Lineage and Legacy Part 5 in Hindi Moral Stories by prem chand hembram books and stories PDF | वंश और विरासत भाग :- ५

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वंश और विरासत भाग :- ५


वंश और विरासत भाग :-५
अगला प्रसंग — आत्मसम्मान और रिश्ते
सरला को अस्पताल में भर्ती हुए दस दिन बीत चुके थे। सफल ऑपरेशन के बाद उसकी तबीयत में काफी सुधार आया था। डॉक्टरों की निगरानी में अब वह धीरे-धीरे सामान्य जीवन की ओर लौट रही थी।
आज भादो मुर्मू भी सरला को देखने अस्पताल पहुँचे थे। पांडेय जी और उनकी पत्नी सरला के बेड के पास बैठे थे। इधर-उधर की बातें चल रही थीं। तभी डॉक्टर प्रधान अपनी नियमित विजिट पर आ पहुँचे।
उन्होंने सरला की जाँच की, कुछ जरूरी बातें पूछीं और फिर सती दा को अपने साथ केबिन की ओर ले गए।
सती दा ने चिंतित होकर पूछा, "भाई, सब ठीक तो है न?"
डॉक्टर प्रधान ने मुस्कराते हुए कहा, "हाँ सती दा, अभी तो सब ठीक है। लेकिन दिल के मामले में लापरवाही नहीं की जा सकती। इन्हें पूरी तरह आराम की जरूरत है। मेरा सुझाव है कि कुछ दिनों के लिए इन्हें आपकी बेटियों के पास भेज दीजिए। वहाँ इनकी अच्छी देखभाल हो सकेगी।"
सती दा ने पास बैठे पांडेय जी की ओर देखा।
पांडेय जी बोले, "डॉक्टर साहब, आपकी बात तो ठीक है, लेकिन सती दा अकेले पड़ जाएँगे।"
डॉक्टर प्रधान ने सहजता से कहा, "अरे भाई, अपनी ही बेटियाँ हैं, कोई गैर तो नहीं। दोनों मिलकर अपने माता-पिता की देखभाल कर लेंगी। इसमें परेशानी कैसी?"
तभी भादो मुर्मू ने डॉक्टर की ओर देखते हुए कहा, "हाँ सती दा, भाभी के लिए कुछ दिनों तक अपनी जिंदगी उनके हिसाब से जीनी पड़ेगी। आखिर उनका स्वास्थ्य सबसे जरूरी है।"
सती दा कुछ देर चुप रहे। फिर धीमे स्वर में बोले, "भाई, मैंने जिंदगी भर स्वतंत्र होकर जीवन जिया है। किसी पर बोझ बनकर रहना मुझे भीतर से कचोटता है।"
तभी पांडेय जी की पत्नी ने आकर बताया, "रूपा और पूनम भी आ गई हैं। दोनों अपनी माँ के पास बैठी हैं।"
डॉक्टर प्रधान उठते हुए बोले, "आइए भाई, अब सरला को भी देख लेते हैं।"
सभी लोग वापस कमरे में आ गए।
रूपा और पूनम ने एक साथ कहा, "गुड मॉर्निंग अंकल!"
डॉक्टर प्रधान ने मुस्कराकर जवाब दिया, "गुड मॉर्निंग!"
फिर उन्होंने रूपा की ओर देखकर कहा, "रूपा, तुम्हारी माँ अब काफी स्वस्थ हैं, लेकिन इन्हें सख्त आराम की जरूरत है। तुम खुद डॉक्टर हो, इसलिए मेरी सलाह है कि कुछ दिनों तक इन्हें अपने पास रखो।"
रूपा ने तुरंत जवाब दिया, "जी अंकल, मैं माँ को अपने साथ ले जाऊँगी।"
तभी पूनम ने पिता की ओर देखकर कहा, "और पिताजी, आप अकेले रहकर क्या करेंगे? कुछ दिन मेरे यहाँ रहिए।"
सती दा ने लाचारी भरी नजरों से सरला की ओर देखा।
सरला ने दोनों बेटियों से कहा, "बेटी, क्या ऐसा नहीं हो सकता कि हम दोनों साथ ही रहें?"
रूपा अपने सास-ससुर के स्वभाव को अच्छी तरह जानती थी। वे दोनों काफी एकांतप्रिय थे। दुनिया-जहान के सामाजिक मेलजोल में उनकी विशेष रुचि नहीं थी। परिवार उच्च शिक्षित था, लेकिन सामाजिक संबंधों के मामले में थोड़ा संकोची था।
रूपा ने माँ का हाथ पकड़कर कहा, "माँ, इसमें परेशानी कैसी? आप दोनों हमारे साथ चलिए। पूनम और मैं मिलकर आप दोनों की देखभाल कर लेंगी।"
भादो मुर्मू अनुभवी व्यक्ति थे। उन्होंने सती दा के चेहरे को ध्यान से देखा। वे समझ गए कि सती दा वहाँ जाना नहीं चाहते थे।
लेकिन वे यह भी जानते थे कि सती दा अपनी पत्नी सरला से कितना प्रेम करते हैं।
सरला भले ही अधिक पढ़ी-लिखी नहीं थी। गाँव के कुछ लोग उसे अनपढ़ और नासमझ समझते थे, लेकिन सती दा के लिए वह जीवन की सबसे बड़ी साथी थी। उन्होंने ही उसे हस्ताक्षर करना सिखाया था, ताकि उसे कभी किसी के सामने अंगूठा न लगाना पड़े।
इसी बीच काउंटर से फोन आया।
"आपका बिल तैयार है। आप भुगतान करके मरीज को घर ले जा सकते हैं।"
डॉक्टर प्रधान कुछ देर पहले ही वहाँ से चले गए थे। अब वे दोबारा कमरे में आए।
उन्होंने कहा, "भाई, बिल तैयार हो गया है। रूपा, सारे कागजात लेकर मुझसे मिल लेना। कुछ जरूरी हिदायतें भी देनी हैं।"
रूपा और सती दा ने एक साथ कहा, "ठीक है, डॉक्टर साहब। बिल का भुगतान करके आते हैं।"
सभी लोग कैश काउंटर की ओर बढ़े।
सती दा ने काउंटर पर बैठे कर्मचारी से पूछा, "भाई, कितना बिल हुआ है?"
कर्मचारी ने कंप्यूटर की स्क्रीन देखते हुए जवाब दिया, "दो लाख पचासी हजार रुपये।"
सती दा के कदम वहीं ठिठक गए।
उनके पास अब कुछ भी नहीं बचा था। वे कुछ क्षण तक उस रकम को सुनकर चुप खड़े रहे। मन में कई विचार एक साथ उठने लगे। उन्होंने कभी अपनी बेटियों के सामने हाथ नहीं फैलाया था। आज पत्नी के इलाज का बिल उनके सामने खड़ा था।
वे सोच नहीं पा रहे थे कि अब क्या करें।
तभी उनका मोबाइल बज उठा।
स्क्रीन पर डॉक्टर प्रधान का नाम चमक रहा था।
सती दा ने फोन उठाया।
"जी भाई..."
डॉक्टर प्रधान की आवाज आई—
"सती दा, आप जरा मेरे केबिन में आइए। आपसे एक जरूरी बात करनी है।"
सती दा ने पूछा, "कोई विशेष बात है क्या भाई?"
डॉक्टर प्रधान कुछ क्षण चुप रहे, फिर बोले—
"हाँ सती दा, बात थोड़ी जरूरी है। आप अकेले आ जाइए।"
सती दा ने फोन काटा और एक बार फिर बिल की पर्ची की ओर देखा।
उनके चेहरे पर चिंता की लकीरें और गहरी हो गईं।
क्रमशः...