### पहचान### सीज़न 1 — अध्याय 1### मजीठा का नौजवानएक सच्ची घटना से प्रेरित काल्पनिक उपन्यासरात के साढ़े ग्यारह बजे थे।लाहौर की सड़कों पर धीरे-धीरे सन्नाटा उतर रहा था। दिनभर शोर से भरे रहने वाले बाज़ारों की दुकानें बंद हो चुकी थीं। कहीं-कहीं चायखानों पर बैठे लोग आख़िरी प्याली के साथ दिनभर की खबरों पर चर्चा कर रहे थे।शहर से कुछ दूर एक आलीशान कोठी की ऊपरी मंज़िल पर रोशनी जल रही थी।कमरे में बैठा पच्चीस वर्षीय कुलवंत सिंह अपने हाथ में शराब का गिलास लिए खिड़की से बाहर देख रहा था।छह फुट लंबा कद, चौड़े कंधे, कसरती शरीर और चेहरे पर अजीब-सा आत्मविश्वास। नियमित जिम जाने के कारण उसका शरीर किसी खिलाड़ी जैसा था। उसके कपड़े, बातचीत और रहन-सहन में किसी अमीर घराने के नौजवान की झलक मिलती थी।लेकिन उसकी आँखों में कुछ ऐसा था, जो उसे बाकी नौजवानों से अलग करता था।वहाँ एक अनजाना डर छिपा था।या शायद वह डर नहीं, कोई ऐसा रहस्य था, जिसे वह दुनिया से ही नहीं, स्वयं से भी छिपाना चाहता था।उसने गिलास मेज़ पर रखा और दीवार पर टँगी एक तस्वीर की तरफ़ देखा।तस्वीर में वह अपनी पत्नी फ़ातिमा के साथ खड़ा था। फ़ातिमा के चेहरे पर मुस्कान थी। उसके पास उनके दोनों बच्चे—इरफ़ान और तशनीन—खड़े थे।यह एक खुशहाल परिवार की तस्वीर थी।कम-से-कम देखने वालों को तो ऐसा ही लगता था।फ़ातिमा, पाकिस्तान के एक प्रतिष्ठित परिवार की इकलौती बेटी थी। कुलवंत से उसका निकाह प्रेम विवाह था। परिवार के कई लोगों ने इस रिश्ते का विरोध किया था, लेकिन फ़ातिमा अपने फैसले पर अड़ी रही। धीरे-धीरे कुलवंत ने घर में अपना स्थान बना लिया था। आज घर के अनेक फैसलों में उसकी राय सबसे महत्वपूर्ण होती थी।उसके पास पैसा था, सम्मान था, परिवार था।फिर भी कभी-कभी आधी रात को उसकी नींद अचानक खुल जाती थी।और तब उसे एक चेहरा दिखाई देता था।एक स्त्री का चेहरा।उसकी माँ, जसबीर कौर का चेहरा।उस रात भी ऐसा ही हुआ।अचानक उसके कानों में किसी के रोने की आवाज़ गूँजने लगी।“बेटा... कुलवंत...”उसने घबराकर पीछे देखा।कमरे में कोई नहीं था।उसने आँखें बंद कीं, लेकिन यादों के दरवाज़े खुल चुके थे।उसे एक पुराना घर दिखाई दिया। घर के आँगन में उसकी माँ खड़ी थी। कुछ दूर उसके नाना, सरदार भिंडर सिंह, बैठे हुए थे। फिर वातावरण बदल गया। शोर, चीखें, भागते हुए लोग और वर्दी पहने कुछ चेहरे...कुलवंत ने झटके से आँखें खोल दीं।“बस!”उसकी आवाज़ खाली कमरे में गूँज उठी।उसने शराब का गिलास उठाया और एक ही साँस में खाली कर दिया।वह अतीत को भूलना चाहता था।लेकिन अतीत कोई पुरानी तस्वीर नहीं था, जिसे फाड़कर फेंका जा सके।वह उसके भीतर जीवित था।और उसी अतीत ने उसे वह इंसान बनाया था, जो आज वह बन चुका था।अमृतसर ज़िले के मजीठा गाँव में कभी उसके परिवार की एक छोटी-सी दुनिया हुआ करती थी। लेकिन कुलवंत की कहानी वहाँ से भी शुरू नहीं होती थी।उसकी कहानी शुरू होती थी 1947 से।उस वर्ष जब सरहदें खिंची थीं, तब लाखों लोगों की तरह उसके दादा-परदादा की दुनिया भी उजड़ गई थी। उसके पिता, सरदार जोगिंदर सिंह, उस समय केवल पंद्रह वर्ष के थे। परिवार को रावलपिंडी छोड़कर भारत आना पड़ा था।उनके मन में एक ही उम्मीद थी—अमृतसर में उनका बड़ा भाई सुखा सिंह रहता था। अपना भाई था। आखिर मुसीबत में भाई ही भाई के काम आता है।लेकिन जब वे अमृतसर पहुँचे, तो उनका स्वागत खुले दरवाज़े से नहीं, बंद दरवाज़े से हुआ।सुखा सिंह ने अपने छोटे भाई और उसके परिवार को अपने घर में जगह देने से इनकार कर दिया।जिस घर को उन्होंने अपना आख़िरी सहारा समझा था, उसी घर से निराश होकर उन्हें लौटना पड़ा।आख़िरकार जोगिंदर सिंह का परिवार एक शरणार्थी शिविर में रहने को मजबूर हो गया।उस दिन पंद्रह वर्षीय जोगिंदर ने अपने मन में एक संकल्प लिया था।वह किसी के सामने हाथ नहीं फैलाएगा।वह अपने पैरों पर खड़ा होगा।लेकिन उसे क्या पता था कि एक दिन उसके बेटे के जीवन में भी ऐसी परिस्थितियाँ आएँगी, जिनमें घर, परिवार, धर्म और पहचान—सब कुछ सवालों के घेरे में खड़ा हो जाएगा।और उस सवाल का जवाब देने के लिए कुलवंत को ऐसी राह पर चलना पड़ेगा, जहाँ से लौटना आसान नहीं होगा।लाहौर में घड़ी ने रात के बारह बजा दिए थे।कुलवंत अपने कमरे से बाहर निकला। गलियारे में सन्नाटा था। नीचे से फ़ातिमा के कमरे का दरवाज़ा बंद दिखाई दे रहा था। बच्चे सो चुके थे।वह सीढ़ियाँ उतरकर बरामदे में आ गया।तभी उसके मोबाइल पर एक संदेश आया।संदेश भेजने वाले का नाम देखकर उसका चेहरा बदल गया।वह उसका पुराना साथी था—ऐसा आदमी, जो उसके जीवन के कई रहस्यों से परिचित था।संदेश में केवल एक पंक्ति लिखी थी—“कुलवंत, मुझे अब तुम्हारे अतीत का सच पता चल गया है।”कुछ क्षण तक वह मोबाइल को घूरता रहा।फिर दूसरा संदेश आया।“और अगर तुमने मुझे सच नहीं बताया, तो कल सुबह तक यह बात उन लोगों तक पहुँच जाएगी, जिनसे तुम सबसे अधिक डरते हो।”कुलवंत की उँगलियाँ काँप उठीं।पहली बार उसे महसूस हुआ कि उसकी बनाई हुई दुनिया की नींव हिलने लगी है।उसने तुरंत फोन मिलाया।कोई जवाब नहीं मिला।दूसरी बार कोशिश की।फोन बंद था।कुलवंत ने गहरी साँस ली। उसके सामने अब केवल दो रास्ते थे—या तो वह अपने साथी को हमेशा के लिए चुप करा दे, या फिर उस सच का सामना करे, जिसे उसने वर्षों से अपने भीतर दफन कर रखा था।वह नहीं जानता था कि अगली सुबह उसके लिए क्या लेकर आएगी।लेकिन इतना तय था कि उसका अतीत अब उसका पीछा छोड़ने वाला नहीं था।और उस अतीत की शुरुआत हुई थी एक बंद दरवाज़े से—1947 में।क्रमशः…Sir, अध्याय 1 में हमने वर्तमान के रहस्य से शुरुआत करके कहानी को 1947 की ओर मोड़ा है।