बहुत से नए युवकों को विशेष रूप से पंजाब हरियाणा व गुजरात के लड़कों को अमेरिका व कनाडा जाने की ज़बरदस्त लालसा रहती है, बात यह है कि उन्हें लगता है कि वहां जाकर जल्दी अमीर हो जायेंगे जितने पैसे यहाँ साल भर में कमाते है उतने तो हफ्ता दस दिन में डॉलर कमा कर पैदा कर लेंगे। वहां अमेरिका से उनके आस पास के लोग जाकर यहाँ कुछ दिनों के लिये आते हैं वे वहां की ऐसी लुभावनी छवि का बखान करते हैं, ऐसी शान मारते हैं कि वे वहां जाने के हसीन सपने बहुत से गाँव के बच्चे अपनी कम उम्र से ही देखने लगते हैं। जो लड़के बेकारी के कारण यहाँ धूल फांकते, छोटी मोटी मजदूरी करते या बेरोज़गार घूमा करते थे अगर एक बार विदेशों में कुछ दिन रह आते हैं बस महंगे बढ़िया जूते कपड़े डाल, आँखों में रेबन का चश्मा चढ़ा इतराते फिरते हैं, उनके घर वाले भी उनके द्वारा डॉलरों की भेजी रकमों के किस्से सुनाते नहीं अघाते। अपने घरों में अमेरिका की स्टेचू ऑफ़ लिबर्टी,एम्पायर स्टेट बिल्डिंग, वन वर्ड ट्रेड सेंटर आदि की फोटो, अमेरिकन फ्लैग के पोस्टर दीवारों और ट्रेक्टर पर लगा कर शान दिखलाते रहते हैं।
पुराने समय में तो जाने के लिए असली पासपोर्ट और टूरिस्ट वीजा भी अकसर आसानी से मिल जाता था, एजेंट लोग पासपोर्ट न मिलने पर नकली वीसा पासपोर्ट मुहय्या करा कर भिजवा देते थे, बस पैसे लगते थे और वे कनाडा या अमेरिका में भिजवा देते थे. एक बार जब मैं अमृतसर में पोस्टेड था, वहाँ का एक किस्सा याद या रहा है । एक दिन मेरा ड्राईवर परमजीत सिंह मेरे पास अपने बेटे की शादी का कार्ड दे कर अपने लिए छुट्टी लेने आया। कार्ड अंग्रेजी और गुरुमुखी दोनों में था, कार्ड में दुल्हन का नाम एलिज़ाबेथ या कुछ ऐसा ही मिलता जुलता सा अंग्रेजी नाम था। मेरे पूछने पर उसने बताया कि वह शादी बस वीजा लेने के लिए है, अभी नकली शादी और दुल्हन से विदेश चला जाएगा फिर बाद में असली पंजाबी शादी होती रहेगी। एजेंट इस तरह की शादी करवा कर, वहाँ के नागरिक के साथ मेरिज सर्टिफिकेट लेकर वीजा दिलवा देता है और अमेरिका भिजवा देता है। यह भी बताया की वह होशियारपुर जिले में शहर के पास के एक गाँव का निवासी है, और उसके यहाँ का कोई घर ऐसा नहीं होगा जिसके परिवार का कोई न कोई मेम्बर विदेश में न हो। मैंने उसे कहा कि क्यों गलत ढंग से उसे भेज रहे हो उसने बताया कि एजेंट जानने वाला और भरोसे वाला है, कई गाँव के लोगों को भिजवा चुका है।
बाद में उस की बात सही निकली थी, उसका बेटा कनाडा चला भी गया था उस विदेशी कन्या के साथ वहां बाद में जॉब मिलने पर विधिवत तलाक ले लिया था। इस नकली शादी के लिए उस महिला और एजेंट ने उनसे मोटा पैसा वसूल किया था। बाद पंजाब की ही एक लड़की से दोबारा शादी कर उसका बेटा सुरजीत वहां सेटल हो गया था, ड्राईवर परमजीत के अनुसार उसे उम्मीद है कि वह और उसकी बीवी भी पेंशन लेकर वहीं चले जायेंगे. ड्राईवर परमजीत ने ही मुझे बताया था कि वह विदेशी गौरांगी कन्या इसी तरह नकली शादी और डाइवोर्स कर कईयों को विदेश भिजवा चुकी है जिसके लिए वह मोटी रकम वसूलती है। अब तक उसी के गाँव में कई नकली शादी कर चुकी थी. यह ऐसा काम था जिसमें सारी पार्टियाँ लाभ ही लाभ में थी, परमजीत के बेटे ने कनाडा में क्या किया यह तो पता नहीं अगले दस बारह महीनों में उसकी नकली शादी में और कनाडा भेजने में लगा खर्चा उसने अपने पिता को भेज कर पूरा कर दिया था। वह वहां ड्राईवर बन कर बड़े बड़े ट्रक चलाता था, अच्छे पैसे कमाता था। यही नहीं और फिर साल डेढ़ साल बाद ही ड्राईवर परमजीत व पत्नी को वीआरएस के तहत स्वैच्छिक पेंशन दिलवा कर सब के सब वहीँ कनाडा चले गए थे। अर्थात दोनों को बेटे ने वहीं बुला लिया था। उनका घर जम जाने पर बेटे सुरजीत ने अपनी पंजाबी दुल्हन हरलीन को भी वहीं बुलवा लिया था, वह ठीक ठाक पढ़ी लिखी तथा स्मार्ट थी, उसने भी जल्दी ही एक रेस्टोरेंट में काम करना शुरू कर दिया था। परमजीत भी एक पेट्रोल स्टेशन जिसे वहां गैस स्टेशन कहते थे, उसमें काम करने लगा था। इस तरह तीन जने काम कर रहे थे बस एक मेम्बर परमजीत की पत्नी ने पूरा घर अच्छी तरह संभाल लिया था। अच्छी आमदनी हो जाती थी, ऐसा सफल विदेश ड्रीम या सपना पंजाब में बहुत लोग देखना चाहते थे।
यह तो तीस साल पुरानी बात थी, अब नए समय में भी कम पढ़े लिखे लोग अभी भी येनकेनप्रकरेण विदेशों में ‘स्मग्गल’ किये जा रहे हैं। पहले तो सिर्फ एजेंट ही हुआ करते थे अब तो एजेंटों के बड़े बड़े अंतर्राष्ट्रीय गिरोह बन गए हैं जो बहुत पावरफुल हैं। यह बड़ा धंधा नहीं एक बडा उद्योग बन गया है।
पंजाब में एक मशहूर कहावत है, ‘जित्थे दी खोत्ती ओत्थे आन खलोत्ती , ते जित्थे दा खोत्ताओत्थे आन खलोत्ता’ यानि गधे या डंकी की तरह जो इधर से उधर जाते हैं फिर आखिर में वहीं लौट आते हैं। इसी कहावत से लेकर हेराफेरी से अमेरिका, यूरोप कनाडा आदि जाने के लिए अपनाए यात्रा रूट को ‘डंकीरूट’ से जाना कहलाता है इसी ‘डंकी’ नाम से हिंदी की एक कॉमेडी फिल्म भी फिल्म निदेशक राज कुमार हिरानी ने बनाई थी जिसमें शाहरुख़ खान और तापसी पन्नू ने प्रमुख भूमिका निभाई थी। यह फिल्म मैंने तो अभी टीवी पर देखी । उस समय का जिक्र है तब तक तो इस तरह की कोई भी ऐसी फिल्म बनी नहीं थी, न ऐसा कुछ पढ़ा था पर मुझे इस तरह का धंधा चलता है उसका थोड़ा अंदाज़ा था क्योंकि पंजाब में कोई चार साल ड्यूटी की थी, वहाँ के लोगों के विदेश प्रेम और जोखिम उठाने की आदत के बारे में जनता था।
अपनी विदेश पोस्टिंग के दौरान इस धंधे के शिकार कुछ पंजाब के नवयुवकों की विदेश में हुई असली दुर्गति ज़रूर देखी थी। सन दो हज़ार में मेरी विदेश पोस्टिंग के दौरान मैं हिंद महा सागर के पश्चिमी छोर स्थित अफ्रीकी देश तंजानिया देश में भारतीय उच्चायोग में कांसुलर विभाग में फर्स्ट सेक्रेटरी का कार्य करता था, वहां बसे भारतीयों की देखभाल और कल्याण भी मेरी ज़िम्मेदारी थी. वहां भारतीय मूल के गुजराती काफी संख्या में बसे हैं व आर्थिक रूप से बहुत मज़बूत हैं। वहां का बहुत सारा व्यापार उन्ही के हाथों में है ये लोग कभी वहां तथा तंजानिया से लगे हुए देश केन्या में पाल वाली नावों जिन्हें ‘धाव’ कहते थे और बाद में स्टीमशिप द्वारा व्यापार करने तथा बाद में बन रही रेलवे लाइन को बनाने आये थे जो केन्या के मोम्बासा से लेकर युगांडा के कम्पाला के लिए आये थे ज्यादातर तो गुजराती थे पर काफी संख्या पंजाब से भी थी. उनमें से ज्यादातर वहीँ बस गए और आर्थिक रूप से काफी सफल होते गए. पंजाब के सिक्खों ने, वहां खूब तरक्की की, उपजाऊ जमीन थी, पर ऐसे ही जंगल पड़े थे, उन्होंने मेहनत कर जंगल साफ़ कर खेती के लिए तैयार किया बड़े बड़े फार्म के मालिक बन गए और वहां की तरह ढल गए पर अपनी पहिचान बनाये रक्खी, सिक्खों की परम्पराओं का पालन भी किया और एक भव्य गुरुद्वारा भी बनवाया और वहां कीर्तन, पाठ, अरदास, लंगर आदि सब अच्छी तरह से संपन्न होते थे।
मुझे गुरुद्वारा सिंह सिंह सभा, दारेसलाम कई अवसरों पर आमंत्रित करती रहती थी, और मैं वहाँ जाता भी था। एक बार जब मैं वहां गया, कार्यक्रम के बाद गुरूद्वारे के प्रधान ने वहां ठहरे हुए पंजाब के कुछ नवयुवकों से मिलाया, वे सब एक एजेंट द्वारा वहां लाये हुए थे जो उन्हें इंग्लैंड में ले जाने की बात कर भारत से लाया था, उन्हें एक होटल में ठहरा कर, उनके पासपोर्ट वीज़ा लगवाने के लिए बता कर ले गया था और अब चुपचाप कहीं चला गया था, उनके टेलीफोन भी नहीं उठा रहा था, तीन हफ्ते से वे वहां थे, होटल में रह कर पैसे खत्म हो गए थे सो बेचारे परेशानी में गुरूद्वारे की शरण में या गए थे। वही से लंगर में रह कर खा पी रहे थे। एजेंट के धोखे के शिकार हो गए थे, जमीन ज़्यादाद बेच कर, उधर लेकर पैसे एकट्ठे किए होंगें और यहाँ परदेश में पड़े थे। ये आज का किस्सा नहीं है बल्कि चालीस वर्ष पुरानी बात है।
उन्होंने बताया था कि न अब उनके पैसे हैं न डॉक्यूमेंट, ले जाने के लिए सब्जबाग दिखा कर किस-किस तरह से रकम जुटाई थी बरबाद हो गए है , हाथ जोड़ कर किसी तरह भारत भिजवाने के लिए गिडगिडाने लगे, पैर छूने लगे। उनकी कहानी सुन कर मैंने उन्हें गुरुद्वारा प्रधान के साथ अगले दिन भारतीय उच्चायोग या हाई कमीशन (कॉमनवेल्थ देशों में एंबेसी को ही हाई कमीशन कहा जाता है) में बुलवाया। बिना पुराना पासपोर्टया कोई भी पहिचान का डॉक्यूमेंट हुए उन्हें पासपोर्ट नहीं दिया जा सकता था। एक डर यह भी था कि इनमें ऐसा भी कोई व्यक्ति हो सकता है जो अपने देश भारत अपराधी हो या ब्लैक लिस्ट हो या कि जिस की एंट्री इंडिया में बेन हो। मैंने सावधानी बरतते हुए सभी नाम और उनकी डिटेल विदेश विभाग के पीवी सेक्शन को भेजे दिए और फ़ोन पर जल्दी जांच कर बताने की प्रार्थना की। विदेश में मुसीबत में फंसे भारतीयों की मदद तो हमारी ड्यूटी भी बनती है । चेक के बाद और विदेश विभाग की सलाह के अनुसार केवल एक यात्रा भारत लौटने भर का पासपोर्ट दे दिया दिया था। टिकट के पैसे का प्रबंध गुरूद्वारे ने कर दिया था। मैंने एफ.आर.आर.ओ. चंडीगढ़ और पंजाब पुलिस को अपराधी एजेंट्स पर आवश्यक कार्यवाही करने के लिए पूरी रिपोर्ट भेज दी. यह तो एक पुराना व छोटा उदाहरण हुआ, अतः उस समय भी गैर क़ानूनी ढंग से भारत से विदेश एजेंट्स की मदद से पलायन होता आया था, नकली पासपोर्ट नकली वीजा, नकली शादी आदि के द्वारा एजेंट यह धंधा करते थे, दूसरे विभिन्न देशों में सिक्यूरिटी, इतनी आने में पाबंदियां भी नहीं थी जितनी अब हैं। पहले न हीं बायोमेट्रिक्स जांच पड़ताल, न ही पुराना रिकॉर्ड जो इमीग्रेशन के कंप्यूटर पर अब एक क्लिक से जांचा जा रहा है होता था. अपराधी तो पुलिस से एक कदम आगे रहते हैं, अब जो ढंग वे अपना रहे है उसमें से एक ढंग है अपना देसी जुगाड़ और इंटरनेशनल एजेंटों का आपस में गठजोड़ और मिलीभगत का यह पंजाबी डंकीरूट से अमेरिका, कनाडा या यूरोप भेजना कहलाता है।
सरकारी सेवा से रिटाइर हो कर आजकल में अपने बेटे के पास अमेरिका के न्यूयॉर्क महानगर में हूँ, वहां उसका फ्लैट प्रसिद्ध यूनियन स्क्वायर के पास है। यहां शनिवार व रविवार के दिन एक फार्मर मार्किट लगता है जहाँ वहां आस पास के अंग्रेज किसान अपने फार्म से ताज़े, सब्जी,फल,शहद, एप्पलसेडार,फार्म में तैयार किये जूस व डिब्बा बंद मुरब्बे, अचार तथा तरह तरह की सामग्री सीधे लोगों कों बेचते हैं। वह बाज़ार साधारण आमदनी के लोगों में काफी लोकप्रिय है। मुझे तो वह अपने छोटे शहर की चौड़ी गली की सब्जीमंडी की याद दिलाता है इस लिए अगर कुछ खरीदना भी नहीं तो भी जाकर घूम आता हूँ। असल में वहां बहुत संख्या में भारतीय इन बड़े किसानों के नौकर हैं वही पूरा काम करते हैं, ज्यादातर मालिक तो पैसे के काउंटर पर बैठ कर गिनते हैं. फार्म में भी ज्यादातर काम वही करते है. वे भी अब टूटी-फूटी अंग्रेजी में काम चलाते हैं और मुझ जैसे भारतीयों से तो पंजाबी और हिंदी में बात करते हैं। कई बार किसी किसी से मैं लम्बी बात भी कर लेता हूँ। वे भारतीयों से बात करने के लिए तरसते हैं क्योंकि जहाँ फार्मों में बदन तोड़ काम करते है वहां कोई हम वतन अपनी भाषा में बात करने वाला या उनकी दुःख तकलीफ सुनने वाला नहीं मिलता। क्योंकि उनके पास कोई डाक्यूमेंट्स नहीं हैं उनकी मज़बूरी है कि जैसी भी हालत हो निबाह करना है। उनको नौकरी देने वाले उनकी मज़बूरी का भरपूर फायदा उठाते हुए उनके काम के हिसाब से काफी कम पैसे मिलते हैं, रहने खाने या काम के समय के घंटों की निर्धारित रेट से बहुत कम मिलता है। अगर उनके स्थान पर अमेरिकन नागरिक वही काम करे उसे कई गुणा पैसा देना पड़े। सप्ताह दर सप्ताह वहां जाने के कारण व उनकी बात सुनने के कारण उनके नाम, कहाँ से आये कैसे आये और अन्य चीज़ें भी काफी जान गया हूँ, फार्म के मालिक उन्हें बात करने से रोकने का प्रयत्न करते हैं क्योंकि भाषा के उनकी समझ में नहीं आता की क्या बात कर रहे हैं ? चोर की दाढ़ी में तिनका तो होता ही है। उनमें से बहुत से इसी डंकीरूट से भारत आये थे। वे खुश नहीं थे पर उनके घरवाले बहुत खुश थे उन्हें खुद कंजूसी कर डॉलर भेजते थे, अपना दुःख तकलीफ उन्हें नहीं बता सकते थे, उन्हें तो वे किसी अन्य के घर खड़े हो कर कार के साथ कोट पेंट टाई पहने फोटो भेजते थे। उनके पास वीजा तो थे ही नहीं किसीके पास सब गैरकानूनी तरीके से आए हैं, कुछ के पास तो पासपोर्ट या कोई डाक्यमेन्ट भी नहीं थे, जिन कुछ के पास थे वे उनके मालिकों ने अपने पास जमा किये हुए थे। ज्यादातर ये मजदूर पंजाब से थे कुछ हरियाणा से भी थे, कुछ नेपाली भी थे, एक फार्म तिब्बती में शरणार्थी थे जिनको अमेरिकन सरकार ने शरणार्थी या एसाइलम सीकर का दर्जा हुआ था.उन्हें किसी से कोई डर नहीं था। भारतीय तो ज्यादातर चोरी छिपे आये हुए और आजकल इस तरह के अवैध अप्रवासियों को पकड़ने और उन्हें अमेरिका से निर्वासित करने,हिरासत में रख उनके देश भेजने के लिए यू.एस . इमीग्रेशन एंड कस्टम एन्फोर्समेंट या आईसीई (ICE ) बुरी तरह से लगी पड़ी है, पकडे जाने के बाद जिस तरह से हथकड़ी डाल जानवरों की तरह एयरक्राफ्ट में भर कर भेजा गया था उसकी आलोचना भी हुई पर सख्ती बढती ही जा रही है, कई घटनाएँ हुई जिसमें बेचारे अप्रवासियों को तो गोली भी मार दी, बेचारे मर भी गए पर उनकी पीठ पर स्वयं वहां के राष्ट्रपति रोनाल्ड ट्रम्प का हाथ है. इसलिए उनके खिलाफ कोई एक्शन नहीं हो रही है. ये सब बातें उन लोगों ने बताई, उन्हें डर सता रहा है कब उनका नम्बर आ जाएगा? यह चर्चा यूनियन स्क्वायर के फार्मर मार्किट के मेहनतकश फार्म वर्कर्स के मुंह से कई बार थोड़ी थोड़ी सुन चुका था तथा मुझे उनसे सहानुभूति होती जा रही थी.आखिर थे तो हमारे देशवासी जो इस दूर देश में मजदूरी करते हुए डर और अनिश्चितिता की हालत में दी गुजार रहे थे।
इन्ही दिनों अपने टीवी में हिंदी मूवीसर्च करते, शाहरुख खान के डंकी नामक फिल्म पर नज़र पड़ी थी और उसे तुरंत ही देखा भी था, यह एक कॉमेडी है जो बड़ी अच्छी लगी, देखते देखते मुझे अपने ये रियल लाइफ पंजाबी युवकों का लगातार ध्यान आता जा रहा था, जिन्हें विदेश में आकर कम मेहनत से जल्दी से अमीर होने के सपने ने बुरी तरफ से फंसाया हुआ है उस पर भी यह दिन रात पकडे जाने और वापिस हथकड़ी के साथ ज़बरदस्ती भेजने की तलवार सर पर लटकी हुई थी। मेरी जिज्ञासा उनकी कहानी जानने की बलवती होती जा रही थी। उस रात मैं एक कोई तीस वर्ष के गुरप्रीत के बारे में कुछ ज्यादा सोच रहा था जो बड़े उत्साह से काम करता अपने मालिक को भी रखने की कोशिश करता दिखलाई देता था। मुझ से बात करने में इस लिए ज्यादा कोशिश करता क्योंकि मैं उसकी ठेठ पंजाबी समझ लेता था और साधारण पंजाबी में उसकी सुख दुःख की बात भी कर लेता था. हर दिन मैं उससे ज़रूर मिला करता, वह भी खुद छांट कर मुझे अच्छे फल सब्जी देता था और अपना अपनत्व दिखाता था.गुरप्रीत लम्बा मज़बूत सिख जट्ट है, अब दाढ़ी और केश नहीं रखता, देखने में मज़बूत और मेहनती, कद कोई छ फीट,रंग गेंहुआ। पंजाबी मिक्स्ड हिंदी बोलता पर अब अंग्रेजी में भी काम चला लेता है, अंग्रेजी में वस्तुओं के रेट बता देता है, पैसे बता देता है, उसका मालिक विलियम तो उस पर ही ज्यादातर काम छोड़ देता है बस पैसे अपने कब्ज़े में रखता है. बाकी सब भागदौड़, बेचना, फार्म से सामान लाना ले जाना सब गुरप्रीत अपने एक दूसरे पंजाब से उसी की तरह से आये पंजाबी युवक के साथ मिल कर लेता था।
अगले दिन सुबह बाज़ार लगना था, सुबह मैं और दिन से ज़ल्दी पहुँच गया था, मुझे उसके बारे में जानना था और डंकी फिल्म में दिखाए बेशरम स्वार्थी एजेंटों के हथकंडों और बहकाने के तरीकों के बारे में सुनना था. उस दिन घर में कड़क चाय बना कर एक बड़े थर्मस में भरी एक रस्क का पैकेट लिया तीन चार बड़े साइज़ वाले पेपर कप अपनी सब्जी वाले थैले में रखे और यूनियन स्क्वायर पहुँच गया था अभी किसान लोग अपनी गाड़ियों से सामान उतरवा उतरवाकर मेजें निकलवा कर अपनी अपनी दुकानें लगवा ही रहे थे. मैं वहीँ पास पार्क में बैठ कर चाय सुडकने लगा, उसने दूर से ‘सत सिरी अकाल’ किया तथा दूर से हाथ हिला कर अभिवादन किया। थोड़ी देर बाद जब उसका अंग्रेज़ मालिक कॉफ़ी पीने सामने ‘स्टारबक कॉफीशॉप’ में गए तो गुरुप्रीत मेरे पास आ गया।
मैंने पूछा “गुरप्रीत तुस्सी चा पिओगे ?”
उसके खुश हो कर ‘हंजीज़नाब’ कहने पर मैंने उसे कप में डाल कर चाय दी और रस्क दिये, उसने रस्क को भिगो कर खाया, चाय का एक लम्बा घूँट भरा, और खुश होकर कहा कि टोस्ट और चाय पीकर उसे वतन की हाईवे के ढाबों की ‘हाईवे वाली स्ट्रोंग चाय याद आ गयी, वे भी क्या दिन थे ट्रक लेकर गौहाटी तक जाता था, बॉम्बे जाता था. ऐसी चाय से नींद भगा कर लम्बे सफ़र पूरे होते थे. पंजाब के लोग स्वभाव से बे-तकल्लुफ होते ही हैं पहला चाय का कप पीने के बाद कहा कि ‘सर जी थोड़ी और चाय पा दो और टोस्ट भी, बहुत दिनों बाद घर जैसी टोस्ट के साथ चाय मिली है.’
मैंने उससे कहा “ जब वहाँ अच्छा था फिर वहाँ की छोड़ क्यों यहाँ आ गए?’
कुछ देर चुप रहा , कुछ न बोल कर आँख से आते आंसूं को रोकते हुए उसने फ़ोन से निकाल कर अपनी बीवी और छोटी सी बच्ची का फोटो दिखाया और भावुक हो कर कहा-
“ सर जी, मेरा दिमाग जो ख़राब हो गया था, माड़े दिन जो देखने थे”।
और आँख में आंसू भर कर जो कहानी सुनाई वह कुछ इस प्रकार है। वह पंजाब के फिरोजपुर जिले के मक्खू गाँव का रहने वाला है। वहीँ पैदा और बड़ा हुआ है, वहीँ आठवीं तक पढ़ा, कबड्डी और वॉलीबॉल का अच्छा खिलाडी रहा. उनके यहाँ खेती अच्छी होती थी और उसका बचपन सब तरह से खूब अच्छी तरह गुज़रा। उसने वहीँ खेती में अपने पिता की मदद करने लगा था। उन्होंने एक ट्रक भी ले लिया था जिसे वह ही चलाता था, छोटे भाई दलजीत ने दसवीं के बाद स्कूल छोड़ दिया और वह फौज में भर्ती होकर बाहर चला गया था. सब कुछ ठीक चल रहा था. जब बाईस वर्ष का हुआ उसकी शादी फिरोज़पुर जिले की तहसील जीरा के कोट शेखां नामक गाँव के खाते पीते किसान परिवार की लड़की हरलीन कौर के साथ हो गयी थी वह भी उसी की तरह तंदुरुस्त और मेहनती थी।
पिता और छोटे भाई के साथ सब मिल कर खेती करते थे। ट्रक खरीदने पर वह एक क्लीनर के साथ पंजाब से दूर दूर तक माल ढोने लगा था जिससे अच्छी आमदनी होती थी। सब कुछ ठीक ही चल रहा था। उसके साथ के बहुत से दोस्त अमेरिका में थे वहां से वे खूब डॉलर भेजते रहते थे, वहां के बारे में, खुशहाली व ठाठ और मौजमस्ती की जिन्दगी के बारे में सुनसुन कर वह भी यहाँ आने के हसीन सपने देखने लगा था, ट्रक चलाने में आमदनी तो ठीक थी परन्तु कई चक्कर तथा झमेले भी बहुत थे, रास्ते में जगह जगह पुलिस के नाके पर रोक कर किसी न किसी बहाने से तंग किया जाता और पैसा देना पड़ता था। कहीं सेल्स टैक्स का नाका कहीं आरटीओ के लोग सबको पैसा पूजना पड़ता। एक एक ट्रिप में घर से हफ़्तों बाहर पड़ता. एक दो बार डाइवर बाहर का लेकर ट्रक चलवाया वह अनुभव भी अच्छा नहीं रहा था. अमेरिका गए दोस्तों के घर आई संपन्नता देख कर, उनके घर में साथियों के टाईसूट काले रेबन के चश्मे में फोटो जिनमें बेक ग्राउंड में चमकती कार, सब चिड़ाते से दिखते. उनके घर में ‘भारत से भगे’इन मित्रों के लाये हुए बड़े बड़े स्टेचू ऑफ़ लिबर्टी , फ्रीडम टावर,एम्पायर स्टेट बिल्डिंग , वाइट हाउस, टाइम स्क्वायर की चका चौंध लिया आदि के पोस्टर दीवारों की शोभा बढ़ाते थे. जब देखता तभी विदेश भागने की इच्छा बलवती होती जाती।
गुरप्रीत के गाँव में एक एजेंट आया था जो नवयुवकों को आराम से अमेरिका भेजने मे अपने आप को सिद्ध बताता था, उसके की दोस्तों के कहने पर वह भी उससे मिला था, एजेंट ने गले में मोतियों की माला हाथ में सोने का मोटा कड़ा उंगलियों में हीरे व अन्य मूल्यवान नगों की अंगूठियाँ पहनी थी हाथ में स्विस रोलेक्स वाच, रेबन के गागल्ज़ आदि धारण किए हुए थे जिनसे हमें भी लगा कि अगर अमेरिका निकल गए तो हम भी य चीजें आसानी से ले सालते हैं। उसने कोई 20 मिनट में हमें भरमा लिया इच्छा तो पहले से ही थी अब जुनून बन गई थी। हम पूरे मेज़्मराइज़ हो गए थे ।
इसके बाद एजेंट ने बताया कि वह उनको वह बड़े आराम से अमेरिका पहुँचाने के रास्ते नक्शे पर दिखाए और वहां की मौज के बारे में मज़ेदार ढंग से बताया कर उसे मानसिक रूप से तैयार कर चुका था फिर उसने पैसा जुटाने के लिए उनके परिवार की ज़मीन ज्यादाद के बारे में पूछा सलाह दी कि अपने हिस्से को रहन कर या बेच कर इंतजाम कर लो तुम्हें तो वहीँ बीवी बच्चों के साथ रहना है, फिर तो पंजाब में बस घूमने आया करोगे । फिर गुरप्रीत के परिवार के बारे में पूछा, वे अच्छे कहते पीते थे खेत की जमीन भी उसके हिस्से में ठीक ठाक थी।
पर जैसे ही बात बात में जब एजेंट को पता लगा कि वह निशान सिंह मक्खू का भतीजा है वह एजेंट सकपकाया गया था और बाकी इंटरव्यू के लिए अगले कैंडिडेट को बुलाने और आगे की बात उसके चंडीगढ़ ऑफिस में आकार करने के लिए कहा था। पर उसके दिमाग में जाने का भूत सवार हो गया था और वह वहाँ भी पहुँच गया , उसने चंडीगढ़ में एक कोचिंग स्कूल चला रखा था, बोर्ड स्कूल था पर कोचिंग काम यह धंधा वहाँ ज्यादा चल रहा था। वहीं उसने खर्चे की पहली किश्त जमा की थी, घर वाले भी उसने तैयार कर लिए थे। चंडीगढ़ ऑफिस में एजेंट ने बताया बताया था कि वह यह जान कर डर गया था कि उसके ताया निशान सिंह का तो किसी समय पूरे मँड एरिया में बाद बहुत खोफ था शायद उसी बात से एजेंट उखड़ गया था । इसलिए गुरप्रीत ने उसे समझाया था कि ऐसी डरने की कोई बात अब नहीं है। खैर आराम से भेजने का खर्चा कोई 55 लाख बताया था जिसे स्टेजों में देना था। पूरा भुगतान अमेरिका पहुँचने पर होना था। गुरप्रीत के पिता भी उसके साथ चंडीगढ़ आए थे उनकी भी तसल्ली एजेंट ने कर दी थी।
उसकी कहानी की इस स्टेज पर मुझे भी बहुत आश्चर्य हुआ कि दुनिया कैसी गोल है, कभी 1990 के समय में चल रहे खलिस्तानी आंदोलन के दिनों इसी खालिस्तानी लिबरेशन फोर्स (के. सी. एफ.)के दुर्दांत खाड़कू यानि मिलिटेंन्ट निशान सिंह को पकड़ने के लिए दो प्लाटूनो के साथ मुझे रात भर गाँव में उसके घर को ऐम्बुश लगा घेर कर पड़े रहना पड़ा था। उसके फ़ायर करते करते बच कर भागने के प्रयास में एक गोली उसकी टांग में लगी थी, उसके गिरने पर उसे दबोच लिया गया था पर इस गोली बारी में अपने एक हवलदार को भी एक गोली लगी थी और वह शहीद हो गया था, बाद में पता लगा था कि कुछ महीनों वह जेल से भी अपने साथियों की मदद से निकल भगा था। बाद में 1992 में पंजाब पुलिस के इन्काउनर में पुलिस की गोलियों से उसकी मौत हुई थी। उसके मारे जाने की खबर तो अखबारों में ही पढ़ी थी और उस समय बड़ी बात थी। उसके इलाके में तो आतंकी निशान सिंह मक्खू को लोग शहीद मानते हैं, यह भी कहते हैं फर्जी इन्काउनर में पंजाब पुलिस ने उसे मारा था। भले ही उसने कितना ही खून खराबा किया हो लोगों की हत्या की हो, निशान सिंह ने 16 वर्ष कम उम्र में ही बस से उतार कर चार पाँच निर्दोष लोगों की हत्या की थी, के सी एफ जॉइन कर बाद में के सी एफ का बड़ा कमांडर माना जाता था।
अपनी कहानी लम्बी न करते हुए गुरप्रीत ने बताया कि कैसे ट्रक बेच, अपने हिस्से की कुछ ज़मीन बेच, व पैसे उधार ले यहाँ तक कुछ पैसे अपनी नई नई धनी ससुराल वह एजेंटों के इन्टरनेशनल गैंग ने यहाँ भेजा था । घर से चल कर वह पहले दुबई फिर एक दूसरी फ्लाइट से क्यूटो नामक जगह तक पहुँच गया जो इक्वेडोर नामक साउथ अमेरिका का देश है जिसका नाम भी उसने कभी सुना नहीं था।
यहाँ तक पहुँच कर पहले उसे लगा था कि शायद आधी जंग जीत ली थी, वहां एक सस्ते होटल में ठहरा दिया था यहाँ जो एजेंट का बंदा था छोड़ कर कई दिन के लिए गायब हो गया था. उसके पिंड के पास का एक बंदा जिसे वह जानता था भी वहां आया था जो वाया इथोपिया वहां पहुंचा था, अगले पांच छ्ह दिनों में 15 सोलह भारत से उसी जगह इकट्ठे हो गए थे वहां से उन्हें कोलंबिया ले जाया गया कंटेनर में सामान के साथ जैसे इंसान न होकर कार्गो हों उस यात्रा में बहुत कष्ट हुआ, यहाँ पर जो बंदे हमें हैंडल कर रहे थे वे दुर्व्यवहार का बुरा नमूना था वे बस हमें लूटने खसोटने और पैसा उगाहने लगे थे. उस ग्रुप में पंजाब, हरियाणा, यूपी की पीलीभीत, यहाँ तक की पाकिस्तान के बहावलपुर से भी हमारे जैसा पंजाबी बोलने वाला एक ड़ोंकी हमारे साथ था, उसने साफ़ कर बताया इस तरह की डंकीरूट से अमेरिका आदि देश जाने वालों को ये लोग डोंकी या कहते थे तथा ले जाने वाले डॉनकेर जो पूरा सताते थे। पता चला के ये लोग पहले ड्रग्स के स्मगलर के गैंग थे। बाद रास्ते में कुछ और मिलते वे भी गन पॉइंट पर लूटते रहते थे । बुरी तरह से फंस गए थे।
हर छोटा रास्ता तय करने के लिए ये लोग डॉलर डिमांड करते नहीं तो जंगल में छोड़ देने का डर रहता, इनके भी बहुत से गेंग थे जिनमें कई जगह आपस में झड़पें हुई और गोलियां चली। कई छोटी नदियाँ और स्ट्रीम या तो कपडे उतार सामान सर पर रख पार की या गहरा या तेज़ धार होने पर नाव से, क्रॉस करने के लिए प्रति आठ दस डॉलर धरवा लेते थे, उनकी मज़बूरी थी, बीच बीच में वेन भी मिलती वे भी अनाप सनाप पैसे धरवा लेते। सात आठ दिन ऐसे डोलते चलते कोलंबिया और पनामा के बीच सबसे कठिन यात्रा के लिए ‘डारियन गेप’ के एक छोर पहुंचे थे। यहाँ गाइड ने बताया कि आगे का पूरा हिस्सा खुद पैदल पार करना पड़ेगा जहाँ कीचड, दलदल, कीड़े, जहरीले सांप और घने जंगल हैं , जंगली जानवर, यहाँ तक की वनस्पति भी घातक है. जो राशन पानी है उसी के साथ चल पड़े थे,उसी से काम चलाना है दिन रात चलते रहोगे, बस पहुँच जाओगे अपनी मंजिल वह साथ चलेगा रास्ता दिखायेगा पर जो पीछे छुट जाएगा बस छुट जाएगा। देख कर सुन कर अपने अमेरिका ड्रीम और अपनी अक़ल पर गुस्सा और अफ़सोस हो रहा था, रोना आ रहा था। उसे लग रहा था कि उसमें ऐसे खतरनाक और मुश्किल रास्ते पर इतना लम्बा चलने की ताकत कहाँ है? पर ना आगे जाने न पीछे लौटना सम्भव था, बस रोते कलपते ‘वाहे गुरु वाहे गुरु सतनाम जी’ कह कर चलता रहा और उनका ग्रुप साथ साथ भूखा तिसाया अपने अपने इष्टों, गुरुओं, अल्लाह ताला को याद करता रहा । रास्ते में बारिश, धूप, कीचड़, तेज पानी की धाराएं, दलदल, सांप ,बिच्छू , कीड़े मकोड़े ,जोंक, ऊँची चढ़ाई, गहरी उतराई , हाँफते रूकते बिना सोये कैसे रास्ता पार कर गए बड़ा अचम्भा है. रास्ते में कई सड़ी दुर्गन्ध डोंकर या डोंकियों की लाशें मिली थी. पनामा पहुँचने पर उन्हें पहली बार बड़ी चैन मिली थी भले ही कितने ही कष्ट उठाए हों और बेहद कमजोर हो गए हों। रास्ते में उसे लगा था की शायद वह जिंदा वहाँ नहीं पहुँच पाएगा।
चाय पीते कहानी सुनते सुनाते काफी देर हो रही थी उसने बताया की उसने और उसके साथ के लोगों ने जब अमेरिका में बॉर्डर की दीवार पार्क की वहाँ उन्हे ड्रग स्मगलर के एक ग्रुप ने अपने काबू कर लिया था और उनके वर्तमान मालिक को सौंपा था जिसे सस्ते कृषि नौकरों की आवश्यकता थी। वे 2022 में आए थे तब तक डोनाल्ड ट्रम्प नहीं थे। अब तो ऐसे आने वालों को और भी मुश्किल हुई हैं ज्यादातर तो पकड़े गए हैं हथकड़ी बांध कर वापिस भेज दिए गए, और भी पकड़ धकड़ चल रही है, इस मामले में उनका मालिक उनकी बहुत मदद कर रहा है इस लिए पड़े हुए हैं। अब वापिस भए चले गए तो ज्यादा अफसोस नहीं होगा, हमारे लिए अमेरिकन ड्रीम उतना खराब नहीं हुआ जितना उन अभागों को जो काफी मारे गए या बिना कमाए बेरंग लौट दिए।
कहानी खत्म हो गई थी उसका मालिक कॉफी हाउस से बाजार की तरफ या रहा था। इसलिए गुरप्रीत लपक कर अपने स्थान पर पहुँच गया।
मैं भी उसके स्टॉल पर थैले ले कर पहुँच गया और काफी काफी मात्रा में सब्जी, फल और कुछ अन्य सामान जैसे उनके फार्म का एप्पल जूस , एप्पलसिडार, फार्म का शहद, चटनी और मुरब्बे खरीदे,अच्छा मोटा बिल बन था अंग्रेज़ मालिक खुश नज़र आया उनकी पहली बिक्री थी पहला पेमेंट था। मानने की बात थी कि सभी समान उच्च कोटी का तथा ताज़ा था।
फार्मर बाज़ार में लोग बढ़ते जा रहे थे। अब गुरप्रीत से बात करना सम्भव नहीं था मैं आगे का किस्सा भी जानना चाहता था सो वापिस घर आ गया. दिमाग में गुरप्रीत और उसके जैसे भारतीयों पर दया आ रही थी कि उन्हें और उनके घर वालों को अमेरिकन ड्रीम कितना महंगा पड़ता है कितना दुखदायी साबित होता है। मेरे लिए गुरप्रीत का निशान सिंह मक्खू जैसे दुर्दांत आतंकवादी खाडकू से पुराना सम्बन्ध था- जिसे 35 वर्ष पहले मेरी कमान में हमारी फ़ोर्स ने एक मेम्बर ऑफ़ दी फ़ोर्से को खोकर पकड़ कर पंजाब पुलिस को सौंपा था। उन दिनों उस ने पंजाब के पूरे मंड इलाके में भारी आतंक मचाया हुआ था, उस के डर से कोई भी उस के बारे में बताने के लिए मुंह नहीं खोलता था। मेरे दिमाग में घूम रहा था जब एस एस पी आर पी शर्मा ने बताया था कि निशान सिंह ने उसी को चैलेंज किया था और कहा था कि निशान सिंह उसके बेटे को ही स्कूल से अगवा करेगा या तो उसके जेल में बंद साथियों को अगले पाँच दिन में रिहा कर दे। एस एस पी की खुफिया जानकारी के आधार पर हमने उसे उसी के घर घेर लिया था। उस दिन वह रक्षा बंधन के दिन अपनी एकलौती बहन से राखी बँधवाने के लिए आया और उसे जखमी कर राखी की जगह हथकड़ी पहना कर हिरासत में लिया था, उसके बाद वह लंगड़े के नाम से भी जाना जाता रहा, एक साल के करीब बाद वह जेल से निकल भागने में कामयाब हो गया था और उसके बाद एक मुठभेड़ में 1972 में मारा गया था। उसी के भतीजे गुरप्रीत की डंकी रूट और अमेरिकन ड्रीम की कहानी और संस्मरण का किस्सा ही यह कहानी है। 35 साल पहले गुरप्रीत के ताऊ से साबका हुआ और अब 36 वर्ष बाद भतीजे से ,जो तब पैदा भी नहीं हुआ था।
उसका कहना था कि जब भी वह अपने देश लौटेगा गाँव गाँव घूम कर नवयुवकों को समझाएगा कि अपने देश की सूखी रोटी भी बाहर विदेश जाकर नौकरी करने से लाख जगह अच्छी है। और ये एजेंट इनको तो पकड़ पकड़ फांसी लगनी चाहिए। बहका कर पता नहीं कितने लोगों के बर्बाद कर चुके हैं और कर रहें हैं। यही या इससे मिलती जुलती सभी डंकी राउट से अमेरिका पहुँचने की कहानियाँ हैं। लिखते समय तो डंकी यात्रा से इस तरह पहुंचने वाले गुरप्रीत जैसे कामयाब नहीं होपा रहें हैं पकड लिए जाते हैं। कई तो वहीं भागने की कोशिश में गोली का शिकार हो जाते हैं ,या पकड़े जाने पर उन्हें जानवरों की तरह पकड़ बांध कर निर्वासित किया जा रहा है। सुनकर शर्म भी आती है की मेक्सिको के बाद सबसे ज्यादा गैर कानूनी ढंग से अमेरिका में आए लोग भारतीय हैं ।