Book Review - Manthra in Hindi Book Reviews by Sudhir Srivastava books and stories PDF | पुस्तक समीक्षा - मंथरा

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पुस्तक समीक्षा - मंथरा

पुस्तक समीक्षा
मंथरा काव्य संग्रह - सुधीर श्रीवास्तव 
                              
                              समीक्षक -संजीव कुमार भटनागर

सुधीर श्रीवास्तव कृत काव्य-संग्रह ‘मंथरा’ केवल कविताओं का संकलन नहीं, बल्कि भारतीय लोक-आस्था, सांस्कृतिक परंपराओं, मानवीय संवेदनाओं और समकालीन सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों का बहुआयामी साहित्यिक दस्तावेज़ है। 180 पृष्ठों में संकलित 106 कविताएँ कवि की व्यापक दृष्टि, अनुभव-संपन्न सोच और समाज के विविध पक्षों को शब्द देने की रचनात्मक क्षमता का परिचय कराती हैं। इस संग्रह में जहाँ भक्ति और पारिवारिक संबंधों की आत्मीयता है, वहीं सामाजिक विसंगतियों, राजनीतिक पाखंड और बदलते जीवन-मूल्यों पर तीखा व्यंग्य भी दिखाई देता है।
पुस्तक का समर्पण अपने सास-ससुर, श्री युगल किशोर श्रीवास्तव एवं श्रीमती युगल किशोर श्रीवास्तव को किया गया है, जो पारिवारिक सम्मान, आत्मीयता और कृतज्ञता की भावना को अभिव्यक्त करता है। लेखक परिचय, ‘लेखक के मन की बात’, कवयित्री कविता झा की विचारोत्तेजक भूमिका तथा श्री मोहन प्रकाश अष्ठाना की शुभकामनाएँ पुस्तक की पृष्ठभूमि को समृद्ध बनाती हैं। माँ शारदा की स्तुति से आरंभ होने वाला यह संग्रह पाठक को आस्था, विचार और जीवनानुभव की विविध राहों पर ले जाता है।
‘मंथरा’ में डॉ. सुधीर श्रीवास्तव का व्यक्तित्व एक संवेदनशील, जागरूक, आस्थावान और सामाजिक दायित्वों के प्रति सजग रचनाकार के रूप में उभरता है। उनकी दृष्टि केवल घटनाओं का वर्णन करने तक सीमित नहीं रहती, बल्कि उनके भीतर छिपे सामाजिक अर्थों और मानवीय प्रश्नों को भी तलाशती है। वे पारिवारिक रिश्तों की गरिमा को स्वीकार करते हैं, ईश्वर के प्रति समर्पण व्यक्त करते हैं, राष्ट्रप्रेम को महत्त्व देते हैं और साथ ही समाज में व्याप्त भूख, बेबसी, उपेक्षा, राजनीतिक अवसरवाद तथा नैतिक पतन पर प्रश्न उठाते हैं।
कवि की विशेषता यह है कि वे गंभीर विषयों के साथ हास्य और व्यंग्य को भी सहजता से साधते हैं। कहीं वे मनुष्य को आत्ममंथन के लिए प्रेरित करते हैं, तो कहीं व्यवस्था की कमजोरियों पर कटाक्ष करते हैं। उनकी कविताओं में आशा और निराशा, श्रद्धा और प्रश्नाकुलता, हास्य और करुणा का सह-अस्तित्व उनके जीवन-दृष्टिकोण की व्यापकता को दर्शाता है।
कविताओं का यह संग्रह विषयों की दृष्टि से अत्यंत विविध है। ‘जीते हैं शान से’ में जीवन और रिश्तों की उलझनों का चित्रण है, जबकि ‘किताब बन गए’ में पारस्परिक निर्भरता और संबंधों की बदलती प्रकृति की झलक मिलती है। ईश्वर के अस्तित्व की तलाश और आत्मसमर्पण से जुड़ी रचनाएँ आध्यात्मिक चिंतन को स्वर देती हैं। वृक्षारोपण पर आधारित कविता प्रकृति-संरक्षण की आवश्यकता को सामने रखती है, वहीं ‘रामराज्य’ कानून, न्याय और आदर्श शासन की अवधारणा को रेखांकित करती है।
दिव्यांग व्यक्ति के मन की व्यथा, भूख और बेबसी, माँ की उपेक्षा तथा जन्मदाताओं के प्रति भावनात्मक समर्पण जैसी रचनाएँ संग्रह के संवेदनात्मक पक्ष को मजबूत करती हैं। ‘आँचल में माँ की उपेक्षा’ और माता-पिता को समर्पित कविताएँ पारिवारिक मूल्यों के क्षरण पर विचार करने के लिए प्रेरित करती हैं। ‘बेटियाँ’, दोस्ती में दोस्ती की परिभाषा, आमंत्रण, उजियारा, संकल्प और एहसास जैसी रचनाओं में रिश्तों, आशाओं, आत्मीयता और जीवन की सकारात्मक संभावनाओं के विविध रंग दिखाई देते हैं।
      धार्मिक एवं सांस्कृतिक चेतना की दृष्टि से प्रभु श्रीराम, कैकेयी के कोप, आज के रावण और दशहरे पर विजय-पर्व से जुड़ी कविताएँ विशेष उल्लेखनीय हैं। इन रचनाओं में भारतीय पौराणिक परंपरा के प्रसंगों के माध्यम से समकालीन जीवन को समझने की संभावना दिखाई देती है। इस प्रकार संग्रह अतीत की सांस्कृतिक स्मृतियों और वर्तमान की चुनौतियों के बीच संवाद स्थापित करने का प्रयास करता है।
भूख, बेबसी और उपेक्षा से जुड़ी कविताएँ मानवीय पीड़ा को सामने लाती हैं, जबकि माता-पिता, बेटियों और मित्रता पर केंद्रित रचनाएँ संबंधों की आत्मीयता को रेखांकित करती हैं। कवि की विचार-सामग्री का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष सामाजिक विसंगतियों के प्रति उनकी सजगता है। ‘चुनावी वादा’, चुनाव-प्रक्रिया पर व्यंग्य, ‘ये बेचारे’ में दिशाहीन विपक्ष पर कटाक्ष तथा ‘जनता की आवाज़’ जैसी रचनाएँ राजनीतिक व्यवस्था और जनजीवन के अंतर्संबंधों की ओर ध्यान आकर्षित करती हैं। ‘हिंदुस्तान के गद्दार’ जैसी कविता राष्ट्र के प्रति निष्ठा के प्रश्न को सामने रखती है, जबकि स्वदेशी उत्पाद अपनाने का संदेश राष्ट्रीय आत्मनिर्भरता की भावना से जुड़ता है।
सबसे बडा झूठ में जैसी रचना के माध्यम से अच्छे कल की प्रतीक्षा, आत्मछल और आशावाद के बीच का द्वंद्व उभरता है। वहीं हास्यपरक कविताएँ जीवन की विडंबनाओं को हल्के-फुल्के अंदाज में प्रस्तुत करती हैं। इस प्रकार कवि गंभीर चिंतन और मनोरंजक अभिव्यक्ति के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास करते हैं।
डॉ. सुधीर श्रीवास्तव की भाषा सहज, संवादपरक और जनसामान्य से जुड़ने वाली प्रतीत होती है। उनके विषय दैनिक जीवन, पारिवारिक संबंधों, धार्मिक मान्यताओं और राजनीतिक परिस्थितियों से लिए गए हैं, इसलिए पाठक को उनसे जुड़ने में सहजता होती है। सरल शब्दावली और सीधे कथ्य के माध्यम से कवि अपने विचारों को पाठकों तक पहुँचाने का प्रयास करते हैं।
कमाल कविता में फोन के प्रयोग, चुनाव में चुनावी प्रक्रिया पर व्यंग्य तथा नेता और विपक्ष से संबंधित रचनाएँ समकालीन जीवन की विसंगतियों को उजागर करती हैं। दूसरी ओर, भक्ति और पारिवारिक विषयों पर लिखी कविताओं में भावनात्मक आत्मीयता प्रमुख है। इस विविधता के कारण संग्रह में एक ही प्रकार की संवेदना का एकाधिकार नहीं रहता।
शब्दों का चयन विषयानुकूल रखने और कथ्य को सरलता से प्रस्तुत करने का प्रयास कवि की संप्रेषणीयता को बढ़ाता है। तथापि, कविता की प्रभावशीलता केवल विषय की प्रासंगिकता पर नहीं, बल्कि बिंब-विधान, प्रतीकात्मकता, लय, शब्द-संयोजन और भावों की कलात्मक सघनता पर भी निर्भर करती है। 
साहित्यिक दृष्टि से ‘मंथरा’ की प्रमुख विशेषता इसकी विषय-विस्तृति और विधागत सहजता है। कवि ने व्यक्तिगत अनुभूतियों से लेकर सार्वजनिक जीवन की समस्याओं तक को अपनी रचनात्मक परिधि में समेटा है। उनकी कविताएँ पाठक को कहीं भावनात्मक रूप से जोड़ती हैं, कहीं हँसाती हैं और कहीं प्रश्न करने के लिए प्रेरित करती हैं।
        सांस्कृतिक स्तर पर राम, कैकेयी, रावण, दशहरा और माँ शारदा से जुड़े संदर्भ भारतीय परंपरा के प्रति कवि की आस्था को व्यक्त करते हैं। सामाजिक स्तर पर भूख, दिव्यांगजनों की व्यथा, पारिवारिक उपेक्षा, राजनीतिक वादों और जनसमस्याओं का उल्लेख समाज के प्रति उनकी जिम्मेदारी का परिचायक है। नैतिक दृष्टि से माता-पिता के प्रति सम्मान, मित्रता की गरिमा, सत्य की विजय, संकल्प, कृतज्ञता और राष्ट्रनिष्ठा जैसे मूल्य प्रमुखता से उभरते हैं।
संग्रह की सार्थकता इस बात में भी है कि यह पाठक को केवल मनोरंजन नहीं देता, बल्कि जीवन और समाज के प्रति अपने दृष्टिकोण पर पुनर्विचार करने का अवसर भी प्रदान करता है। डॉ. सुधीर श्रीवास्तव का काव्य-संग्रह ‘मंथरा’ भक्ति, पारिवारिक संवेदना, सांस्कृतिक चेतना, सामाजिक सरोकार और हास्य-व्यंग्य का बहुआयामी संकलन है। उनकी रचनाओं में आस्था के साथ प्रश्नाकुलता, संवेदना के साथ सामाजिक आलोचना और गंभीर चिंतन के साथ विनोद का समावेश दिखाई देता है।
‘मंथरा’ का मूल महत्त्व इसकी विषयगत विविधता और जनजीवन से जुड़े सरोकारों में निहित है। यह कृति पाठक को अपने परिवेश, अपने संबंधों और अपने नैतिक दायित्वों के प्रति सजग रहने का संदेश देती है।
                                                 लखनऊ उत्तर प्रदेश