अध्याय 5: अमावस की रात, गन्ने का खेत और लाल आँखें
सूरज ढलते ही आसमान पर स्याही बिखर गई।
यह पूस की अमावस से ठीक पहले की रात थी। गाँव में बिजली का खंभा तो खड़ा था, पर तार पिछले तीन महीने से सूखे पेड़ों की तरह बेजान लटके थे।
पूरे इलाके में ऐसा अंधा सन्नाटा पसरा था कि अगर कोई सुई भी गिर जाए, तो उसकी खनक दूर तक सुनाई दे।
अपने कच्चे ओसारे में मोनू चारपाई पर बैठा था।
लालटेन की लौ उसने बिल्कुल मद्धम कर रखी थी।
कोहनी पर लगा घाव अब टीस मार रहा था। उसने नीम की छाल का काढ़ा बनाकर उस पर लगाया था, पर जिस्म से ज्यादा उसका दिमाग सुलग रहा था।
गाँव के छोर पर स्थित उसके दो बीघे खेत के उस पार ठाकुर की विशाल हवेली थी। और उस हवेली की चौपाल पर इस वक्त ताड़ी और कच्ची शराब का दौर चल रहा था।
रात के ठीक ग्यारह बजे।
खेत की पगडंडी पर तीन लठैतों के भारी कदमों की चाप सुनाई दी। आगे-आगे मंगतू था—ठाकुर का सबसे पुराना लठैत, जिसके हाथ में गँड़ासा था। उसके पीछे सुक्खा और छन्नू थे।
दोनों के हाथों में लोहे की शाम जड़ी भारी लाठियाँ और जलती हुई लालटेनें थीं।
“ससुरे माते के पिल्ले को दिन में ही अक्ल आ जानी चाहिए थी,” मंगतू ने गुटखा थूकते हुए कहा, “आज मेड़ काटकर सीधे गन्ने की क्यारी में मिला देंगे। कल सुबह रोता फिरेगा।”
“अरे काहे की अक्ल बे,” सुक्खा हँसा, “अनाथ है, कौन-सा थाने में रपट लिखाने जाएगा? चल, जल्दी हाथ चला... ठाकुर साहब ने कहा है कि सुबह तक बीच वाली मेड़ का नामोनिशान नहीं दिखना चाहिए।”
वे तीनों उस विवादित मेड़ पर आ खड़े हुए, जहाँ मोनू का खून दोपहर में गिरा था।
रात की हवा अचानक बिल्कुल रुक गई।
पूस की सर्द रात में भी हवा ऐसी भारी और चिपचिपी हो गई, जैसे किसी ने बबूल की झाड़ियों के बीच जलते हुए अंगारे बिखेर दिए हों।
मंगतू ने फावड़ा उठाया और पहली चोट ज़मीन पर मारी—
‘खट!’
लोहे की धार जैसे ही सूखी मिट्टी में धँसी, खेत के ठीक बीचों-बीच खड़े विशाल गन्ने के फैलाव में एक अजीब-सी सरसराहट हुई।
“रुक...” सुक्खा ने मंगतू का कंधा पकड़ लिया।
“क्या हुआ रे?”
“वो देख... गन्ने के पत्ते कैसे हिल रहे हैं? हवा तो चल नहीं रही।”
मंगतू ने लालटेन ऊँची की। पीली रोशनी जहाँ तक जा रही थी, वहाँ गन्ने के लंबे डंठल बिल्कुल सीधे खड़े थे। कोई हवा नहीं थी। पत्तों का हिलना भी थम चुका था।
“तू दारू कम पिया कर,” मंगतू झल्लाया, “जंगली सुअर होगा या सियार। चल, काम निपटा।”
मंगतू ने दूसरा वार करने के लिए जैसे ही फावड़ा ऊपर उठाया...
‘झम!’
गन्ने के घने झुरमुट के भीतर से घुँघरुओं की बहुत तीखी, गूँजती हुई आवाज़ आई।
यह किसी औरत की पायल जैसी आवाज़ नहीं थी। यह आवाज़ भारी थी, धातु जैसी, और इतनी नज़दीक थी मानो कोई ठीक उनके सिर के ऊपर हवा में खड़ा होकर पाँव पटक रहा हो।
तीनों लठैतों के हलक सूख गए।
“सुक्खा... तूने सुना?” छन्नू की लाठी काँपने लगी।
लालटेन की पीली रोशनी में अचानक एक झटके से बदलाव आया। वह पीली लौ धीरे-धीरे मद्धम हुई और फिर... गहरे बैंगनी और हल्के लाल रंग में बदलने लगी।
काँच की चिमनी के भीतर जलती आग से कड़वे तेल की जगह अचानक ताज़ा मोगरे और किसी बहुत पुरानी, श्मशानी राख की मिली-जुली अजीब गंध उठने लगी।
“भूत... भूत है बे!” छन्नू पीछे हटा।
“चुप रह!” मंगतू ने गँड़ासा सीने के आगे ताना, पर उसकी आँखों की पुतलियाँ थरथरा रही थीं, “कौन है रे? सामने आ! ठाकुर बलवंत सिंह का आदमी हूँ... चीर के रख दूँगा!”
सन्नाटे ने जवाब दिया।
गन्ने के खेत के भीतर से हवा का एक ऐसा बर्फीला बवंडर उठा कि तीनों की आँखें धूल से भर गईं। ज़मीन के सूखे ढेले हवा में उड़ने लगे।
और उस बवंडर के बीच, ठीक उस विवादित मेड़ के ऊपर...
ज़मीन से करीब सात फीट की ऊँचाई पर, हवा में...
दो दहकती हुई, सुनहरी-लाल आँखें जल उठीं।
वे आँखें इंसानी नहीं थीं। न ही उनमें कोई पलक झपक रही थी। उन आँखों में ऐसा शून्य और ऐसी प्राचीन क्रूरता थी, जिसे देखकर इंसान का दिल धड़कना भूल जाए।
उस साए का कोई चेहरा नहीं दिख रहा था। बस एक विशाल, गहरा, गुलाबी-काली धुंध का घेरा था, जो हवा में लहरा रहा था।
और फिर उस धुंध के भीतर से एक आवाज़ गूँजी।
वह आवाज़ किसी मुँह से नहीं निकल रही थी। वह सीधे उन तीनों के दिमाग की नसों में गूँज रही थी—जैसे हज़ारों सूखे पत्ते एक साथ चटक रहे हों:
“यह ज़मीन... उसकी है।”
“अरे बाप रे!”
छन्नू ने लाठी फेंकी और उल्टे पाँव भागा।
मंगतू की रीढ़ की हड्डी सुन्न पड़ चुकी थी। वह चाहकर भी अपने पाँव हिला नहीं पा रहा था। तभी उस धुंध के भीतर से हवा का एक अदृश्य, लोहे जैसा भारी थपेड़ा चला।
‘धड़ाक!’
मंगतू हवा में उछला और करीब दस फीट दूर कँटीली बबूल की झाड़ियों में जाकर गिर पड़ा। उसका गँड़ासा छिटककर दूर रेत में धँस गया।
सुक्खा बदहवास होकर चीखते हुए पगडंडी की तरफ भागा।
पीछे खेत में ठाकुर की हवेली के दो भारी-भरकम साँड बँधे थे। वे अचानक रस्सियाँ तोड़कर बिदक उठे।
उनकी आँखों में भी वही खौफ़ था। वे रस्सियाँ तुड़ाकर सीधे ठाकुर की हवेली के दालान की तरफ भागे और दालान के खंभों से सिर टकराने लगे।
चीख-पुकार, साँडों का रँभाना और लठैतों के बदहवास कदमों की आवाज़ ने पूरे गाँव के कुत्तों को रुला दिया।
दूर, अपने कच्चे ओसारे में बैठा मोनू चौंककर खड़ा हो गया।
हवेली की तरफ से शोर उठ रहा था। साँडों के बिदकने की गूँज और किसी के पागलों की तरह चीखने की आवाज़ें रात के सन्नाटे में तैर रही थीं।
मोनू ने लालटेन उठाई और आँगन में निकल आया। उसने अपने खेत की दिशा में देखा।
वहाँ घुप अँधेरा था।
पर उस अँधेरे में, मसान बाबा के थान की तरफ बबूल के पेड़ों के ऊपर एक अजीब-सी, हल्की लाल चमक उठती दिखाई दी, जो पल भर में आसमान में विलीन हो गई।
मोनू के रोंगटे खड़े हो गए। उसने दोनों हाथ जोड़ लिए। उसकी आँखों में आँसू छलक आए।
(‘मसान बाबा...’) उसने काँपते होंठों से बुदबुदाया, (‘आपने मेरी सुन ली... आपने सचमुच मेरी मेड़ बचा ली...’)
उसे पूरा यकीन हो गया कि दोपहर में जिस तरह वह मसान बाबा की चौखट पर सिर पटककर रोया था, यह उसी तलवारधारी लोक-देवता का प्रकोप था, जिसने ठाकुर के लठैतों को खदेड़ दिया।
वह नहीं देख पाया कि जिस वक्त वह हाथ जोड़कर मसान बाबा को नमन कर रहा था...
ठीक उसके कच्चे कमरे की खपरैल पर, एक बेहद लंबी, सुकोमल परछाईं खड़ी थी।
हवा में उसके हल्के गुलाबी बाल तैर रहे थे।
उस साए ने नीचे आँगन में खड़े मोनू को कुछ देर तक देखा।
उसकी सुनहरी आँखों में न क्रोध था, न ममता।
बस एक ऐसा गहरा, प्राचीन भाव था, जिसे इंसानी आँखें पढ़ ही नहीं सकती थीं।
फिर उसने धीरे से आसमान की ओर देखा।
“अभी नहीं...”
बस इतना कहा।
और अगले ही पल वह साया अँधेरे में ऐसे विलीन हो गया, जैसे वहाँ कभी था ही नहीं।
कमरे की कच्ची दीवार पर सिर्फ लालटेन की पीली लौ काँपती रह गई।