वंश और विरासत
सोहराय की आहट और वंश का दीपक
गाँव में सोहराय की आहट सुनाई देने लगी थी। पूरा गाँव साफ-सफाई में जुटा था। घरों की दीवारें मिट्टी से लीपी जा रही थीं। आँगन सँवारे जा रहे थे। मवेशियों के रहने की जगह साफ की जा रही थी। हर तरफ बोंगा-बुरु की पूजा की तैयारी थी।
खलिहान में धान की अच्छी फसल रखी थी। इस साल मारांग बुरू की कृपा से खेत सोना उगल रहे थे।
भादो मुर्मू खलिहान के किनारे खड़ा होकर अपनी फसल निहार रहा था। चेहरे पर संतोष था। लेकिन अचानक उसकी आँखों में उदासी उतर आई।
उसने मन ही मन सोचा, ‘इतनी जमीन, इतना धन, यह घर और यह खलिहान... मेरे बाद इनका क्या होगा? मेरी दो नतिनियाँ हैं, लेकिन नाती नहीं। कहीं मेरे पुरखों की जमीन किसी दूसरे के हाथ न चली जाए!’
वह गहरी साँस लेकर घर की ओर चल पड़ा।
घर के आँगन में उसका बेटा श्यामू सोहराय की तैयारी कर रहा था। उसकी पत्नी और दोनों बेटियाँ भी काम में लगी थीं।
भादो ने बेटियों की ओर देखा, फिर नजर फेर ली।
श्यामू ने पिता के चेहरे पर छाई उदासी देखी।
“बाबा, क्या हुआ? सुबह से परेशान दिखाई दे रहे हैं।”
“कुछ नहीं।”
“कुछ तो है। बताइए न!”
भादो ने धीमे स्वर में कहा, “बेटा, घर में सब कुछ है। खेत हैं, जमीन है, अनाज है। लेकिन मेरे मन में एक चिंता बैठ गई है।”
“कैसी चिंता, बाबा?”
“तेरे बाद इस घर का नाम कौन चलाएगा? तेरे बाद तेरी पूजा कौन करेगा? हमारे हापराम की परंपरा कौन निभाएगा?”
श्यामू कुछ देर चुप रहा।
“बाबा, मेरी बेटियाँ भी तो हैं।”
भादो ने उसकी ओर देखा।
“बेटियाँ हैं, यह मैं जानता हूँ। लेकिन हमारे समाज में वंश की परंपरा बेटे से चलती आई है। इसी बात की चिंता मुझे खाए जा रही है।”
श्यामू पिता के मन की गाँठ समझ रहा था, लेकिन उसे खोलने के लिए उसके पास अभी शब्द नहीं थे।
उसी समय भादो का समधी ईश्वर मरांडी घर आया।
“जोहार , समधी!”
“जोहार, आइए समधी जी!”
दोनों आँगन में बैठ गए। कुछ देर खेती-बारी और सोहराय की तैयारियों की बातें होती रहीं। फिर ईश्वर ने भादो के उदास चेहरे की ओर देखकर पूछा—
“समधी, क्या बात है? त्योहार का समय है, फिर भी आपके चेहरे पर खुशी नहीं दिख रही।”
भादो ने मन की बात कह दी।
“समधी, आपसे क्या छिपाना! मेरी चिंता मेरे वंश को लेकर है। मेरे पास जमीन-जायदाद है, घर है, खेत हैं। लेकिन मेरे बेटे की दो बेटियाँ हैं, बेटा नहीं। सोचता हूँ, मेरे बाद हमारे वंश का क्या होगा?”
ईश्वर मुस्कराया।
“समधी, आप इतनी बड़ी चिंता क्यों पाल रहे हैं? बेटियाँ भी तो संतान हैं। क्या वे अपने माता-पिता की संतान नहीं हैं?”
भादो ने तुरंत उत्तर दिया—
“समधी, आप चाहे कितने ही तर्क दीजिए, लेकिन हमारे यहाँ मारांग बुरू की पूजा हो, मांझी थान की पूजा हो या जाहेर थान की पूजा—इन परंपराओं को निभाने की जिम्मेदारी प्रायः बेटे ही उठाते आए हैं। आपको भी पता है, मेरे मरने के बाद श्यामू ही मेरी पूजा करेगा। मेरे लिए पानी चढ़ाएगा। मेरे हापराम की परंपरा निभाएगा।”
अभी दो दिन पहले की बात है समधी ...मेरे दोस्त सती मंडल दा की दो बेटियां हैं दोनों बड़े डॉक्टर हैं पर उसकी बीबी घर में अकेले रहती हैं बेचारी झाड़ू लगाते वक्त हर्ट अटैक हुआ मुश्किल से बची हैं अगर कोई पुत्र होता तो अभी दोनों राम नाम की माला जपते "
वह कुछ क्षण रुका, फिर भारी आवाज में बोला—
“लेकिन जिस दिन श्यामू नहीं रहेगा, उस दिन कौन करेगा? क्या उसकी बेटियाँ मेरे लिए पानी चढ़ाएँगी? क्या वे हमारे हापराम को याद करेंगी? क्या वे उन परंपराओं को आगे बढ़ाएँगी, जिन्हें हमारे पुरखों ने हमें सौंपा है?”
ईश्वर ने कहा, “समधी, बेटियों को अवसर मिलेगा, तो वे भी अपनी संस्कृति सीख सकती हैं। परंपरा केवल जन्म से नहीं, संस्कार और सीखने से भी आगे बढ़ती है।”
भादो ने सिर हिलाया।
“आपकी बात सुनने में अच्छी लगती है। लेकिन हमारे हापराम ने हमें जो परंपरा सौंपी, उसका भी तो कोई अर्थ है!”
उसकी आवाज में पीड़ा थी।
“हमारे हापराम ने हमें पूर्वजों का सम्मान करना सिखाया। जब कोई अपना इस संसार से चला जाता है, तो हम उसे भूल नहीं जाते। हम उसे याद करते हैं, उसके लिए पानी चढ़ाते हैं, उसकी आत्मा की शांति की कामना करते हैं। हमारी मान्यता है कि पूर्वजों का उचित स्मरण और सम्मान आवश्यक है, ताकि उनकी आत्मा भटकती न रहे।”
वह ईश्वर की आँखों में देखने लगा।
“समधी, मैं अपनी नातियों से प्रेम नहीं करता, ऐसा नहीं है। लेकिन मेरे मन में सवाल है—क्या मेरी परंपरा मेरे साथ ही समाप्त हो जाएगी? क्या मेरे हापराम का नाम लेने वाला कोई नहीं बचेगा?”
ईश्वर कुछ कहना चाहता था, लेकिन उसके शब्द जैसे गले में अटक गए।
श्यामू भी चुप बैठा था।
भादो ने फिर कहा—
“आप ही बताइए, समधी! खेत की जमीन का बँटवारा तो हो जाएगा। घर भी किसी के हिस्से में चला जाएगा। लेकिन पूर्वजों के प्रति हमारा कर्तव्य कौन निभाएगा? हमारी भाषा, हमारी रीति-रिवाज, हमारे बोंगा-बुरु, हमारे हापराम—इन सबको कौन सँभालेगा?”
ईश्वर ने गंभीर होकर उत्तर दिया—
“समधी, आपकी चिंता परंपरा को बचाने की है, यह मैं समझता हूँ। लेकिन एक बात सोचिए। यदि बेटियाँ हमारे संस्कार सीखें, हमारी भाषा बोलें, हापराम की कथाएँ जानें और समाज की परंपराओं का सम्मान करें, तो क्या वे इस विरासत की वाहक नहीं बन सकतीं?”
भादो कुछ देर तक उसे देखता रहा।
“बात केवल सीखने की नहीं है, समधी। बात उस जिम्मेदारी की है, जिसे हमारे समाज ने पीढ़ी-दर-पीढ़ी निभाया है।”
श्यामू ने पहली बार बीच में बोलने का साहस किया।
“बाबा, क्या हम अपनी बेटियों को बचपन से ही ये परंपराएँ नहीं सिखा सकते? उन्हें हापराम की कहानियाँ नहीं सुना सकते? उन्हें मारांग बुरू, मांझी थान और जाहेर थान के महत्व से परिचित नहीं करा सकते?”
भादो ने बेटे की ओर देखा।
“सिखा तो सकते हैं, बेटा। लेकिन क्या समाज उन्हें स्वीकार करेगा? क्या लोग कहेंगे कि भादो के हापराम की परंपरा उसकी नतिनियों ने निभाई?”
श्यामू के पास इस प्रश्न का कोई स्पष्ट उत्तर नहीं था।
आँगन में कुछ क्षणों के लिए सन्नाटा छा गया।
बाहर सोहराय की तैयारी चल रही थी। कहीं मवेशियों को सजाया जा रहा था, कहीं घर की दीवारों पर रंग लगाया जा रहा था। बच्चे खुशी से दौड़ रहे थे। पूरा गाँव उत्सव की प्रतीक्षा में था, लेकिन भादो के मन में एक अनकहा भय बैठा हुआ था।
ईश्वर ने धीरे से कहा—
“समधी, विरासत का अर्थ केवल जमीन-जायदाद नहीं होता। विरासत वह भी है, जो हम अपनी अगली पीढ़ी के मन में छोड़ जाते हैं।”
भादो ने उदास होकर उत्तर दिया—
“आपकी बात मैं समझता हूँ। लेकिन मेरा मन अभी भी शांत नहीं हुआ है।”
वह उठकर आँगन से बाहर चला गया।
सूरज ढल रहा था। खेतों के ऊपर अँधेरा उतरने लगा था। भादो उसी खेत की मेड़ पर जाकर खड़ा हो गया, जहाँ उसने जीवन में पहली बार हल चलाया था। इसी मिट्टी में उसके पिता का पसीना मिला था। इसी जमीन पर उसके हापराम की यादें बसी थीं।
उसने मुट्ठी भर मिट्टी उठाई और देर तक उसे देखता रहा।
“हे मारांग बुरू! मैंने इस जमीन को सँभाला। अपने पुरखों की परंपरा को निभाया। अब मेरे बाद क्या होगा?”
उसकी आँखें भर आईं।
“मेरे बाद श्यामू रहेगा। वह मेरी पूजा करेगा, मेरे लिए पानी चढ़ाएगा। लेकिन श्यामू के बाद? उस दिन कौन मेरे हापराम को याद करेगा? कौन हमारे पूर्वजों के लिए जल अर्पित करेगा? कौन इस परंपरा को आगे बढ़ाएगा?”
उसकी आँखों के सामने अपनी दोनों नतिनियों के चेहरे उभर आए। वे उसे दादू कहकर पुकारती थीं। उसके पास बैठती थीं। उसकी बातें सुनती थीं।
उसका मन एक पल को पिघला।
फिर वही पुरानी चिंता लौट आई।
“क्या मैं अपनी परंपरा को लेकर गलत सोच रहा हूँ? या सचमुच मेरे जाने के बाद कुछ छूट जाएगा?”
वह उत्तर खोजता रहा।
पीछे से श्यामू की आवाज आई—
“बाबा!”
भादो ने पलटकर देखा। श्यामू उसके पास आकर खड़ा हो गया।
“बाबा, घर चलिए। अँधेरा हो रहा है।”
भादो ने खेत की ओर देखते हुए कहा—
“बेटा, यह जमीन मेरे लिए केवल जमीन नहीं है। इसमें मेरे पिता की यादें हैं। मेरे हापराम का इतिहास है। मैं नहीं चाहता कि मेरे बाद यह सब समाप्त हो जाए।”
श्यामू ने पिता का हाथ पकड़ लिया।
“बाबा, हम अपनी विरासत को बचाने की कोशिश करेंगे।”
भादो ने उसकी ओर देखा, लेकिन कुछ बोला नहीं।
दोनों चुपचाप घर की ओर चल पड़े।
पीछे खेतों में अँधेरा गहराता जा रहा था। सामने घर में सोहराय की तैयारी पूरी होने वाली थी। गाँव उत्सव की रोशनी से जगमगाने को तैयार था, मगर भादो के मन में एक प्रश्न अब भी अँधेरे की तरह पसरा हुआ था—
क्या वंश का दीपक केवल बेटा होता है, या विरासत को समझने और सँभालने वाली बेटी भी उस दीपक की लौ बन सकती है?
इस प्रश्न का उत्तर अभी बाकी था।