(कमरे में अब सन्नाटा है, बस करन की भारी साँसों की आवाज़ गूँज रही है। सिमरन का चेहरा अब डर से मुक्त हो चुका है, उसमें एक दृढ़ संकल्प और अपार प्रेम झलक रहा है।)
सिमरन (धीरे से, बहुत ही कोमलता से) बोली -
शांत हो जाओ मेरे राजा… अब सब ठीक है।
(वो करन के बिखरे हुए बालों को पीछे करते हुए, उसके माथे पर एक हल्का सा चूमती है। फिर उसके गालों पर, और अंत में उसके ठंडे होंठों पर एक पवित्र, कांपता हुआ चुंबन देती है। यह चुंबन किसी वासना का नहीं, बल्कि एक 'औषधि' जैसा था—जो उसके अंदर के राक्षस को सुला दे।)
(करन की तनी हुई मांसपेशियाँ धीरे-धीरे ढीली पड़ने लगती हैं। उसकी लाल आँखें धीरे-धीरे बंद हो जाती हैं। वह गहरी नींद में खो जाता है, जैसे सालों बाद पहली बार उसे चैन मिला हो।)
सिमरन (फुसफुसाते हुए) बोली -
आराम कीजिए, करन जी। मैं यहीं हूँ।
(वो धीरे से उठती है और करन को तकिये पर सिर रखकर सुला देती है। चादर को उसके ऊपर ठीक से ओढ़ाती है, मानो कोई माँ अपने बच्चे को सुला रही हो, या कोई पत्नी अपने थके हुए पति को।)
(सिमरन कमरे के कोने में रखी भगवान कृष्ण की छोटी सी मूर्ति के पास जाती है। बाहर अभी भी बारिश हो रही है, लेकिन कमरे के अंदर की हवा अब शांत है। वो मूर्ति के सामने घुटनों के बल बैठ जाती है। उसके हाथ जुड़े हुए हैं, आँखों से लगातार आँसू बह रहे हैं, लेकिन उसकी आवाज़ में एक अटूट विश्वास है।)
सिमरन (रोते हुए, प्रार्थना करते हुए) बोली -
हे कान्हा… हे मेरे द्वारिकाधीश…
आप तो जानते हैं न कि ये इंसान नहीं, मेरे पति हैं?
लोग इन्हें राक्षस कहेंगे, दुनिया श्राप कहेगी…
लेकिन मेरे लिए, ये वही करन हैं जिन्होंने मुझे जीवन दिया।
(वो मूर्ति की ओर देखती है, उसकी आँखों में विनती है।)
सिमरन जारी रखती है -
मैंने इनसे 'आप' कहकर बात करना इसलिए नहीं छोड़ा क्योंकि मैं इनसे दूर हूँ… बल्कि इसलिए क्योंकि मैं इनकी इतनी इज़्ज़त करती हूँ कि इनके इस रूप को भी स्वीकार कर सकूँ।
प्रभु, अगर ये श्राप है, तो इसे तोड़ दीजिए।
अगर ये परीक्षा है, तो मुझे शक्ति दीजिए।
मैं चाहती हूँ कि करन फिर से वैसे ही बन जाएं जैसे पहले थे—शांत, मुस्कुराते हुए, इंसान।
मुझे इनका खून नहीं चाहिए, मुझे बस इनकी रूह चाहिए।
कृपा कीजिए प्रभु… मेरे करन को वापस ला दीजिए।
(वो अपना सिर ज़मीन पर टिका देती है। कमरे में एक अजीब सी दिव्य शांति छा जाती है। मोमबत्ती की लौ स्थिर हो जाती है।)
(तभी, बिस्तर से एक हल्की सरसराहट की आवाज़ आती है। सिमरन चौंककर पीछे मुड़ती है।)
(करन अब भी सो रहा है, लेकिन उसके चेहरे का तनाव पूरी तरह गायब हो चुका है। उसके होंठों पर एक हल्की, शांत मुस्कान है—वही मुस्कान जो सिमरन को पहले दिन मिली थी।)
सिमरन (मन ही मन) सोचती है -
शायद… शायद भगवान ने सुन लिया।
(वो धीरे से उठती है और वापस करन के पास आकर बैठ जाती है। वो उसका हाथ अपने हाथों में ले लेती है और उसकी उंगलियों को सहलाती रहती है।)
सिमरन (धीरे से, प्यार से) बोली -
सोइए, करन जी। जब आप जागेंगे, तो सूरज निकल आएगा… और अंधेरा हमेशा के लिए चला जाएगा।
(बाहर बारिश रुकने लगी है। बादलों के बीच से चाँद की एक किरण निकलकर सीधे करन के चेहरे पर पड़ती है। ऐसा लगता है जैसे प्रकृति भी इस प्रेम और त्याग को सलाम कर रही हो।)
"रात अभी बाकी थी, लेकिन सिमरन के दिल में सुबह हो चुकी थी।
उसकी प्रार्थनाएं अब सिर्फ शब्द नहीं, बल्कि एक तांत्रिक शक्ति बन चुकी थीं।
और करन… वो अब सिर्फ एक वैंपायर नहीं, बल्कि एक ऐसे पति थे जिन्हें उनकी पत्नी की भक्ति और प्रेम ने बांध रखा था।"
(सुबह की सुनहरी धूप खिड़की के पर्दों से छनकर कमरे में आ रही है। पक्षियों की चहचहाहट बाहर गूंज रही है, जो रात के उस भयानक सन्नाटे का बिल्कुल विपरीत है।)
(करन की आँखें खुलती हैं। सबसे पहले वो शीसे की तरफ मुंह करता है उसे अपनी पुतलियों में वही लाल रंग दिखाई देता है—वही श्रापित निशान। उसका दिल एक पल के लिए रुक सा जाता है। डर के मारे वह सिमरन को कसकर अपनी बाँहों में जकड़ लेता है, मानो उसे छोड़ते ही वह फिर से उस राक्षसी रूप में लौट जाएगा।)
(लेकिन तभी, सिमरन हल्की सी हिलती है। उसकी नींद खुलती है। वह करन के सीने पर सिर रखे हुए है। जैसे ही उसकी आँखें खुलती हैं, वह थोड़ा घबरा जाती है—रात की यादें अभी भी ताज़ा हैं।)
(वह धीरे से ऊपर देखती है। करन की आँखें अब लाल नहीं हैं। वे वही गहरी, शांत और इंसानी काली-भूरी आँखें हैं जिन्हें वह जानती है। उसके चेहरे पर न तो गुस्सा है, न ही प्यास। बस एक गहरा अपराधबोध और अनंत प्रेम है।)
सिमरन (हल्की मुस्कान के साथ, राहत की सांस लेते हुए) बोली -
उठ गए आप...?
(करन कुछ बोल नहीं पाता। वह बस सिमरन को देखता रहता है, यह यकीन करने की कोशिश करता है कि वह सुरक्षित है, कि उसने रात में उसे चोट नहीं पहुंचाई।)
सिमरन (धीरे से उसके सीने से सर उठाती है और बिस्तर से उठ खड़ी होती है।
अपने बिखरे बालों को संवारते हुए) बोली -
मैं नाश्ता बना देती हूँ। आपको भूख लगी होगी।
(वह दरवाजे की ओर बढ़ती है, लेकिन जाते-जाते रुकती है और पीछे मुड़कर करन को देखती है। उसकी आँखों में वह सम्मान और 'आप' वाला अंदाज़ वापस आ गया है, जो रात के डर के बाद अब और भी गहरा हो गया है।)
सिमरन (नरम स्वर में) बोली -
आप फ्रेश हो लीजिए, करन जी। मैं चाय और आपके पसंदीदा परांठे लेकर आती हूँ।
(करन अभी भी बिस्तर पर बैठा है, उसकी मुट्ठियाँ अब ढीली हैं। वह सिमरन को जाते हुए देखता है। उसके मन में एक अजीब सी शांति है, लेकिन साथ ही एक सवाल भी—कि क्या यह शांति स्थायी है? या यह सिर्फ एक तूफान के बीच का सुकून है?)
करन (धीमे स्वर में, खुद से) बोला -
शुक्रिया... सिमरन।
(सिमरन कमरे से बाहर निकल जाती है। करन बिस्तर से उठता है और शीशे के सामने जाता है। वह अपने चेहरे को छूता है। कोई दांत नहीं, कोई लाल आँखें नहीं। वह फिर से 'इंसान' लग रहा है। लेकिन जब वह अपनी कलाई देखता है, तो वहां की नसें अभी भी थोड़ी काली दिख रही हैं—श्राप पूरी तरह गया नहीं है, बस सोया हुआ है।)
(वह गहरी सांस लेता है और अपना चेहरा धोने के लिए बाथरूम की ओर बढ़ता है। उसे पता है कि सिमरन ने उसे बचाया है, लेकिन अगली रात क्या लाएगी, यह किसी को नहीं पता।)
(बाहर रसोई से बर्तनों की खनक और चाय की खुशबू आने लगती है। यह साधारण दृश्य, इस हवेली में एक चमत्कार से कम नहीं है।)