Conversations With Myself - 5 in Hindi Comedy stories by Aarushi Singh Rajput books and stories PDF | Conversations With Myself - 5

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Conversations With Myself - 5

अस्पताल, महाभारत और दो घंटे की आज़ादी! 😂❤️

हाय दोस्तों! कैसे हैं आप सब?

बहुत दिनों से मैंने कुछ लिखा ही नहीं। मतलब मोबाइल की तरफ देखा तक नहीं कि कुछ लिखूँ। समझ ही नहीं आ रहा था कि क्या लिखूँ और ऊपर से समय भी नहीं मिल रहा था। फिर सोचा कि चलो, कुछ तो लिखना चाहिए। आज जो हुआ, वही आप लोगों को बताना चाहती हूँ।

वैसे तो कोई बहुत बड़ी या अच्छी बात नहीं है, लेकिन छोटी-छोटी बातें भी लिख देनी चाहिए। अच्छा लगता है। 😊

तो हुआ कुछ ऐसा कि कुछ दिन पहले मेरे दादाजी का पैर टूट गया। अब उनका ऑपरेशन होना है। बस, इसी बात को लेकर हमारे घर में महाभारत का युद्ध चल रहा है। 😂

युद्ध का मुद्दा है कि कौन पैसे देगा और कौन नहीं!

वैसे दादाजी के चार बेटे हैं, लेकिन सबकी अपनी-अपनी कहानी है। जमीन बाँटने की बात हो तो सब थोड़े-थोड़े हिस्से के लिए आ जाते हैं, लेकिन जब कुछ करने की बारी आती है तो कोई दिखाई नहीं देता।

और मेरी दादी-बाबा भी कुछ कम नहीं हैं। दोनों की अपनी अलग ही दुनिया है। बस इसी वजह से घर में महाभारत चल रहा है।

वैसे जब कोई पैसे देने को तैयार नहीं है तो आखिरकार हमें ही सब करना पड़ेगा।

हम लोग अस्पताल गए थे। सबसे पहले तो दादी को अस्पताल ले जाने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ी। दादी जाने का नाम ही नहीं ले रही थीं। आखिरकार उन्हें किसी तरह मनाकर और लगभग जबरदस्ती ही लेकर जाना पड़ा कि चलिए, एक-दो दिन रहकर दादाजी की सेवा ही कर लीजिए।

दादी को दादाजी की कितनी चिंता है, यह तो आप लोग समझ ही सकते हैं। उन्हें खाने-पीने और टीवी देखने से फुर्सत मिले तब न! दिनभर टीवी देखना और इधर-उधर घूमना। हाँ, कोई पूछ ले तो थोड़ी-सी नौटंकी जरूर हो जाती है। 😂

खैर, उस दिन मैं, मेरी बहन, मेरा छोटा भाई, भैया और दादी सब गाड़ी से अस्पताल के लिए निकले।

हमारा अस्पताल घर से काफी दूर था। दूसरे इलाके में जाना था। रास्ते में ही एक टोटो वाले ने अपनी टोटो हमारी गाड़ी से भिड़ा दी। गाड़ी पर खरोंच आ गई।

बस, फिर क्या था! भैया गाड़ी से उतरे और उसकी क्लास लगाने पहुँच गए। मुझे तो लगा कि अब यहाँ पक्का लड़ाई होने वाली है। लेकिन उन्होंने उसे छोड़ दिया, क्योंकि गाड़ी में महिलाएँ और छोटे बच्चे भी थे।

जैसे-तैसे हम अस्पताल पहुँचे।

वहाँ पहुँचते ही भैया ऑफिस के काम से निकल गए और गाड़ी की चाबी हमें पकड़ा गए।

अब अस्पताल में हम लोग अकेले!

वैसे अस्पताल अच्छा था, लेकिन उस दिन मैंने वहाँ जरूरत से ज्यादा ही चीजें देख ली थीं। इतना खून, इतने सारे घायल लोग, किसी के हाथ में चोट तो किसी के पैर में, कहीं टूटी-फूटी चीजें और कहीं लोगों की ऐसी हालत कि क्या बताऊँ!

ऐसा नहीं है कि मुझे इन सब चीजों से कोई परेशानी होती है या मैं यह सब देखकर घबरा जाती हूँ। मेरा दिल थोड़ा मजबूत है। लोग तो मुझे पत्थर दिल भी कहते हैं। अब हूँ या नहीं, यह तो पता नहीं, लेकिन हाँ, मैं इन सब चीजों से इतनी आसानी से नहीं घबराती।

मगर जब जरूरत से ज्यादा ऐसे दृश्य देख लेती हूँ न, तो वे सब दिमाग पर चढ़ जाते हैं। फिर खाने के समय वही सारी चीजें याद आने लगती हैं। एक अजीब-सा महसूस होता है और खाना खाते नहीं बनता।

इसी वजह से उस दिन मैंने सुबह घर से निकलने से पहले भी कुछ नहीं खाया था और अस्पताल पहुँचने के बाद भी पूरे दिन कुछ खाने का मन नहीं हुआ।

बस बाहर जाकर थोड़े-बहुत गोलगप्पे और कुछ खाने-पीने की चीजें खाईं। अब गोलगप्पे तो खा ही सकते हैं, आखिर इतने दिनों बाद बाहर घूमने का मौका मिला था। 😂

खैर, कुछ देर बाद हमें पैसों की जरूरत पड़ी। हमारे पास पैसे नहीं थे और मेरा फोन भी मेरे पास नहीं था। पापा भी घर चले गए थे। भैया अपना एक फोन देकर गए थे, उसी से पापा को फोन किया। पापा ने पैसे भेज दिए।

फिर हमने सोचा कि चलो, कुछ खा-पीकर आते हैं।

दादी से भी बड़े प्यार से पूछा कि दादी, आपके लिए क्या लेकर आएँ? चाउमीन, बर्गर, पिज्जा या कुछ और?

अब दादी की खाने के मामले में तो बात ही अलग है। मैंने कहा जो खाना है बता दीजिए, सब लेकर आएँगे। उन्होंने तो पूरी लिस्ट ही पकड़ा दी। 😂

हमारा छोटा भाई आयुष पहले ही पापा के साथ घर भेज दिया गया था और भैया भी ऑफिस जा चुके थे।

अब अस्पताल में मैं और मेरी बहन ही बचे थे।

हम दोनों ने सोचा कि जब बाहर जा ही रहे हैं तो थोड़ा घूम भी लेते हैं। बस, फिर क्या था! हमने मॉल जाने का प्लान बना लिया।

काफी दिनों बाद घर से अकेले निकले थे। कितना अच्छा लग रहा था, बता नहीं सकती।

हमने गोलगप्पे खाए। 😋 कुछ खाने-पीने का सामान खरीदा। वैसे जरूरत का कोई सामान तो नहीं खरीदा, लेकिन कुछ-कुछ चीजें ले ही लीं।

लगभग दो घंटे घूमने के बाद वापस अस्पताल आ गए।

सच बताऊँ तो अकेले घूमने का मजा ही अलग है। न कोई जान-पहचान वाला, न कोई रोकने-टोकने वाला। अपने पास थोड़े पैसे हों और अपनी मर्जी से घूमते रहो।

कभी-कभी लगता है कि बस ऐसी ही आजादी मिलती रहनी चाहिए। 😂❤️

लेकिन अस्पताल वापस आते ही हमारी आजादी का अंत हो गया।

दादी ने जो सुनाया, जो सुनाया, क्या बताऊँ! इतनी गालियाँ दीं कि पूछिए मत।

फिर जब हमने उनके लिए लाया हुआ सामान दिखाया तो दादी खुश हो गईं और आराम से बैठकर खाने लगीं।

एक तरफ हमसे अस्पताल में खाना तक नहीं खाया जा रहा था और दूसरी तरफ दादी आराम से सब खा रही थीं। 😭😂

इसके बाद मैं वेटिंग एरिया में जाकर बैठ गई। वहाँ मुझे थोड़ा अच्छा लग रहा था। बस चुपचाप बैठी रही।

अब बात करते हैं रात की।

रात हो चुकी थी। हम लोग वेटिंग एरिया में बैठे थे। तभी अचानक लाइट के साथ कुछ ऐसा होने लगा कि कभी बंद, कभी चालू। बिल्कुल किसी भूतिया फिल्म वाला सीन लग रहा था। 👻

उसी समय लिफ्ट खुली और उसमें से एक मरीज को बाहर लाया जा रहा था। उसका भी अभी-अभी ऑपरेशन हुआ था। उसे देखकर मेरी हालत खराब हो गई।

एकदम ऐसा लग रहा था जैसे किसी हॉरर फिल्म का सीन चल रहा हो। 😂

मुझे तो अपनी ही कहानियाँ और हॉरर फिल्में याद आने लगीं। आजकल हम सामान्य कहानियाँ देखते हैं, लेकिन उस समय तो दिमाग में सिर्फ भूतिया फिल्में ही घूम रही थीं।

अच्छा हुआ कि मेरे साथ भैया, मेरी बहन और मेरा भाई थे। वरना अकेले होती तो शायद वहीं से भाग जाती।

रात में दादी और बाबा का खाना लेकर मैं और मेरी बहन भैया के साथ घर के लिए निकल गए।

मेरा भाई और पापा पहले ही घर पहुँच चुके थे। दादी को हमने बाबा के पास छोड़ दिया।

पापा भी तीन दिनों से अस्पताल में थे। घर नहीं आ रहे थे और उनकी तबीयत भी ठीक नहीं थी। इसलिए हमने उन्हें घर भेज दिया था।

वैसे उस दिन करवाचौथ भी था, 29 तारीख को। मेरी मम्मी व्रत रखती हैं।

लेकिन दादी का उस दिन अलग ही कार्यक्रम चल रहा था। उन्होंने अपने सभी बेटों को फोन किया। यहाँ तक कि अपनी बहन और दूसरे रिश्तेदारों के घर भी फोन करके बताने लगीं कि देखो, उनका बेटा अपनी बीवी के साथ करवाचौथ मनाने के लिए भाग गया।

अब इनको कौन समझाए कि अरे भाई, पापा बताकर ही तो घर आए थे! ऐसा थोड़ी था कि किसी को बिना बताए अस्पताल छोड़कर चले गए।

असल में उस दिन हमारे यहाँ आँधी-तूफान और बारिश हो रही थी। घर पर धान रखा हुआ था। अगर उसमें पानी पड़ जाता तो काफी नुकसान हो सकता था। इसलिए उसे उठवाना और अच्छी तरह सुरक्षित रखना जरूरी था। घर पर उस समय कोई नहीं था, इसलिए पापा को वापस जाना पड़ा ताकि धान को खराब होने से बचाया जा सके।

और सबसे मजेदार बात यह है कि पापा को घर भेजने के लिए दादी ने ही काम का बहाना दिया था। उन्होंने खुद कहा था कि घर जाकर धान संभाल लीजिए।

अब जब पापा उनकी बात मानकर घर चले गए तो रात में फोन करके उन पर ऐसे-ऐसे इल्जाम लगाए जा रहे थे। ऊपर से रिश्तेदारों को भी फोन करके ऐसी बातें बताई जा रही थीं।

मतलब हद है यार! 😂

तीन दिनों से पापा अस्पताल में थे, अपनी तबीयत खराब होने के बावजूद सब संभाल रहे थे। यह बात किसी को नहीं बतानी, लेकिन उनके घर जाने पर पूरी कहानी बनाकर सबको सुनानी है।

अब आप ही बताइए, इसे क्या कहेंगे?

खैर, हम बच्चे थे और हमें घर जाना था, इसलिए निकल पड़े।

मैं तो आराम से गाड़ी की पीछे वाली सीट पर लेट गई थी और मेरी बहन आगे बैठी थी।

रास्ते में मुझे अपने उपन्यास की बहुत सारी बातें याद आने लगीं। कई सारे सीन दिमाग में घूमने लगे। मैं आराम से पीछे की सीट पर बैठकर अपने ख्यालों में खोई हुई थी।

वैसे एक बात बताऊँ, मुझे गाने सुनते समय इमैजिनेशन करने की बहुत आदत है। 😂

मैं कोई गाना सुन रही होती हूँ और मेरे दिमाग में न जाने कितने सीन चलने लगते हैं। कभी अपनी जिंदगी से जुड़ी बातें सोचने लगती हूँ, कभी कोई मजेदार सीन इमैजिन करती हूँ तो कभी अपने उपन्यास के किरदारों को लेकर ही कुछ नया सोचने लगती हूँ।

अब लेखक हूँ तो इमैजिनेशन भी थोड़ी ज्यादा ही है। गाना कोई भी हो, मेरे दिमाग में उसकी अपनी अलग कहानी चलने लगती है। कभी-कभी तो पता ही नहीं चलता कि मैं गाना सुन रही हूँ या अपने दिमाग में कोई नई फिल्म बना रही हूँ। 😂

और उस रात भी कुछ ऐसा ही हो रहा था। बाहर बारिश, गाड़ी में सॉफ्ट भोजपुरी गाने और मैं अपनी ही दुनिया में खोई हुई थी।

तभी गाड़ी में इतने प्यारे-प्यारे भोजपुरी गाने बजने लगे कि क्या बताऊँ!

खासकर रात के सफर में सॉफ्ट भोजपुरी गाने सुनने का मजा ही अलग होता है। ❤️

जैसे हमरो जिंदगी गुलाम हो गइल और सिंदूर रंग। अगर आप लोगों ने अभी तक ये दोनों गाने नहीं सुने हैं, तो प्लीज एक बार जरूर सुनिएगा। सुनकर खुद समझ जाएँगे कि ये गाने कितने अच्छे लगते हैं। ❤️

वैसे मैं बहुत ज्यादा भोजपुरी गाने नहीं सुनती, लेकिन कुछ सॉफ्ट और अच्छे गाने हैं जो मुझे काफी पसंद हैं।

रात में सफर करते समय ऐसे गाने सुनने का अपना ही मजा है।

हम बिहारी हैं या नहीं, यह तो रहने ही दीजिए। 😂 हैं भी और नहीं भी हैं, ऐसा समझ लीजिए। लेकिन भोजपुरी गानों से प्यार जरूर है।

आखिरकार रात करीब दस बजे हम घर पहुँच गए। सर्दी का मौसम था, ऊपर से बारिश भी हो रही थी। सुबह से लेकर रात तक लगातार बारिश हुई थी।

हम लोग घर आकर सो गए।

लेकिन हमारी कहानी इतनी जल्दी खत्म कहाँ होने वाली थी!

रात के करीब एक बजे फोन आने लगा।

उधर दादी और इधर बाबा, दोनों चिल्ला रहे थे कि दवाई लेकर चले गए, हमें छोड़कर भाग गए और न जाने क्या-क्या!

अब बताइए, हम लोग क्या करें?

इतने दिनों से अस्पताल में रहकर सब कुछ संभाल रहे हैं और ऊपर से ऐसी बातें सुनने को मिल रही हैं।

बाबा भी कुछ कम नहीं हैं। वह भी चिल्ला रहे थे कि एक-दो लाख रुपये लगाकर इनका इलाज करवाओ, दिनभर इनकी देखभाल करो और न जाने क्या-क्या।

ऐसी बातें सुनकर कभी-कभी लगता है कि हम पर कोई एहसान किया जा रहा है।

हम उनके घर में थोड़ी रहते हैं। हमारा अपना घर है। हम अपना खाते-पीते हैं। ऐसा भी नहीं है कि हम उनसे कुछ माँगते रहते हैं।

और सबसे बड़ी बात, मेरे दादी-बाबा गरीब भी नहीं हैं। वे किसान हैं। उनके पास जमीन है और खेतों से जो अनाज मिलता है, उसे बेचकर बैंक में जमा कर देते हैं।

लेकिन जरूरत के समय एक रुपया भी खर्च करने को तैयार नहीं होते। उल्टा हमसे ही कभी पैसे माँगना, कभी कुछ माँगना और फिर ऊपर से बातें सुनाना।

दिनभर हमारी सेवा करवानी हो तो सब याद आता है, लेकिन जब हमारी मेहनत की बात आती है तो वही बातें सुनने को मिलती हैं।

सच कहूँ तो मैं बहुत परेशान हो चुकी हूँ।

मैं भगवान से बस यही प्रार्थना करूँगी कि किसी को ऐसे दादी-बाबा न मिलें।

भले ही किसी के पास बहुत कुछ न हो, लेकिन कम से कम अपने परिवार के लोगों के साथ अच्छा व्यवहार तो होना चाहिए।

क्योंकि मैंने जितना कुछ सहा है, वह शायद हर किसी के बस की बात नहीं है। बातें तो फिर भी इंसान सुन लेता है, लेकिन जब अपने ही लोग बार-बार ऐसा व्यवहार करें तो बहुत बुरा लगता है।

खैर, आज के लिए इतना ही। इतना बकवास काफी है। 😂

आप लोगों को मेरी बातें कैसी लगीं, जरूर बताइएगा।

वैसे मुझे नहीं पता कि किसी को मेरी ये छोटी-छोटी बातें पढ़ने में दिलचस्पी होगी या नहीं, लेकिन मुझे अपनी बातें लिखना बहुत अच्छा लगता है।

क्योंकि लिखते-लिखते ही तो इंसान सीखता है। क्या पता, एक दिन मैं भी बहुत अच्छा लिखने लगूँ।

और हाँ, बहुत सारे लोग मेरी उम्र पूछ रहे थे। तो भाई, इतना समझ लीजिए कि मैं अभी एक स्कूल स्टूडेंट हूँ और फिलहाल कक्षा 11वीं में पढ़ती हूँ। मेरी उम्र का अंदाजा लगाने के लिए इतना काफी है। 😂

तो बस, आज के लिए अलविदा!

मिलते हैं अगले अध्याय में। ❤️

उम्मीद है आप लोग मेरी अगली पोस्ट भी जरूर पढ़ेंगे।

तब तक के लिए बाय-बाय! 👋