-तुलना की कैंची से मत काटिए अपने बच्चों के प्रेम को
"देख शर्मा जी के बेटे को, 95% लाया है और तू?"
"तेरी बहन कितनी समझदार है, तू तो नालायक है।"
ये बातें हम बचपन से सुनते आ रहे हैं। पर क्या आपने यह भी सुना है?
"बड़े ने तो मुझे सोने की चेन दी, तूने क्या दिया?"
"छोटी बहू तो मेरी सेवा करती है, बड़ी को तो फुर्सत ही नहीं।"
"तू किस काम का बेटा है, जो तेरे भाई ने किया वो तू कभी नहीं कर सकता।"
पहली तुलना बचपन को तोड़ती है और दूसरी तुलना बुढ़ापे में पूरे परिवार को बिखेर देती है।
क्या ये पंक्तियाँ आपको सुनी-सुनाई लगती हैं? शायद आपने भी अपने घर में, पड़ोस में या अपने ही बचपन में इन्हें सुना होगा। माता-पिता का प्यार तो अटूट होता है, पर कभी-कभी अनजाने में कही गई यही तुलनात्मक और अपमानजनक बातें बच्चों के बीच एक ऐसी दीवार खड़ी कर देती हैं, जो उम्र भर नहीं गिरती।
हर बच्चा अपने आप में एक अलग फूल है। किसी में गुलाब की खुशबू है तो किसी में गेंदा की चमक। पर जब हम एक फूल से कहें कि तू दूसरे जैसा क्यों नहीं है, तो वह मुरझा जाता है।
अक्सर माता-पिता सोचते हैं कि तुलना करने से बच्चे में प्रतिस्पर्धा आएगी और वह बेहतर करेगा। "तेरा भाई रोज सुबह 5 बजे उठ जाता है, तू क्यों नहीं उठता?" सुनने में यह एक प्रेरणा लगती है, पर बच्चे के मन में इसका अर्थ कुछ और ही होता है - "मम्मी-पापा भाई से ज्यादा प्यार करते हैं, मैं बेकार हूँ।"
यहीं से दो जहर पनपते हैं। एक बच्चे में हीन भावना - मैं कभी अच्छा नहीं बन सकता। और दूसरे में अहंकार या अपराधबोध। बड़ा होकर वही भाई-बहन जो एक थाली में खाते थे, एक-दूसरे की सफलता पर जलने लगते हैं। राखी और भाई दूज सिर्फ रस्म बनकर रह जाते है.
भारतीय परिवारों में आज भी अनजाने में कई तरह के भेदभाव दिखते हैं - बेटा-बेटी में, पढ़ने वाले और कम पढ़ने वाले में, गोरे-काले में, या फिर माता-पिता के ज्यादा करीब रहने वाले बच्चे में।
"तू तो लड़की है, तुझे ज्यादा पढ़कर क्या करना है", "तू तो हमारा राजा बेटा है, तुझे सब मिलेगा" - ये बातें बच्चों के अवचेतन मन में घर कर जाती हैं।
जिस बच्चे को कम प्यार मिलता है, वह खुद को अकेला महसूस करने लगता है। वह सोचता है कि शायद मुझमें ही कोई कमी है। वह घर में रहते हुए भी पराया हो जाता है। और जिसे ज्यादा प्यार मिलता है, वह भी हमेशा एक अदृश्य दबाव में रहता है कि उसे हर हाल में श्रेष्ठ बने रहना है। दोनों ही स्थितियों में नुकसान बच्चों का ही होता है।
3. अपमानजनक शब्द - जो जुबान से निकलकर आत्मा पर लगते हैं
गुस्से में कहा गया एक शब्द, "बेवकूफ", "नालायक", "कलंक", "बोझ" - माता-पिता तो कहकर भूल जाते हैं, पर बच्चे की आत्मा पर वह गोद दिया जाता है।
एक शोध कहता है कि बचपन में बार-बार अपमानित किया गया बच्चा बड़े होकर खुद पर विश्वास करना ही छोड़ देता है। उसे लगता है कि वह सच में नालायक है। वह डरपोक, चिड़चिड़ा या अत्यधिक गुस्सैल बन जाता है।
सबसे बड़ा नुकसान यह होता है कि वह अपने ही भाई-बहन को अपना दुश्मन समझने लगता है। "मम्मी ने मुझे इसके कारण डांटा था।" यह सोच धीरे-धीरे नफरत में बदल जाती है। वे बच्चे जो कभी एक-दूसरे के बिना सो नहीं पाते थे, जवानी में एक-दूसरे की शक्ल तक देखना पसंद नहीं करते।
तो क्या करें? - समाधान माता-पिता के हाथ में है
हर बच्चे की अपनी गति, अपनी रुचि होती है। एक बच्चा गणित में तेज है तो दूसरा चित्रकला में। एक की ताकत को दूसरे की कमजोरी मत बनाइए। कहिए - "तुम्हारी ड्राइंग में तो जादू है, इसे और निखारो।"
प्यार जताने का तरीका अलग हो सकता है, पर नियम, सुविधाएं और सम्मान सबके लिए बराबर होने चाहिए। त्योहार पर कपड़े, खाने-पीने या पढ़ाई के अवसर में भेदभाव बिल्कुल न करें।
गुस्सा आए तो 10 तक गिनें, पानी पिएं, पर बच्चे को गाली या अपमानजनक शब्द न कहें। गलती पर बच्चे के व्यवहार को बुरा कहें, बच्चे को नहीं। "तुमने ये काम गलत किया" और "तुम गलत हो" - इन दोनों में जमीन-आसमान का अंतर है।
कभी-कभी बच्चे को सिर्फ सुने जाने की जरूरत होती है। रोज 15 मिनट बिना मोबाइल के, बिना टोके, सिर्फ उसके मन की बात सुनिए।
याद रखिए, बच्चे मिट्टी के घड़े की तरह होते हैं। जैसा आकार आप बचपन में देंगे, वैसा ही रूप जवानी में दिखेगा। अगर आप चाहते हैं कि आपके बच्चे बड़े होकर एक-दूसरे का सहारा बनें, तो आज से ही उनके बीच तुलना की कैंची चलाना बंद कर दीजिए।
क्योंकि अंत में संपत्ति नहीं, संस्कार और भाई-बहन का प्यार ही काम आता है। अक्सर बचपन की तुलना बुढ़ापे में ताने में बदल जाती है।
बच्चे बड़े हो गए, शादी हो गई, अपने-अपने घर बस गए। माता-पिता अब बूढ़े हो गए हैं। अब उन्हें सहारे की जरूरत है। और यहीं से एक नई, और ज्यादा खतरनाक तुलना शुरू होती है - सेवा की तुलना।
यह वह समय है जब माँ-बाप अनजाने में तराजू लेकर बैठ जाते हैं।
"तेरे बड़े भाई ने तो मुझे तीर्थ करा दिया, तूने क्या किया?"
"छोटे ने इस महीने 20 हजार भेजे, तू तो 5 हजार भी नहीं भेजता।"
"बड़ी बहू तो मेरे पैर दबाती है, तू तो बात भी नहीं करती।"
माँ-बाप को लगता है कि ऐसा कहने से दूसरा बेटा भी ज्यादा सेवा करेगा। पर सच इसके बिल्कुल उल्टा होता है।
1. सेवा, सेवा नहीं रहती, प्रतियोगिता बन जाती है: बेटा-बेटी जो सेवा श्रद्धा से कर रहे थे, अब वह दिखावा बन जाती है। "मुझे पापा से ज्यादा नंबर लेने हैं।" प्यार में मिलावट आ जाती है।
. बहुओं के बीच जहर घुलता है, जब सास कहती है "छोटी बहू अच्छी है", तो बड़ी बहू के मन में छोटी के लिए नफरत पैदा होती है। फिर देवरानी-जेठानी के झगड़े शुरू होते हैं, जो भाइयों को भी दुश्मन बना देते हैं।
जो कम कमाता है, वह टूट जाता है,हो सकता है बड़ा बेटा विदेश में है, ज्यादा कमा रहा है। छोटा बेटा गाँव में है, कम कमा रहा है पर रोज माँ-बाप के पास बैठता है, दवा देता है। पर माँ-बाप पैसे की तुलना में उसके बैठने को भूल जाते हैं। छोटा बेटा अंदर ही अंदर घुटता है - "मेरी नियत की कोई कीमत नहीं।"
और सबसे बड़ी बात, जिस बेटे की तारीफ हो रही है, वह भी असहज हो जाता है। उसे लगता है कि मेरे कारण मेरे भाई को डांट पड़ रही है। वह भी अपराधबोध में आ जाता है।
अंत में होता क्या है? बुढ़ापे में माँ-बाप अकेले रह जाते हैं। बेटे सोचते हैं - "मैं कितना भी कर लूं, माँ-बाप को तो वही बेटा प्यारा है, तो वही करे।" जो परिवार अंतिम समय में एक-दूसरे का संबल बनना चाहिए था, वह कोर्ट-कचहरी और संपत्ति के बंटवारे में उलझ जाता है।
कभी भी एक बच्चे के सामने दूसरे की सेवा मत गिनाइए। हर बच्चे की परिस्थिति अलग है। कोई पैसे से सेवा करता है, कोई समय से, कोई बहू के हाथों से। सभी की सेवा को सम्मान दीजिए। कहिए - "तुम सब अपने-अपने तरीके से मेरा बहुत ख्याल रखते हो, मैं खुशनसीब हूँ।"
ताना नहीं, आशीर्वाद दीजिए, "तू मेरी सेवा नहीं करता" कहने से सेवा खत्म हो जाती है। उसकी जगह कहिए - "बेटा जब तू आता है तो मुझे बहुत अच्छा लगता है।" प्यार से कहा गया एक वाक्य ताने से ज्यादा काम करता है।
बहुओं में कभी तुलना मत कीजिए। हर बहू एक नए घर से आई है। उसे बेटी बनाइए, प्रतियोगी नहीं।
याद रखिए, बच्चे मिट्टी के घड़े हैं, पर बुढ़ापे में माता-पिता खुद काँच के घड़े बन जाते हैं। जरा सी ठेस से सब बिखर जाता है।
अगर आप चाहते हैं कि आपके चारों धाम आपके चारों बेटे-बेटियों के घर में ही हों, तो आज से ही तराजू तोड़ दीजिए। सेवा को तोलना बंद कीजिए, सेवा को महसूस करना शुरू कीजिए। क्योंकि अंत में हिसाब पैसे का नहीं, प्यार का होता है।
डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली
Vandna. reporter@gmail.com