[अस्वीकरण: यह एक काल्पनिक कहानी है, वास्तव के साथ इसका कोई संबंध नहीं है]
पहला अध्याय
यह बात है लगभग 7,000 वर्ष पूर्व की। जब एक ओर संपूर्ण संसार में मनुष्य केवल भटक-भटक कर जीवन जी रहे थे, वहीं दूसरी ओर भारत और चीन जैसे देशों में पूरी सभ्यता स्थापित हो चुकी थी। उस समय मनुष्य केवल वस्तुओ का आदान-प्रदान नही करते थे, एक-दूसरे के भावनाओं को भी समझते थे। उस युग में मानवता आज की तुलना में बहुत थी; लोग इतने भले और निष्ठावान की लेने से अधिक देने पर विश्वास करते थे।
लगभग 6500 ईसा पूर्व में, एक गरीब परिवार में एक बालक का जन्म हुआ। उसका नाम रखा गया—'आदि'। तब किसे मालूम था कि यह साधारण सा दिखने वाला बालक आगे चलकर संपूर्ण सृष्टि के लिए क्या करने वाला है।
समय व्यतीत हुआ और 14 वर्ष बाद, आदि अब समझदार हो चुका था।उसका साहस और बुद्धि बाकी बच्चों से कई अधिक था। बाकी बच्चों के साथ रोज की तरह वह अपने मित्र के साथ खेलने गया। खेल कूद करके जब रोज की तरह हसते हुए घर आ रहा था, वह हसी भगवान ने ज्यादा देर रहने नही दिया। अपने घर से थोड़ी दूर से ही घर मे माता की रोता हुआ चीख सुनकर वह डर गया। नियति ने भी अपना खेल शुरू कर दिया था। जब वह घर पहुंचा, उसके पैरों तले जमीन खिसक गई। जीवित रहने के वावजूद उसका शरीर लांस जैसा स्तब्ध हो गया। जिसके छा में वह पला बढ़ा हुआ, वही छा अब उससे चली गई थी। उसके पिता अब इस दुनिया से चले गए थे। अपने पिता का मृत शरीर उसके अपने आंखों के सामने था। बयां न कर पाने वाली दुःख से उसके आंसु रुख ही नहीं रही थी। जिसके कंधो पर बैठ कर घुमता-फिरता था; अब उसी को अपने कंधो पर रखकर अपने हाथों से ले जाना पड़ रहा था।
अब घर का सारा दायित्व अपने उपर आ पड़ा था। घर चलाने के लिए उसने कार्य खोजना आरंभ किया और शीघ्र ही वह एक मूर्ति निर्माता (शिल्पकर) के पास पहुँचा। मालिक ने उसकी निष्ठा देखकर उसे कार्य पर रख लिया। आदि दिन-रात परिश्रम से मूर्तियाँ बनाने लगा।
काफी दिन बित गए। उनका व्यापार पहले से और अच्छी चलने लगी। उनकी मूर्ति की रूप एसा लगता है जैसे वह मूर्ति नहीं असली है। उनकी मूर्ति नगर के कोने कोने में प्रसिद्ध हो गया। एक दिन, उनके देश के राजा मित्रविंदन को यह वात पता चलता है। राजा को अपने आराध्य(ईश्वर) की पूजा करनी थी। राजा ने मूर्ति बनाने के लिए उन्हे एक अत्यंत विशेष मूर्ति बनाने के लिए एक सप्ताह का समय दिया। मालिक का हालत उतनी अच्छी न होने के कारण उन्होने यह मूर्ति आदि को बनाने के लिए कहा। आदि ने अपने तन-मन लगाकर मूर्ति लगभग पूर्ण कर दी थी। कदाचित नियति उसे किसी और ही मोड़ पर ले जाना चाहती थी। अचानक वह मूर्ति हाथ से छूटकर गिर गई और उसमें गहरी दरारें आ गईं। यह देखकर मालिक के हाथ पैर कांपने लगे, सर पकड़ कर बैठ गए।उसे चिंता होने लगी कही राजा मित्रविंदन उसे सज़ा के रूप में मृत्युदंड न दे; क्योंकि राजा का क्रोध भयावह रहा है।
लेकिन आज कुछ अलग ही थी; जब यह बात राजा को पता चलता है; तो न जाने क्यूं राजा ने उन्हें क्षमा कर दिया और फिर एक सप्ताह का समय दिया गया...