colors of courage in Hindi Motivational Stories by Vijay Erry books and stories PDF | हिम्मत के रंग

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हिम्मत के रंग

हिम्मत के रंग 
लेखक: विजय शर्मा एरी
गाँव के किनारे बसे छोटे-से घर में रवि अपने पिता के साथ रहता था। माँ की मृत्यु हुए कई वर्ष हो चुके थे। पिता जी एक साधारण किसान थे। खेत छोटे थे, फसलें अनिश्चित थीं, और कर्ज का बोझ हमेशा सिर पर टंगा रहता था। रवि बारह वर्ष का था जब उसने पहली बार हिम्मत का अर्थ समझा।
उस दिन आकाश में काले बादल घिरे हुए थे। अचानक आँधी आई। तेज हवा ने पेड़ों को झुका दिया। रवि खेत में था। पिता जी घर पर थे। अचानक एक तेज गर्जना हुई और बिजली कड़की। खेत के किनारे खड़ा पुराना आम का पेड़ टूटकर गिर पड़ा। पेड़ के नीचे पिता जी का बैल बँधा हुआ था। रवि दौड़ा। बैल चीख रहा था। पेड़ की मोटी डाल उसके शरीर पर पड़ी थी। रवि ने बिना सोचे-समझे डाल को उठाने की कोशिश की। डाल बहुत भारी थी। उसके छोटे हाथ काँप रहे थे। आँखों में आँसू आ गए, लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी। वह चिल्लाया, “पिता जी… पिता जी!”
पिता जी दौड़े आए। दोनों ने मिलकर डाल हटाई। बैल बच गया। उस रात पिता जी ने रवि के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “बेटा, हिम्मत सिर्फ बड़े लोगों में नहीं होती। हिम्मत छोटे दिल में भी रहती है। आज तुमने साबित कर दिया।”
रवि उस बात को कभी नहीं भूला।
वर्ष बीतते गए। रवि सोलह वर्ष का हो गया। स्कूल में वह अच्छा पढ़ता था, लेकिन गरीबी हमेशा साथ चलती थी। एक दिन स्कूल में अध्यापक ने घोषणा की कि जिले के स्तर पर निबंध प्रतियोगिता होगी। विषय था—“सच्ची हिम्मत क्या है?” विजेता को छात्रवृत्ति मिलेगी। रवि के दिल में आशा जगी। वह रात-रात भर लिखता रहा। उसने अपने जीवन की कहानी लिखी—माँ की मृत्यु, पिता का संघर्ष, बैल की घटना, और अपने मन में उठने वाले डर। उसने लिखा कि हिम्मत का मतलब डर का न होना नहीं है। हिम्मत का मतलब है डर के बावजूद आगे बढ़ना।
प्रतियोगिता के दिन रवि का निबंध चुना गया। जिले के अधिकारियों ने उसकी तारीफ की। छात्रवृत्ति मिल गई। पहली बार घर में खुशी की लहर दौड़ी। पिता जी की आँखें भर आईं।
लेकिन खुशी ज्यादा दिन नहीं टिकी। एक शाम अचानक पिता जी बीमार पड़ गए। डॉक्टर ने कहा कि उन्हें दिल की गंभीर समस्या है। इलाज महँगा था। गाँव के पास कोई अच्छा अस्पताल नहीं था। शहर जाना पड़ता। रवि के पास पैसे नहीं थे। छात्रवृत्ति का पैसा भी अधूरा था। रवि ने सोचा कि अब क्या करे। उसने रात भर जागकर सोचा। सुबह उठकर उसने फैसला किया।
वह शहर गया। वहाँ एक छोटे होटल में काम करने लगा। सुबह चार बजे उठता, बर्तन साफ करता, टेबल साफ करता, और शाम को पिता जी के पास अस्पताल जाता। कई बार थकान से बेहोश होने को होता, लेकिन हिम्मत नहीं छोड़ता। एक दिन होटल के मालिक ने उसकी मेहनत देखी और कहा, “तुम पढ़ना चाहते हो न? मैं तुम्हें आधा दिन की छुट्टी दे दूँगा, लेकिन काम पूरा करना होगा।” रवि ने सिर हिलाया।
दिन बीतते गए। पिता जी की हालत सुधरने लगी। रवि ने रात में पढ़ाई जारी रखी। उसने बारहवीं की परीक्षा दी और अच्छे अंक लाए। कॉलेज में दाखिला लिया। अब वह सुबह कॉलेज जाता, दोपहर को होटल में काम करता, और रात को अस्पताल। शरीर कमजोर हो रहा था, लेकिन मन मजबूत था।
एक दिन कॉलेज में एक बड़ी समस्या आई। कुछ छात्रों ने एक गरीब लड़की को परेशान करना शुरू कर दिया। लड़की रो रही थी। आसपास के छात्र चुप थे। डर था। रवि ने देखा। उसके अंदर कुछ उबल उठा। वह आगे बढ़ा और बोला, “बस करो। यह गलत है।” लड़के गुस्से में आ गए। एक ने धक्का दिया। रवि गिर गया, लेकिन उठा और फिर बोला, “मैं अकेला नहीं हूँ। गलत के खिलाफ खड़े रहना ही हिम्मत है।” कुछ और छात्र आगे आए। झगड़ा रुक गया। लड़की बच गई। बाद में प्राचार्य ने रवि की प्रशंसा की।
उस घटना के बाद रवि के मन में एक नई सोच आई। वह सिर्फ अपनी जिंदगी नहीं सुधारना चाहता था। वह दूसरों की मदद भी करना चाहता था। उसने गाँव के बच्चों के लिए मुफ्त पढ़ाने का फैसला किया। हर रविवार वह गाँव जाता और छोटे बच्चों को पढ़ाता। कुछ बच्चे बहुत गरीब थे। उनके पास किताबें तक नहीं थीं। रवि ने अपनी छात्रवृत्ति का कुछ हिस्सा बचाकर किताबें खरीदीं।
एक दिन गाँव में बाढ़ आई। नदी उफान पर थी। कई घर पानी में डूब गए। लोग भाग रहे थे। रवि भी घर पहुँचा। पिता जी कमजोर थे। पानी बढ़ रहा था। रवि ने पिता जी को कंधे पर उठाया और ऊँचे स्थान की ओर चल पड़ा। रास्ते में एक छोटे बच्चे की चीख सुनाई दी। बच्चा पानी में फँस गया था। रवि ने पिता जी को सुरक्षित जगह पर बैठाया और बच्चे की ओर बढ़ा। पानी तेज बह रहा था। रवि डूबने लगा, लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी। उसने बच्चे को पकड़ा और किनारे खींच लाया। गाँववाले उसकी हिम्मत देखकर दंग रह गए।
बाढ़ के बाद गाँव में मदद की जरूरत थी। रवि ने युवाओं को इकट्ठा किया। उन्होंने मिलकर घर साफ किए, खाना बाँटा, और बीमारों की देखभाल की। रवि रात-रात भर जागता रहा। एक रात वह थककर सो गया। सपने में माँ दिखाई दीं। माँ मुस्कुरा रही थीं और कह रही थीं, “बेटा, हिम्मत रखना। तुम सही रास्ते पर हो।”
वर्ष बीतते गए। रवि ने कॉलेज पूरा किया। उसने समाज सेवा में रुचि ली। एक दिन एक बड़ी संस्था ने उसे नौकरी का प्रस्ताव दिया। शहर में अच्छा वेतन, आराम की जिंदगी। लेकिन रवि ने मना कर दिया। उसने कहा, “मेरा काम गाँव में है।” उसने गाँव में एक छोटा स्कूल खोला। नाम रखा—“हिम्मत विद्यालय”। शुरू में सिर्फ दस बच्चे आए। धीरे-धीरे संख्या बढ़ी। रवि खुद पढ़ाता था। उसने बच्चों को सिर्फ किताबें नहीं सिखाईं। उसने उन्हें हिम्मत सिखाई। उसने कहा, “डर तो सबको लगता है। लेकिन डर के आगे बढ़ना ही असली जीत है।”
एक दिन स्कूल में एक लड़की आई जिसका नाम सीमा था। सीमा बहुत शर्मीली थी। बोल नहीं पाती थी। उसके पिता शराबी थे और घर में मारपीट होती थी। सीमा स्कूल आने से डरती थी। रवि ने धीरे-धीरे उससे बात की। उसने सीमा को लिखाई सिखाई। एक दिन सीमा ने अपनी कहानी लिखी। रवि ने उसे पढ़ा और आँखें भर आईं। उसने सीमा को कहा, “तुम बहुत हिम्मती हो। तुमने दर्द को शब्दों में बदल दिया।” सीमा धीरे-धीरे खुलने लगी। उसने कक्षा में बोलना शुरू किया। एक दिन उसने पूरे स्कूल के सामने अपनी कविता सुनाई। सब ताली बजा रहे थे। सीमा की आँखों में चमक थी।
रवि की कहानी गाँव से आगे निकल गई। अखबारों में छपी। एक दिन एक पत्रकार आया और पूछा, “आपकी हिम्मत का स्रोत क्या है?” रवि मुस्कुराया और बोला, “मेरे पिता जी। उन्होंने कभी हार नहीं मानी। और मेरी माँ, जो अब नहीं हैं, लेकिन उनकी याद हमेशा हिम्मत देती है। हिम्मत बाहर से नहीं आती। वह अंदर से आती है। जब आप दूसरों के लिए खड़े होते हैं, तब हिम्मत और मजबूत हो जाती है।”
पिता जी की उम्र बढ़ चुकी थी। एक शाम वे बिस्तर पर लेटे हुए रवि से बोले, “बेटा, तुमने मेरी आँखों को गर्व से भर दिया। तुमने साबित कर दिया कि गरीबी हिम्मत को नहीं रोक सकती।” रवि ने पिता जी का हाथ पकड़ा। आँखों में आँसू थे, लेकिन मुस्कान भी थी।
कुछ महीने बाद पिता जी चल बसे। रवि अकेला रह गया, लेकिन अकेला नहीं। पूरे गाँव ने उसे सहारा दिया। हिम्मत विद्यालय अब सौ से ज्यादा बच्चों का घर बन चुका था। रवि ने और शिक्षकों को जोड़ा। उसने बच्चों को खेती भी सिखाई, ताकि वे आत्मनिर्भर बन सकें।
एक दिन एक बड़ा अधिकारी स्कूल देखने आया। उसने रवि से कहा, “आपको शहर में बड़े पद पर काम करना चाहिए।” रवि ने धीरे से जवाब दिया, “सर, शहर में कई लोग हैं जो बड़े पद संभाल सकते हैं। लेकिन गाँव में बच्चों को हिम्मत सिखाने वाला कोई और नहीं। मेरी जगह यहीं है।”
अधिकारी चुप रहा। बाद में उसने स्कूल को सरकारी मदद दिलवाई। नई इमारत बनी, किताबें आईं, कंप्यूटर आए। रवि ने बच्चों को कंप्यूटर भी सिखाना शुरू किया।
समय बीतता गया। रवि अब चालीस वर्ष का हो चुका था। उसके बाल सफेद होने लगे थे, लेकिन आँखों में वही चमक थी। एक दिन स्कूल के सालाना समारोह में सीमा आई। अब वह एक सफल डॉक्टर बन चुकी थी। उसने मंच पर खड़े होकर कहा, “आज मैं जो कुछ हूँ, वह रवि सर की हिम्मत की वजह से हूँ। उन्होंने मुझे सिखाया कि डर के आगे बढ़ना ही जीवन है।”
रवि की आँखें भर आईं। उसने भीड़ की ओर देखा। सैकड़ों चेहरे। बच्चे, माता-पिता, गाँववाले। सब मुस्कुरा रहे थे। उस पल रवि को लगा कि उसकी सारी मेहनत सफल हो गई।
रात को अकेले बैठकर उसने डायरी खोली। पहली बार उसने लंबा लिखा। लिखा—
“हिम्मत कोई जादुई शक्ति नहीं है। हिम्मत रोजमर्रा के छोटे-छोटे फैसलों में छिपी होती है। जब तुम थक जाते हो और फिर भी उठते हो, वह हिम्मत है। जब तुम डरते हो और फिर भी सही काम करते हो, वह हिम्मत है। जब तुम अकेले होते हो और फिर भी दूसरों के लिए खड़े होते हो, वह हिम्मत है। मैंने जीवन में बहुत कुछ खोया—माँ, पिता, आराम, आकांक्षाएँ। लेकिन मैंने हिम्मत नहीं खोई। और हिम्मत ने मुझे सब कुछ वापस दे दिया—प्यार, सम्मान, और उद्देश्य।”
डायरी बंद करके रवि ने खिड़की से बाहर देखा। चाँद चमक रहा था। हवा में हल्की ठंडक थी। उसने धीरे से कहा, “माँ, पिता जी… तुम्हारा बेटा अब भी हिम्मत रखे हुए है।”
अगली सुबह स्कूल में घंटी बजी। बच्चे दौड़ते हुए आए। रवि मुस्कुराया। एक नया दिन शुरू हुआ। और हिम्मत की कहानी आगे बढ़ती रही।
आज भी गाँव में जब कोई मुश्किल में पड़ता है, तो लोग कहते हैं—“रवि भैया की तरह हिम्मत रखो।” और बच्चे स्कूल में पढ़ते हुए सीखते हैं कि सच्ची हिम्मत किताबों में नहीं, दिल में बसती है।
हिम्मत कभी खत्म नहीं होती। वह एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक चलती रहती है। ठीक वैसे ही जैसे रवि ने अपने पिता से सीखी थी, और अब सैकड़ों बच्चे उससे सीख रहे हैं।
समाप्त
(यह कहानी लगभग 2000 शब्दों की है।)