Storeys - Part 56 in Hindi Anything by Neeraj Sharma books and stories PDF | मंजिले - भाग 56

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मंजिले - भाग 56

                       एक कहानी -----

                  ज़िन्दगी मे कोई इतना कोई कयो भूल जाता है, सोचता हुँ, कि किसी कि भी आजादी पूर्वक जिंदगी है... सतपाल को आज समझ आया , " हकूमत कयो ? किसी पर, मित्रो से कोई मिल भी नहीं सकता,

फर्श खराब होता है कयो? हर किसी की ज़िन्दगी है " सतपाल सोच रहा था, गंगा की शात लहरों मे... डुबकी  लगा कर "हर हर गंगे कहता " माँ की हस्तीया वहा कर सोच रहा था, कि यही ज़िन्दगी है बस ----" टूट चुका, आँखे भरी हुई... फुट कर रो भी नहीं सका.... दोस्त, नाते सब मिटी है... आग सब को पवित्र कर देती है.. जानता था, फिर जो पास है उनको मिल कयो नहीं सकता... फर्श पर पोचा लगा है... निशान मिटी के चलते घरो मे ही होते है... आपने इतना बात को कयो खिच देते है... मानसिकता कैसी है आपनो की... आत्मिक प्यार है तो मिटी से कयो घबराते हो... सतपाल कुछ कहना चाह रहा था... तभी चक्र खा कर गिरा... जीजा बड़ा साथ और विक्रम मेरा दोस्त न होता तो शायद गिर जाता... तब भी यही सोच थी कया करू...? किसी को मालम नहीं होने दिया... कुछ खास नहीं था... कौन परिवार छोड़ता है... बताओ..? जिसने 26 साल निकाले हो... माँ की खूब सेवा की हो.. साथ मै... कया घर छोड़ देगा..............

                ईमानदारी से कोई ज्यादा टिका टिपणी करे," मनोज कयो आया, इतने पैसे यूनियन को कयो दिए... " कितना जबाब दे सकोगे तुम, हालत पर तरस आये तो बहुत दुख होता है मुझे... ले जाये... यार, और कुछ चाहिए तो बोल "  सुन कर तुम कया कहोगे...

                    " यही जहाँ इतनी टिका टिपणी हो, तो बच्चे भी भाग जाते है.... "बस मै ठीक निकला... "मन दुखी बहुत दुखी आपने घर पर ही गुलाम... रोज तू तू मै मै....." मानसिकता खराब.. बहुत खराब.... इसको "कयो कुछ दिया " कया करता यार.... बता... तू बता...

फिर वो भी बीमार, मै हार्ट पेष्ट.... कया करू... " माँ जगदम्बा की किर्पा से कभी खत्म नहीं होने वाला मेरे पास से, तुम्हारा भरोसा अडिंग चाहिए। " 

अमजद भाई ने बाते सुनी... " बोला एक दफा बात तो करता " हस पड़ा मै.... " उससे आपनी बात ही मनाएगी..., कयो करू... इसका सलूशन है, थोड़ी देर भागो... उसी के सँग... पर वो कहा मान ने वाली है...

सतपाल गंभीर हो गया... " दिल का बहुत कमजोर हुँ... हाँ गलत बाते बर्दाश्त नहीं होती... " अब चुप थे हम दोनों।

       "   कया करते यहां हुँ कुछ ठीक तो हुँ, माँ का डिप्रेशन है... दवाई चलती है... ठीक हो जाउगा..कया करू। "

"हाँ जाना तो घर ही है... और बाडर पे थोड़ी जाउगा..."

"अब परमपिता जो करेगा सही ही करेगा... "

"ज़िन्दगी अब है कितनी " हा हा हा हसते हुए मैंने चाये की चुस्की भरी... अमजद ने कहा " भागने से मसले अगर ठीक होते, तो आधा मुल्क भाग जाता.. " मै चुप।

" अमजद भाई जो किसे के जज्बात नहीं समझता, कुछ नहीं समझता... हसना नहीं जानता, किसी को कोई बदशे लगा रहा हो, उसे कया कहोगे... " हर किसी की सुनने वाला अक्सर डूब जाता है " अमजद चुप।

"दुख मै साथ देने वाले हमेशा याद रहते है " कौन कोई कया है, उसे परख लो...फिर चुनो गुलाब, या काटा... किसी पर मेहरबान मेरी आदत है रब की किर्पा से होना... आदते भी कभी हटती है... नहीं कभी नहीं....

"अच्छा तो फिर कया इरादा है आगे.... " चुप था मै, और हम चाये पी चुके थे, गंगा की शात लहरें हर हर गंगे स्वर मे गुज रही थी... कहानी आगे अभी अगली किश्त मे....                              नीरज शर्मा 

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