🌺 वृषाली 🌹
अध्याय – 1
👑 अंगराज या राधेय? 🏹
🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻मेरे प्रिय वाचक मेरी ये स्टोरी गुजराती भाषा मेंबहुत धुम मचा रही है तो मैने सोचा क्यों ना इसे हिन्दी भाषा में पेश किया जाए तो ज्यादा से ज्यादा वाचक इसका आनंद उठा सके
आपको ये स्टोरी कैसी लगी जरूर बताना 🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻
संध्या धीरे-धीरे ढल रही थी। आकाश की अंतिम किरणें मानो दिन को विदा दे रही थीं, किंतु राधामाता के हृदय में चिंता का अंधकार गहराता जा रहा था।
तुलसी के चौरे पर दीप प्रज्वलित करने का समय हो चुका था। उनके हाथों में दीपक था, बाती भी तैयार थी, फिर भी उनका मन एक क्षण के लिए भी स्थिर नहीं हो पा रहा था। वे बार-बार गृह के द्वार तक जातीं, नगर के मार्ग की ओर देखतीं और अपने पुत्र को न पाकर निराश मन से लौट आतीं।
श्रेष्ठियों के रथ एक-एक करके नगर में प्रवेश कर रहे थे। जब भी किसी रथ के पहियों की ध्वनि उनके कानों में पड़ती, उनका हृदय आशा से धड़क उठता।
‘कदाचित् इस रथ में मेरा कर्ण होगा...’
परंतु प्रत्येक बार उनकी आशा अधूरी रह जाती।
कर्ण अभी तक नहीं लौटा था।
कुछ दिन पूर्व ही कर्ण हठ करके अपने पिता अधिरथ के साथ कौरवों और पांडवों की शस्त्र-प्रतियोगिता देखने तथा उसमें भाग लेने के लिए गया था। उसी दिन से राधामाता के हृदय में एक अनजानी आशंका ने जन्म ले लिया था।
उन्हें अपने पुत्र की शक्ति पर तनिक भी संदेह नहीं था। संदेह था तो केवल इस संसार की दृष्टि पर।
‘मेरा कर्ण चाहे कितना ही पराक्रमी क्यों न हो, किंतु यह संसार उसे किस दृष्टि से देखेगा?’
यह प्रश्न बार-बार उनके हृदय को व्यथित कर रहा था।
उसी समय पड़ोस में रहने वाला कार्तिक वहाँ से गुजरा।
“हे कार्तिक!”
राधामाता के स्वर में छिपी व्याकुलता सुनकर वह तुरंत उनके समीप आ गया।
“क्या हुआ, राधामाता?”
“वत्स, क्या तुमने कर्ण को कहीं देखा है? अभी तक मेरा पुत्र घर नहीं लौटा।”
कार्तिक ने उन्हें सांत्वना देते हुए कहा,
“नहीं, राधामाता। अभी तक उसका दर्शन नहीं हुआ। आप चिंता मत कीजिए। वह पिताश्री अधिरथ के साथ ही गया है। संभवतः किसी कार्य के कारण विलंब हो गया होगा। वे दोनों शीघ्र ही लौट आएँगे।”
कार्तिक के शब्द सांत्वना देने वाले थे, किंतु एक माँ का व्याकुल हृदय भला इतनी सरलता से कैसे शांत होता?
उसी समय गंगामाता वहाँ आ पहुँचीं।
राधामाता के मुख पर चिंता की रेखाएँ देखकर उन्होंने मंद मुस्कान के साथ कहा,
“राधा पुत्री, जल से भरा कलश तैयार रखना। आज तुम्हें अपने पुत्र का विजय-तिलक करना होगा।”
राधामाता एकाएक ठिठक गईं।
“विजय-तिलक?”
उनके स्वर में आश्चर्य से कहीं अधिक आशा थी।
“किस बात का, गंगामाता? क्या समाचार है?”
गंगामाता हँस पड़ीं।
“अरी पुत्री! आज तो तुम्हारे लिए आनंद का दिन है। सचमुच तुम भाग्यशाली हो, जिसे ऐसा पुत्र प्राप्त हुआ है।”
इतना सुनते ही राधामाता के मन में अनेक विचार एक साथ उठने लगे।
‘क्या हुआ होगा?’
‘क्या मेरे कर्ण ने प्रतियोगिता में भाग लिया होगा?’
‘क्या उसने अर्जुन को चुनौती दी होगी?’
और तभी उनके मन में एक दूसरी ही चिंता ने जन्म लिया।
‘परंतु उसे प्रतियोगिता में भाग लेने कौन देगा?’
‘यदि उसने अर्जुन को चुनौती दी होगी, तो कहीं किसी ने मेरे पुत्र का अपमान तो नहीं किया होगा?’
एक माँ का मन उस समय वायु से भी अधिक वेग से दौड़ रहा था।
फिर अचानक उनके हृदय में गर्व की एक छोटी-सी ज्योति प्रज्वलित हुई।
‘और यदि... यदि मेरे कर्ण ने अपना पराक्रम सिद्ध कर दिया होगा तो?’
परंतु अगले ही क्षण एक और आशंका ने उन्हें घेर लिया।
‘मेरे पुत्र की योग्यता देखकर कहीं किसी के मन में ईर्ष्या तो नहीं जाग उठी होगी? किसी ने उसे प्रताड़ित तो नहीं किया होगा?’
उन्होंने गंगामाता के मुख की ओर देखा।
किंतु वहाँ चिंता का कोई चिह्न नहीं था। उनकी आँखों में केवल आनंद झलक रहा था।
तब जाकर राधामाता के मन में थोड़ा विश्वास जागा।
‘यदि गंगामाता इतनी प्रसन्नता से विजय-तिलक की बात कर रही हैं, तो निश्चय ही कुछ शुभ हुआ है।’
उसी क्षण दूर से घोड़ों के टापों की ध्वनि सुनाई दी।
राधामाता का हृदय तेजी से धड़क उठा।
उनकी दृष्टि नगर के मार्ग पर स्थिर हो गई।
एक रथ धीरे-धीरे उनके गृह के समीप आकर रुक गया।
और फिर...
रथ से एक तेजस्वी, ऊँचे कद वाला, घुँघराले केशों से सुशोभित, सूर्य के समान आभायुक्त वर्ण और बलिष्ठ शरीर वाला अत्यंत सुंदर युवक उछलकर नीचे उतरा।
उसके अधरों से एक ही पुकार निकली—
“माँ!”
वह कर्ण था।
राधा और अधिरथ के जीवन का प्राण!
अपने पुत्र को देखते ही राधामाता को लगा, मानो उनके शरीर में पुनः प्राण लौट आए हों।
कर्ण एक क्षण का भी विलंब किए बिना उनकी ओर दौड़ा और उनके चरणों में अपना मस्तक झुका दिया।
“माँ! अब मैं तुम्हारे सभी स्वप्न पूर्ण करूँगा। मुझे अपना आशीर्वाद दो। कुमार दुर्योधन ने मुझे अंगराज की उपाधि प्रदान की है!”
‘अंगराज...’
यह शब्द राधामाता के कानों में पड़ा और उनकी आँखें अश्रुओं से भर उठीं।
जिस पुत्र के लिए वे वर्षों से समाज की वक्र दृष्टि सहती आई थीं, आज उसी पुत्र को समाज ने राजमुकुट प्रदान किया था।
किंतु आनंद के साथ ही एक माँ के स्वाभाविक प्रश्न ने उनके हृदय में जन्म लिया।
“अंगराज? तुम्हें? दुर्योधन ने? किंतु क्यों, पुत्र?”
तभी अधिरथ भी रथ से नीचे उतरे।
उन्होंने कहा,
“राधा, कर्ण ने आज प्रतियोगिता में भाग लेने का निश्चय किया था। उसने अर्जुन को चुनौती भी दी।”
“अर्जुन को चुनौती?”
राधामाता की धड़कन मानो एक क्षण के लिए थम गई।
“पुत्र, हमें अर्जुन को चुनौती नहीं देनी चाहिए थी। वह अत्यंत कुशल धनुर्धर है। शब्दभेदी बाण चलाने में भी निपुण है।”
अधिरथ ने धीमे स्वर में कहा,
“राधा, तुम्हारी बात उचित है। मुझे स्वयं भी भय लग रहा था, किंतु कर्ण ने अर्जुन को चुनौती दे दी।”
“फिर?”
राधामाता के स्वर में चिंता स्पष्ट थी।
अधिरथ ने आगे कहा,
“गुरु द्रोणाचार्य ने उसे रोक दिया। उन्होंने कहा कि इस सभा में केवल राजा अथवा राजकुमार ही प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। इसलिए कर्ण को इसकी अनुमति नहीं दी जा सकती।”
राधामाता मौन होकर सुनती रहीं।
उनके हृदय में अपने पुत्र के पराक्रम के लिए गर्व उमड़ रहा था।
किंतु जब उन्होंने सुना कि गुरु द्रोणाचार्य ने केवल इसलिए कर्ण को रोक दिया, क्योंकि वह किसी राजा अथवा राजकुमार का पुत्र नहीं था, तब उनके हृदय में वर्षों पुरानी पीड़ा फिर से जाग उठी।
‘मेरा पुत्र... केवल अपने जन्म के अज्ञात रहस्य के कारण कितना कुछ सहने के लिए विवश होगा?’
उनका मन व्यथा से भर उठा।
तभी कर्ण ने कहा,
“माँ, आगे की बात भी सुनो।”
अधिरथ ने कहना आरंभ किया,
“उसी समय कुमार दुर्योधन उठ खड़े हुए। उन्होंने घोषणा की—यदि इस प्रतियोगिता में भाग लेने की योग्यता केवल राजा अथवा राजकुमार होना है, तो मैं आज से कर्ण को अंगदेश का राजा घोषित करता हूँ!”
“और फिर दुर्योधन ने कर्ण को अंगदेश का राज्य प्रदान कर दिया।”
राधामाता कुछ क्षणों तक निःशब्द खड़ी रहीं।
उनकी आँखों में अश्रु छलक आए।
“आज तो मानो हमारे भाग्य के द्वार खुल गए। ऐसा प्रतीत होता है, जैसे सूर्यास्त के समय स्वयं सूर्यदेव ने हमारे आँगन में अपनी कृपा बरसा दी हो। मानो हमारे छोटे-से गृह में आज सूर्य का उदय हुआ हो!”
इतना कहकर वे तुरंत तुलसी के चौरे के समीप गईं।
उन्होंने हाथ जोड़कर आँखें बंद कीं और प्रार्थना करने लगीं—
“हे तुलसीमाता! मेरे कर्ण की रक्षा करना। उसे राजनीति और राजकीय षड्यंत्रों से सदैव दूर रखना। उसके मार्ग में आने वाले प्रत्येक संकट से उसकी रक्षा करना। मेरे पुत्र का जीवन सुख, सम्मान और शांति से परिपूर्ण करना।”
उनके पीछे खड़ा कर्ण खिलखिलाकर हँस पड़ा।
“माँ! मुझे जो प्राप्त हुआ है, वह मेरी योग्यता के कारण प्राप्त हुआ है। दुर्योधन ने मेरी योग्यता को पहचाना है। फिर इसमें षड्यंत्र कैसा? माँ, क्या तुम्हें अपने पुत्र की योग्यता पर विश्वास नहीं है? क्या तुम्हें अपने पुत्र पर गर्व नहीं है?”
राधामाता कुछ नहीं बोलीं।
उन्होंने केवल कर्ण को अपने हृदय से लगा लिया।
उसी समय आसपास के गृहों से लोग वहाँ एकत्र होने लगे। प्रत्येक मुख पर प्रसन्नता थी।
जिस राधेय को वे अब तक केवल एक सारथिपुत्र के रूप में जानते थे, वही आज उनकी आँखों के सामने अंगदेश का राजा बनकर खड़ा था।
समूचा वातावरण जयघोष से गूँज उठा—
“हमारे अंगराज की जय!”
“अंगदेश के महाराज कर्ण की जय!”
राधामाता ने प्रसन्न होकर सभी को अगले दिन अपने गृह में भोजन के लिए आमंत्रित किया।
धीरे-धीरे पूरे नगर में कर्ण की विजय का समाचार फैल गया। लोग आनंदित होकर अपने-अपने गृहों की ओर लौटने लगे।
राधामाता भी मुस्कुराते हुए कर्ण की ओर देखकर बोलीं,
“पुत्र, गंगामाता ने सच ही कहा था। जा, मैं जल से भरा कलश लेकर आती हूँ। पहले तुम्हारा विजय-तिलक तो कर लूँ, फिर भीतर आना।”
कर्ण ने हँसते हुए कहा,
“जैसी आपकी आज्ञा, माँ!”
राधामाता और अधिरथ गृह के भीतर चले गए।
🌹 राधेय के हृदय की रानी
उसी क्षण पीछे से पायल की मधुर रुनझुन सुनाई दी।
कर्ण ने मुड़कर देखा।
गृह के द्वार पर एक मुग्धा खड़ी थी।
उसके लंबे, काले केश नागिन के समान लहराते हुए नितंबों तक पहुँच रहे थे। खुले केशों की एक अलक उसके गोरे कपोलों से अठखेलियाँ कर रही थी। कानों में लटकते मोतियों के झुमके उसकी सुंदरता में चार चाँद लगा रहे थे।
दीपशिखा के समान उन्नत नासिका पर जड़ी मणि वाली नथनी उसके अधरों को स्पर्श कर रही थी। पतली कमर पर बँधे करधनी के छोटे-छोटे घुँघरू और हाथों के कंगन मधुर ध्वनि उत्पन्न कर रहे थे।
लज्जा से लाल हुए कपोल और गुलाब की पंखुड़ियों जैसे कोमल अधर मानो स्वयं गुलाब को भी लज्जित कर रहे थे।
उसकी बड़ी-बड़ी मृगनयनी आँखें एकटक कर्ण को निहार रही थीं।
जैसे ही उसकी दृष्टि कर्ण की दृष्टि से मिली, उसकी आँखों में संकोच उतर आया। उसने तुरंत अपनी पलकें झुका लीं।
कर्ण के अधरों पर एक गहरी, स्नेहभरी मुस्कान खिल उठी।
“तुम आ गईं, वृषाली?”
वह वृषाली थी।
कर्ण की बचपन की सखी...
उसके यौवन का स्वप्न...
उसके हृदय में चुपचाप स्थान बना चुकी वह सुंदर भावना, जिसे वह स्वयं भी शब्दों में व्यक्त नहीं कर पाता था।
वृषाली!
जिसे देखते ही कर्ण का हृदय हर बार अपनी धड़कन भूल जाता था।
कुछ क्षणों तक वृषाली मौन खड़ी रही।
फिर संकोच से भरे स्वर में बोली,
“राधेय... आप श्रेष्ठ हैं, विशिष्ट हैं... और आज तो सर्वश्रेष्ठ बनकर लौटे हैं।”
कर्ण ने प्रेमपूर्ण मुस्कान के साथ पूछा,
“वृषाली! तुम्हें भी समाचार मिल गया? दुर्योधन ने मुझे अंगराज बना दिया है।”
वृषाली के मुख पर लज्जाभरी मुस्कान फैल गई।
कर्ण की दृष्टि से उसकी दृष्टि मिली और उसकी पलकें पुनः झुक गईं। हृदय की गति अचानक बढ़ गई।
‘आज संपूर्ण संसार ने उन्हें पहचान लिया है...’
‘परंतु मैंने तो उन्हें बहुत पहले ही पहचान लिया था।’
उसके अधरों पर एक कोमल मुस्कान उभर आई।
“राधेय...”
कर्ण उसकी ओर देखता रहा।
वृषाली ने धीरे से कहा,
“मैं आपको अंगराज बनने की बधाई देने आई हूँ।”
कर्ण के मुख पर प्रसन्नता झलक उठी।
किंतु वृषाली के लिए यह केवल बधाई देने का अवसर नहीं था। उसके हृदय में वर्षों से संचित भावनाएँ आज मानो शब्दों में ढलने के लिए व्याकुल थीं।
उसने साहस करके कर्ण की ओर देखा।
“आज पूरा नगर आपके यश का जयघोष कर रहा है।”
वह फिर संकोच से भर उठी।
“सब आपको अंगराज कह रहे हैं।”
कुछ क्षण मौन रहने के बाद उसने अत्यंत धीमे स्वर में कहा,
“परंतु मेरे लिए तो आप सदैव से ही राजा रहे हैं।”
कर्ण की आँखों में आश्चर्य की हल्की-सी झलक उभरी।
वृषाली ने अपनी पलकें झुका लीं।
“आज संसार ने आपकी योग्यता को पहचाना है...”
उसके स्वर में गर्व था।
“किंतु मैंने तो...”
वाक्य अधूरा रह गया।
उसके कपोलों पर लाली छा गई।
फिर उसने साहस बटोरकर धीरे से कहा,
“मैंने तो वर्षों पहले ही आपको अपने हृदय का राजा बना लिया था।”
यह कहने के बाद मानो उसके हृदय का सारा भार हल्का हो गया।
आज उसे कर्ण के राजमुकुट से भी अधिक प्रसन्नता इस बात की थी कि जिस सम्मान का स्थान उसने वर्षों से अपने हृदय में सुरक्षित रखा था, वही सम्मान आज समूचा संसार उसके प्रिय को दे रहा था।
कर्ण ने मुस्कुराकर पूछा,
“तुम जो कहना चाहती हो, वह...”
वृषाली के कपोल और भी लाल हो उठे।
“परंतु मैंने तो कुछ कहा ही नहीं!”
कर्ण की आँखों में शरारत चमक उठी।
“इसीलिए तो!”
वृषाली भी धीरे से हँस पड़ी।
उस हँसी में संकोच तो था, किंतु अब पहले जैसी झिझक नहीं थी।
कुछ क्षण बाद उसने धीरे से पूछा,
“आपने अर्जुन को चुनौती दी थी?”
कर्ण के चेहरे पर खिली मुस्कान कुछ फीकी पड़ गई।
“हाँ।”
“फिर?”
“गुरु द्रोणाचार्य ने मुझे रोक दिया।”
वृषाली की आँखों में क्षणभर के लिए चिंता उतर आई।
“आपको दुःख हुआ होगा।”
कर्ण ने उसकी ओर देखा।
उत्तर देने से पहले वह एक क्षण मौन रहा।
“थोड़ा।”
वृषाली उसकी आँखों में झाँकती रही।
उसे लगा कि इतने बड़े अपमान के बाद भी कर्ण अपने दुःख को सहजता से छिपा रहा था।
उसने आगे कुछ नहीं पूछा।
केवल इतना कहा,
“परंतु आज वह सब पीछे छूट गया।”
कर्ण ने उसकी ओर देखा।
“शायद।”
वृषाली ने हल्की मुस्कान के साथ कहा,
“आज तो पूरा नगर आपके साथ है।”
कर्ण ने चारों ओर दृष्टि दौड़ाई।
“पूरा नगर कुछ समय के लिए साथ है।”
फिर उसकी दृष्टि पुनः वृषाली पर आकर ठहर गई।
“लेकिन माँ... उनकी प्रसन्नता बहुत दिनों तक बनी रहेगी।”
वृषाली कुछ नहीं बोली।
उसके चेहरे पर कोमल भाव उभर आए।
‘इन्हें अपने सम्मान से अधिक अपने माता-पिता का सुख प्रिय है।’
शायद यही वह गुण था, जो उसे बार-बार कर्ण की ओर खींच लाता था।
🌺 माँ का आशीर्वाद
उसी समय राधामाता बाहर आईं।
वृषाली को देखते ही उनके मुख पर वात्सल्यपूर्ण मुस्कान खिल उठी। वे तुरंत उसके समीप गईं और उसे हृदय से लगा लिया।
“बेटी! तुम तो मेरे कर्ण के भाग्य की अधिष्ठात्री हो। तुम्हारे शुभ चरणों के प्रभाव से ही मेरे कर्ण को इतना ऊँचा स्थान प्राप्त हुआ है।”
फिर उन्होंने स्नेहपूर्वक पूछा,
“तुम्हारे माता-पिता कहाँ हैं? क्या वे भी आ रहे हैं?”
वृषाली ने संकोच से अपनी पलकें झुका लीं।
“हाँ, माँ। वे भी आ रहे हैं। अंगराज से मिलने।”
राधामाता ने प्रेम से उसके मस्तक पर हाथ फेरा।
फिर कर्ण की ओर देखकर बोलीं,
“पुत्र, अब भीतर आ जाओ।”
उन्होंने वृषाली की ओर स्नेह से देखा।
“बेटी, तुम भी भीतर आओ।”
इतना कहकर वे गृह के भीतर चली गईं।
वृषाली उनके पीछे चलने लगी।
कर्ण कुछ क्षण वहीं खड़ा रहा।
उसकी दृष्टि वृषाली पर ठहर गई। मानो वह उससे कुछ कहना चाहता हो, किंतु उसके अधरों तक शब्द पहुँचकर भी लौट गए।
वृषाली द्वार तक पहुँच चुकी थी।
तभी पीछे से कर्ण का धीमा स्वर सुनाई दिया।
“वृषाली!”
वह ठिठक गई।
फिर पीछे मुड़ी।
कर्ण ने उसके वस्त्र का छोर हल्के से थाम रखा था।
“क्या मेरे साथ भीतर नहीं आओगी? आज की मेरी यह विजय तुम्हारी भी तो है, है न?”
वृषाली की आँखों में क्षणभर के लिए आश्चर्य झलक उठा।
फिर उसके अधरों पर एक छोटी-सी मुस्कान खिल गई।
वह मन ही मन कह उठी—
‘आपकी विजय मेरी विजय है...
आपके दुःख मेरे दुःख हैं...
और मेरे समस्त सुख भी आपके ही सुख हैं।’
कर्ण के इस प्रश्न में मानो उसे अपने हृदय का स्थान मिल गया था।
जिस भावना को वह वर्षों से नाम देने का साहस नहीं जुटा पा रही थी, आज कर्ण ने सहज ही उसे स्वीकार कर लिया था।
वह कुछ नहीं बोली।
बस धीरे से उसके समीप आकर खड़ी हो गई।
वृषाली के हृदय में एक बार फिर मधुर कंपन दौड़ गया।
कर्ण ने उसका हाथ अपने हाथ में ले लिया।
वृषाली की उँगलियाँ हल्के से काँप उठीं।
कर्ण ने उस कंपन को अनुभव किया।
उसने उसका हाथ कसकर नहीं पकड़ा, केवल इतना स्पर्श बनाए रखा, जिससे उसे आश्वासन मिल सके।
वृषाली ने एक क्षण उसकी ओर देखा।
कर्ण की आँखों में कोई अधीरता नहीं थी।
वहाँ केवल एक शांत स्वीकार था।
वृषाली ने अपनी दृष्टि झुका ली।
उसने अपने हाथों की ओर देखा और फिर धीरे से अपना मस्तक झुका दिया।
इस क्षण उसे किसी राजमहल की इच्छा नहीं थी।
न किसी बहुमूल्य आभूषण की।
न किसी प्रतिष्ठा की।
उसके लिए इतना ही पर्याप्त था कि जिस पुरुष को उसने अपने हृदय के सिंहासन पर विराजमान किया था, उसने आज अपने जीवन के सबसे बड़े क्षण में उसका हाथ अपने हाथों में थाम लिया था।
कर्ण ने धीरे से कहा,
“चलो।”
वृषाली उसके साथ गृह के भीतर प्रवेश कर गई।
द्वार पार करते समय उसने एक बार पीछे मुड़कर नगर की ओर देखा।
बाहर अब भी ‘अंगराज’ का जयघोष सुनाई दे रहा था।
किंतु वृषाली के हृदय में आज एक दूसरा ही नाम गूँज रहा था।
‘राधेय...’
वही राधेय, जिसे संसार ने आज राजमुकुट प्रदान किया था।
और जिसे वृषाली ने बहुत पहले ही अपने हृदय का सिंहासन सौंप दिया था।
वह धीमे कदमों से कर्ण के साथ आगे बढ़ती रही।
अब उसके मन में केवल एक ही प्रार्थना थी—
‘हे देव! आज जो सम्मान संपूर्ण संसार ने उन्हें दिया है, उसमें मेरे हृदय का स्थान कभी छोटा मत होने देना।’
और उसी क्षण वृषाली ने पहली बार अपने अंतर्मन में स्वीकार किया—
कर्ण के प्रति उसकी भावना अब केवल मौन स्नेह नहीं रही थी।
वह उसके जीवन की दिशा बन चुकी थी।
दोनों के कदम आगे बढ़ते रहे।
तभी पुनः पायल की मधुर रुनझुन सुनाई दी।
कर्ण और वृषाली ने एक साथ गृह में प्रवेश किया।
सूर्यदेव अस्त होने से पूर्व अपनी अंतिम स्वर्णिम किरणें उन दोनों पर बिखेर रहे थे।
मानो दिनकर अपनी अंतिम किरणों के माध्यम से दोनों को आशीर्वाद दे रहे हों।
एक ओर संसार के लिए अंगराज कर्ण का नया जीवन आरंभ हो रहा था, तो दूसरी ओर वृषाली के हृदय में प्रेम की एक नई कहानी आकार ले रही थी।
एक ऐसा प्रेम, जो राजमुकुट का मोहताज नहीं था।
एक ऐसा संबंध, जिसे संसार की स्वीकृति से पहले ही दो हृदयों ने मौन भाव से स्वीकार कर लिया था।
क्रमशः...
॥ अस्तु ॥
लेखिका: विशाखा भट्ट
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BHAVNAGAR
🌹 प्रिय पाठकों! 🌹
आपको ‘वृषाली’ का यह प्रथम अध्याय कैसा लगा? अपनी प्रतिक्रिया देकर मेरा उत्साह अवश्य बढ़ाएँ।
❤️ सुंदर
👍 अच्छा
🙏 ठीक
आपकी प्रतिक्रिया और स्नेह मेरे लिए अनमोल हैं। ❤️🌺
अपना प्रेम और आशीर्वाद बनाए रखिएगा।
लेखिका: विशाखा भट्ट