"अरे भाई सुनो।" सागर भाई ने अपने साथी के साथ घोड़ा पकड़कर चलते हुए रास्ते में एक आदमी को रोका
"हा कहिए भाई, कोई मदद चाहिए।" वो उनकी तरफ़ मुड़ गया
"मुझे बेलोस हवेली जाना है आप मुझे वहा का रास्ता बता देंगे।"
"बेलोस हवेली?" वो दोनों को ग़ौर से देखने लगा
"हां भाई, हमें तोहफ़ा पहुंचाना है।"
"अच्छा।" उसके चेहरे पर से सवालिया निशान मिट गया "आप यहां से सीधे रास्ते चले जाइए आप को मालूम हो जाएगा बे लोस हवेली कहा हैं।" बताकर वो चला गया। उसकी बात पर सागर भाई ने लंबी सांस खींचा
"चलो भाई राघव अब इस पहेली को भी बुझते है।"
"आप अब आगे क्या करने वाले है?" उनकी गोल गोल बातों को ध्यान में रखकर राघव भी गुमान में डूबा हुआ था
"पहले तो हमें अंदर की ख़बर निकालने के लिए अंदर पहुंचना होगा। वो कहते हैं न अंदर के राज़ अन्दर से पता करो।"
"सही कहा आपने - कहते हैं भरो चाभी नौकर की और राज़ बाहर। अंदर की बात पता करने के लिए नौकरों पर नज़र रखना होगा। उनके ज़रिए तो सात तह में छुपी ख़बर भी बाहर निकल आती है।"
"हां भाई, ऐसा ही करते हैं।"
अंदर की कहानी मालूम करने का मंसूबा बनाते हुए वो लोग रास्ता पार करने लगे। चलते चलते हवेली के पास पहुंचते ही राघव की नज़र हवेली पर टिक गई
"लगता है यही हवेली है।"
"इसलिए कहा था उसने ख़ुद समझ आ जाएगा।" सागर भाई भी हवेली का जायज़ा लेने लगे "चलो फिर इंतज़ार कैसा।"
दोनों लोग हवेली की तरफ़ आ गए। हवेली का दरवाज़ा बंद था और सामने दो पहरेदार खड़े थे। सागर भाई ने एक की तरफ़ बढ़े
"भाई हमें अंदर जाना है।" दोनों पहरेदार ने एक दूसरे को देखा, इशारों में बात करके एक अंदर चला गया। कुछ देर में वो बूढ़े शख़्स के साथ बाहर आकर अपनी जगह खड़ा हो गया।
बूढ़ा शख़्स सागर भाई के पास आ गया
"किसे मिलना है?"
सवाल पर राघव ने सवाल किया "चाचा क्या ये बेलोस हवेली है?"
"नवे हो क्या बेटा आलीपुर में?"
"जी चाचा नए हैं - हम हवेली के लिए तोहफ़ा लाए है।"
"अच्छा तो आप छोटी साहबजान के लिए आए हैं।" उनका बेरुखा लहजा फ़ौरन बदल गया
"थोड़ी देर ठहरिए मैं अभी आता हूं।" बूढ़ा आदमी तेज़ी से हवेली की तरफ़ बढ़ गया उसे देखकर सागर भाई ने हैरत से उन्हें देखने लगे
"इन्हें कैसे मालूम हम किसके लिए आएं हैं?"
"अब ये तो अंदर चलकर ही मालूम होगा।"
"ऐसा लगता है अभी बहुत कुछ चौंकाने वाला सामने आने वाला है।"
"क्या मालूम, शायद......।" कुछ देर इंतज़ार करने के बाद, बूढ़े आदमी को किसी के साथ वापस आता देख राघव ने सागर भाई को सतर्क किया "वो आ रहे हैं।"
बूढ़ा शख़्स एक लड़के के साथ आया था। उन्होंने उस लड़के से इशारा किया
"यही वो लोग हैं।" वो लड़का दोनो को अपने साथ अंदर ले गया।
दोनो लोग चारों तरफ़ नज़र फेरते हुए अंदर जाने लगे। इन्होंने देखा बग़ीचे में फूलो की देखभाल करता हुआ माली, टोकरी लिए एक लड़की जिसने एक हाथ से दुपट्टा नाक पर रखा हुआ था, एक लड़की जो इन्हें तिरछी नज़र से घूर रही थी, एक तरफ़ दो लड़कियां आपस में बात करते हुए, कुछ लड़के जो सामान ढो रहे थे, और सबकी नज़र इन दोनों पर ही टिक गई थी। ये लोग नज़ारे देखते हुए आगे बढ़ रहे थे। लड़के ने एक जगह इन्हें ठहरा लिया
"आपलोग अपना घोड़ा यहीं पर छोड़ दीजिए, ये हवेली के अंदर नहीं जाएंगे।" उस लड़के ने घोड़ा चरवाहा को आवाज़ देकर घोड़ा उसके साथ भेज दिया।
ये लोग लड़के के पीछे हवेली के अंदर चले गए। दाख़िल होते ही इनके कानो से हवेली में गूंजती हुई आवाजें टकराने लगी
"मैंने कहा था बदलने को, नजाने चंदा ने क्यों नहीं बदले।"
"तो आप ही बदल दीजिए इन्हें। सूखे फूल हमें पसंद नही जानती हैना आप।"
"क्यू गुस्सा कर रही हो मेरी प्यारी बहन, बदल जाएंगे ये फूल।.... इन्हें जल्दी से बदल दीजिए।"
"साम भाई आप.. ऐसे काम होगा तो फिर सब काम अधूरा रह जाएगा।"
"हम जाते है भैय्या ताज़े फूल लेकर आते है बाहर से।"
गूंजती हुई आवाज़ें बंद हो गई। जिस रास्ते से ये लोग हवेली के अंदर जा रहे थे उसी रास्ते बागीचे वाली लड़की फूलो से भरी टोकरी लेकर उन्हें घूरते हुए तेज़ी से अंदर पहुंच गई।
लड़का इन्हें अपने साथ लेकर घूमते हुए हवेली के मेहमानख़ाने में पहुंच गया। कमरे में दीवान, क़ालीन, परदे सब सफ़ेद और बदामी रंग के लगे थे। लड़का दोनो को बिठाकर मिबसाम को लेने चला गया। मिबसाम के आते ही दोनो लोग ताज़ीम में खड़े हो गए। मिबसाम ने बैठते हुए इन्हें भी बिठाया
"क्या आपलोग अम्हेल से मिलने आए है?" उसने नर्मी से पूछा
"मेरी बीवी ने उनके लिए तोहफ़ा भिजवाया है।" उन्होंने बताया
"किस कस्बे से हैं अपलोग?"
"हमलोग बंसीपूर से आएं है।"
"बंसीपूर?" थोड़ी देर इसके बारे में सोचकर मिबसाम जुस्तुजू में पड़ गया "अम्हेल तो कभी बंसीपूर की तरफ़ नहीं गई फिर आपलोग उसे कैसे जानते है?"
"असल में उन्होंने यहां पर छोटी दरगाह में मेरी बीवी का बहुत ख़्याल रखा था। इसलिए मेरी बीवी ने उनका शुक्रिया अदा करने के लिए उन्हे तोहफ़ा भिजवाया है।"
"वो उन्हें जानती है?... लेकिन अम्हेल तो इस वक़्त आलीपुर में नहीं हैं।"
"जी मुझे यहां पहुंचकर ख़बर मिली। मेरी बीवी यहां पर उनसे पिछले बरस मिली थी।"
"ठीक है, आप तोहफ़ा रख दीजिए, ये मैं उनतक पहुंचा दूंगा।"
"तोहफ़ा रख दो।" सागर भाई ने कहा, तोहफ़ा ढूंढकर राघव ने घबराते हुए आहिस्ता से बताया
"सागर भाई तोहफ़ा घोड़े के साथ रह गया।"
"ऐसे कैसे?"
"कोई बात नहीं आप आराम से बैठिए। मैं थोड़ा जल्दी में हूं इसलिए चलता हूं। तोहफ़ा आप मेरी बहन को दे दीजिए।" दोनों को देखकर मिबसाम उन्हें तसल्ली देकर खड़ा हो गया
मिबसाम लड़के को कुछ समझाकर, उसी इनके साथ छोड़ कर चला गया। राघव भी तोहफ़ा लेने बाहर चला गया।
कुछ देर में माहम भी यहां पहुंच आई, उसपर नज़र पड़ते ही सागर भाई हैरत से खड़े हो गए।
उसे देखकर लड़का फ़ौरन उसके पीछे हो गया और वो सोफे पर अदब से बैठ गई। उसने इशारा करके उन्हें भी बैठने को कहा
"क्या आप ही आएं है साहबजान से मिलने?" उसने काफ़ी नर्म लहजा इस्तेमाल किया
"जी।" उन्होंने बैठकर जवाब दिया
इसके जवाब के साथ महम के पीछे खड़े उसी लड़के ने माहम के कान में तोहफ़े के बारे में बताया जिसपर उसने सागर भाई से फिर कुछ नही पूछा बल्कि लड़के को इशारा करके पानी उनके सामने पेश करवाया।
सागर भाई की नज़र चुपके चुपके नौकरों पर बिल्कुल कड़ी थी उसकी तलाश के लिए जिसकी उन्हें ज़रूरत है। आलीपुर की मेहमाननवाज़ी से वो मोहित हो रहे थे मगर उनके मन में सवाल था कि क्या ये सबकुछ हक़ीक़त है, या फिर भ्रम है।अगर हक़ीक़त है तो अम्हेल की कहानी क्या है, और अगर भ्रम है तो फ़िर हक़ीक़त क्या है? आख़िर क्या है जो उन्हें तलाश करना है।
वो उसकी तलाश में थे जो उन्हें नज़र नही आ रहा था। उन्हें सोच में विलीन देखकर माहम ने उनसे सवाल किया
"आप कुछ उलझे उलझे मालूम हो रहे है?"
"असल में मैं अक्सर यही सोचा करता था की कौन है जिन्हें मेरी बीवी भूल ही नहीं पाती, आख़िर ऐसा क्या है उनमें। आज मैं समझ गया ऐसा क्यों था। मैं उनसे मिल नही पाया अफ़सोस है मुझे नजाने मैं अपनी बीवी को जाकर क्या जवाब दूंगा।"
"आप उनसे कहिएगा उनका भिजवाया हुआ तोहफ़ा सही हाथों में पहुंच गया है।" उसके नर्म लहजे के साथ नर्म मुस्कुराहट भी ज़ाहिर हुई
राघव भी तोहफ़े के साथ हाज़िर हो गया। सागर भाई ने तोहफ़ा उससे लेकर माहम के सामने रख दिया
"ये बहुत क़ीमती नही लेकिन उसने ख़ुशी से भेजा है।"
"हमारे नज़दीक मुहब्बत से भरे तोहफ़े ही क़ीमती होते है।" महम के अंदाज़ में उन्हें अम्हेल की झलक आने लगी।
"मैंने सोचा था उनसे मिलकर उनका शुक्रिया अदा करूंगा। लेकिन अब ऐसा लग रहा उनसे मिलना या आपसे मिलना एक ही बात है। आप मेरी और मेरे बीवी की तरफ़ से उन्हें शुक्रिया कह दीजिएगा।"
"ज़रूर।"
"हम अब चलते हैं इजाज़त दीजिए।" तोहफ़ा देकर सागर भाई उठ खड़े हुए।
माहम की इजाज़त से वो लड़का इन्हें इनके घोड़े के साथ दरवाज़े तक छोड़कर लौट गया। हवेली से निकलते ही सागर ने कहा
"तुमने ध्यान दिया था, इनलोग की नज़र हमपर कितनी तेज़ थी।"
"मुझे भी यही बताना है।" राघव हवेली के कुछ आगे ठहर गया "उसके भाई ने हमपर नज़र रखने को कहा था। मैं जब बाहर निकला तो उस फूलो की टोकरी वाली लड़की की नज़र मुझपर ही थी। उसके बाद घोड़े की तरफ़ जाने के बाद मैंने माली से बातों बातों में मालूम किया लेकिन उसने भी कुछ नहीं बताया। उनसे कहा वो हवेली में दो मौसम पहले ही आया है इसलिए आगे पीछे का उसे कुछ नही पता।" उसके चेहरे पर जुस्तुजू के साथ हैरानी भी थी
"लेकिन ढूंढते ढूंढते मैंने फूलों की टोकरी वाली लड़कों को दूसरी लड़की से बात करते सुना। उसने बताया
...ये बेचारे भी तोहफ़ा लेकर आएं हैं।.....
.......अब इनका तोहफ़ा भी तोहफे के ढेर में पहुंच जाएगा।.....
....इन्हें क्या पता साहबजान तो अब शायद ही हवेली आएं।......
......किसी के साथ ऐसा होगा तो वो क्योंकर वापस आएगा। बेचारी साहबजान उन्हें तो फ़िज़ूल में इतना कुछ झेलना पड़ा। नवाब की ग़लती की सज़ा उन्हें मिल गई, और वो कमबख़्त माली भी समय से भाग गया था। और हमारी साहबजान कुछ नही कर पाईं......
उन्हें सारी बात बताकर राघव सोच की दुनिया से बाहर आया
"चौंकने वाली बात ये है कि जिस माली की बात हो रही है वो तबसे ग़ायब है, किसी को उसका कोई पता नहीं।"
"अब ये माली का क्या चक्कर है?" सागर भाई भी ताज्जुब में पड़ गए
"हो न हो चक्कर गहरा है। जो है नज़र नहीं आ रहा, जो नहीं है उसे भी ढूंढना है "
"तुमने बताया कि ये नया माली दो मौसम पहले ही हवेली में आया है।"
"और ये भी की कोई नवाब है।"
"हां! ये नवाब कौन है?...इसके बारे में मालूम करना होगा।" राघव के बाद सागर भाई भी ताजुब्ब खेज़ हो चुके थे
"इसका हल भी निकल गया है।..." उसके कहते ही सागर भाई की नज़र उसपर घूम गई
"एक लड़की पूरे हवेली मेरा पीछा कर रही थी और तबेले तक भी मेरे पीछे आ गई थी। उसने मुझसे कहा कि साहबजान के बारे में मालूम करना है तो वो बता सकती है। उसने कहा जो कुछ भी मालूम करना है वो शाम को बताएगी बशर्त उसे उनकी ख़बर चाहिए।
शाम को हवेली के बाहर इंतज़ार करने को कहा है।"
"उसे कैसे पता हम क्या करने आए हैं? और उससे बड़ा सवाल जब सब ख़ामोश है तो वो ख़ुद आकर क्यों बताना चाहती है और क्या?"
"अब ये तो शाम को मालूम होगा लेकिन हमें उससे होशियार रहना होगा।"
"हम्मम, लेकिन अभी फिलहाल तो बादल घिरने लगे है, कहीं आसरा ढूंढ लेते है।" सागर भाई ने आसमान को देखा
सागर भाई का लगाया हुआ अंदाज़ा सही निकला। हवेली से निकलने के बाद बदलते मौसम के साथ कुछ हैरान कर देने वाली बातें हुई और वो इंसान सामने आया जो मंज़िल तक पहुंचने वाले रास्ते को आसान करने वाला था हालांकि अभी बहुत कुछ बाक़ी था जिसे सामने आना था।
ये दोनों हवेली के पास आसरा लेकर हवेली पर नज़र रखने लगे।