रिश्ते में बहस में जीतना
आर0 के0 लाल
सुशील को अपनी बात पर पूरा विश्वास था। वह जानता था कि इस बार गलती उसकी नहीं थी। सामने उसकी पत्नी मीरा थी और उसकी आँखों में गुस्से से अधिक दुख दिखाई दे रहा था। सुशील भी लगभग एक घंटे की बहस करके थक गया था । वह चुप हो कर निढाल बैठ गया था मानो उसके शरीर से किसी ने प्राण ही खींच लिया हो ।
बात बहुत छोटी-सी थी। मीरा चाहती थी कि सुशील कल यानि रविवार को उसके माता-पिता से मिलने चले। सुशील ने पहले ही अपने मित्रों के साथ एक जरूरी काम तय कर रखा था। उसने मीरा से कहा था कि वह अगले रविवार चलेंगे, लेकिन मीरा को लगा कि सुशील उसके परिवार को महत्व नहीं देता। मीरा ने नाराज़ होकर कहा, “ तुम्हारे लिए हमेशा तुम्हारे दोस्त और तुम्हारा काम ही जरूरी होता है,”
मीरा गुस्से से बोलती रही, “जब भी तुमसे अपने घर चलने के लिए कहती हूं हमेशा आनाकानी ही करते हो। मुझे तो याद ही नहीं कि तुम कभी वहां जाने के लिए खुशी-खुशी तैयार हुए हो। कभी जाते भी हो तो वहाँ पहुंचते ही जल्दी वापस होने की धुन रटने लगते हो। मम्मी पापा कहते ही रह जाते हैं कि बेटा तुम लोग डिनर करके जाना, मगर तुम्हें कहां उनकी परवाह? मुझे लेकर अक्सर अपने भाइयों के घर चले जाते हो। फिर वहां से घर लौटने की जल्दी नहीं होती। रात के 12:00 बजे तक वहीं डटे रहते हो। यह सिद्ध करता है कि तुम कितने मतलबी हो।“
यह सुनकर के सुशील के शरीर में आग लग जाती है। उसक़े भीतर तुरंत जवाब देने की इच्छा हुई। वह कहना चाहता था कि यह सच नहीं है। वह याद दिलाना चाहता था कि पिछले महीने वह मीरा की माँ को अस्पताल लेकर गया था, कितनी बार उसने उसके परिवार की मदद की थी और कितनी बार अपने जरूरी काम छोड़ कर मीरा ने जैसा चाहा उसका साथ दिया था।
उसके मन में अपना पक्ष ठीक साबित करने के लिए कई तर्क थे। लेकिन जैसे ही उसने मीरा की ओर देखा, उसके शब्द होंठों पर आकर रुक गए। उसे लगा कि इस समय मीरा को कोई तर्क देना उचित नहीं होगा वरना उसका रोना धोना शुरू हो जाएगा। अगर बातचीत बढ़ गई तो समझो कि दो तीन दिन की फुर्सत हो गई इसलिए चुप रहना ही बेहतर है। पहले भी न जाने कितनी दफा ऐसे एपिसोड होते ही रहे हैं। सुशील के मन में आता था कि वह जो कह रहा है वह सही है। मीरा भी ऐसा ही सोचती थी। दोनों अपनी अपनी बात को हर हाल में साबित करना चाहते थे। इस प्रकार हमेशा वार्तालाप चिल्लाने से लेकर रोने धोने तक बढ़ जाता था।
सुशील खुद तो नहीं समझता लेकिन मीरा को समझाने के लिए अक्सर कहा करता है कि जीवन में सही होना जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही महत्वपूर्ण यह भी है कि हम अपनी बात कैसे रखते हैं। सुशील मीरा को समझाते हुये कहता है कि अक्सर हम मान लेते हैं कि अगर हमारी बात सही है, तो हमें उसे हर हाल में साबित करना चाहिए। हम चाहते हैं कि सामने वाला हमारी बात माने और समझे कि हम गलत नहीं हैं। हम सामने वाले की बात समझने के बजाय उसकी बात में कमियाँ खोजने लगते हैं। उसके शब्दों का अर्थ समझने के बजाय उनमें छिपी गलतियाँ निकालने लगते हैं। हम सुनते कम हैं और जवाब देने की तैयारी अधिक करते हैं। इसी एक साधारण सी बातचीत को तुम बहस में बदल देती हो, न जाने कितने उलाहना देती हो, पता ही नहीं चलता कब तुम्हारा स्वर बदल जाता है। व्यंग सें भरे होते हैं तुम्हारे वाक्य। सब मिला कर हमारे बीच सहजता खो जाती है और बात सही-गलत से आगे बढ़कर अहंकार की लड़ाई बन जाती है।
कई बार ऐसी बहस दोनों के बीच में हुई है। अक्सर सुशील अपनी बात तर्कों से साबित कर देता और वह विजय की मुस्कान के साथ आगे बढ़ जाता। लेकिन हर बार बहस खत्म होने के बाद मीरा उससे थोड़ी और दूर हो जाती। उनके बीच खाईं गहरी होती जाती । सुशील को लगता कि उसने सच कह दिया, इसलिए सब ठीक है। पर मीरा के मन में उसके शब्दों की चोट बहुत दिनों तक बनी रहती।
अभी परसों की ही बात है कि सुशील ने बहस करके अपनी बात सही साबित कर दी थी, लेकिन घर में एक अजीब-सी खामोशी फैल गई थी। बहस के बाद मीरा चुपचाप कमरे से चली गई थी। कुछ देर बाद सुशील ने देखा कि मीरा बालकनी में बैठी रो रही थी। सुशील भीं दुखी हो गया था । वह उसके पास गया और उसे प्यार करते हुए पूछा, “तुम रो क्यों रही हो?”
मीरा ने आँसू पोंछते हुए कहा, “क्योंकि हर बार तुम अपनी बात साबित कर देते हो, लेकिन मुझे ऐसा लगता है कि मैं ऐसा नहीं कर पाती हूं और मेरी भावनाएँ हार जाती हैं।”
सुशील ने सोचा कि कह दे, “ मैं केवल सच बोलता हूं और तुम बात को बढ़ा-चढ़ा कर प्रस्तुत करती हो वह भी लड़ाई के लहजे में। मगर उसके मन में पहली बार महसूस हुआ कि शायद हर सही बात सही समय और सही तरीके से उसके द्वारा बात नहीं कही जाती। उसे एहसास हुआ कि सत्य बोलने के बावजूद भी कहीं न कहीं वह हारता चला जा रहा है। उसके दांपत्य जीवन की शांति भंग होती जा रही है। उसके बातचीत का उद्देश्य जब मीरा को हराना बन जाता है, तो वह अहंकार में आ जाता है। वह मीरा की बात समझने के बजाय उसमें कमियाँ खोजने लगता है। सुनने के बजाय जवाब देने की तैयारी करता है और भूल जाता है कि मीरा कोई विरोधी नहीं है बल्कि उसकी अपनी जीवनसाथी ही है। जिसके साथ हमने जीवन के कई सुंदर पल बिताए हैं, जिसके साथ हँसी, दुःख, सपने और विश्वास बाँटे, उसी के सामने अपनी बात साबित करने के लिए वह ऐसे - ऐसे शब्द बोल देता हूँ जो मीरा के मन को गहराई से आहत करते हैं।
सुशील को अपने बचपन की बात याद आई। बचपन में जब वह किसी बात पर बहस करता था, तो उसके पापा मुस्कराकर कहते थे, “बेटा, हर बहस जीतना जरूरी नहीं होता। इससे अगला दुखी भी हो सकता है और फिर आपसी मनमुटाव पैदा हो सकता है” । तब सुशील को लगता था कि जो सही है, उसे चुप क्यों रहना चाहिए। आज उसे समझ आने लगा था कि रिश्ते बातों - बातों में कैसे बनते - बिगड़ते हैं। शब्दों के बाण गहरी चोट करते हैं और सामने वाली की पीड़ा जल्दी खत्म नहीं होती। रिश्ते भावनाओं से बनते हैं, और भावनाएँ तर्क से नहीं बल्कि संवेदना से समझी जाती हैं।
आज सुशील इन बातों को याद करके चुप ही रहा। बात को समाप्त करने के लिए उसने मीरा से कहा “शायद मैं इतना व्यस्त था कि तुम्हारी बात ठीक से समझ ही नहीं पाया” ।
मीरा ने उसकी ओर देखा। उसके चेहरे पर अब भी उदासी थी, लेकिन गुस्सा कम हो चुका था। उसने धीरे से कहा “मैं बस इतना चाहती हूँ कि तुम मेरी भावनाओं को गलत मत समझो,” ।
सुशील ने प्यार से उसका हाथ पकड़ लिया उसकी आँखे नं हो गयी थी मात्र इतना बोल पाया, “मैं कोशिश करूँगा।” उसे लग रहा था कि चुप होकर के भी वह जीत गया है। सोचने लगा कि समझदार व्यक्ति वह नहीं जो हर बहस में अपनी बात मनवा ले, बल्कि वह है जो पहचान सके कि कहाँ बोलना जरूरी है और कहाँ मौन बेहतर है। असहमति जताना और अपनी सीमाएँ तय करना भी जरूरी है। संवाद का उद्देश्य समझ पैदा करना होना चाहिए किसी को नीचा दिखाना नहीं।
इस बार सुशील ने अपनी बात शांत स्वर में रखी। उसने यह भी स्वीकार किया कि मीरा के लिए अपने माता-पिता से मिलना भावनात्मक रूप से महत्वपूर्ण था। मीरा ने भी समझा कि सुशील की अपनी व्यस्तताएँ थीं और उसका उद्देश्य उसे नजरअंदाज करना नहीं था। दोनों ने मिलकर तय किया कि वे अगले रविवार मीरा के माता-पिता से मिलने जाएँगे।
समस्या वही थी, लेकिन इस बार बातचीत बहस नहीं बनी क्योंकि दोनों में से किसी ने जीतने की कोशिश नहीं की थी। दोनों ने भली भाँति समझ लिया था कि अगर किसी बहस में आप जीत जाते हैं, लेकिन आपका अपना व्यक्ति आपसे दूर हो जाता है, तो उस जीत का कोई मतलब नहीं है।
दोनों समझ गये थे कि दामपत्य रिश्तों में सबसे बड़ी जीत सामने वाले को गलत साबित करना नहीं, बल्कि असहमति के बावजूद सम्मान सहित एक-दूसरे के करीब बने रहना है।
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