (बड़े भैया बड़े हो गए थे, वे अपनी साइकिल से जाते थे) उनके साथ दो बजे तक बुनगा के लिए निकल जाते। अप्रैल महीने की गर्मी, धूप और उमस का हम पर कोई असर नहीं होता था। हालांकि बैलगाड़ी में धूप से बचाव के लिए नारदमुनि बढ़िया कवर किए रहते थे।
25 किलोमीटर की दूरी लगभग छः-सात घंटे में पूरी होती थी। कारण, रास्ते में पड़ने वाले आम, अमरूद, जामुन, तेंदू के पेड़। हमारी नज़रों से ऐसा कोई फलदार पेड़ नहीं छूटता था, जिसका फल हम सात भाई बहनों में से किसी ने भी डंडा या पत्थर मारकर न गिराया हो।
हम सभी भाई बहनों की उम्र 5 से 12 साल के बीच थी। उम्र में मैं चौथे नंबर का, पर शैतानियों में टॉप पर था। ननिहाल में सभी लोग मुझे 'फंदिया भाँचा' कहते थे, जिसका अभिप्राय है - 'झगड़ालू भांँजा'। आज भी जब ननिहाल जाता हूँ, तो वहाँ के गिने-चुने जीवित मामा लोग फंदिया भांचा कहकर ही बुलाते हैं।
सच कहूँ, तो बैलगाड़ी में किए गए वे सफर हम जीवनभर नहीं भूलेंगे।
- डॉ प्रदीप कुमार शर्मा
रायपुर, छत्तीसगढ़