Rishte ki bat in Hindi Love Stories by Dr. Pradeep Kumar Sharma books and stories PDF | रिश्ते की बात

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रिश्ते की बात

रिश्ते की बात

समय कभी रुकता नहीं है। वह अपनी रफ़्तार से निरंतर चलते रहता है। कमल जी को पता ही नहीं चला कि कभी उनकी हथेली में खेलने वाली बेटी नेहा शादी के लायक हो गई है। इतना जरूर है कि उनकी श्रीमती जी बार-बार उन्हें याद दिलाती रहतीं कि अब अपनी लाड़ली के लिए एक अच्छा वर-घर देखना शुरू कर दो, पर कमल जी हमेशा मजाक में टाल देते कि नेहा अभी शादी के लायक छोटी है। अभी-अभी तो उसकी नौकरी लगी है। कुछ दिन तो उसे चैन से नौकरी करने दो। हां, रमेश कुमार जी के यहां से रिश्ता आने पर वे टाल न सके।
आज लड़के वाले नेहा को देखने उसके घर आने वाले थे । लड़का शहर के सबसे प्रतिष्ठित समाजसेवी और धनाढ्य लोगों में शुमार रमेश कुमार जी का इकलौता बेटा डॉ. दिनेश कुमार था । डॉ. दिनेश कुमार की गिनती भी शहर के अच्छे उभरते हुए डॉक्टरों में होती थी । पंडित जी ने जब रिश्ते की बात छेड़ी, तो नेहा के पिता कमल जी को पहले तो अपनी कानों पर विश्वास ही नहीं हुआ, पर जब पंडित जी ने बताया कि "कमल जी, डॉ. दिनेश कुमार और आपकी नेहा बिटिया स्कूल के दिनों में में एक साथ पढ़ चुके हैं और एक दूसरे को अच्छे से जानते-पहचानते हैं । रमेश और उनकी पत्नी सुभद्रा जी नेहा बिटिया को नगर पालिका के गार्डन में लोगों को सुबह-सुबह योगा सिखाते हुए पहले ही देखकर पसंद कर चुके हैं । यदि आपकी अनुमति हो, तो वे लोग रिश्ते की बात करने के लिए अगले इतवार को आपके घर आना चाहते हैं ।" 
कमल जी पहले तो मारे खुशी के उछल पड़े कि उनकी बेटी के लिए इतने बड़े परिवार से रिश्ता आया है, पर वास्तविकता का अहसास होते ही उन्होंने पंडित जी से कहा, "पंडित जी, आपसे तो हमारी हैसीयत छुपी हुई नहीं है । रमेश जी कहाँ राजा भोज और मैं कहाँ गंगू..."
पंडित जी ने उन्हें आश्वस्त किया, "कमल जी, मैंने रमेश जी और उनकी पूरी फैमिली को आपके बारे में सारी बता स्पष्ट रूप से बता दी है । वे लोग दान-दहेज़ के सख्त खिलाफ हैं । भगवान का दिया हुआ सब कुछ है उनके पास । मेरा उनके घर में तब से आना-जाना है, जब दिनेश जी का जन्म भी नहीं हुआ था । रमेश जी की शादी में मेरे पिताजी ही पुरोहित थे । रमेश जी की पत्नी सुभद्रा जी भी एक साधारण परिवार से ही हैं । मैं कई बार सुभद्रा जी के घर पूजा-पाठ के सिलसिले में जा चुका हूँ ।"
"ठीक है पंडित जी, यदि ईश्वर ने चाहा और आपका आशीर्वाद रहा, तो नेहा बिटिया की तो जीवन ही संवर जाएगी । हमारी ओर से आप उन्हें अगले इतवार को आने का न्योता दे दीजिएगा ।" कमल जी ने दोनों हाथ जोड़कर कहा । 
"ठीक है कमल जी, मैं उन्हें अगले इतवार की दोपहर के ठीक तीन बजे लेकर आपके घर पहुंचता हूँ ।" कहकर पंडित जी ने उनसे विदा ली ।
निर्धारित दिन कमल, उनकी पत्नी कमला और बेटा-बहू ने लड़के वालों की खातिरदारी की पूरी तैयारी कर ली । कई तरह के पकवान और मिठाइयां बना लीं साथ ही कुछ मिठाइयां और स्नेक्स वगैरह बाजार से भी मंगवा लीं। घर को दुल्हन की तरह सजा लिया था ।
पंडित जी रमेश कुमार, सुभद्रा और डॉ. दिनेश को लेकर दोपहर को ठीक तीन बजे उनके घर पहुँच गए । थोड़ी देर की औपचारिक बातचीत के बाद सुभद्रा जी ने कहा, "भाई साहब, हमें आपकी नेहा बिटिया बहुत पसंद है । हम तो बस बिटिया का हाथ मांगने आए हैं। पसंद तो हम उसे पहले ही कर चुके थे। यदि आप लोगों को भी हमारा बेटा दिनेश और परिवार पसंद हो, तो हम लोग शादी की बात आगे बढ़ा सकते हैं ।"
"अहो भाग्य हमारे सुभद्रा बहन, हमारी बेटी आपके परिवार की बहू बनेगी, इससे बड़ा और हमारा क्या सौभाग्य होगा ?" लड़की की मां कमला ने कहा ।
"सौभाग्य तो हमारा होगा कमला बहन । आप लोगों ने अपनी नेहा बिटिया को अच्छी शिक्षा और सु-संस्कार की श्रृंगार से ऐसा सजाया है कि आज पूरा शहर उसके सदगुणों का कायल है । नेहा बिटिया इस नगर की सबसे प्रतिष्ठित स्कूल में एक शिक्षिका के रूप में सेवा देते हुए भी रोज सुबह 5 बजे से नगर पालिका गार्डन में लोगों को नि: शुल्क योग प्रशिक्षण देकर जो पुण्य कमा रही है, हम उसका क्या बखान करें ? अब तो हमारा डॉक्टर बेटा दिनेश भी अपने मरीजों को रोज सुबह नगर पालिका के गार्डन में जाकर योग सीखने और योगाभ्यास करने की सलाह देने लगा है ।" दिनेश के पिता रमेश जी ने कहा ।
"जी... जी... वो..." कमला जी कुछ कहना चाहती थीं। 
कमला जी की बात काटते हुए सुभद्रा जी ने कहा, "कमला जी, आप बिलकुल भी चिंता मत करिए । हमें नेहा बिटिया की वह शर्त भी मंजूर है कि शादी के बाद भी वह अपनी स्कूल की नौकरी और नि:शुल्क योग प्रशिक्षण जारी रखेगी । यह बात हमें इसलिए मालूम है क्योंकि नेहा बिटिया योगा सिखाते समय अक्सर कहती है कि वह प्रशिक्षण कार्य शादी के बाद भी जारी रखेगी।"
"बहन जी, आपने तो मेरे मन की बात पढ़ ली ।" कमला जी ने मुस्कुराते हुए कहा ।
"तो फिर हम ये रिश्ता पक्का समझें बहन जी  ?" लड़के के पिता रमेश जी ने पूछा।
"भाई साहब, आप तो हमें अच्छे से जानते हैं । हमारी हैसियत आपके मुकाबले... हम तो आपके सामने खड़े होने के लायक भी नहीं...  फिर भी यदि लेन-देन की बात भी तय हो जाती तो..." लड़की के पिता कमल जी ने किसी तरह से हिम्मत जुटाकर कहा ।
"क्या भाई साहब, आप कौन-सी दुनिया में रहते हैं ? आज लड़कियां चाँद पर पहुँच गईं, बड़े-बड़े जहाज उड़ा रही हैं और आप अठारहवीं सदी में ही अटके पड़े हैं ?" रमेश जी ने उत्साह के साथ कहा ।
"वो तो ठीक है भाई साहब, पर दुनियादारी भी तो निभानी होगी न । जैसा कि समाज में दूसरे लोग..." 
कमल कुमार की बात काटते हुए रमेश जी ने कहा, "दूसरे लोग क्या करते हैं और क्या नहीं करते, हम और हमारे परिवार के लोग उस पर बिलकुल भी ध्यान नहीं देते हैं। ईश्वर की कृपा और पूर्वजों के आशीर्वाद से हमारे घर किसी भी चीज की कोई कमी नहीं है । मेरा व्यवसाय और बेटे की प्रैक्टिस दोनों बहुत ही अच्छे से चल रहे हैं । हमें कमी है तो बस नेहा बिटिया जैसी एक सुंदर, सुसंस्कृत बहू की, जिसकी पूर्ति आप लोग कर सकते हैं ।"
"हां भाईसाहब... पर..." कमल जी कुछ कहना चाह रहे थे।
"भाई साहब, पर वर कुछ नहीं । यदि और कोई बात नहीं है तो आप, बहन जी, नेहा और उसके भैया-भाभी सब लोग एक बार हमारे घर पधारिए । सब कुछ देख कर ही बताइए कि यह रिश्ता आपको मंजूर है या नहीं ? और हां, यदि कोई ऐसी चीज जो हमारे घर न दिखे, तो हमें बेहिचक बता दीजिएगा, ताकि हम उसे पूरा करने की कोशिश करेंगे ।" रमेश जी ने कहा ।
"भाई साहब, हमारी ये मजाल नहीं कि हम आपके घर आकर कोई कमी निकाल सकें ।" कमल जी ने हाथ जोड़कर कहा ।
"मजाल वाली बात नहीं है भाई साहब । हम तो लड़के वाले हैं । हम आपके घर आए हैं माँगने के लिए । वह भी कुछ ऐसा-वैसा नहीं, आपके जिगर का टुकड़ा । हमने भी अपनी बेटी ब्याही है । हमें अच्छे से पता है कि अपनी बेटी के लिए एक योग्य वर-घर की तलाश के क्या मायने होते हैं ? आप सबका और नेहा बिटिया का तो हक बनता है उस घर को देखने का, जहां वह शादी के बाद रहने वाली है । वर तो आपके सामने बैठा ही है । एक ही शहर के होने से हम लोग भी सर्वथा अपरिचित नहीं हैं ।" रमेश जी बोले ।
"क्या भाई साहब, आप तो लगे हमारी खिंचाई करने... शादी के पहले बेटी ससुराल देखने जाए... ऐसे तो लोग..." कमल जी ने सकुचाते हुए कहा ।
"कमल जी, आप फिर से लोगों की परवाह करने लगे । समय के साथ हम लोगों को भी अपनी सोच को बदलना जरूरी है । क्या हमारे और आपके दादा जी अपनी शादी के समय लड़की देखने गए थे ? नहीं न ? लेकिन हम तो गए थे न । आप भी गए ही होंगे ? तो अब हमारी बेटियां अपना भावी वर और घर देखने के लिए क्यों न जाएं, जहां कि उनको अपना पूरा जीवन बितानी है ?" रमेश जी ने कहा ।
"हूँ... भाई साहब, बात तो आपकी सौ टका सही है ।" कमल जी ने भी उनकी बात पर हामी भरते हुए कहा ।
"तो फिर कब पधार रहे हैं आप लोग हमारे घर ?" रमेश जी ने पूछा ।
"आज... बल्कि अभी... क्योंकि यदि आज नहीं जा सके, तो हम सबको फिर से इकठ्ठे होने के लिए अगले सन्डे का इंतजार करना होगा ।" इस बार कमला जी ने कहा ।
"तो फिर चलें, शुभस्य शीघ्रम ।" रमेश जी ने उत्साहित होकर कहा । 
"हाँ, पर मेरी एक शर्त है भाई साहब ?" कमल जी ने कहा ।
"शर्त ... कैसी शर्त ?" रमेश जी ने आश्चर्यचकित होकर पूछा । शर्त की बात सुनकर सब लोग कमल जी की ओर देखने लगे थे  ।
"मेरी शर्त बस यही है कि नेहा बिटिया और दिनेश जी का रिश्ता तय होने की खुशी में मिठाई खिलाकर ही हम यहाँ से आपके घर की ओर निकालेंगे समधी जी ।" कमल जी ने मुस्कुराते हुए सुरेश जी को मिठाई खिलाई  ।
अपने-अपने पिता जी को खुशी-खुशी आपस में गले मिलते देखते हुए नेहा और दिनेश की एक बार फिर आँखें चार हुईं और उन्होंने नजरें झुका लीं  ।

- डॉ. प्रदीप कुमार शर्मा
रायपुर, छत्तीसगढ़