wo Baarish aur Hum Tum in Hindi Love Stories by Jigar Ashok Pandya books and stories PDF | वो बारिश और हम तुम

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वो बारिश और हम तुम


रास्ते से जा रहा था कि अचानक ही बारिश शुरू हो गई। छाता तो लिया नहीं था, क्योंकि अभी मौसम पूरा अपने रंग में नहीं आया था।

लेकिन इस बार बूँदें ज़ोरों पर थीं, जैसे किसी से बहुत गुस्सा हो और उसी गुस्से में टूट पड़ी हों।

समझदारी इसी में थी कि कहीं किसी शेड के नीचे सहारा लिया जाए, जब तक बारिश का गुस्सा शांत होकर प्यार से रिमझिम बरसने न लगे।

सामने एक चाय की टपरी थी, जिसे ताड़पत्री और प्लास्टिक से चारों तरफ़ से ढका गया था।

वाह! बारिश हो और गरमा-गरम चाय हो... मज़ा आ जाए!

मन वहीं मुड़ गया। झट से दौड़कर टपरी में जा खड़ा हुआ।

बालों से लेकर गालों तक पानी सरक-सरककर जिस्म के अंदर उतर रहा था।

वहाँ कोई और नहीं था। चाय वाला भी दिखाई नहीं दे रहा था।

पानी से भरे बर्तन और खाली टपरी के बीच मेरी नज़रें उसे इधर-उधर ढूँढ रही थीं।

अचानक छन-छन करती हुई एक लड़की भागती हुई आई और सीधे नीचे ज़मीन पर जमा पानी के ऊपर पैर से जंप मार दी।

पचक!

छींटे मेरे पैंट पर भी आकर पड़े।

“ओफ्फ...!”

कुछ कहने के लिए उसकी तरफ़ देखा तो...

वो सफ़ेद कुर्ता-पायजामा पहने थी, जो आधा गीला और आधा सूखा था।

उसका दुपट्टा सिर पर ओढ़ा हुआ था, लेकिन बारिश ने फिर भी अपना कमाल दिखाते हुए उसकी ज़ुल्फ़ों को गीला कर ही दिया था।

साइड फेस उसके बालों से ढका हुआ था और पानी की बूँदें उनमें शीशे पर फिसलती बूँदों की तरह ऊपर से नीचे सरक रही थीं।

वो अपने आपको पोंछ रही थी और ठंड से सिकुड़ते हुए उस छोटी-सी टपरी में खुद को संभाल रही थी।

फिर उसने अपनी ज़ुल्फ़ें झटकीं और पीछे की ओर कर दीं।

बस...

उन ज़ुल्फ़ों का हवाओं से बातें करते हुए पीछे की ओर जाना, हवा का उसके गीले बालों की बूँदों को छेड़ना और फिर उन बूँदों को बालों से जुदा करके मेरी ओर मोड़ देना...

कुछ ऐसा लगा जैसे उन बूँदों ने मेरे गालों से मिलने का बहाना ढूँढ लिया हो।

उफ़्फ़... ये खूबसूरती! ऐसा लग रहा था जैसे साँस लेता हुआ चाँद मेरे बिल्कुल बाजू में आ गया हो।

बारिश उसे भिगो रही थी और मुझे अब वही बारिश जला रही थी।

उसका जिस्म ठंड के मारे काँप रहा था, तो मेरा शरीर जैसे बिजली लगी हो, हर गिरती बूँद के साथ जल रहा था।

पीछे से आवाज़ आई—

“चाय बनाऊँ? एकदम कड़क, गरमा-गरम?”

“हाँ।”

मैं मुस्कुराया।

बात करने का मौका छोड़ना नहीं चाहता था, इसलिए उसकी तरफ़ देखते हुए पूछ लिया—

“आप पिएँगी?”

उसने आसमान की ओर देखा, जैसे बारिश का अंदाज़ा लगा रही हो।

लड़की है भाई... सीधा और तुरंत जवाब थोड़ी देती है!

फिर उसने धीरे से सिर हिलाया।

मैंने चाय वाले से कहा—

“भाई, दो स्पेशल बना ना।”

“बहुत बारिश है... तेज़, एकदम तेज़। और कुछ लोग तो उनसे भी तेज़ हैं आने में।”

उसने मेरी ओर देखा।

“वो... पाँव फिसला और संभलने के लिए जंप लगानी पड़ी, तो पानी थोड़ा-सा उड़ गया।”

मैंने कहा—

“It's okay.”

सॉरी न बोलने के अलग-अलग तरीके कोई इनसे ही सीखे।

चाय वाले के चूल्हे में आग जल चुकी थी और यहाँ हमारी बात भी शुरू हो चुकी थी।

बात आगे बढ़ानी थी, सो मैंने पूछ लिया—

“कहीं इंटरव्यू के लिए आई थीं?”

“नहीं।”

शॉर्ट एंड स्वीट आंसर।

वैसे भी उसके हाथों में कोई फाइल या प्रोफाइल नहीं थी।

“ओह... यहाँ कहीं काम कर रही हो क्या? मैं तो काम की तलाश में यहाँ आया था।”

चाय वाले ने पानी में चाय की भुक्की डाली, लेकिन पानी को उबलने में अभी वक्त था।

“नहीं।”

इस बार आवाज़ थोड़ी स्ट्रॉन्ग और बुलंद थी।

चाय वाले ने अदरक कूटकर चाय में डाल दी।

“ओके... ओके।”

अगर अब इस बारे में आगे पूछा, तो ‘नहीं’ की जगह सीधा ‘तुमसे मतलब?’ आ सकता था। इसलिए फुल स्टॉप।

“आपका ड्रेस पीछे से थोड़ा गंदा हो गया है।”

सहानुभूति ही समझदारी है—ये सोचकर मैंने कह दिया।

“सच! उफ़... मैंने कहा था दोस्तों को सफ़ेद पहनकर निकलना रिस्क होगा बारिश में। पर वो लोग बस ‘वाइट में चाँदनी बनकर घूमने का स्टाइल है’ कहकर जबरदस्ती मजबूर कर रहे थे।”

ओह...

चाय उबलने लगी।

“हाँ, सही... चाँद बने हो तो दाग तो थोड़ा होगा ही। और काला टीका चाँद पर इसलिए होता है कि उसे किसी की नज़र न लगे।”

इस बार लंबी डायलॉग मार दी।

वो भी हँस दी।

इस बार दिल से हँसी आई थी।

मुँह मोड़कर हँस रही थी।

वो नीचे देख रही थी और मैं उसे वहाँ पानी से बने आईने में चुपके से देख रहा था।

चाय के उबलने की खुशबू चारों तरफ़ फैल रही थी।

चाय वाले ने दूध डाल दिया।

“इस मौसम में घूमने का मज़ा ही और है ना?”

मैंने कहा।

“हाँ। बारिश में सारा समाँ बदल जाता है। हर तरफ़ हरे-हरे पेड़-पत्ते, जैसे खुशियाँ मना रहे हों। हमें बुला रहे हों—आओ, मेरे साथ झूमो, नाचो। सारी चिंता छोड़कर बस एक दिन इनके साथ घूमना अच्छा लगता है।”

फिर उसने मेरी तरफ़ देखकर पूछा—

“तुम्हें नौकरी मिली?”

“नहीं। अभी बस इंटरव्यू दिया है। होप है मिल जाए।”

“मिल जाएगी। उन्हें ज़रूरत है लोगों की।”

“तुम्हें कैसे पता?”

मैं आश्चर्यचकित होकर उसके कॉन्फिडेंस को देखता रहा।

उसने मुस्कुराकर कहा—

“हम चार लड़कियों ने एक साथ नौकरी छोड़ी थी। वहाँ आज पेमेंट लेने आए थे। आज़ादी एन्जॉय करनी थी और तुम्हारे पीछे से ही मैं निकली। लेकिन बारिश की वजह से यहाँ रुकना पड़ा।”

सफ़ेद दूध, चाय और पानी तीनों घुलकर एक अलग ही रंग बनाते हैं... वैसे ही इस सफ़ेद चाँद ने मुझसे बातें करते-करते मेरे सामने एक अलग ही दुनिया बना दी थी।

“साहब, चाय लो।”

आवाज़ आई।

दोनों के हाथों में चाय आ गई।

गरम धुआँ ऊपर उठ रहा था और मेरे दिल में कई ऐसे सवाल जाग रहे थे, जिन्हें पूछना ज़रूरी लग रहा था।

लेकिन उसने मेरी बेचैनी समझ ली।

“ज़्यादा सोचो मत। वहाँ स्कोप है। कल वो सामने वाली बिल्डिंग में आ जाना। वहीं हम लोग काम करते हैं। तुम्हारे बारे में बात करूँगी।”

दोनों की नज़रें मिलीं।

आँखों में मस्ती थी।

दोनों के हाथ एक साथ उठे और चाय की पहली चुस्की हम दोनों ने एक साथ अपने होंठों से लगा ली।

एक नया सफ़र...
नया साथी...
नया मौसम...
नई मंज़िल...
नई उम्मीद...

और चाय की प्याली में उभरता हुआ नया स्वाद...

शायद... प्यार। ❤️


                               ✍🏻 जिगर अशोक पंड्या