जीवन इसी का नाम है
रामनाथ सिंह भिलाई स्टील प्लांट की सेवा से रिटायरमेंट ले चुके थे, रिटायरमेंट के बाद उन्हें बी.एस.पी से अच्छी खासी धन राशि मिली है .अपनी तीनों बेटियों की शादी उन्होंने अपने सेवाकाल में ही कर दी थी | अभी हाल फिलहाल उनकी कोई बड़ी जिम्मेदारी नहीं थी । बेटी लीला का बड़ा बेटा ओमप्रकाश उन्हीं के पास रह रहा है ,लीला के दूसरे बेटे के जन्म के समय रामनाथ की पत्नी शांति बेटी लीला की सेवा जतन के लिए दो माह तक वही रही थी ,तभी से ओमप्रकाश नानी से घुल मिल गया और अपने घर वापस आते समय वे ओमप्रकाश को अपने साथ ले आई थी । तब से ओमप्रकाश नानी नाना के पास ही रह रहा है ।
लीला को भी सहारे की जरूरत थी ,उससे भी दो बच्चों का काम नहीं सम्हलता था, मां के साथ ओमप्रकाश चला गया तो उसे भी थोड़ी राहत मिली, उसका काम का बोझा थोड़ा कम हो गया । यहां ओमप्रकाश नानी,नाना के पास मजे से रहता खेलता । थोड़ा बड़ा हुआ तो नाना ने उसे बी.एस.पी के स्कूल में भर्ती करवा दिया | वह पढ़ने लिखने में अच्छा था देखने में भी बड़ा सुंदर । ओमप्रकाश भी खुश और नाना रामनाथ, नानी शांति देवी भी खुश । उन्हें भी बुढ़ापे में एक सहारा मिल गया । अब रिटायरमेंट के समय ओमप्रकाश 12 वीं कक्षा में पढ़ रहा था ।
रामनाथ रिटायर हुये तो उन्हें बी.एस.पी से बहुत पैसा मिला उन्होंने मेंन रोड पर एक घर खरीद लिया ,घर भी उनके पति ,पत्नी व ओमप्रकाश के हिसाब से बड़ा था .घर के सामने जगह थी ,पीछे भी बाड़ी बहुत बड़ी थी ,बाड़ी में सिर्फ एक कुआ था ।
रामनाथ ने सामने की जगह में तीन दुकान बना ली और पीछे बाड़ी में तीन परिवारों के रहने लायक कमरे व रसोई घर बनवा लिये और किराये से सब उठा दिये । घर में किरायेदारों के आने से रौनक रहने लगी और दुकानों व घर के किराए से रामनाथ का घर खर्च निकलने लगा । उन्हें बुढ़ापे की चिंता बिल्कुल नहीं थी ,दिनभर घूमते शाम को पड़ोस में बुजुर्गों के पास बैठते रात को घर में खाना खाते और सो जाते कभी - कभी शौक से पी पा भी लेते थे ।
ओम प्रकाश भी स्कूल में पढ़ता , दोस्तों के साथ घूमता और कभी-कभी मौज मस्ती में पी लेता था । रामनाथ समझ भी जाते थे कि आज ओमप्रकाश मौज मस्ती करके आया है ,परंतु वे उसे टोकते नहीं थे, जानते थे आजकल लड़के मौज मस्ती करते हैं, सोचते यही तो मौज मस्ती करने के दिन है ।
बारहवीं करने के बाद ओमप्रकाश पढ़ने नहीं गया तो उन्होंने ओमप्रकाश को एक कंपनी में काम में लगा दिया और एक सुंदर लड़की से उसकी शादी भी कर दी । इस बीच ओमप्रकाश रोज पीकर आने लगा उन्होंने उसे समझाया भी ,कई बार लड़कों की संगत से दूर रहने के लिए मना भी किया ,परंतु वह अपने मन से चलता था, इसी बीच रामनाथ की पत्नी शांती की तबियत ख़राब रहने लगी । पत्नी शांति की बीमारी व बुढ़ापे को देखकर रामनाथ ने ओमप्रकाश की शादी सरिता के साथ कर दी थी । शांती को कई जगह दिखाया, घर में बहू सरिता ने उनकी बहुत सेवा की धीरे-धीरे वह कमजोर होती गई और एक दिन उन्होंने शरीर छोड़ दिया ।
अब घर की जिम्मेदारी सरिता पर आ गई ,नाना की देखभाल भी उसी को करनी थी ,खुद भी वह दो बेटियों की मां बन चुकी थी परंतु ओमप्रकाश की आदत नहीं सुधरी वह रोज पीने लगा और देर रात को घर आता था .सरिता जब पीने के लिए मना करती तो उससे झगड़ा करता ,कभी-कभी सरिता से मारपीट भी करता था। रामनाथ भी कई बार उसको समझा चुके थे परंतु ओमप्रकाश अपनी आदत से बाज नहीं आ रहा था ।
सरिता बहुत समझदार व होशियार महिला है, वह नाना ससुर की सेवा मन लगाकर करती थी, रामनाथ को भी बुढ़ापे में सहारे की जरूरत थी, पत्नी शांति की मौत के बाद से वे अकेलापन महसूस करते थे । ओम प्रकाश को उन्होंने प्राइवेट कंपनी में काम में लगा दिया था , ओमप्रकाश अपने पीने की आदत से लाचार था ,ना तो वह अपनी ड्यूटी ठीक से करता और ना ही घर की जिम्मेदारी निभाता ,बहू सरिता इन मामलों में ठीक थी , बच्चों की घर की जिम्मेदारी सम्हालते हुये भी वह ससुर रामनाथ सिंह का ख्याल रखती थी | दोनों कभी-कभी बहुत देर तक बातें करते रहते ,उनकी दवाई तथा खाने का वही ख्याल रखती थी ।
सरिता समझदार थी इसलिए उसने नाना ससुर से कहकर मकान व दुकानों में ओमप्रकाश को नामिनी बनवा लिया ,वह खुद तहसील ऑफिस गई सब कागज बनवाये व वसीयत नामा बनवाकर घर व दुकानों में ओमप्रकाश को नामिनी बनवा लिया ,वृद्ध ससुर को भी वह तहसील ऑफिस लेकर गई ।
इसी तरह बातों बातों में उसने ससुर से जान लिया कि उनके पास 10 लाख की एफ.डी.आर है तो एफ.डी की समयावधि पर उसमें भी ओमप्रकाश व खुद को नामिनी लिखवा लिया । नाना भी बहू सरिता की सेवा से खुश थे इसलिए कुछ नहीं बोले ,उन्होंने सब राजी खुशी लिख दिया ।
धीरे धीरे रामनाथ सिंह की आयु बढ़ती गई और ओमप्रकाश की पीने की लत भी बढ़ती गई, तो रामनाथ का मन भी ओम प्रकाश से हटता गया । ओमप्रकाश गैर जिम्मेदार होता गया जबकि उसकी दोनों लड़कियां बड़ी होती गई तो भी उसे इस बात की इतनी भी चिंता नहीं रहती थी । एक दिन बहुत पीकर आने पर वह सरिता से कहने लगा — “घर में पड़े - पड़े खाती रहती है कुछ करती धरती नहीं है” ।
सरिता बोली — “दिन भर पीकर आप पड़े रहते हो ,तुम पड़े - पड़े खाते हो या मैं पड़े - पड़े खाती हूं” ?
ओमप्रकाश – “मेरा घर है मैं कुछ भी करूं तू कौन होती है बोलने वाली” ?
सरिता — “ दारु पीने और घूमने के अलावा क्या करते हो ?नाना तक को कभी डॉक्टर को नहीं दिखाया ,ना बच्चों को देखते हो , सब मैं करती हूं” ।
ओमप्रकाश — “ये कोई काम है , मेरे घर में खायेगी और जरा सा काम करेगी तो दिन भर गायेगी ,निकल ,यहां से” इतना सुनते ही सरिता बोली — “आप निकलिये घर से” ।
इतना सुनते ही ओम प्रकाश भड़क गया और ओमप्रकाश घर से सरिता को निकालने लगा , दोनों एक दूसरे को घर से निकालने लगे ,सरिता ने ओमप्रकाश को धक्का देकर निकालना चाहा, इसी बात पर दोनों में बहुत मारपीट हो गई ,बूढ़े नाना ससुर ने दोनों को समझाने की बहुत कोशिश की परंतु कोई असर नहीं हुआ । सरिता को कई जगह चोटें आ गई थी ,वह गिर गई थी घुटने में ज्यादा ही चोट लगी थी ,इस से वह दुखी थी ।
सुबह उठकर वह सीधे थाने गई और थाने में उसने ओमप्रकाश के खिलाफ रिपोर्ट लिखवा दी ,तो थाने से दो कांस्टेबल ओमप्रकाश को पूछते, खोजने घर आ गये , रामनाथ को इस बात पर बहुत दुख हुआ वे सरिता से बोले —“ तुम्हें थाने में रिपोर्ट नहीं लिखवानी चाहिए थी” ।
सरिता — “नाना जी ,मैं भी इंसान हूं इनकी आदतों से मैं बहुत दुखी रहती हूं ,ना तो घर का कोई काम करते हैं , ना ही आपकी सेवा करते है , ना ही बच्चों को देखते हैं । आपके कहने का भी इन पर कोई असर नहीं होता है, यह पुलिस से ही सुधरेंगे, जब डंडे पड़ेंगे तभी समझेंगे” ।
परंतु रामनाथ को ,सरिता की यह बात अच्छी नहीं लगी । पुलिस ओमप्रकाश को पकड़ कर ले तो गई फिर समझा बूझाकर छोड़ दिया । रामनाथ ने ओमप्रकाश व सरिता दोनों को समझाया कि घर की बातें बाहर नहीं जाना चाहिए और थाने में तो कतई नहीं जाना चाहिए परंतु सरिता जवानी के जोश में आ गई ,अब वह ओमप्रकाश को सहन करने के मूड में नहीं थी फिर भी ससुर का लिहाज करके चुप रह गई ।
सरिता के रौद्र रूप को देखकर व सरिता के थाने जाने की घटना से रामनाथ सिंह दुखी रहने लगे कि घर की बातें बाहर नहीं जानी चाहिए परंतु थाने में जाकर ओमप्रकाश की शिकायत करने से और पुलिस के कांस्टेबिलो द्वारा ओमप्रकाश को थाने ले जाकर चमकाने, धमकाने से सरिता का मनोबल बढ़ गया । अब वह ओमप्रकाश से दबती नहीं थी , उस पर अपना नियंत्रण रखती थी। नाना के पैसों का हिसाब किताब व दुकान मकान के किराये के पैसों का हिसाब रखने लगी थी । नाना की सेवा में वह कोई कमी नहीं रखती थी ,उसे समझ आ गया था कि नाना ही घर की धुरी है ।
रामनाथ अब उमर से लाचार हो चले थे, उन्हें अस्थमा रहता था ,रात - रात भर खांसते रहते थे ऐसे में सरिता ही नाना के पास बैठती थी ,उनकी सेवा करती थी अब लड़कियां भी बड़ी हो गई थी, सीता गीता दोनों पढ़ने लिखने में होशियार थी. गीता 12 वी में सीता 10 वी में मेरीट लिस्ट में पास हुई थी ,दोनों बेटियां अब घर काम में भी सहारा देती थी । परंतु ओमप्रकाश को घर से कोई मतलब नहीं था ।
नाना की बीमारी बड़ती गई ,धीरे धीरे वे कमजोर होते गये, अब नाना की अलमारी की चाबी भी सरिता के हाथ में आ गई । सरिता के शादी के जेवर तो सरिता के पास ही थे, अब नानी सास के जेवर भी उसके कब्जे में आ गये । अलमारी की चाबी मिलते ही नाना के पूरे सामान की वो मालकिन हो गई ।
नाना को अस्थमा का अटैक आया तो दो तीन दिन की गंभीर बीमारी में ही नाना जी संसार से विदा ले गये. नाना जी के मरने का समाचार सुनकर उनकी तीनों बेटियां लीला , शकुंतला व कलावती आ गई । तेरहवीं कार्यक्रम के पूर्व ही तीनों बहनों को मां के जेवर कहां है ?पिता जी का कितना पैसा है ? कहां है ? सब पता साजी करती रही । लीला को तो ज्यादा चिंता नहीं थी परंतु इस मामले में शकुंतला व कलावती की ज्यादा उत्सुकता थी ।उन्होंने सरिता से पूछा — “मां के जेवर कहां है” ?
सरिता बोली — “यह अलमारी की चाबी” , उसने अलमारी की चाबी दे दी , बेटियों ने अलमारी खोली उसमें कुछ नहीं मिला ।
कलावती कहने लगी —“ मां के पास दो हार थे ,एक गुलबंद था गले में वे जंजीर पहनती थी ,बाबू जी के जंजीर, मां के कंगन ,सोने की चूड़ियां व अगूंठी सब कहां है” ?
सरिता बोली — “मुझे कुछ नहीं मालूम यह चाबियां है, आप लोग खोलें और । देखिये, कहाँ है? जेवर, इस बारे में नानी और नाना ही जानेंगे क्या था और क्या नहीं” ? यहां अलमारी में तो कुछ भी नहीं है ।
कलावती बोली — “पापा का पैसा बैंक में था, उनके एफ. डी. आर .कहां पर है” ?
सरिता बोली — “दस लाख का एफ. डी. आर है उसमें मैं व ओमप्रकाश नामिनी है” ।
कलावती भी बहुत होशियार थी ,उसने पिता के नाम के एफ.डी.आर का बैंक में पता किया तो पता हुआ रामनाथ के नाम पर दो एफडीआई है, एक 10 लाख का ,एक 5 लाख का ,5 लाख के एफ.डी.आर के बारे में सरिता को पता नहीं था ,जैसे ही उसे पता चला उसने बैंक में मैनेजर के नाम पत्र लिखकर पेमेंट न करने का आवेदन बैंक में ओमप्रकाश के नाम से दे दिया ।
कलावती बोली – “यह 15 लाख के एफ.डी.आर . का पैसा हम तीनों बहनों को मिलना चाहिये” ।
सरिता बोली — “आप लोगों को क्यों मिलना चाहिए ? सेवा मैं करूंगी, पैसा तुम रखोगी ? यह कहां की बात हुई” ?
कलावती बोली — “घर, दुकान ,पीछे की किराये वाले घर ,बाड़ी सब तुम ही रखोगी तो हम बेटियों को नगद के पैसे दे दो । घर में तुम लोग रहो हम उसमें हिस्सा नहीं मांगती है” ।
सरिता ने एकदम मना कर दिया – “मैं एक पैसा नहीं दूंगी ,नाना ने मुझे व ओमप्रकाश को नामिनी बनाया है, मैं कुछ भी नहीं दूंगी” ।
पिता की तेरहवीं के बाद कलावती ने पड़ोसियों को बुलाकर मीटिंग भी की , मीटिंग में पड़ोसियों ने कहा -कि —“जिस एफ. डी .आर. में रामनाथ ने किसी को नामिनी नहीं बनाया है, उस एफ.डी.आर का पैसा तीनों बहनों में बांट देना चाहिये” ।
सरिता बोली — “क्यों बटेंगे ? सेवा और बीमारी में तेरहवीं में खर्च मैं करूंगी और पैसा इन्हें क्यों दूंगी” ?
पंचायत ने कहा — “उसमें एक हिस्सा तो तुम्हारी सास को भी तो मिलेगा” ।
सरिता बोली — “सास को मिलेगा वो थोड़े ही मेरे को मिलेगा, वो पैसा वो रखेंगी ,मैं नहीं दूंगी” ।
पंचायत के लोगों ने कहा — “अच्छा तो उस पांच लाख वाले एफ. डी.आर के चार हिस्से कर लो ,एक हिस्सा तुम भी रख लो” ।
सरिता इस पर भी सहमति नहीं हुई. कलावती दो माह तक अपने घर का काम धाम छोड़कर यहां रही परंतु उसकी कहीं भी दाल नहीं गली ।
कलावती तहसील ऑफिस में गई, वहां उसने मकान और दुकान में अपना व बहनों का नाम डलवाने का भी बहुत प्रयास किया कलावती का कहना था कि रामनाथ की हम बेटियां है, प्रॉपर्टी में हमारा हक है, हमारा नाम आना चाहिए परंतु वहां भी उनका काम नहीं बना । वसीयतनामे में रामनाथ ओमप्रकाश का नाम लिखवा चुके थे ।
तेरहवीं के बाद सरिता ने कलावती को घर से खाना देना भी बंद कर दिया तो कलावती अपना राशन लाकर बनाकर खाना खाने लगी । घर में सरिता से पैसों को लेकर झगड़ा भी हुआ । सरिता ने उन्हें एक पैसा भी नहीं लेने दिया | कलावती व तीनों बहनों की इच्छा थी कि घर तो हम उठा कर ले नहीं जा सकते ,माँ के जेवर पिता के एफ.डी.आर. में से हमें भी कुछ हिस्सा मिलना चाहिए ,परंतु सरिता शेरनी की तरह डटी रही, उसने तीनों बहनों को धीरे-धीरे खिसका दिया और तीनों बहने खाली हाथ वापस चली गई । समय रहते सरिता ने अपनी स्थिति मजबूत बना ली थी ,सब पेपर ठीक करवा लिये थे इसी का उसे फायदा मिला ।
इसी बीच गीता पी. ई. टी परीक्षा में पास हो गई और रायपुर में सरिता ने गीता का बी.ई कालेज में दाखिला करवा दिया ।
ओमप्रकाश अपने पीने की आदत से लाचार था ,उनके पीने में कोई फर्क नहीं पड़ा ,वह पीकर जहां-तहां पड़ा रहता था ,धीरे-धीरे दारू ने उन्हें पीना शुरू कर दिया, लगातार उसकी तबीयत खराब रहने लगी, शक्ल सूरत भी ज्यादा पीने के कारण खराब होती गई , नाना रामनाथ की मौत के चार बरस बाद ,जवान ओमप्रकाश की भी मृत्यु हो गई ।
दोनों बेटियां गीता और सीता समझदार थी, मां सरिता को उनका सहारा रहता था | गीता बी. ई .करने के बाद किसी कम्पनी में काम करने लगी थी । सरिता दुकानों व मकान के किराये से अपना घर खर्च चला लेती थी और अब तो बेटी भी काम पर जाने लगी थी | अपने अदम्य साहस से वह हर परिस्थिति से संघर्ष करती रही और एक – एक समस्या को पार कर के रास्ते बनाती रही | इस संघर्ष के बीच उसे मान , अपमान ,निंदा व आलोचनाओ का शिकार होना पड़ा जो हमारे समाज की अपनी धारणाओं के अनुसार होना स्वाभाविक है परन्तु अपनी सूझ – बूझ व साहस से सरिता सदैव आगे बढती रही | जीवन इसी का नाम है |
छत्तीसग़ढ रत्न
डॉ. शिरोमणि माथुर
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