“"क्या करूं अच्छा तुम ही बता दो" ???
वह आजिज (तंग) आ कर बोली।
"फोन करो उन्हें पागल लड़की और खुद बुलाओ घर पर अगर वह नही आ रहे हैं खुद से" !!
"और अगर हमेशा की तरह काम ना हआ फोन से तो फिर??
वह उसके मशवरे पर बुरी तरह चिढ़ गई।
"इस बार भी फोन नहीं उठाया तो फिर उनका खून कर देना तुम" !!!
नादिया ने जवाब दिया।
"तो तुम कोई ढंग का मशवरा नहीं दे सकतीं.... पता है तुम्हें कि मैंने कितने कॉल्स किये लेकिन या तो फोन सिव्चड ऑफ जाता है , या तो नॉट रीचेबल"
वह खफ़गी (नाराज़गी) से बोली।
"ढंग का मशवरा यह है कि तुम उन के घर जाओ उनसे मिलो और बैठ कर बात करो। अगर घर में बात करना पॉस्सिबल नही हो तो कहीं बाहर चले जाओ साथ में" !!!
नादिया कह रही थी और उसे भी इस बार उसका मशवरा माकूल (ठीक) लगा था।
"ठीक है, मैं करती हूं कुछ" !!
वह बेदिली बोली।
"एक तो मेरी यह समझ नही आता कि तुम यह बात घरवालों से क्यों नही करती हो। आफ्टर ऑल निकाह में हो तुम उस बंदे के कोई गलत बात तो नहीं है।"
"क्या बात करूं घर वालों से, यही कि अनस मुझसे बात नहीं कर रहा है मतलब हद करती हो तुम भी, यार निकाह हुआ है अभी मेरा, रुख्सती नहीं"
उसने नादिया की बे अक़्ली पर सर पीट लिया।
"अच्छा, कज़िन्ज़ से तो कर सकती हो तुम बात तुम्हारे"
नादिया बोली।
"कौन से कज़िन्ज़ से करूं बात ?? अदील भाई से जो कि मुझ से पाँच साल बड़े हैं या फिर रज़ा भाई से ?? और रहे आज़मीन और हसन तो वह मुझ से छोटे हैं उन से तो बात करने का सवाल ही पैदा नही होता"
वह उलझ कर बोली।
"यह अच्छी है.... तुम्हें बड़ो से भी बात करने में मसला है , और छोटो से भी तुम्हें बात करनी नही है। तो तुम एक काम करो कि अपने साइज़ का एक कज़िन मैन्यूफैक्चर करा लो फिर"
उसकी तफसील पर नादिया जल ही तो गयी थी।
"अच्छा ठीक है मैं तुम से बाद में बात करती हूं अभी सोचने दो करना क्या है" !!
"ठीक है सोच लो तुम , और अब की बार भी तुम से कुछ नहीं हुआ तो मैं ज़रनिश आपी से बात करूंगी फिर.... रज़ा भाई से वह खुद बात कर लेंगी जैसा भी होगा!!"
नादिया ने इस बार उसे लास्ट वार्निंग दी थी।
"नही, अभी रुको तुम, कोई बात करने की ज़रूरत नहीं है किसी से पहले हम खुद तो हैण्डल कर लें यह मसला फिर अगर सॉल्व नही होता है तब देखेंगे क्या करना है।"
उसने मना करने के बाद कहा तो नादिया ने भी अल्लाह हाफिज कह कर फोन रख दिया।
"आपी, आपको अम्मी बुला रही हैं"
वह अपनी ही सोचो में गुम थी कि हसन की आवाज़ पर चौंक गई।
"हाँ, अच्छा ठीक है तुम चलो आ रही हूं मैं" !!
वह बेदिली से कहती उठी थी।
खुले बालों का जूड़ा बनाने के बाद उसने आइने में खुद को एक बार देखा और बाहर निकल आई।
"जी अम्मी, बुलाया है क्या आपने??
"हाँ मैंने बुलाया है, आओ यहाँ बैठो इधर"
जवाब अम्मी के बजाए दादू ने दिया था।
"जी दादू??
वह हमेशा की तरह उनके गले में बांहे डालती पास ही बैठ गई थी।
"तबियत तो ठीक है तुम्हारी???
उन्होंने पूछा।
"जी दादू मैं बिल्कुल ठीक हूं"
वह उन्हें मुतमइन करने के लिये बोली।
"तो फिर जब से आई हो कमरे में ही क्यों घुसी हई हो अपने???
वालिदेन (माँ बाप) को पता नही अपने बच्चों के मसले खुद ही कैसे पता चल जाते हैं। और फिर वह तो उसके वालिद (बाप) की भी माँ थीं, कैसे ना जान पाती कि उनके जिगर का टुकड़ा किसी परेशानी में है।
"नही दादू, ऐसी कोई बात नहीं है, बस वह वहां पर यूनिवर्सिटी के चक्कर में रात में देर से सोना होता है , और सुबह में जल्दी उठना नींद पूरी हो नही पाती , इसलिये मैं बस आराम कर रही थी कुछ वक़्त" !!
उसने कमजोर सा रीज़न दिया।
"तुम कुछ कमज़ोर भी लग रही हो पहले से, सब खैरियत तो है ना??
नादिरा बेगम को फिक्र हई।
"जी अम्मी, मैं ठीक हूं बिलकुल वह बस शायद थोड़ी एग्ज़ाम की टेंशन है" ।।
"आग लगे ऐसे ऐग्ज़ामज़ को.... सेहत का सत्यानास कर दिया बच्ची की। हम तो चाहते ही नहीं थे कि तुम इतनी दूर जाओ इस मुई पढ़ाई की खातिर ऊपर से तुम खुद भी ख्याल नहीं रखती हो अपना " !!!
दादू उस से बे इंतेहा नाराज़ थीं।
"अरे मेरी प्यारी दादु कुछ दिनों की तो बात है फिर तो मैं यहीं वापस आ जाउंगी आपके पास"!!
वह उनकी नाराज़गी दूर करने के लिये लाड से बोली थी।
"अरे कुछ दिन कहाँ , डेढ़ साल है अभी तो"!!
"आप फिक्र ना करें यह डेढ़ साल तो यूं निकल जाएगा"!!
वह चुटकी बजाते हुए बोली।
"तुम्हारे लिये ही तो निकल जाएगा ऐसे, हम तो एक एक दिन गिन गिन कर काटते हैं"
उनकी नाराज़गी ज्यू की त्यूं थी।
"अच्छा आप नाराज़ ना हों, आज मैं अपने हाथ से बिरयानी बनाकर खिलाती हूं आपको देखियेगा फिर कैसे मूड ठीक होता है आपका" !!
वह मुस्कुरा कर उठती हुई बोली तो अम्मी भी दोनों दादी पोती के इस लाड पर मुस्कुरा दीं।
☆ ☆ ☆
""हैलो, कोई है यहां ???
नाशते की टेबल पर अम्मी दादू और आज़मीन नाशता करने में बिज़ी थीं और वह पलेट सामने रखे किसी सोच में गुम थी, जब बहुत करीब से आती अनस की आवाज़ ने उसे बुरी तरह डरा दिया।
"जानवरों वाली हरकतें छोड़ना मत यह कभी, कहीं इन्सान ना बन जाओ"
वह उस पर बुरी तरह चिल्लाई।
"शिफ़ा" !!!
बेगम आसिम ने उसे आँखों ही आँखों में घूर कर देखा था।
"इस की हरकतें ना देखें आप, इंसान वाली जो एक भी बात हो" !!!
वह किलस कर गुस्से से चेयर पीछे धकेलती उठ खड़ी हो गई।
"तो तुम्हें किसने कहा था कि मेरे ख्यालों में इस बुरी तरह खो जाओ"
अनस ने उसके बराबर से झुक कर प्लेट से बिस्कुट उठाते हुए बहुत धीमें से कहा जो उसे और ज़्यादा सुलगा गया।
"लानत, तुम पर भी और तुम्हारे ख्यालों पर भी" !! वह भिन्नाते हुए कह कर बराबर से गुज़र कर जाने लगी।
" नाशता तो करती जाओ वह पराठा पड़ा शर्मा रहा है या फिर मैं खा लूं यह "???
अनस ने आवाज़ लगाई।
"ज़हर खा लो तुम तो" !!
वह जल कर बोली।
"लाएं दादू, जल्दी से मुझे कराएं नाशता आप, फिर मैंने मुर्दा घर भी जाना है" !!
वह उसी चेयर पर बैठते हुए बोला जिस पर से शिफ़ा उठ कर गई थी।
"अल्लाह खैर, क्यों जाना है वहां !!!
दादू हौल कर पूछने लगीं और वह भी जाती जाती उसकी आखिरी बात सुन कर रुक गई थी।
"अरे दादू वह जगह जहां पोस्टमार्टम होते हैं ना"
वह बड़ी संजीदगी के साथ बता रहा था।
"लेकिन जाना क्यों है वहां ??
"वह मुझे बल्ड चाहिये थोड़ा सा तो वह वहीं से मिल सकता है"
"थोड़ा सा का क्या मतलब है , और चाहिए क्यों तुम्हें पूरी बात बताओ"
दादू उसकी बात सुनकर बुरी तरह परेशान हो गई थीं।
"अरे दादू यह आपकी पोती सिर्फ सॉरी कहने से तो मानने वाली नही है, तो अब मुझे खून से खत लिखना पड़ेगा तब ही मानेगी यह"
वह बड़े मज़े से नाशता करते हुए बता रहा था। जिस पर आज़मीन की बुरी तरह हसीं छूट गई और दादू ने उसकी कमर में एक धप रसीद की थी।
"डरा ही दिया था तुमने तो मुझे"
वह पोते को घूरते हुए बोलीं।
"बी ब्रेव माई डियर दादू"
वह लाड से उनके गले में बाँहें डाल कर बैठ गया।
"तो मैसेज के ज़मानें में आप खून से खत लिखेंगे क्या आपी को अनस भाई, और वह भी मुर्दे के खून से" ???
आज़मीन की हँसी किसी तरह नही रुक रही थी।
"अब तुम्हारी बहन इस लायक़ तो है नहीं , कि मैं इसे अपने खून से ख़त लिखूं"
अनस ने उसे सुनाने के लिये ज़ोर से कहा।
"मुर्दा घर तो नहीं , पागल खाने जाने के पूरे पूरे आसार नज़र आ रहे हैं मुझे तुम्हारे" !!
वह उसकी पूरी बात सुनने के बाद किलस कर बोली।
"तुम्हारे बगैर तो वहां भी नही जाउंगा मैं" ।।
वह दादी और सास का ख्याल किये बगैर इतमीनान से बोला तो वह और ज़्यादा चिढ़ गई थी।
"दफा हो जाओ तुम, खाने के अलावा कोई और काम भी कर लिया करो
वह जलती भुनती पलट गई और पीछे अनस मुस्कुराता रह गया।
"क्या मैं अंदर आ सकता हूं???
अनस दरवाज़े पर खड़ा पूछ रहा था।
"कोई ज़रूरत नही है यहां आने की, वही से दफ़ा हो जाओ"
वह गुस्से से बोली।
"आने के लिये मुझे तुम्हारी इजाज़त की ज़रूरत नहीं है, वह तो मैंने यूं ही पूछ लिया कि काफी दिन बाद आया हूं इसलिये हमारी वेगम से इजाजल ले ली जाऐ"!!
वह उसके मना करने के बावुजूद भी अंदर आ कर बैठ गया था।
ओह हो, फाईनली याद आ ही गया आपको कि आपकी बेगम भी हैं"???
उसने तंज के साथ कहते हुए उसकी तरफ देखा था।
"यार मेरी बात सुनो अच्छा" !!
"मुझे कोई बकवास नही सुननी है जाओ यहां से"
उसका मूड किसी तरह सही होने में नही आ रहा था।
"एक बार पूरी बात सुन लो मेरी, फिर भी तुम्हें मेरी गलती लगे तो जो तुम सज़ा दोगी वह मंजूर है मुझे" iii
अनस ने रिक्वेस्ट की तो वह कुछ बोली नही बस खामोश रही थी।
"तुम जानती हो ना कि आजकल मैं अंकल कामरान के साथ होता हूं"
उस ने कह कर अपनी बात को प्रूव करने के लिये उसकी तरफ देखा मगर वह खामोश ही रही तो उसने अपनी बात आगे कंटीन्यू कर दी।
"मुझे उनकी न्यू ब्रांच सम्भालनी है, इसलिये उन्होंने मुझे हर डिपार्टमेंट की निगरानी का ज़िम्मा दिया हुआ है। क्योंकि नये वाले ऑफिस में मेरी पोस्ट के हिसाब से मुझे नॉलेज हर डिपार्टमेंट की होनी चाहिये जिस्से कि वर्कर्स को सही तरीके से हैण्डिल किया जा सके। तो मीटिंग्स में भी मुझे उनके साथ जाना होता है जिस से मुझे यह आ जाए कि कलाइंट को कैसे डील करना है , माल कहां से एक्सपोर्ट कहां इम्पोर्ट होगा यानी कि each & every thing वह मेरी नॉलेज में लाना चाह रहे हैं। क्योंकि नया ऑफिस रेडी होने के फौरन बाद तो हमें रन करना है उसे इसलिये मेरे पास सीखने का टाईम यही है" !!
अनस ने एक बार फिर नज़रें उसके खामोश चेहरे पर डाली।
"रात में कौन सी मीटिंग्स होती हैं , कि फोन तक अटैंड नही किया जाता है, खुद से कॉल करना तो दूर की बात है" ???
उसने मासूमियत से शिकवा किया था।
"यार पूरा दिन इधर से उधर और उधर से इधर के चक्कर में इतना थकान हो जाती है कि आते ही खाना खाने की भी हिम्मत नही होती क्योंकि आठ तो मुझे आते आते ही बज रहे होते हैं रात के , और फिर कई बार तो हमें बाहर भी जाना पड़ा है शहर से। अब कभी कभी यह भी होता है कि रेंज नही आती फोन की तो उस में तो किसी से भी बात नही हो पाती, इस बार भी परसो घर से कई फोन गए लेकिन रेंज का ही मसला रहा , बाद में जब मैंने खुद कॉन्टैक्ट किया तो पता चला मुझे वरना तो नॉटिफाई भी नही होता कॉल्स का" !!!
उसने अपने रवैये की सफाई दी और यह सब बताते हुए वह एक बार भी नही रुका था मतलब वह कुछ भी बनाकर नही बोल रहा था यानि कि पूरी बात बिलकुल सच थी।
"हां परसो मैंने कई कॉल्स किये लेकिन नम्बर आउट ऑफ रेंज जाता रहा या फिर स्विच ऑफ"
उसने इस बार कछ नॉर्मल लहजे में बात की थी।
"हम्म, कई दिन पहले भी जब तुमने कॉल्स किये तब मैं मीटिंग में था और मीटिंग भी रेग्यूलर थी इसीलिये मैं बात नही कर पाया, फारिग़ हो कर जब मैंने कॉल किया तो तुमने रिसीव नही किया था !!!
इस बार उसने शिकायत की तो शिफ़ा को शर्मिंदगी ने आ घेरा, वह पता नही क्या क्या सोच कर बैठी हुई थी।
"तो यह बात आप फोन पर भी तो बता सकते थे" !!!
वह शर्मिंदगी मिटाने को बोली।
"यार बताया तो है या तो फोन की रेंज नही होती थी या फिर मैं मीटिंग्स में होता था इसलिये पूरी बात करने का टाईम ही नही मिला तुम से , और जब कभी टाईम निकाल कर मैंने कॉल किया तो तुम ने बात ही नही की" !!
बात करते करते बीच में अनस का फोन भी रिंग हुआ था लेकिन उसने कॉल कट कर दी। और दोबारा जब आया तो कॉल कट करने के साथ ही फोन भी स्विचड ऑफ कर दिया था।
"अटैंड कर लें कॉल, क्या पता कोई इम्पोर्टेड कॉल हो??
उसने कहा।
"फिलहाल मेरे लिये तुम हो सब से ज़्यादा इम्पोर्टेड, और इसीलिये मैं नहीं चाहता कि इस वक़्त कोई भी डिस्टर्बेस क्रिएट हो, और फिर अगर एक बार मैंने कॉल अटैंड कर ली तो बस समझो फिर तो हो गई हमारी बात"
उसने तफसील बताते हुए मुहब्बत से शिफ़ा की तरफ देखा था जवाब में वह सर झुका गई।
" शर्माते हुए अच्छी लगती हो वैसे" !!!
अनस ने उसे छेड़ते हुए कहा तो वह जवाबन उसे घूरने लगी।
"अच्छा जाओ जा कर रेडी हो जाओ, आईसक्रीम खाने चलते हैं"
अनस ने उसे ऑफर किया।