DASTAN-E-KARB भ्रम से परे क्या है? in Hindi Drama by Azoorey books and stories PDF | DASTAN-E-KARB - भ्रम से परे क्या है? - Chapter 5 Scene 6

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DASTAN-E-KARB - भ्रम से परे क्या है? - Chapter 5 Scene 6

"घोड़े तयार है साहब?" मैदान के पास थोड़ी दूर पर खड़े हुए मुंशीजी ने कबीर को मैदान से आता देख, तांगे के पास खड़े घोड़ा चरवाहा से तसल्ली लिया

"हां मुंशीजी तयार हो गए है।" उसने जानकर अपनी आवाज़ ऊंची रखा

उसकी आवाज़ मुंशीजी के साथ साथ कबीर के कानों में भी पहुंची, पलटकर तयार तांगे को देखकर मुंशीजी से उसका सवाल आया

"क्या ये तांगा जाएगा?"

"हां तांगा जाएगा।"

"क्यों?"

"क्यों का क्या मतलब है साहब, हट्टे कट्टे नौजवान सिपाही आप है, लेकिन इस मौसम में आली जान इसपर ही जाएंगे।"

"मैने इसलिए ही पूछा मुंशीजी की अगर सिर्फ़ उन्हें जाना है तो ये बड़ा तांगा क्यों?"

"कबीर साहब मैं जानता हूं आप मिज़ाज के थोड़े कड़े है, मेरा लहजा आपको पसंद नही लेकिन आप ज़रा ये भी तो सोचिए वो जा रहें हैं तो यासिर भी जाएगा उनके साथ और कुछ सामान भी।"

"हां हां ठीक है, मैं समझ गया।" अपने आप को इस दफ़ा बेसुध पाकर कबीर अपने घोड़े के साथ आगे बढ़ गया।

मुंशीजी उसे फिर से टेढ़ी नज़रों से देखकर इस बहस में अबकी दफ़ा अपनी जीत की ख़ुशी मनाते हुए मुस्कुराकर महल में चले गए।

"कहां रह गए वो?" अपने आप से सवाल करते हुए उन्होंने एक ख़ादिम को आवाज़ लगाकर अपने पास बुलाया "बात सुनो, जाओ पता करके आओ आली जान कहां है।" उनके हुक्म पर वो दौड़ गया। ऊपर ज़य्यान के कमरे में उसने आकर देखा तो पाया कि यहां कोई नहीं है।

मालूम करते करते उसे पता चला की वो ऐवान-ए-सद्र में है। उसने दरवाज़े के पास खड़ी सुरूर से कहा "आली जान को मुंशीजी का बुलावा आया है।" सुरूर ने ख़बर अंदर पहुंचा दिया

शेख़ बाबा ने मुंशीजी को ही ऐवान-ए-सद्र में आने का पैग़ाम भिजवाया दिया। वो फिर भागता हुआ मुंशीजी के पास चला गया।
उसके जाने के बाद शेख़ बाबा अपना चश्मा आंखों पर से हाथों में लेकर उममें उलझ गए

"क्या वो अभी तक पहुंचे नहीं?"

"मैने कहलवाया था, नही मालूम कहां गए।" अम्मा साहब के चेहरे पर भी ताज्जुब की लकीर नज़र आई।

"आली जान अपने कमरे की तरफ़ गए थे, लेकिन इस वक़्त वो वहां नहीं हैं।" सुरूर ने दोनों को इस सूरते हाल से बख़बर किया, और अगले ही पल अहलम की आहट ने पूरे कमरे का मेज़ाज बदल दिया। अंदर दाख़िल होते ही वो अम्मा साहब के क़रीब बैठ गई

"संभलकर, अभी पैर आपके बिलकुल ठीक नहीं हुए हैं।" शेख़ बाबा की ताकीद आई 

"मेरा पैर अब काफ़ी बेहतर हो गया है। ये देखिए मैं आपको चल के दिखाती हूं।" अहलम ने फ़ौरन कूदते हुए उन्हें इधर से उधर चलकर दिखाया जिसपर अम्मा साहब और शेख़ बाबा हंस पड़े

"ठीक कह रही हैं आप, लेकिन अगर शाम तक तकलीफ़ बढ़ने लगे तो फिर हम दोनों आपकी शिकायतें नहीं सुनेंगे। क्यूं बहु बेगम दुरुस्त कहा न मैने?" उसकी नादानी भरी हरकत पर बाबा भी उसे तंग करने लगे

"ठीक है फिर मैं चुपचाप बैठ जाती हूं।" अहलम उनका मतलब समझते हुए भोला सा चेहरा बनाकर बैठ गई। उसी वक़्त कुर्ता ठीक करते हुए ज़य्यान दाख़िल हुआ

"मासाब मैं चल.....!" नज़र अहलम पर पड़ते ही उसके मुंह से आगे कुछ नही निकला, अहलम ने उसे देखते ही उसके पास आकर उसको बाज़ुओं को अपने हाथों से घेर लिया

"छोटे भाई आप कहां थे, कल से मैं ढूंढ रही हूं आपको?"

उसे खींचकर लाते हुए फिर से उसके साथ अम्मा साहब के पास बैठ गई। उसे देखकर अम्मा साहब मुसकुराने लगीं 

"अभी अभी किसी ने कहा था चुपचाप रहूंगी, देखिए बाबा कैसे इसे देखकर फिर से कूदने लगी।"

"लेकिन मैं छोटे भाई से नाराज़ हूं।" अहलम की नज़र ने अम्मा साहब का रुख किया।
ज़य्यान ने उसकी तरफ़ देखा, अहलम कि नज़र दुबारा उसपर पहुंची, उसका शिकायती अंदाज़ नख़रे में बदल गया 

"आपने एक बार भी मेरी तबियत का हाल नही लिया, आप जानते हैं कितना दर्द था मेरे पैरों में।...." ज़य्यान की ख़ामोशी और चेहरा देखकर हालात समझते हुए अहलम अम्मा साहब की तरफ़ मुड़ गई  

"अम्मा साहब देखिए अब जब शिकायत की है मैने तो छोटे भाई कुछ नही बोल रहें हैं। इन्होंने मुझे बहस किया था की आप किसको ज़्यादा चाहतीं हैं। उसी बात की अकड़ है इन्हें अभी तक।" बेहद समझदारी से उसने अपने अंदर का बचपना ज़ाहिर करते हुए बात आगे बढ़ाया 

"अच्छा, ऐसी बात है, फिर तुम दोनो के बीच में मैं क्यों पड़ूं?" अम्मा साहब ने अपना पलड़ा साफ़ कर लिया, 

"मतलब आप वाक़ई इसे ज़्यादा चाहती हैं?"

इन सब के बावजूद जब ज़य्यान ख़ामोश बैठा रहा तब अहलम का चेहरा उतर गया उसने फिर उसके बाज़ुओं को दोनों हाथ से कस के पकड़ लिया

"आपको क्या हुआ है छोटे भाई? आपको मालूम हैना आपकी मायूसी मुझे नहीं पसंद।.......
मुझे अंदाज़ा है आख़िर ये क्यों है,... मगर मैं चाहती हूं की आप उस बात को भूल जाएं और वापस लौट आएं वहां जहां से आपकी सुबह मुझे परेशान किए बिना नहीं होती।" अहलम की समझदारी भरी बातों को अम्मा साहब और शेख़ बाबा ग़ौर से सुन रहे थे
"पूरे पूरे दिन हो जाते हैं और आप मुझे अपना चेहरा तक नही दिखाते। कबतक आप मुझे नज़रअंदाज़ करेंगे?" उसने पूछा

उसके सवाल और उसकी बातें सुनकर ज़य्यान ने भी उसके सामने ख़ुद के मन को खोल दिया

"अभी मुझमें तुम्हारा सामना करने का हौसला नही है। ये मेरी ग़लती है कि मैं तुम्हारी हिफाज़त नहीं कर सका और उसका कफ़्फ़ारा मैं किस तरह अदा करूं मुझे नहीं समझ आ रहा है। मेरी मौजूदगी जब किसी काम ना आ सकी तो उसका क्या फ़ायदा।" उसकी बातों में मायूसी के इलावा कुछ नहीं मिला

"तो आप इन दिनों ये सोच रहे थे?" अहलम उसकी यासदार नज़र में छुपे मलाल और अफ़सोस को देखने लगी
"आपको पता है इन दिनों में मैं पल भर के लिए भी अकेले नही थी लेकिन फिर भी सबकुछ ख़ाली था। आपको मालूम हैं न आपके बिना अच्छा नही लगता मुझे। फ़िर आप कैसे कह सकतें हैं कि आपके रहने का फ़ायदा नहीं है।...
आप नही रहेंगे तो फिर क्या रहेगा?" 

उसकी बातों ने ज़य्यान की ख़ामोश मलाल का रुख़ मोड़ दिया, कमरे में गहरी शांति पसर गई। 

इतने में ख़ामोशी ख़त्म करने के लिए दरवाज़े से मुंशीजी की आवाज़ गूंजने लगी

"अपने बुलवाया मुझे वज़ीर साहब।" कहते हुए वो अंदर आ गए

"आली जान कहां रह गए?......" उन्होंने अन्दर आकर पूछा, उनकी नज़र ज़य्यान पर पड़ते ही वो ठहर गए "अरे आप तो यहीं पर मौजूद हैं।"

"आ गए मुंशीजी।" शेख़ बाबा ने कहा "आपके लिए एक काम है।" उन्होंने शाही पैग़ाम उनकी तरफ़ करते हुए कहा "ये आप कबीर को दे दीजिए और कहिए कि इसे पास के कस्बे तक पहुंचा देंगे।" 

"इसमें क्या है?" पैग़ाम हाथ में उठाते हुए उत्सुक हो गए 

"महल में काम के लिए अर्ज़ी आई थी, ये उसका जवाब है।"

"ठीक है मै ये उन्हें दे दूंगा।" जाते जाते उन्होंने पलटकर कहा "सब तैयारी हो गई है बस आली जान का इंतज़ार है।"

"हम्मम, आप जाइए हम ज़य्यान को भेज रहे है।" शेख़ बाबा का जवाब लेकर मुंशीजी चले गए। 

अहलम का सवालिया निशान चेहरा फ़ौरन ज़य्यान को देखने लगी 

"छोटे भाई को कहां जाना है?" 

"साथ वाले कस्बे में।" शेख़ बाबा ने बताया "वहां बड़ा मसला दरपेश आ गया है, ज़य्यान इसी सिलसिले में जा रहें हैं।" 

"अच्छा!.... केसरी ने बताया था मुझे।" फिर उसने कुछ सोचकर ज़य्यान की तरफ़ मुस्कुराहट भरी निगाह किया  "इसे पूरा करके आप जल्दी से लौट आइएगा। मेरी सालगिराह में आपको रहना है।" 

अहलम के मुस्कुराते लबों से निकले लफ़्ज़ों ने ज़य्यान के मन को हल्का कर दिया। उसके लब पर भी नर्म मुस्कान बिखर गई

"ज़रूर ऐसा ही होगा।"

ज़य्यान के दिल को अहलम की बातों ने कुछ मुतमाईन कर दिया था। उसकी आंखों में ख़ुद ऐतेमादी और ख़ुद अगाही की लौ जल उठी थी। सारी तैयारी के बाद सबने उनको विदा किया। 

ज़य्यान के तांगे के पीछे पीछे कबीर भी कुछ सिपाहियों के साथ सीना तान कर बढ़ने लगा। ऐवान-ए-सद्र की छत पर से अहलम अपनी नज़रों के सामने से सबको ओझल होता देखती रही।