यह कहानी है ज़ैनब और फैजान की। ज़ैनब एक छोटे और शांत शहर के मदरसे में छोटे-छोटे बच्चों को कुरआन की दीनी तालीम देती थी और साथ ही समाज सेवा व गरीबों की मदद के लिए हमेशा आगे रहती थी। उसका दिल बहुत साफ, कोमल और नेकदिल था, जो हमेशा दूसरों के चेहरे पर मुस्कान लाने की फिक्र में रहता था। वहीं दूसरी तरफ, फैजान एक बेहद मेहनती, उसूलपसंद और संजीदा नौजवान था। वह दिनभर कड़ी मेहनत करके अपनी रोजी-रोटी कमाता था और अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा शहर के अनाथ बच्चों की देखरेख, उनकी पढ़ाई और जरूरतों को पूरा करने में खर्च करता था। इसके अलावा, वह शहर की एक पुरानी और प्रतिष्ठित इस्लामी लाइब्रेरी की देखभाल भी किया करता था, जहाँ दूर-दूर से लोग आकर दीन और इल्म की किताबें पढ़ा करते थे और ज्ञान हासिल करते थे।
दोनों की पहली मुलाकात उसी इस्लामी लाइब्रेरी की शांत और किताबों से महकती हुई हवाओं के बीच हुई थी। उस दिन मौसम बहुत सुहाना था और लाइब्रेरी में सन्नाटा छाया हुआ था। ज़ैनब को एक बहुत ही खास इस्लामी तारीख और तालीम से जुड़ी किताब की सख्त जरूरत थी, जो उसे शेल्फ पर मिल नहीं रही थी। वह परेशान होकर यहाँ-वहाँ देख रही थी, तभी काउंटर पर बैठे फैजान की नजर उस पर पड़ी। फैजान ने आगे बढ़कर बेहद अदब, तहजीब और एहतराम के साथ ज़ैनब से पूछा कि क्या वह किसी किताब की तलाश कर रही है। जब ज़ैनब ने अपनी जरूरत बताई, तो फैजान ने तुरंत उस किताब को ढूंढकर उसके हाथों में थमा दिया।
उस छोटे से और बेहद मामूली लगने वाले पल में दोनों की नजरें एक-दूसरे से मिलीं, लेकिन इस्लाम, हया और पर्दादारी के पाक दायरे ने उनकी निगाहें तुरंत नीचे झुका लीं। आज के इस आधुनिक और दिखावे से भरे दौर में जहाँ लोग बिना सोचे-समझें एक-दूसरे से बातचीत शुरू कर देते हैं, वहाँ ज़ैनब और फैजान के बीच न तो कोई फोन नंबर शेयर हुआ, और न ही कोई लंबी-चौड़ी या बेफायदा बातें हुईं। दोनों ने अपनी नजरों की हिफाजत की और अपनी सीमाओं का पूरा ख्याल रखा। लेकिन उस पहली ही मुलाकात ने दोनों के दिलों में एक-एक करके गहरी इज्जत, एहतराम और एक बेहद पाक सा रूहानी अहसास जरूर जगा दिया था। वे दोनों अंदर ही अंदर महसूस कर रहे थे कि यह मुलाकात महज इत्तेफाक नहीं थी, बल्कि इसके पीछे ऊपर वाले की कोई बेहतरीन मर्जी शामिल थी।
इस पहली मुलाकात के बाद कई महीने बीत गए। शहर वही था, रास्ते वही थे और दोनों का आना-जाना भी उसी इलाके में था। कई बार वे रास्ते में एक-दूसरे के आमने-सामने आए भी, लेकिन उन्होंने कभी भी अपनी हया की सीमाओं को पार करने की जुर्रत नहीं की। न तो फैजान ने कभी रास्ते में रोककर ज़ैनब से बात करने की कोशिश की और न ही ज़ैनब ने कभी उसकी तरफ पलटकर देखा। वे दोनों इस बात को बहुत अच्छी तरह समझते और मानते थे कि जो रिश्ते चुपचाप, छुपकर और गुनाह के रास्तों पर परवान चढ़ते हैं, उनमें कभी भी अल्लाह की बरकत और असली सुकून नहीं रहता। फैजान के दिल में ज़ैनब के लिए एक खास जगह बन चुकी थी और वह उसे अपना हमसफर बनाना चाहता था, लेकिन उसने किसी भी प्रकार के शॉर्टकट या गलत रास्ते को अपनाने के बजाय सब्र का दामन थामे रखा। उसे पूरा यकीन था कि अगर यह रिश्ता अल्लाह की तरफ से लिखा है, तो वह सही और हलाल वक्त पर उसके नसीब में खुद-ब-खुद आ जाएगा।
उधर ज़ैनब भी अपने दिल के तमाम जज्बातों और भावनाओं को पूरी तरह काबू में रखती थी। वह जानती थी कि एक नेक इंसान की सबसे बड़ी खूबसूरती उसकी हया और उसका सब्र है। इसलिए उसने अपने सारे अरमानों और दुआओं को अपने रब के हवाले कर रखा था। दोनों के बीच शारीरिक दूरियां थीं, कोई बातचीत नहीं थी, और पूरी तरह खामोशी का पहरा था, लेकिन इसके बावजूद उनके दिलों का यह पाक रिश्ता दुआओं के मजबूत धागे से एक-दूसरे के साथ बंधा हुआ था। यह सब्र का एक बहुत ही कठिन और कड़ा इम्तिहान था, जिसमें दोनों बिना किसी शिकायत के पूरी ईमानदारी के साथ डटे हुए थे, यह जानते हुए कि इस इम्तिहान का अंत बेहद खूबसूरत और सुकून भरा होने वाला है।