Junius - 1 in Hindi Fiction Stories by Vijay books and stories PDF | जिनीयस - 1

The Author
Featured Books
Categories
Share

जिनीयस - 1

१ — किस्मत 

इंसान हर चीज़ से लड़ सकता है।

मुश्किल हालात से। लोगों से। अपने डर से भी।

लेकिन अपनी किस्मत से?

मैंने यह बात बहुत बार सुनी थी। हर बार मुझे लगता था कि शायद ऐसा वही लोग कहते होंगे जिन्होंने लड़ने से पहले ही हार मान ली। मैं उन लोगों में नहीं थी। मेरा मानना था कि अगर ज़िंदगी आपके सामने चुनौती रखती है, तो आपको खड़े होकर उसका सामना करना चाहिए।

मैं लड़ना जानती थी।

कम से कम, उस दिन तक मुझे यही विश्वास था।

मेरा नाम विशाखा है। मैं एमबीबीएस डॉक्टर हूँ और शहर के एक बड़े, प्रतिष्ठित अस्पताल में प्रैक्टिस करती हूँ। अस्पताल में दिन कब शुरू होता और कब खत्म, कई बार पता ही नहीं चलता था। किसी दिन एक साथ इतने मरीज आ जाते कि बैठकर पानी पीने का समय नहीं मिलता। फिर भी मैं हर मरीज की बात सुनती थी। दवा लिखना मेरे काम का एक हिस्सा था; सामने बैठे इंसान का डर समझना भी उतना ही ज़रूरी लगता था।

एक बार रात की ड्यूटी में एक बुज़ुर्ग महिला अपने पति को लेकर आई थीं। उनकी हालत गंभीर नहीं थी, लेकिन वह इतनी घबराई हुई थीं कि बार-बार एक ही सवाल पूछ रही थीं।

“डॉक्टर, ये ठीक हो जाएँगे ना?”

मेरे पास उस समय उन्हें देने के लिए कोई बड़ा भाषण नहीं था। मैंने उनकी जाँच की, इलाज शुरू किया और उनके पास बैठकर कहा, “मैं यहीं हूँ। जो ज़रूरी होगा, हम करेंगे।”

कुछ देर बाद जब उनके पति की हालत संभली, वह महिला मेरा हाथ पकड़कर रो पड़ीं। उस रात मुझे फिर याद आया कि मैंने डॉक्टर बनना क्यों चुना था।

लोग मुझे आत्मविश्वासी कहते थे। कुछ मेरी खूबसूरती की तारीफ करते थे, कुछ मेरी समझदारी की। मुझे अच्छा लगता था, लेकिन अपनी पहचान मैंने इन बातों से नहीं बनाई थी। मैंने पढ़ाई की थी, मेहनत की थी और अपने पैरों पर खड़ी हुई थी। मुझे अपने फैसले खुद लेना पसंद था।

मैं किसी के सामने हाथ फैलाकर जीना नहीं चाहती थी।

मेरी एक छोटी बहन थी—अंजली।

बचपन में वह अक्सर मेरी चीज़ें बिना पूछे ले जाती थी। मैं गुस्सा करती तो हँसकर कहती, “दीदी की चीज़ बहन की भी तो हुई।” बड़ी होने पर भी उसकी यह आदत नहीं बदली। मेरे कमरे में आती, अलमारी खोलती और पूछती, “यह ड्रेस मैं पहन लूँ?”

मैं हर बार कहती, “पहले पूछा कर।”

और हर बार वह जवाब देती, “तो पूछ ही रही हूँ!”

हम दोनों में बहुत प्यार था।

कम से कम, मुझे तो यही लगता था।

अंजली की शादी तय हुई तो घर में जैसे उत्सव शुरू हो गया। लड़का पढ़ा-लिखा था और प्लास्टिक की छोटी-छोटी चीज़ें बनाने की फैक्ट्री चलाता था। परिवार को रिश्ता अच्छा लगा। दोनों ओर बात हुई और शादी की तारीख तय हो गई।

माँ ने कपड़े सँभाले। पापा रिश्तेदारों की सूची बनाने लगे। अंजली कभी गहनों को लेकर उत्साहित होती, कभी सजावट के नमूने देखकर। मैं अस्पताल की ड्यूटी के बाद घर लौटती तो वह मेरा हाथ पकड़कर कोई नया काम बता देती।

“दीदी, कल मेरे साथ चलना। अकेले रंग तय नहीं कर पाऊँगी।”

मैं थकी होती, फिर भी उसके साथ चली जाती। मुझे उसे खुश देखकर खुशी होती थी।

शादी से ठीक एक दिन पहले भी घर में वैसी ही भागदौड़ थी। मंडप सज चुका था। रिश्तेदार आने लगे थे। माँ रसोई और मेहमानों के बीच दौड़ रही थीं। मैं अस्पताल से जल्दी लौट आई थी, ताकि अंजली के साथ कुछ देर बैठ सकूँ।

लेकिन अंजली अपने कमरे में नहीं थी।

पहले किसी ने खास ध्यान नहीं दिया। लगा शायद ब्यूटी पार्लर गई होगी, या किसी सहेली के साथ सामान लेने निकली होगी। फिर उसका फोन बंद मिला।

एक घंटा बीता। फिर दूसरा।

माँ ने उसकी सहेलियों को फोन किया। पापा बाहर उसे ढूँढने गए। मैं उसके कमरे में खड़ी थी। बिस्तर पर शादी के लिए निकाले कपड़े रखे थे। आईने के पास वे झुमके रखे थे जिन्हें पहनकर उसने सुबह मुझसे पूछा था, “कैसे लग रहे हैं?”

वह बिना बताए कहाँ चली गई थी?

शाम तक घर में हड़कंप मच गया।

“किसके साथ गई होगी?”

“कहीं शादी से डर तो नहीं गई?”

“अगर जाना ही था तो आज क्यों?”

हर कोई अपनी बात कह रहा था। किसी के पास जवाब नहीं था।

माँ रो रही थीं। पापा बार-बार फोन मिलाकर वही बंद नंबर सुन रहे थे। कुछ रिश्तेदार सचमुच अंजली की चिंता कर रहे थे; कुछ की सबसे बड़ी चिंता यह थी कि सुबह आने वाले मेहमानों से क्या कहा जाएगा।

दूसरी ओर लड़के के परिवार तक खबर पहुँची तो वे भी घर आ गए।

उनमें से एक आदमी ने गुस्से में कहा, “हमारे परिवार को इतनी बड़ी बेइज्जती झेलनी पड़ रही है। अब आप लोग क्या चाहते हैं?”

मैंने माँ की ओर देखा। वह जवाब देने की हालत में नहीं थीं।

“पहले अंजली को ढूँढना ज़रूरी है,” मैंने कहा।

“और शादी का क्या होगा?” सामने से सवाल आया।

मुझे उस समय यह सवाल सुनकर गुस्सा आया। मेरी बहन लापता थी। किसी को यह नहीं पता था कि वह सुरक्षित भी है या नहीं।

रात बढ़ती गई। अंजली का कोई पता नहीं चला।

फिर परिवार के कुछ लोग अलग कमरे में बात करने लगे। जब मुझे वहाँ बुलाया गया, सबकी नज़रें एक साथ मुझ पर उठीं। मुझे तुरंत समझ आ गया कि वे क्या कहने वाले हैं।

“डॉक्टर साहिबा,” एक रिश्तेदार ने कहा, “आप ही परिवार की इज्जत बचा सकती हैं।”

मैंने उनकी ओर देखा। “आप कहना क्या चाहते हैं?”

“अगर कल शादी नहीं हुई तो दोनों परिवारों की बदनामी होगी।”

“तो इसमें मेरी क्या गलती है?”

“गलती आपकी नहीं है,” लड़के के परिवार के एक आदमी ने कहा, “लेकिन हालात ऐसे हैं…”

“हालात चाहे जैसे हों,” मैंने उसकी बात काट दी, “किसी लड़की को उसकी इच्छा के खिलाफ शादी करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।”

कमरे में खामोशी छा गई।

मैंने लड़के की ओर देखा। वह भी वहीं था। उसने अब तक बहुत कम बात की थी। उसका चेहरा गंभीर था। मैं जानना चाहती थी कि इस पूरे प्रस्ताव के बारे में वह क्या सोचता है, लेकिन उससे पहले माँ मेरे पास आ गईं।

उन्होंने मेरा हाथ पकड़ लिया। उनकी आँखों से आँसू बह रहे थे।

“बेटी, घर की इज्जत का सवाल है।”

मैं डॉक्टर थी। समझती थी कि दबाव में लिया गया इतना बड़ा फैसला किसी की पूरी ज़िंदगी बदल सकता है। मैं यह भी जानती थी कि एक शादी टूट जाने से किसी का जीवन खत्म नहीं होता।

फिर भी उस कमरे में खड़ी होकर मैं केवल यह सब सोच नहीं पा रही थी। मेरे सामने माँ थीं, जिनकी आवाज़ काँप रही थी। पापा थे, जो सुबह से अंजली को ढूँढते-ढूँढते थक गए थे। बाहर सजा मंडप था। और बीच में अंजली का खाली कमरा—जिसमें जाने से अब माँ डर रही थीं।

मैंने अपने आप से पूछा, क्या मैं सच में यह शादी करना चाहती हूँ?

जवाब था—नहीं।

फिर मैंने माँ का हाथ देखा। उनकी उँगलियाँ मेरी उँगलियों से इस तरह लिपटी थीं जैसे वह मुझे छोड़ेंगी तो गिर पड़ेंगी।

मैंने पूछा, “आप लोगों ने लड़के से बात की है? वह क्या चाहता है?”

लड़के ने पहली बार मेरी ओर देखा। “अगर तुम्हारी सहमति हो, तो मुझे इस रिश्ते से एतराज नहीं है।”

मैं उसके जवाब से कोई भरोसा महसूस नहीं कर पाई। वह मेरा परिचित नहीं था। मैं उसके कारोबार के बारे में उतना ही जानती थी जितना रिश्ते की बात करते समय बताया गया था। मगर इतना बड़ा फैसला मेरे सामने उसी रात रख दिया गया था।

बहुत देर तक मैं कुछ नहीं बोली।

फिर मैंने कहा, “ठीक है।”

माँ ने मेरी तरफ देखा। कमरे में मौजूद बाकी लोग भी चुप हो गए।

“लेकिन मेरी बात पूरी सुनिए,” मैंने कहा। “मैं किसी की जगह भरने के लिए पैदा नहीं हुई हूँ। अगर यह शादी कर रही हूँ, तो इस समय अपने माँ-पापा को अकेला नहीं छोड़ना चाहती। इसे मेरी कमजोरी मत समझिएगा।”

लड़के के परिवार के एक आदमी ने कहा, “हमें मंज़ूर है।”

मैंने उसकी ओर देखकर कहा, “और अगर कभी मेरे साथ गलत हुआ, तो मैं चुप नहीं बैठूँगी।”

उस रात बहुत लोगों ने मेरी बात सुनी। शायद किसी ने उसे गंभीरता से नहीं लिया।

अगले दिन मेरी शादी हो गई।

जिस मंडप में अंजली को बैठना था, वहाँ मैं बैठी थी। मंत्रों की आवाज़ सुनाई दे रही थी। आसपास खड़े लोगों के चेहरों पर राहत थी—जैसे कोई बड़ी मुसीबत टल गई हो।

लेकिन मेरे मन में अब भी एक सवाल था।

अंजली गई कहाँ?

शादी के बाद मैं अपने काम पर लौट आई। अस्पताल में मरीजों के सामने मैं वही विशाखा थी—ध्यान से बात सुनने वाली, मुश्किल समय में जल्दी फैसला लेने वाली डॉक्टर। घर लौटते ही मेरी एक अलग ज़िंदगी शुरू हो जाती।

मेरे पति की छोटी-सी फैक्ट्री थी। वहाँ प्लास्टिक की चीज़ें बनती थीं। शुरू में सब सामान्य लगा। फिर एक दिन किसी भुगतान के बारे में फोन आया। अगले हफ्ते मशीन की किस्त को लेकर बात हुई। उसके बाद किसी ने उधार लौटाने के लिए घर तक आकर पूछ लिया।

धीरे-धीरे मुझे पता चला कि फैक्ट्री पर कर्ज है। बाजार में देनदारियाँ हैं। मशीनों का भुगतान बाकी है। बैंक की किस्तें भी हैं।

मैंने पति से पूछा, “शादी से पहले मुझे इनमें से कुछ क्यों नहीं बताया गया?”

वह हर बार कहता, “तुम चिंता मत करो। सब सँभाल लूँगा।”

“मैं चिंता न करूँ, यह कैसे हो सकता है? मैं तुम्हारी पत्नी हूँ। अगर कारोबार मुश्किल में है, तो मुझे सच जानने का अधिकार है।”

वह मुस्कुराकर बात टाल देता।

मैं कुछ समय तक यही समझती रही कि वह केवल अपने कारोबार की परेशानी छिपा रहा है।

मैं गलत थी।

कुछ साल बाद मुझे उसका एक पुराना फोन मिला। उसमें कुछ संदेश और तस्वीरें थीं। पहले तो मैंने खास ध्यान नहीं दिया। फिर स्क्रीन पर एक नाम देखकर मेरी उँगलियाँ रुक गईं।

अंजली।

मेरी बहन का नाम वहाँ देखकर मुझे आश्चर्य नहीं होना चाहिए था। आखिर कभी उसकी शादी इसी आदमी से तय हुई थी। लेकिन जैसे-जैसे मैंने संदेश पढ़े, मेरी साँसें तेज होने लगीं।

उन दोनों के बीच की बात वैसी नहीं थी जैसी मुझे बताई गई थी।

मुझे अंजली की गर्भावस्था के बारे में पहले पता चला था। उस समय मैंने ही माँ-पापा को बताया था, क्योंकि मुझे लगा था कि मेरी छोटी बहन को हमारी मदद चाहिए। मैंने उससे भी बात करने की कोशिश की थी। लेकिन उसने मुझे पूरी सच्चाई नहीं बताई।

उस पुराने फोन ने मुझे वह बात बताई जो इतने सालों तक मुझसे छिपी रही थी।

अंजली के बच्चे का पिता मेरा पति था।

वही आदमी जिससे पहले अंजली की शादी तय हुई थी।

वही आदमी जिससे बाद में मेरी शादी हुई।

मैं फोन हाथ में लिए बहुत देर तक बैठी रही। मुझे पुराने दिनों की एक-एक बात याद आने लगी। अंजली का अचानक गायब होना। घरवालों की घबराहट। शादी बचाने की बात। मेरा मंडप में बैठना।

क्या अंजली का शादी से एक दिन पहले जाना सचमुच अचानक हुआ था?

क्या मेरे पति को पहले से पता था कि वह नहीं आएगी?

और अगर उन्हें पता था, तो मुझसे शादी क्यों की?

उस रात मेरे पास इन सवालों के जवाब नहीं थे। फोन के संदेशों ने उनके रिश्ते का सच मेरे सामने रखा था, लेकिन उससे आगे जो साज़िश मुझे दिखाई दे रही थी, उसे अभी साबित करना बाकी था।

मुझे वह दिन भी याद आया जब मैंने अंजली की गर्भावस्था की बात माँ-पापा को बताई थी। मैं सोच रही थी कि बहन को अकेला नहीं पड़ने दूँगी। क्या उसी बात से कोई ऐसी योजना बिगड़ी थी जिसके बारे में मुझे पता ही नहीं था?

मैं फिर फोन की स्क्रीन देखने लगी। एक संदेश का समय शादी तय होने के बाद का था। दूसरा उस दिन के बहुत करीब भेजा गया था जब अंजली घर से गायब हुई थी।

मेरा दिल तेजी से धड़कने लगा।

मैंने अपने आप से कहा, विशाखा, पहले सब समझो। अभी किसी के सामने कोई सवाल मत रखो।

मैं डॉक्टर थी। अधूरी जानकारी से किसी बीमारी का निष्कर्ष नहीं निकालती थी। अपनी ज़िंदगी के इस मामले में भी मुझे सच पूरा जानना था।

फोन बंद करके मैंने उसे अपने पास रख लिया। फिर आईने के सामने जाकर खड़ी हुई।

उसमें मुझे वही चेहरा दिख रहा था जिसे लोग आत्मविश्वासी कहते थे। लेकिन आज मेरी आँखों में चोट भी थी।

मेरी छोटी बहन ने मुझसे इतना बड़ा सच छिपाया था। जिस आदमी को मैंने अपना पति माना, वह भी मेरी आँखों में देखकर वर्षों तक सामान्य बात करता रहा।

मैं रो सकती थी। उस रात मैं रोई भी।

फिर मैंने अपने आँसू पोंछे और आईने में खुद से कहा—

“अब तक तुम दोनों ने मेरी ज़िंदगी की कहानी लिखी है।”

मेरे चेहरे पर हल्की मुस्कान आई।

“अब आगे की कहानी मैं लिखूँगी।”

पर कहानी आगे लिखने से पहले मुझे यह जानना था कि अंजली शादी से एक दिन पहले कहाँ गई थी—और उसके जाने का फैसला किसने लिया था।